अवधी लोकगीत : नाव मुसहरवा है..!

हमरे लिये गर्व कै बाति है कि सोसित लोगन की ब्यथा क बानी दियै वाले लोकगीतन से लोकभासा भरी है, ई लोकभासा कै बिसेस पहलू है। लखनऊ मा भये एक अवधी साँझ मा श्री माता प्रसाद ‘मितई’ जी (पूर्व राज्यपाल – अरुनाचल प्रदेस) पधारे रहे। तरे दीन लोकगीत ‘नाम मुसहरवा है’ मितई जी कै लिखा है। मितई जी अपने कंठ से यहिका हुवाँ प्रस्तुत किहे रहे, जेहिकै रिकार्डिंग हमरे लगे गिरिजेस भइया के जरिये पहुँची। यहि गीत मा मुसहर जाति की व्यथा कै मार्मिकता से रू-ब-रू हुआ जाय:

लोकगीत: नाव मुसहरवा है!

नाव मुसहरवा है, कउनउ सहरवा ना,
कैसे बीते जिनगी हमार। (टेक)

जेठ दुपहरिया में सोढ़िया चिराई करी,
बहै पसिनवा के धार।
बँहगी मा बाँधि लेई चललीं लकड़िया,
आधे दाम माँगै दुतकार ।१। नाव मुसहरवा है..

मेघा औ मगर गोह, साँप मूस खाई हम,
करी गिलहरिया सिकार।
कुकुरा के साथ धाई, जुठवा पतरिया पै,
पेटवा है पपिया मड़ार ।२। नाव मुसहरवा है..

रहइ के जगह नाही, जोतइ के जमीन कहाँ,
कहैं देबै गाँव से निसार।
घरवा के नमवा पै एकही मड़ैया में,
ससुई पतोहू परिवार ।३। नाव मुसहरवा है..

तनवा पै हमरे तो, फटहा बसनवा बा,
ओढ़ना के नाही दरकार।
जड़वा कइ राति मोरि, किकुरी लगाइ बीतै,
कउड़ा है जीवन अधार ।४। नाव मुसहरवा है..

अब ढकुलहिया में पतवा मिलत नाहीं,
कैसे बनई पतरी तोहार।
दुलहा दुलहिनी कै डोली लै धावत रहे,
उहौ रोजी छीनी मोटरकार ।५। नाव मुसहरवा है..

मारै थानेदरवा बलाइ घरवा से हमैं,
झूठइ बनावै गुनहगार।
जेलवा में मलवा उठावै मजबूर करै,
केउ नाहीं सुनत गोहार ।६। नाव मुसहरवा है..

देसवा आजाद अहै, हमही गुलमवा से,
हमरे लिये न सरकार।
एस कौनउ जुगुति बतावा भइया ‘मितई’,
हमरउ करावा उरधार ।७। नाव मुसहरवा है.. 
___कवि श्री माता प्रसाद  ‘मितई’

अब सुना जाय ई लोकगीत मितई जी के कंठ से:  

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