अकेलपन औ जिन्दगी कै राह!

कहत हैं कि अकेल परत मनई कमजोर हुअत जात है. चारिउ तरफ से. मुल अलग ढंग से सोचे पै पता चलत है कि यू भगवान की तरफ से बनावा संजोग आय. जाहिर तौर पै केहू भले खुद क तकलीफ मा पावै लेकिन ई बिध कै संजोग आय कि ऊ आगे की जिन्दगी मा पोढ्हातय जात है. यहिलिये जब अस हुवै तौ यहिका भगवान की तरफ से कीन नीमन इसारा मानेक चाही, जिन्दगी कै तुंहुसे तनिका मांग बढ़ि जात है कि मजबूत बनौ, बस्स!

कयिउ बार हम अपने चारिउ वारी देखित है कि फालतू के लोगन कै भीड़ रहत है. हम नाहीं जान पाइत कि वै फालतू हैं अउर मौका आये पै टरि जइहैं. यही समय हुअत है उनके पहिचान कै. ‘रहिमन बिपदा हूँ भली जो थोड़े दिन होय’! बिपदा आये पै तकलीफ थोड़ेन दिन कै रहत है, इन थोड़े दिनन मा मनई खुदै सिखि जात है कि कैसे यू बिपत्ति आसान होये. मुल असली लाभ यू है – ‘हित-अनहित यहि जगत मा जानि परत सब कोय’!

अक्सर हम भीड़ वाले दिनन मा अपने संघरी कयिउ अइसे लोगन क पाइत है जे अपनी मौजूदगी से हमैं असहज किहे रहत हैं. जरूरी नाय है कि वै हमरे साधे कुछ घात करैं, हम मेर-मेर के लिहाज के चलते असहज रहित है. फिर यकायक लागत है कि बत्ती गुल भै, चारिउ वार अन्हेरै-अन्हेर! हम भरोसा के टेकनी से टेकत-टेकत खुद का सम्हारत आगे बढ़ि जाइत है. कुछ समय हम अन्हेरे मा रहित है. फिर भिनसार हुअत है. हमैं लागत है कि चौगिर्दा सूनापन है औ हम अकेल हन. जिन्दगी क लैके हमार सोच बदलत है. कहाँ भीड़ से भरा अन्हेर, कहाँ अंजोर से भरा आज! यहि सूनेपन मा हम अपने क कुदरती चीजन के बहुत नगीच पाइत है. लागत है कि हमरे चारिउ वारी कै सूनापन उम्मीदन से भरा है, सूनेपन का अंजोर भरे है, अंजोर कै एक-एक कन जइसे उम्मीद कै सूरज हुवै! कुदरती चीजैं हमरी आत्मा क सबसे जादा छुवत् थीं. यै हमैं सबसे जादा मजबूत करत् थीं. सबसे जादा भरोसा देवावत् थीं!

महाभारत कै यक परसंग अहै, किसन भगवान कुंती महरानी से कहत हैं कि मनचाहा बरदान मांगौ. कुंती उनसे दुःख मांगत् थीं. कुंती कहत् थीं कि दुःख रहे तौ हे प्रभू तोहार याद न बिसरे! अगर हम भगवान क सुमंगल, सच्चाई अउर सुबिचार कै परतीक मानी तौ हम अपने ऊपर पड़ी मुसीबतन के ओढ़रे इंसानियत अउर अच्छाई के सबले करीब रहित है! [ अमरेन्द्र / डायरी / २९-५-२०१२ ]

5 responses to “अकेलपन औ जिन्दगी कै राह!

  1. अकेलेहे म मनई क आपनि अउ अपने दोस्तन कै पहिचान होति है |जब कउनो दुखु आवथ तबहीं आपन-परार जानि परथ !

  2. अमरेन्द्र जी — कुछ दिनों से मुझे अपने ज़िन्दगी को लेकर ऐसा लग रह था कि “बत्ती गुल भै, चारिउ वार अन्हेरै-अन्हेर!” तो आपका यह निबन्ध पढ़कर, मुझे थौड़ा साहस मिला। पहले मुझे लग रहा था कि सूनापन किसी चीज़ के अभाव का निशान है, लेकिन जैसे आपने लिखा, “हमरे चारिउ वारी कै सूनापन उम्मीदन से भरा है।” एकदम सही। — टाईलर ‘प्रवासी’

    • टाईलर साब’, आपको पोस्ट करीब लगी, भरोसे-दार लगी, समझिये कि लिखने की अर्थपूर्णता!

  3. भावुक मामला। अब सहज हो गये होगे।

  4. ऐसन सहेला से तो भगवन बचान्वे ,

    संत कबीरदास कह गए

    ऐसे प्रीत न कीजिये , जस खीर ने कीन .
    उपरे से तो गोल है , भीतर फांके तीन

    औरे एक शायर लिखिस

    दोस्ती उस से करो , जिसका भी सीना साफ़ हो .
    ज़ात में कम्ज़ात हो , लेकिन बात में अशराफ हो .

    मतलबे यह हुए के अपन यार बानवे के पहिरे , मनइ कईओ बार बिचार करो ,

    औ रहे अकेलापन केर बात तो इ सब आज क्यार जीवन चर्या के कारन होए रहा ,
    सबन्हि मनइ इस घुड दौड़ माँ भागी रहें , कौनो का कौनो क्यार चिंता नहीं ना ,
    इ दुनिया माँ सब पैसा के पीछे नतमस्तक आंहीन ,

    औ इ महंगाई भी वाहे का बढ़ावा देत है ,

    मानसिक रोगन क्यार रूगी बढ़ रहें ,यह से हमार यह मतलब नहीं की लोग पगुर्या गएँ आंहीन
    क्रोध , हिंसा , दीपरेस्सन आदि क्यार सीकार.

    सायकेत्रिस्त केर पास जावे से सरमाय का नही चाही , इ डाक्टर यह माँ से निकरे क्यार उपाय बतावत हैं.

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