पाहीमाफी [५] : विद्या-विद्यालय-छूतछात

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग”  , तिसरका भाग , चौथा भाग , के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई ५-वाँ भाग:     16838136_1774772422548857_416297774_n

  • विद्या-विद्यालय-छूतछात

ज्यादा ना गुन गावा साथी
अपने आँखी देखे बाटी
पेड़े-पालव कै जात हुवै पर
मनई मा बस यक्कै जाती
मुला काव कहै अध्यापक कां
स्कूल म जाति कै जड़ खोदैं
ठाकुरे कां वै ‘बावू साहब’
बाभन कां ‘पंडित जी’ बोलैं
सब कहैं ‘मौलवी’ मुसलमान कां
‘मुंशी’ बाकी जाती कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जो जाति-पाँति कै ज़हर रहा
कुलि इस्कूलेन मा भरा रहा
जे पढ़त रहा वोकरे माथे पै
ऊँच-नीच भी लिखा रहा
देखतै हमकां छाती फाटै
तिरछी आँखी रहि-रहि ताकै
‘हमरे बेटवा के बगल बइठ
ई धोबिया सार पढ़त बाटै’
वै तौ कहि कै बस खिसिक लिहिन
यक तीर लाग हमरे दिल मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

देखा यक दिन कि हद होइ गय
कलुवा चमार कै भद पिटि गय
अँजुरी से पानी पियत रहा
यक उंगुरी लोटा मा छुइ गय
कछ्छा दुइ मा ऊ पढ़त रहा
दुनिया-समाज से सिखत रहा
इस्कूले मा हल्ला होइ गय
कि जान-बूझ कै छुवत रहा
झाऊ कै डंडा घपर-घपर-घप
सिच्छा पाइस पीठी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

खुब सुबुक-सुबुक कलुवा रोवै
रहि-रहि मुँह हाथे पोछि लियै
लइकै तख्ती- झोरा-बोरा
पेड़े के नीचे खड़ा रहै
रोवत-सोवत फिर जाग गवा
जइसै कि रस्ता पाय गवा
यक ढेला जोर से पटक दिहिस
औ भूईं थुकि कै भाग गवा
वहि दिन के बाद से ना देखा
वोकाँ कउनौ इसकूले मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जे जहाँ रहा ऊ वहीँ खड़ा
आतंकी लोटा रहा पड़ा
पिपरे कै चैली बीन-चून
सब ढूह लगाइन बहुत बड़ा
खुब नीक आग दहकाय लिहिन
डंडा से लोटा डारि दिहिन
जब लाल-लाल लोटा होइ गय
बाहर निकारि ठंढाय लिहिन
यक बड़ी समिस्या दूर भवा
जंग जीत लिहिन मैदाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

पूछैं सवाल देखैं जब भी
पावैं जवाब वै सही-सही
तब सीधे मुँह बोली बोलैं
केतनौ पढ़बा रहिबा धोबी
जियरा मा सीधै तीर लगै
हम मन मसोस चुप रहि जाई
माई बोलिन यक काम करा
अबसे ना दिहा जवाब सही
नाहीं तौ अइसन नज़र लगी
कि लागी आग पढ़ाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

खेतिहर ठकुरे कै यक लरिका
खुद पढ़ै न पढ़ै दियै हमकां
यक दिन कसि कै झगरा होइ गै
बोलिस बाहर पीटब तुंहकां
समझअ थ्या काव तू अपुवां कां
मुंह लाग्या न हम जाईअ थै
जेतना तोहार औकात बाय
वतनां तौ दारू पी लीअ थै
हम रहेन डेरान घरे आयन
माई समझाइन तब हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कहूँ से आवत रहा करेठा
हमसे बोला कहौ बरेठा
पढ़ि लेबा के कपड़ा धोई
फांदौ ना किस्मत कै रेखा
बोलेन हम बोली बोलत हौ
जो कहत हया ऊहै करिबै
दस बिगहा खेत नावं लिख द्या
आजै से हम नाहीं पढ़िबै
ऊ बोला बहुत चलांक हवा
अंगारा तोहरे बाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

दादा कहैं कि चला घाट पै
बइठा हया बना धमधूसर
तबौ सवेरे करी पढ़ाई
कउनौ काम करी ना दूसर
माई  तब वन्हैं समझावैं
बहुत काम बा वकरे ऊपर
करै द्या वोकां जवन करत बा
गठरी धइ द्या हमरे ऊपर
काम करे के वोकर संती
के जाई  इसकूले मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

तू लिहें किताब खाट तूरा
औ’ काम करैं बूढ़ी-बूढ़ा
खबवा बनि कै तइयार भये
कूँड़ा यस पेट भरा पूरा
पहिरै कां नीक-नीक चाही
काटी उँगरी मुत त्या नाहीं
नोखे मा हया पढ़ैया तू
देहियाँ धुनियात तोर नाहीं
आगम देखात बाटै हमकां
सूअर पलबा तू घारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पँचवां दरजा जब पास किहेन
माई कै चेहरा खिला-खिला
बोलिन मेहनत से खूब पढ़ा
औ गाँव छोड़ि बाहर निकरा
यहि गाँव म काव धरा बाटै
सीधे कै मुँह कूकुर चाटै
खेती ना धन-दौलत-पूँजी
खाली गँहकिन कै मुँह ताकै
पढ़ि-लिखि लेत्या दिन बहुरि जात
उजियार हुअत हमरे कुल मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पढ़वइया नीक रहा साथी
जाती मा नीचे से अछूत
पहिरे फटही जन्घिहा-आगाँ
सथवैं उ जाय रोज इस्कूल
बोला अब कइसै काव करी
गवने आई  बाटीं मेहरी
कच्छा नौ नाहीं पास किहेन
गटई ठेंकुर कै फाँस परी
जिउ कै खंइहस–कपछई बहुत
बाटैं घनघोर गरीबी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

माई तोहार दुलरुवा लरिका
पढ़ी न अबसे लइ ल्या बस्ता
लावा परसा खाना खाई
आज दिमाग बहुत बा खट्टा
कागज़-कलम कां पइसा नाहीं
देहीं ढंग कै कपड़ा नाहीं
बाभन-ठाकुर रहत हैं अइंठे
काव करी घर बइठे-बइठे
जाबै हम परदेश कमाय
आग लगै हरवाही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

माई रोवैं कहि ना पावैं
अपने शकि भै खुब समझावैं
सोचत रहेन कि पढ़ि-लिखि लेबा
जिनगी  नाहीं  होई  रेंगा
बाप कहैं कुछ करै क चाही
कब तक करिबै हम हरवाही
मुन्नी बोलिस भइया जाया
हम्मै ताईं खेलौना लाया
ठौरिग होय कै सोच लिया तू
दुविधा ना पाल्या मन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भिनसारे यक दिन उड़ी हवा
‘तेजू खां’ चुप्पे भाग गवा
मेहरारू घूंघुट मा सुसकै
महतारी बोलै गजब भवा
केव कहै कि लरिका रहा नीक
परदेश चला गै भवा ठीक
पढ़वइया बनत रहे सरऊ
अब जाय क् मागयँ हुवां भीख
केव कहै कहूं न गै होई
गइ होई नाते-बाते मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

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7 responses to “पाहीमाफी [५] : विद्या-विद्यालय-छूतछात

  1. दीपक त्रिपाठी

    मजा आइ गवा भैय्या पढी के

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