टीड़ी महराज कै किस्सा (१) : मातरी भासा

किस्सा : मातरी भासा 

राजा कै दरबार लाग रहा। दरबारिन के संघे आसन पै फक्कड़ सुभाव कै टीड़ी महराजौ बिराजमान रहे। राज मा टीड़ी महराज के दिमागदारी कै चर्चा दूर-दूर ले फैली रही।

यही समय दरबार मा एक मनई आवा। सकल से चतुर लागत रहा।

राजा क देखिके मनइवा कहिस – “हे राजा! तोहरे दरबार मा बड़े दिमागी दरबारी अहैं, जिनकै चर्चा सुनिके हम बड़ी दूर से आयेन हैं। क केहू हमार मातरी भासा बूझि सकत है?”

राजा कहिन – “काहे नाहीं! बिल्कुल!” एतना कहि के बड़े गुरूर से टीड़ी महराज के वारी लखिन।

from a poster in JNU

फिर ऊ मनई ताबड़तोड़ बोलब सुरू किहिस। भोजपुरी भासा बोलै तौ हुवाँ भोजपुरी इलाका के मौजूद लोगन क लागै कि ऊ ओनहिन के इलाके कै आय। बिरिज भासा बोलै तौ लागै कि यहिकै घर वहीं है। जौ अवधी बोलिस तौ सिपाहियन कै कान चौगड़ा अस खड़ा होइगा यहि बिसवास मा कि ई अवध क्यार रहवैया आय। अइसनै ऊ पूरी होसियारी के साथे खड़ी बोली  औ राजस्थानिउ बोलिस।

जब रुका तौ बूझै की कोसिस मा पूरा दरबार सनामन्न होइगा। सब दरबारी चुप्प। राजौ क कुछ नाहीं सूझि परा। सबही टीड़ी महराज के वारी लखै लागे।

टीड़ी महराज यकायक उठे। वहि मनइक लगे गये। फिर वहिके पिछुवाड़े पै यक लात जमाइन। ऊ तनिका सम्हरा तौ यक लात फिर हनिन्‌। ऊ भहराय परा।

मनयवा बेचारा चिल्लाय लाग – ‘‘अरे बाप रे! अरे बाप रे! .. हे राजा! इससे बचाओ। यह आदमी तो मुझे मार ही डालेगा। यह अन्याय क्यों!”

टीड़ी महराज यक सिपाहिस कहिन कि यहि मनई क उठाओ, लाइ के नीकेसूके बैठाओ।

सबही अचंभा म परा रहा, तबै टीड़ी महराज कहिन – “हे राजा! यहिकै मातरी भासा खड़ी बोली  है।”

राजा औ दरबारिन महँसे केहू कुछ कहत यहिके पहिलेन ऊ मनई कहै लाग – “सही कहा, पर आपने जाना कैसे!”

टीड़ी महराज बोले – “हे भाय! पहिले तौ माफ किहेउ! बात अस है कि जब केहू क चोट पहुँचत है, तकलीफ हुअत है, तौ ऊ अपने जबान से दुसरी भासा कै खोल जुरतै उतारि दियत है। ऊ अपने असिल भासा मा बोलै लागत है। ऊ  अपनी मातरी भासा मा अपनी माई, बाप या भगवान क याद करै लागत है। यहै वजह रही जौन हम तुहैं लात मारे रहेन।”

“धन्य हौ टीड़ी महराज! धन्य हौ! हम तोहरे चतुराई के सामने सर झुकावत अही!” – ऊ मनई टीड़ी महराज कै तारीफ करै लाग।

राजा खुस्स होइ गये। अपने गटई से यक माला निसारि के टीड़ी महराज क भेंट के रूप मा दै दिहिन। माहौल खुसनुमा होइगा। चउगिर्दा टीड़ी महराज कै तारीफ हुवै लागि।

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नोट: हम टीड़ी महराज से जुड़ी पहिली कहानी सैंहारेन हैं, कुछ बातन का पहिले कमेंट मा रखत अहन।

~सादर/अमरेन्द्र अवधिया 

11 responses to “टीड़ी महराज कै किस्सा (१) : मातरी भासा

  1. पढ़ैया लोगउँ!
    हमार बचपन यहि लिहाज से अमीर नाय रहा कि नानी-नाना या दादी-दादा से कहानी सुनै क मिला हुवै। गाँव गिराँव मा माई-बाप केरी तमाम व्यस्तता हुअत है औ ई काम जादातर बुजरुग लोगै करत हैं, अपनी भावी पीढी क कहानियन के जरिये कुछ दौलत दै जात हैं, नसीहत दै जात हैं, जिंदगी कै रौनक दै जात हैं! बस अइसनै उड़त-पुड़त कहूँ कहूँ टीड़ी महराज के बारे मा सुने रहेन, यहि रूप मा कि यै महराज बीरबल, तेनालीराम, गोनू ओझा, लालबुझक्कड़ के बिरादर कै जीव हुवैं। आज इनके बारे मा कुछ पढ़ेन तौ यादन मा कुछ चेहरै चमकि आये जौन टीड़ी महराज कै चर्चा करत रहे। अब हमार कोसिस यू है कि यहि चरित्र के माध्यम से छोट-छोट किस्सन कै रचना करी, अवधी के चाल-ढाल मा। यही प्रयास मा पहिली कहानी सैंहारेन हैं, ‘मातरी भासा’। लोकभासन मा कहानिन कै आवाजाही रहत है, कुछ अनुकरण, कुछ कल्पना। यही रास्ते हमहूँ रचब। आगेउ ई प्रयास जारी रहे। आप लोगन कै सुभकामना साथे रहै, सादर..!

  2. akhil kumar singh

    Bahut achha prayas

  3. Syed Khalid Mahfooz

    Bahut Badhiya Amrendra Bhai…

  4. खुश कीता ई, अमरेन्दर प्यारे।

    हम खुशी में भी मातृभाषा बोलते हैं जी:)

  5. बहुत बढ़िया अमरेन्द्र भाई!!!वाकई में जब चोट लगती है तो अपनी मातृभाषा ही निकलती है |

  6. टीड़ी महराज की जय
    सही बात है… जितना भी विद्वान होगा … पर दुःख में अपनी भाषा में ही रोयेगा..
    शुक्र है उसने दरूर नहीं पी थी, नहीं तो इंग्लिश में मा बाप को याद करता.

  7. apna sab kuch acchha lagat hai….

    jai baba banaras…….

  8. फेर ऊहे हाल! काथा त जानल- सुनल आ बरा जानल- मानल हइलहीं हऽ। बाकिर एकरा में हिन्दी आ खरी बोली के अपमान जरूरी रहे ? आच्छा। जइसन राउर इच्छा।

    हँ, हमरा एह परयास प्रेरना मिलल। हमहूँ कुछ करे के परयास करेम।

  9. मुसीबत माँ आपन मादरी भासा औ अम्मय याद आवा थ

  10. खड़ी बोली क्यार कौनौ अस्तित्व नहीं रहें ,

    जैतना भी (हिंदी )देसी भासा रहें , उनका लेकर औरे पंजाबी , अरबी , पारसी का कुछ अंश मिलैके , इ दिल्ली वाले शासक एक भासा का पैदा किहिस .

    यहे मा खुसरो साहेब केरी बहुत बड़ा योगदान रहे .

    औरे एक नई भासा के निर्माण किहिस जौन हुवे उर्दू (लस्कर क्यार भासा अंग्रेजी(मंगोली ) मा hordes )यहे का हिन्दुस्तानी बोली भी कहत रहें , लिपि रहे अरबी और बोले मा खड़ी .

    खड़ी बोली दुसर देसी भासा-वन का गला घोंट दिहिस , और दोसरे लोगन का बाटे के हिंदी भासा उत्तर भारतीयां क्यार मातरी भासा हुवे करी , वही के खातिर हिंदी क्यार विरोध .

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