यक इंकलाबी कविता : ‘धुतू-धुतू’ (~कवि उन्मत्त)

  आधुनिक अवधी कविता के खास कवियन मा गिना जाय वाले आद्या प्रसाद ‘उन्मत्त’ कै जनम १३ जुलाई १९३५ ई. मा प्रतापगढ़ जिला के ‘मल्हूपुर’ गाँव मा भा रहा। यै अवधी अउर खड़ी बोली दुइनौ भासा मा लिखिन। ‘माटी अउर महतारी’ उन्मत्त जी की अवधी कबितन कै संग्रह है। अवधी गजलन और दोहन के माध्यम से काफी रचना किहिन। इनकै काब्य-तेवर ललकारू किसिम कै है: “तू आला अपसर बना आजु घरवै मूसै मा तेज अहा, / अंगरेज चला गे देसवा से तू अबौ बना अंगरेज अहा।” प्रस्तुत कबिता ‘धुतू-धुतू’ मा इंकलाबी तेवर देखा जाय सकत है: 

कविता :   ‘धुतू-धुतू’ (~कवि उन्मत्त) 

नई भीत उठा थै पुरान भीत गिरै, भैया धुतू-धुतू। हो भैया..!

बरखा कै रतिया गढ़ानि अँधियरिया,

चारिउ मू से बही झकझोरि के बयरिया,

लूटै लागे पहरू धरम धन दुइनौ,

हे हो राम! लगा तुहीं अब तौ गोहरिया,

मारा ईखनवाक मूड़ उतरै, हो भैया धुतू-धुतू। हो भैया..!

नकली समाजबाद खोखली अजादी,

पपवा प परदा महतिमा क खादी,

जेकरे रकतवा से बेदिया गै लीपी,

ओकरे असनवा पै बैठिगे फसादी,

मारि के ढकेलि द्या न सोझै उतरै, हो भैया धुतू-धुतू। हो भैया..!

डकुआ लुटेरुआ क राज तनी देखा,

झपटै कबुतरी प बाज तनी देखा,

अपुना महलिया म करै रंगरेलिया,

देसवा क बूड़ै थै जहाज तनी देखा,

होइजे मरद ऊ लँगोट पहिरै हो, भैया धुतू-धुतू। हो भैया..!   

देहिया उधारि के करावै नाच नंगा,

हड़वा बहाइ के मचावै हुड़दंगा,

नवा नवा सपन सुनावै भिनुसारे,

देसवा क लूटि के बनावै भिखमंगा,

अपुना अखंड खर खाइ औचरै, हो भैया धुतू-धुतू। हो भैया..!

अखिया म पनिया मना म चिनगारी,

निकरा पुरुब से पुरुस अवतारी,

दौड़ि चला गाँव गाँव टेरा थै जवानी,

जेका होये दुधवा पियाये महतारी,

दुधवा कै लाज करै दौड़िके भिरै, हो भैया धुतू-धुतू। हो भैया..!

नई नई भीत उठै नवा खपरैला,

घरा खटै गोरिया सेवनिया म छैला,

ठुम ठुम ठुमकै औ मारै किलकारी,

अगना म ललना बगिचवा मुरैला,

खेतिया कियरिया बसंत लहरै, हो भैया धुतू-धुतू। हो भैया..!

चन्दा मामा धावै लिहे दूध कै कटोरिया,

हँसि के अँगनवा म उतरै अँजोरिया,

सास जी कै छोहिया ननद कै ठिठोली,

अपने लिलार पै गुमान करै गोरिया,

फिर से धरतिया सरग उतरै, हो भैया धुतू-धुतू। हो भैया..!

जहाँ तहाँ धूम करै कल कारखनवा,

महकै मजरुवा के मथवा पसिनवा,

सिमवा के मोरचा पै गरजै जवानी,

खेतवा के मोरचा प चमकै किसनवा,

बलिया से मोतिया कै दनवा झरै, हो भैया धुतू-धुतू। हो भैया..!

अँखिया भै निदिया औ भुखिया भै दाना,

लजिया भै कपड़ा सरब सुख माना,

अवा गवा देखिके जुड़ाइ जाइ छतिया,

केहू क दरद दुख रहै न बेगाना,

गोरुआ किनाहीं केउ न अपुनै चरै, हो भैया धुतू-धुतू। हो भैया..!

नई भीत उठा थै पुरान भीत गिरै, भैया धुतूतुतू। हो भैया..!

— कवि आद्याप्रसाद ‘उन्मत्त’

2 responses to “यक इंकलाबी कविता : ‘धुतू-धुतू’ (~कवि उन्मत्त)

  1. जहाँ तहाँ धूम करै कल कारखनवा,

    महकै मजरुवा के मथवा पसिनवा,

    सिमवा के मोरचा पै गरजै जवानी,

    खेतवा के मोरचा प चमकै किसनवा,

    बहुत खूब!
    जीवन के रंग और ओज को गाती कविता!
    आभार!

  2. Pingback: नोट्स : कवि ‘उन्मत्त’ कै कविता-१ | अवधी कै अरघान

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