यादगारी: ‘पहिलका डर’_राघव देवेश

जेठ-असाढ़ कय महीना, गरमी पुराजोर रही। दुपहरिया कय खाना लावय क भुलाय गा रहेन। पेट कोर्रा गिनत रहा। गरमसत एतना रहा कि पूछव न, लसलसी गरमी दिमाग झंड किहे रही। उमसत खूब रहा, बादर घेरे रहा, लागय कि बरसे जरूर। खाना नाहीं खाये रहेन यही के मारा छठयें घंटा मा चहरदेवारी फांदि के इसकूल से चंपत होइ लिहेन। घरे आयेन, अम्मा मिलतय पूछिन –- ‘का रे, इसकूल से काहे एतनी जल्दी भागि आयव?’ हम कहेन –- ‘मास्टर नाहीं आवा रहे, काव करतेन, सोचेन कि घरे चलिके गाय-गोरू कय चारावारा निपटाय ली। अम्मा कहिन –- ‘ठीक बाय लेकिन पहिले खाना खाय लियव अउर बोरिया बिछाइके घर कय काम पूर कै लियव। हँ..अउर खेलय तौ जायव न, नाहिँत काटिके पिठासा धइ दियब।’

कुछ देर बाद पिता जी बजारी से भुट्टा लइ के आये। गुड़िया बहिनी भूजब सुरू किहिन अव सबही मिलि के चबायन। सँझलउख हुअत रहा, बदरियान मौसम मा मुरैलौ बोलत रहे। गौधिरिया देखि के गुड़िया बहिनी लालटेन कय सीसा साफ करब सुरू किहिन। माटिक तेल भरे के बादि मा लालटेन बारि के डुढ़ुई पै धरिन, तीन दाँय संझा-माई क ध्यायिन। दुइ घरी भय नाहीं कि टुपुर-टुपुर बुंदियाय लाग। पता लाग कि लालटेन के किनारे दुइ चार पाँखी लहरियाय लागीँ। यनहीं के लभक्के मा यह दुइ बिहतुइयौ पहुँचि गयीं। नल के चौकी पै पानी छहराय के ह्वईं लालटेन धय दीन गय। ताकि पँखियै वही वारी पानी मा मरयँ-खपयँ। यनहीं के डर से खाई-पिया जल्दी होइ गय। मुल पानी बुँदियाइ के रहिगा। लाइट तनिका भै लुप्प असे भय कि मुन्ना के खेते कय टरांसफारम धाँय से उड़ि गा। लियव भईया, अब तौ बिजलियौ न आये। खाई-पिया होइगय तब सबही आपन-आपन कथरी-गुदरी लइके पक्का(छत) पै पहुँचि गा। पानी बुँदियाय के कारन पक्का ठंढान रहा, नाहीं वइसे तौ जेठ-असाढ़ कय घाम सहिके गरम तावा अस जरा करत हय। सबही पहुँड़ब सुरू किहिस। कुछ देर तौ हम धुरुब तारा औ सप्तरिसी हेरत-हेरत बितायन। यही के बिच्चे कब औंघाय गयन, पतै न लागि।

अबहीं सोये आधव घंटा न भा रहा कि सुकुल के पुरवा की वारी से धाँय-धाँय कय अवाज सुनाय परय लागि। हम अहदंक के मारा उठि-बैठि परेन। माई हमार हाँथ पकरि लिहिन। काहे से कि हम नींद मा कौने वारी ढर्रियाय जाई, पता नाहीं। केहू कहय कि हथगोला दगा तौ केहू कहय कि गोली चली। यक दुसरे के वारी से खेखारा-खेखारी हुवय लाग। अलगू, मास्टर अव सुकुल –- यै सबही सोचतय रहे कि चलि के तनी आरव लीन जाय। सबही आपन लाठी-डंडा सहेजत रहे कि अतनेन मा पुरुब टोला मा हलचल मची कि चड्ढा-बनियाइन गिरोह वाले लाव-लसकर के साथे निकरि परा अहयँ; यही वारि आवत जनाय परत अहयँ। सभय चौकन्ना होइगा अव अपने-अपने छते पै हाथे मा अद्धा लइके खड़ा होइगा। वहि सइती चोरी-चकारी कय अतना अहदंक रहा कि मनई अपनी हिफाजत के ताईं अपने छते के कोने पै रोड़ा-अद्धा कुरियाये रहत रहा। ताकी कौनौ समय जरूरति परय तौ इस्तेमाल कीन जाय। अस जनान कि चड्ढा-बनियाइन गिरोह वाले दुसरी वारी मुँड़ियाय गये। तब तनिका सबके जिउ मा जिउ आवा।

लगभग आधा घंटा के बाद फिन नरक मचा। हलचल भै कि मुँहनोचवै उतरत अहयँ। हउँफा उड़ा रहा कि यहिसाइत मुँहनोचवा अउर मुँड़कटवा उधिरान बाटे जौन कि टीबी के अंटीना से सिगनल लइके अकास से उतरत थीं; यनके खउफ से आरी-पौस्त कय मनई आपन अंटीना परमानेंटली उतारि के धै दिहे रहा…मुँहनोचवा कय बाति सुनतै हमार माई कहिन अंटिनवा तौ दिनै मा उतारि दीन गा रहा, तौ कयिसे!/? तब तक अलगू चिल्लाने कि सुकुल भैया कय लरिकवा आपन लगाय लिहे रहा महाभारत देखै के ताईं। गोहराई-गोहरावा भय। वै सरऊ जल्दी से आपन नट-बुल्ट ढील करिन। तौ सबकै जिउ थोरक्‌ ठन्टुट भा। अतनेन मा मोखड़ी वाली बगिया मा कुछ टारच लपलपाय लागीं। केहू कहिस कि मनई आम बीनत होये, तब तक सुगदेव चिल्लाय परे –- ई तौ सारै चोर बत्ती लिहे बाटे। ई बत्ती गाँव मा केहू के लगे थोरय अहय! यह दाईं फिर सबकै धुकधुकी बढ़ी। हमार तौ भूसी खसक गय रही। जिउ यक सौ पचास के उपरै धुकधुकात रहा। अब मन कहय कि अलगू औ सुगदेव जइसे मनइन का केहू चुप कराय दियै। पर करय के? गाँव भय जब जागि गा तब मनई, केहू लाठी केहू डंडा अऊर गाँव मा दुन जने के लगे बंदूक रही, वहू लाइसेंसी, वहिका लइके तनी आरव लियै बहिरियाने। आगे बंदूक वाले, पाछे डंडा-गोजी वाले। करत-करावत चारि बजिगा। डर के मारे नींद उड़नछू होइगै। घर कय मनई कामकाज मा बाझि गये। हम पाँच बजे भिनसारे डेरात-डेरात सोइ गयेन।

deveshदुसरे दिन दस बजे आँखि मुलमुलावत उठेन। उठेन तौ देखेन सबही बड़ा अफसोसात रहा। भगतिन बैठी रहीं; उनका बस इहै कहत सुनेन कि ‘बेचारे बड़ा नीक मनई रहे, अपना मरे मुला घरे वालेन का बचाय लिहिन।’ सोवय के पहिले अलगू दिमाग खराब किहे रहे अऊर अब भगतिनौ खराब खबर सुनाइन। हम उठतय अपनी बहिनी से पूछेन, तब पता लाग कि सुकुल के पुरवा मा जौन पुजारी कै बाप रहे वै राति मा चोरन का गाँव मा हलत देखि लिहे रहे अउर देखतै गोहरावय लागे –- ‘का हो! के हुवौ! कहाँ जात बाटेव!’ पता नहीं कयिसे वै ताड़ लिहे रहे कि वै सब चड्ढ़ा-बनियाइन गिरोह वाले रहे। औ ठाँवैं जोर-जोर से चिल्लाय लागे कि सबही जागि जाव हो, यह देखौ सारय… …। तब तक वहिमा से यक मिला उनपै हथगोला मारि दिहिस अउर चट्टय उनकय आँती-पोती बहिरियाय गय। खैर… अब काव कीनय जाय सकत हय! मजमा देखिके अलगुवौ मुँहे मा दतुइन कूँचत पहुँचि गये अउर यक नयी खबर सुनाइन कि काल्हि तौ भईया गजब होइगा रहा। पिता जी पूछिन –- काव हो? अलगू कहिन –- अरे भईया कुमारे ताले पै मछरी कय निगरानी करय आवा रहे। सुकुल भईया चोर समझि के बंदूक से निसाना साधि लिहे रहे लेकिन हियात रही कुमारे कय कि सुकुल भईया का सुबहा लागि गय कि कहूँ तलवा पै कुमरवा न हुवै! काहे से कि ऊ रोज तीन से चारि के बीच मा मछरी क दाना डारय आवत हय। हाँ भईया, तौ कुमारे मरत-मरत बचे।

सबका पुजारी के बाप कय बड़ा अफसोस रहा। बाता-कहानी के बाद सबही अपने थाने-पवाने होइ लिहिस। ई हमार पहिलका डर रहा जेहमन हनुमान चालिसव पढ़े से काम न चला। हम भूते क सम्हारि लिहेन पर मुँहनोचवा से हमार जान हलक मा अटकि गय। दुइ दिन तौ बरबस रारि ठानि लिहेन औ इसकूल न गयेन।

राघव देवेश अवधी कय युवा कवि-लेखक हुवयँ। पढ़ाई; जल्दियै ग्रेजुएसन पूर भवा, एम्मे कy तैयारी मा अहयँ। इनसे आप  9910618062 पै संपर्क कय सकत हयँ। 

One response to “यादगारी: ‘पहिलका डर’_राघव देवेश

  1. बड़ा नीक लिख्यो है.

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