उमेश कुमार सिंह चौहान केर कविता-१ : भारत भुइं तुम्है बोलाय रही!

कवि उमेश जी से हमैं सात कवितन कै प्राप्ति कुछ रोज पहिले भै रही। सब कवितै सुंदरि हैं, सबमा कथ्य की ताजगी के साथ रूप(फोर्म) कै सधाव बड़ा बढ़िया अहै।  इन सात कवितन का दुइ पोस्टन मा रखै कै योजना है, जेहिके तहत पहिले स्वाधीनता – बर्तमान मा यहिके अरथ अउर आसय – क केंन्द्र मा रखत कवितन क प्रस्तुत कीन गवा है। यहिके बाद दुसरी पोस्ट मा दुसरे मनो-मिजाज कै कविता रहे। (संपादक)

कविता (१) : म्वार देसवा हवै आजाद

म्वार देसवा हवै आजाद,
हमार कोउ का करिहै ।

कालेज ते चार-पाँच डिग्री बटोरिबै,
लड़िबै चुनाव, याक कुरसी पकरिबै,
कुरसी पकरि जन-सेवक कहइबै,
पेट्रोल-पंपन के परमिट बटइबै,

खाली गुल्लक करब आबाद ॥
हमार कोउ का करिहै ।

गाँधी रटबु रोजु आँधी मचइबै,
किरिया करबु गाल झूठै बजइबै,
दंगा मचइबै, फसाद रचइबै,
वोटन की बेरिया लासा लगइबै,

फिरि बनि जइबै छाती का दादु,
हमार कोउ का करिहै ॥

संसद मां बैठि रोजु हल्ला मचइबै,
देसी विदेसी मां भासनु सुनइबै,
घर मां कोऊ स्मगलिंग करिहै,
कोऊ डकैतन ते रिश्ता संवरिहै,

धारि खद्दर बनब नाबाद,
हमार कोउ का करिहै ॥

बहुरी समाजवाद जब हम बोलइबै,
आँखिन मां धूरि झोंकि दारिद छिपइबै,
भारत उठी जब-जब हम उठइबै,
भारत गिरी जब-जब हम गिरइबै,

कोऊ अभिरी करब मुरदाद,
हमार कोउ का करिहै ॥

कविता (२) :  भारत भुइं तुम्है बोलाय रही 

भारत भुइं तुम्है बोलाय रही, ना रुकौ ठिठुकि अब बढ़े रहौ ।
झाखरु कटिगा मुलु ठूंठु ऐसि, अब ना ख्यातन मां खड़े रहौ ॥

सोने कै चिड़िया माटी भै, कुछु मति हमारि अस काटी गै,
सत मंजिला कै बसि नींव सुनौ खाली बरुआ ते पाटी गै,

ढहि गईं मंजिलै अलग न तुम निचली मंजिल मां पड़े रहौ ॥
… … ना रुकौ ठिठुकि अब बढ़े रहौ ।

भुइं मोरि चंदरमा ऐसि रहै, मुलु राहु-केतु सब गांसि लिहिन,
परदेसी चतुर चिरैयन का चुपके लासा मां फांसि लिहिन,

अब इधर बढ़ौ या उधर बढ़ौ, ना चौराहे पर खड़े रहौ ॥
… … ना रुकौ ठिठुकि अब बढ़े रहौ ।

तुम्हरे असि जूनन के द्वारा जो मानवता का बोझु बंधा,
वहु छूटि बिथरि गा मुला तबौ जूना अस ऐंठबु तुम्हैं सधा,

चिलवलि की तितुली जैसे तुम ना हवै हवा मां उड़े रहौ ॥
… … ना रुकौ ठिठुकि अब बढ़े रहौ ।

मंगता कुबेर के लरिका भे, हथिनी के पैदा मूसु भवा,
उइ कांटा पांयन सालि रहे जिनके बेरवा हम खुदै बोवा,

बिनु मढ़े ढोलकिया ना बाजै सो बार-बार तुम मढ़े रहौ ॥
… … ना रुकौ ठिठुकि अब बढ़े रहौ ।

तुम पांच रहौ अब अनगिनतिन, च्यातौ अब तत्व बिचारि लेव,
अपनत्व छूटि गा दुनिया ते, अब आपन स्वत्व संभारि लेव,

तुम गदहा, घोड़ा के संकर, खच्चर पर अब ना चढ़े रहौ ॥
… … ना रुकौ ठिठुकि अब बढ़े रहौ ।

तुम का कुपंथ कै अमरबेलि हरियर बेरवा असि झुरै दिहिसि,
मेहनति तुम्हारि सब फुरि होइगै, बिसु भरा घाव कोउ दुखै दिहिसि,

अब सजग होउ ना माटी के माधौ बनिकै तुम परे रहौ ॥
… … ना रुकौ ठिठुकि अब बढ़े रहौ । 

कविता (३) : पन्द्रह अगस्त का भारत मां

कबहूँ सूखे माँ झूमि मेघ जस सूपन जलु ढरकावत है,
पन्द्रह अगस्त का भारत मां वैसन आजादी आवत है ।

कहुँ झूरा परिगा ख्यातन माँ, कहुँ कुरिया बहिगै बहिया माँ,
असि कीमति वहिकै घटी मनौ लगि राहु-केतु गे रुपया माँ,
जिनका हम समझा कर्णधार, उइ करनी करि घरु भरै लागि,
गांधी-नेहरू कै कसम खाय , व्यापार वोट का करै लागि,

जैसे घनघोर अँधेरिया माँ जुगनू प्रकाश फैलावत हैं,
पन्द्रह अगस्त का ………।

मनई का मनई चूसि रहा, कुछु इरखा-दोखु ऐस बढ़िगा,
जस मेझुकी किरवा लीलत है, मेझुकी का  साँपु चट्ट करिगा,
दुमुही असि जिम्मेदार हियां, जिनका बसि दौलत प्यारी है,
जेतना आगे वोतनै पीछे, इनकै कुछु हालति न्यारी है,

जैसे चम्पा कै झूरि कली सारी बगिया महकावति है,
पन्द्रह अगस्त का ………।

सबु कीन धरा माटी मिलिगा, छल-छंद क्यार रोजगारु चढ़ा,
जस काटे ते हरियाय दूब, वैसय दुइ नम्बरदार बढ़ा,
घर मां अभियान चला अस की, आबादी मां खुब रंग सजे,
जैसे ई पैंसठ बरसन मां, नब्बे करोड़ देवता उपजे,

जैसे चौराहे पर कबौ-कबौ हरि गाड़ी बिरिक लगावत है,
पन्द्रह अगस्त का ………।

अब ‘चंद्रयान’ पूजौ लेकिन पूंजिव का तो कुछु ख्याल करौ,
जो कर्जु चढ़ा हरि मूड़े पर, वोहिका तो तनिक मलाल करौ,
अंग्रेजन यहिका खुब चूसा, दुइजहा देशु यहु भारत है,
परि जाई ज्यादा बोझु अगर, तौ यहिका मरबु यथारथ है,

जैसे स्वाती की बूँदिन ते पपिहा निज प्यास बुझावत है,
पन्द्रह अगस्त का ………।

***  ***

कवि-परिचय : इन कवितन क लिखै वाले कवि उमेश कुमार सिंह चौहान मूल रूप से लखनऊ-अवध से ताल्लुक रखत हैं। यै १९८६ से भारतीय प्रशासनिक सेवा के केरल कैडर के तहत कार्यरत अहैं। यै १९९३-९४ मा जापान सरकार द्वारा आयोजित ‘शिप फॊर वर्ड यूथ’ मा भारतीय जवानन के दल कै नेतृत्व किहिन। यै केरल औ भारत सरकार कै प्रतिनिधि बनिके यू.एस.ए., यू.के., जापान, जर्मनी, स्विटजरलैंड, ग्रीस, यू.ए.ई., सिंगापुर स्रीलंका, मालदीव….आदि देसन कै यात्रौ किहिन। यहि साइत नई दिल्ली मा केरल सरकार के रेजीडेंट कमिस्नर के रूप मा तैनात अहैं। उमेश जी खड़ीबोली-हिन्दी के वर्तमान कविता परिदृश्य कै बड़ा नाम है अउर इनकै कयिउ पुस्तक आय चुकी अहैं। हुजूर कयिउ सम्मानन से नवाजा जाय चुका हैं। इनसे आप umeshkschauhan@gmail.com पै संपर्क कै सकत हैं। मोबाइल नं. है  +91-8826262223

2 responses to “उमेश कुमार सिंह चौहान केर कविता-१ : भारत भुइं तुम्है बोलाय रही!

  1. Pingback: उमेश कुमार सिंह चौहान केर कविता-२ : काहे बुझी सोच कै बाती! | अवधी कै अरघान

  2. bhanu pratap singh

    BHANU PRATAP SINGH
    मनई का मनई चूसि रहा, कुछु इरखा-दोखु ऐस बढ़िगा,
    जस मेझुकी किरवा लीलत है, मेझुकी का साँपु चट्ट करिगा,
    दुमुही असि जिम्मेदार हियां, जिनका बसि दौलत प्यारी है,
    जेतना आगे वोतनै पीछे, इनकै कुछु हालति न्यारी है,
    UMESH SIR JI AAPKI KAVITA M HAMRE DESHWA KAI DASHA JAUN BAKHAN KEENI GAI HAI.IN NETAN KA JARUR YAH SANDESH BHEJA JAY K CHAHI.
    T&K

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