छपरा कस उठी!

ई निबंध, छपरा कस उठी, भारतेंदु जी कै लिखा आय। भारतेंदु जी अवधी कै, यहि दौर कै, अहम गद्य लेखक हुवैं। इनकै दुइ उपन्यास, ‘नई रोसनी’ औ ‘चंदावती’, आय चुका हैं। यै दिल्ली मा रहत हैं। इनसे आप ०९८६८०३१३८४ पै संपर्क कय सकत हैं।: संपादक
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भारतेन्दु मिश्र

भारतेन्दु मिश्र

 “छपरा कस उठी”__भारतेन्दु मिश्र

जुगु बदलि गवा है। अब कउनेउ ट्वाला मा जाति बिरादरी वाले याक साथ बइठै-क तयार नाई हैं। जी के तीर पैसा है वहेकि ठकुरई। उनका छपरा तौ जस पहिले उठति रहा है, वइसै अबहूँ उठी मुला गरीबन क्यार छपरा को छवाई? जो कउनिउ तना ते छाय ले तौ फिर ऊका उठावै वाले जन कहाँ ते अइहैं।

गरीबी हटावति हटावति कइयौ सरकारै हटि गयीं। गरीब दुखिया जहाँ खड़े रहैं हुआँ ते अउरु पीछे हटि आये, मुला गरीबी न अब लौं हटी है, न जल्दी हटै वाली है। अमीरी-गरीबी के पाटन मा आपसदारी धीरे-धीरे पिसी जाय रही है। तीका कोई इलाजु नाई है।

अब जब नोटन ते रिस्ता जुड़ि गा है तो बेइमानी-बदमासी औ मक्कारी करै मा जो साथु दे, जिहिकी बदौलति नोट मिलैं, वहै रिस्तेदार है, वहे से आपसदारी है। छपरा बिनु आपसदारी, न तौ छावा जाय सकी न उठावा जा सकी औ जौ आगि लागि जाय तौ बुझावौ न जाय सकी। हमरी लरिकईं मइहाँ सब याक दुसरे क्यार छपरा छवावै अउरु उठवावै जाति रहैं। अबहूँ छपरा उठवावै-क न्यउता आवति है मुला अब टाला-टाली कइकै सब अपन जिउ चोरावति हैं। जीके हाथेम लाठी है तीके सगरे काम हुई रहे हैं। कुछ जन तौ तिकड़म ते आपन काम निकारि रहे हैं, तेहूँ गाँव मा अइसन मनई जादा हैं जिनके काम कउनिउ तना नाई हुइ पाय रहे हैं। अइसे टेम मइहाँ उनका छपरा कस उठी?

अब न उइ सैकरन बाँसन वाली बाँसी रहि गई हैं, न छपरा खातिर बाँसै जुहाति हैं। फूस धीरे-धीरे फुर्रु हुइ गवा है। हाँ ऊँखन कै पाती औ झाँखर जरूर मिलि जाति हैं। बड़क्के किसान तौ पक्की हवेली बनवाय रहे हैं छोटकए कच्ची देवालन पर लेसाई लौ नाई कइ पाइ रहे हैं। मजूरी-धतूरी ते जो संझा तके लोनु रोटी जुरि जाय तौ जानौ बड़ी भागि है। कंगाली के साथै मँहगाई मुर्गा बनाये है। लकड़ी कटि-कटि राती-राता सहरन मा जाय रही है। फारेस्ट वाले खाय-पीकै सोय रहे हैं। हमका तुमका तौ थुनिहा औ चियारी तक नाई मिलै वाली है, बाता मइहाँ पगही बाँधे छपरा कै दिन रुकी, अरे रुकी कि ठाढ़ै न होई।

अइसी-वइसी बइठै ते, बीड़ी फूकै ते या सुर्ती मलै ते कुछु काम बनै वाला नाई है। लरिकई-म जब छपरा उठवावै जाइति रहै तौ बड़ा जोसु रहै, गाँव केरी ऊँची-नीची सब जाति क्यार आदमी आवति रहै। “अउरु लगा दे…हैंसा, जोर लगा दे..हैंसा। पुरबह वार खँइचौ रे, दखिनह वार थ्वारा रेलि देव” – ई तना के जुमला यादि आवति हैं। तब मालुम होति रहै गाँव ट्वाला सब कुछु अपनै देसु है।

तब जहाँ चहौ तहाँ चट्ट-पट्ट छपरा धरि दीन जाति रहै। अब न तौ रमजानी अपने ट्वाला ते अइहैं, न सुच्चा सिंह रामपालै केरि उम्मेद है। अइसे बुरे वखत मइहाँ कहाँ मूड़ु दइ मारी।

छपरा, जीमा कइयौ सिकहर लटके होति रहैं, कहूँ-कहूँ छोटकई चिरइया आपन *घरघुच्चु बनउती रहैं, जिनके ऊपर कबहूँ लउकी कबहूँ कदुआ केरि फसलि मिलति रही, जीपर बिलैया टहलती रहैं, जीके तरे जिंदगी-मउत, दीन-दुनिया केरि सब बतकही होति रहै, जीके तरे घरी भरि बइठि कै राहगीरौ जुड़ाति औ सँहताति रहै, जहाँ दुपहरिया मा कबौ किस्सा-कहानी, कबौ सुरबग्घी, औ कबहूँ कोटपीस ख्याला जाति रहै – अब उइ दिन कहाँ? अब जब प्यारु, दुलारु, मोहब्बति औ भइयाचारु नाई रहिगा तौ छपरा छावा जाय चहै न छावा जाय। उठवावा जाय चहै न उठवावा जाय, हमरी बलाय ते।

*घोसला
(‘कस परजवटि बिसारी’ किताब से)

2 responses to “छपरा कस उठी!

  1. BAHUT BADHIYA

  2. Pingback: अवधी गद्य में अनंत शक्ति है : त्रिलोचन | अवधी कै अरघान

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