अवधी साहित्य की समस्या और आचार्य कवि श्याम सुंदर मिश्र ‘मधुप’

इंटरनेट पै मधुप जी के अवधी अवदान क ध्यान मा रखिके लिखा ई पहिल आलेख आय। यहिते पहिले बस आप  उनके साथ भवा यक इंटब्यू जरूर देखि सकत हँय। यहि आलेख क बड़े लव से युवा अवधी अध्येता सैलेन्दर सुकुल लिखिन हैं। हम उनकय बहुत आभारी हन्‌। : संपादक
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*शैलेन्द्र कुमार शुक्ल

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मधुप जी के साथ शैलेन्द्र शुक्ल

अवधी कविता अपने आप में ही आचार्यत्व की एक खरी कसौटी है। जिस भाषा में जायसी, तुलसी और रहीम जैसे आचार्य कवि हुये हों उस भाषा की कविताई के साथ खिलवाड़ नहीं हो सकती। भाषा का अपना एक चरित्र होता है, इस प्रकार हर भाषा अपने स्वभाव का इतिहास और भूगोल अपनी संस्कृति में रचती है। मध्य काल की प्रारम्भिक अवस्था से ही अवधी का विराट वैभव काशी से कान्यकुब्ज तक दिखाई पड़ता है जब की इसका केंद्र अवध ही था । पं॰दामोदर शर्मा के ग्रंथ ‘उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण’ से लेकर जगनिक के आल्ह-खंड तक इसे देखा जा सकता है।इसी भाषा में सूफी कविता की एक स्ंवृद्ध परंपरा मिलती है, जिसकी तुलना विश्व के किसी भी पुराने साहित्यिक और सांस्कृतिक आंदोलनों से की जा सकती है। ऐसा विराट आंदोलन और व्यापक पहल शायद फिर कभी दिखाई नहीं पड़ी। इस काव्यपरंपरा के लगभग सारे कवि मुसलमान थे। इन मुसलमान कवियों ने अवधी की जो साझा संस्कृति रची वह अवधी और हिन्दी में ही नहीं विश्व साहित्य में भी एक महत्वपूर्ण मिसाल के तौर पर पेश की जा सकती है। यह काव्यधारा एक संक्रमण की संस्कृति है, जहां भाषा एंटी-वाइरेस का काम करती है। मानवीय मूल्यों का कलात्मक संरक्षण भाषा के साहित्यिक होने का बड़ा प्रमाण है। एक प्रश्न यहाँ जायज है इन सूफी कवियों ने अवधी भाषा को ही क्यों चुना ?जबकि अवधी के साथ-साथ समय का अनुगमन ब्रज-भाषा भी कर रही थी औरब्रजभाषा का स्वाभाविक चरित्र प्रेम के लिए ज्यादा निकट था, प्रेमगाथाओं के अनुकूल भी ! इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि ब्रजभाषा प्रबंध के लिए तैयार न थी और दूसरा यह कि इन सूफी कवियों को केवल प्रेम ही स्थापित करने का लक्ष्य न था । वह जीवन के विविध पक्षों की विराटता लिखना चाहते थे। कुछ सूफी कवि इसी तरह के प्रेमाख्यानक अन्य लोक भाषाओं में भी लिख रहे थे, लेकिन जो ऊंचाई अवधी के प्रेमाख्यानों की है वह अन्यों की नहीं। यह अवधी भाषा के सामर्थ्य का एक जोरदार पहलू है।

डॉ॰ श्याम सुंदर मिश्र ‘मधुप’(1922-2014)अवधी साहित्य के पहले इतिहासकर हैं। वह अवधी के प्रगतिशील कवि और आचार्यत्व के गुणों से परिचित एक प्रबुद्ध आलोचक भी। उनका लोचनात्मक व्यक्तित्व लोक की समाजशास्त्रीय पद्धति के आलोक में दिखाई पड़ता है । उन्होंने अपनी मातृभाषा अवधी में बड़ा काम किया । और यह कम महत्वपूर्ण नहीं कि जब स्थापित खड़ीबोली हिंदी को लेकर एक दूसरे की पीठ सहलाने वाले लोग विद्वता का ढोंग बड़े बड़े के नाम पर सिर्फ हिंदी का ढिढोरा पिटा जा रहा हो, संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषाओं में हिंदी को शामिल किए जाने का दबाव बढ़ रहा हो, यह सब जिन लोगों द्वारा किया जा रहा हो उन्हें यह मालूम ही न हो कि हिंदी आखिर है क्या ! इनकी नजर में क्या हिंदी के पहले कवि हरिऔध हैं ! बहरहाल हिंदी के विदूषकों ने यहीं माहौल बना रखा है । हिंदी के महत्वपूर्ण आलोचक डॉ॰ मैनेजर पाण्डेय की यह उक्ति कितनी प्रासंगिक है ‘आजकल भूमंडलीकरण की जो आँधी चल रही है हर बुद्धिजीवी स्थानीय होने से पहले राष्ट्रीय बन जाना चाहता है और राष्ट्रीय होने से पहले अंतरराष्ट्रीय’। इससे हिंदी का कोई हित होने वाला नहीं है यह बात तो तय है । डॉ॰ मधुप ऐसे ही कठिन समय में उस हिंदी के लिए काम करते रहे जो हिंदी जायसी, तुलसी और रहीम की हिंदी थी । जिस हिंदी पर हिंदी साहित्य के इतिहासकारों ने मध्यकाल से ही ताला लगा दिया था । और यह भी विचारणीय तथ्य है कि भक्तिकाल में अवधी हिंदी का स्वर्णयुग रच रही थी,संत और भक्त कवियों की वाणी इसी भाषा का वैभव बनी । इस युग में यह भाषा अपने स्वभाव को और भी स्वाभाविक बना चुकी थी । इसका यह भी बड़ा प्रमाण है कि इस भाषा ने राजदरबारों में जाने से परहेज किया । इस तरह रीतिकाल भर यह भाषा चुप्पी साधे रही यानी ‘रहिमन चुप ह्वै बैठिए देखि दिनन को फेर’ लेकिन यह चुप्पी एक लंबी लड़ाई की तैयारी कर रही थी, जिसकी वही स्वाभाविक धमक और उतनी ही तेज धार आधुनिक युग में दिखाई पड़ती है । डॉ॰ ‘मधुप’ अपने ग्रंथ ‘अवधी साहित्य के इतिहास’ में अवधी की आधुनिक कविता का प्रस्थान बिंदु काशी के बाबू भारतेन्दु हरिश्चंद्र को मानते हैं ।भारतेन्दु के बारे में अपनी बात रखते हुये वह कहते हैं “अपनी काव्यभाषा को ब्रज-भाषा रखते हुये भी उन्होंने अपनी सामयिक रचनाओं के लिए जनभाषा अवधी की सादगी का सहारा लिया”। यहाँ मधुप जी अवधी को जन भाषा इस लिए भी कह रहे हैं क्योंकि अवधी लंबे समय तक हिंदी भाषी प्रान्तों की संपर्क भाषा रही है । इस तथ्य की ओर सुनीति कुमार चटर्जी ने ‘उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण’ की भूमिका लिखते हुये इशारा किया था जिसे डॉ॰ रामविलास शर्मा ने काफी उधेड़बुन के बाद स्पष्ट रूप में व्याख्यायित किया है ।

डॉ॰ मधुप का इतिहास ग्रंथ अवधी की पुरानी परंपरा को परखते हुये अवधी की आधुनिक साहित्य परंपरा की एक महत्वपूर्ण खोज है । डॉ॰ मधुप शहरों की साहित्यिक चकाचौंध और विमर्शों के झंडाबरदारों से बचते हुये हिंदी की उस स्वाभाविक परंपरा को साधने का काम किया जिसे विद्वता के अभिमानी दिहाती बोली कह कर छुट्टी ले लेते हैं ।वह पक्के दिहाती थे और दिहाती होना उनकी स्वाभाविक विद्वता का सबसे मजबूत पहलू । उन्होंने अंत तक अपने गाँव मैनासी-सरैयां (सीतापुर) को नहीं छोड़ा । वह आर॰एम॰पी डिग्री कॉलेज, सीतापुरमें अध्यापन कार्य करते हुये खुद को देहाती हिंदी के लिए समर्पित कर दिया । उन्होंने अवधी में बड़ा काम किया । वह मूलतःअवधी कवि थे और कविताई का आचार्यत्व उनमे था । उनके काव्यग्रंथ ‘गाउँ का सुरपुर देउ बनाइ’,‘जगि रहे गांधी केर सपन’,‘खेतवन का देखि-देखि जीउ हुलसइ मोर’ तथा ‘घास के घरौंदे’ अवधी साहित्य की निधि हैं । इन किताबों की कवितायें आज भी बूढ़े किसानों के मुह सीतापुर के आस-पास के गांवों में सुनने को मिल जाएंगी । इसके अतिरिक्त उन्होंने अवधी की उस विरासत को सहेजा, जो बिखरीपड़ी थी उसे संपादित किया । इस तरह के ग्रन्थों में ‘वंशीधर शुक्ल ग्रंथावली’,‘अवधी की राष्ट्रीय कवितायें’, आदि प्रमुख है । उन्होंने अवधी की साहित्य परंपरा को आगे बढ़ाते हुये कई महत्वपूर्ण शोध-ग्रंथ और आलोचना पुस्तकें दीं जिनमें ‘परंपरा के परिपेक्ष्य में आधुनिक अवधी काव्य’,‘आधुनिक अवधी काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ’,‘अवधी काव्यधारा’,‘अवधी कविता की नई लीक के प्रवर्तक: बलभद्र प्रसाद दीक्षित ‘पढ़ीस’’, तथा ‘अवधी के आधुनिक कवि’ प्रमुख हैं । इसके अतिरिक्त जिसके आधार पर उन्हें अवधी का रामचन्द्र शुक्ल कहा जाता है वह है ‘अवधी साहित्य का इतिहास’ । इस इतिहास ग्रंथ में उन्होंने जो बहुत ही जटिल और मुश्किल काम को अंजाम दिया वह है आधुनिक अवधी साहित्य की खोज । अवधी के आधुनिक साहित्यकारों का साहित्य जो सहज उपलब्ध नहीं मिलता,क्योंकि यह राजकमल, वाणी, और ज्ञानपीठ से नहीं छपा।इधर हाल ही में जगदीश पीयूष द्वारा संपादित अवधी ग्रंथावली वाणी प्रकाशन से छप चुकी है लेकिन इसमे भी आधुनिक कवियों की सिर्फ एक–एक कविता संग्रहीतहै। यह साहित्य बहुत कुछ आज भी अप्रकाशित ही है और जो भी छपा है वह स्थानीय छोटे-छोटे प्रकाशनों से। इनमें से अधिकांश प्रकाशन अब बंद भी हो गए हैं । और जो चालू हालत में हैं उनके पास पुरानी पुस्तकें उपलब्ध नहीं है और नई छापने की हिम्मत अब उनमें नहीं, क्योंकि बाजार में इनकी मांग नहीं है। अवधी के तमाम साहित्यकार जो इस बदहाली में मर गए, या अपने अंतिम पड़ाव पर जीवित हैं, उनके घर वाले या वे स्वयं किसी अपरिचित को साहित्य देने में संकोच करते हैं,कि कहीं वह इसे अपने नाम से न छपवा ले । कई लोलुपों ने यह किया भी। अवधी की इसी आधुनिक पीढ़ी में मधुप जी भी थे जो जाते-जाते यह महत्वपूर्ण काम कर गए जिसे उनके अलावा कोई मुश्किल से ही कर पता। मधुप जी के पास एक दुर्लभ पुस्तकालय था। इस बात का प्रमाण उनका यह ग्रंथ है।

मधुप जी ने इस किताब में साहित्य के इतिहास लेखन की दृष्टि हिंदी साहित्य के इतिहास से ग्रहण की। और यह ही इस किताब की सबसे बड़ी कमजोरी है। उन्होंने अवधी की आधुनिक काव्यधारा में छायावाद और रहस्यवाद जो दिखाया है वह बेमतलब की चीज है। अवधी की नई लीक के प्रवर्तक बलभद्र दीक्षित ‘पढ़ीस’ अपने प्रारम्भिक अवस्था से ही पूर्णतः प्रगतिशील थे। उनकी कावताओं में प्रगतिशीलता के वह गुण विद्यमान हैं जिन्हे हिंदी कविता की मूल (या बेमूल) धारा में खोजना आज भी मुश्किल है। रही बात रमई काका की जो छायावाद के बाद की उपज हैं। सिर्फ इन दो कवियों के यहाँ मधुप जी ने छायावाद और रहस्यवाद देख लिया और इन दोनों के बीच की कड़ी वंशीधर शुक्ल को सीधे छोड़ दिया क्योंकि यह कवि स्वतन्त्रता आंदोलन के समय क्रांति का अलाव जलाए बैठा था । अब जब अवधी में छायावाद या रहस्यवाद नहीं था तो नहीं था,उसे जबरन ठेल कर पता नहीं क्या प्रमाणित करना चाहते थे । बहरहाल इसके आगे उन्होंने अवधी की प्रगतित्रई की जो स्थापना की और उसकी जो ऐतिहासिक पड़ताल की वह अपने आप में बहुत ही महत्वपूर्ण है । इन कवियों के साथ मधुप जी ने साहित्य की ऐतिहासिक ऊर्जा दिखाई । मधुप जी ने अवधी की प्रगतिशील परंपरा की एक लंबी कतार दिखाई । कवियों के बारे में भी लिखा और कविता के उदाहरण भी दिये । अवधी में हो रहे गजल और नवगीत लेखन को भी रेखांकित किया। इसके अतिरिक्त इस ग्रंथ में उन्होंने अवधी की पुरानी परमम्परा जो दोहा-चौपाई-बरवै की थी वह आधुनिक अवधी में कब तक चलती रही और उसमे क्या-क्या लिखा जाता रहा ,यह सब दिखाया है जो अपने आप में एक इतिहास दृष्टि का मानक है ।

इस प्रकार हम देखते हैं मधुप जी ने लगभग 300 आधुनिक अवधी कवियों का हवाला देते हुये उनकी कविताओं के जिस प्रकार उदाहरण दिये हैं वह अपने आप में एक बहुत ही जटिल और निहायत मुश्किल काम था क्योंकि यह अवधी साहित्य के इतिहास का पहला ग्रंथ है । साहित्य के इतिहास का पहला ग्रंथ लिखना कितना मुश्किल होता है यह बताने अवश्यकता नहीं । मधुप जी नें यह बड़ा काम किया है । जिसके लिए साहित्य प्रेमी उनके सदा ऋणी रहेंगे।

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शैलेन्द्र कुमार शुक्ल
शोधार्थी: म.गां.अं.हिं.वि.वि.,वर्धा (महाराष्ट्र)
मो.07057467780
ई-मेल: shailendrashuklahcu@gmail.com 

2 responses to “अवधी साहित्य की समस्या और आचार्य कवि श्याम सुंदर मिश्र ‘मधुप’

  1. Pradeep Tripathi

    بہت بہت بڑھائی ساتھ

  2. अस्मुरारी नंदन मिश्र

    शैलेन्द्र भाई ने बढ़िया लिखा है| इन कथित रूप से बेमूल लेकिन वास्तव में मूलवान और मूल्यवान साहित्य की पड़ताल जरुरी है| एक आलोचक पर पूर्ण आलोचकीय दृष्टि दी है|
    हाँ! सूफी साहित्य के सन्दर्भ में ‘लगभग सारे मुसलमान’ लिखने से बेहतर था ‘ज्यादातर मुसलमान लिखना..

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