अवधी बालगीत : अंथा पंथा दुइ कौड़ी पायेन..!

फेसबुक के अवधी पेज पै ई अवधी बालगीत हमैं अमित भाई से मिला। यहिका पढ़तै हमैं आपन बचपना याद आइ गा, फिर सरद जी ह्वईं कमेंट मा बतायिन कि यहिका उनकै बड़की अम्मा (ताई) उनहूँ के बचपने मा उन्हैं सुनावत रहीं। सोचा जाय, कि केतना पहिले यू लिखा गा होये, के लिखिस/कहिस होये पहिले-पहिल, कैसे यतना सचरि गा, केहू नाय कहि सकत…! वाह..! : मोडरेटर

अवधी बालगीत : अंथा पंथा दुइ कौड़ी पायेन..!

“अंथा पंथा दुइ कौड़ी पायेन,

ऊ कौड़ी वै गंगा बहायेन,

गंगा माई बालू दिहिन,

ऊ बलुइया हम भुजइन क दीन,

भुजइन बेचारी लाई दिहेसि,

ऊ लाई हम घसछोलनिया क दीन,

घसछोलनिया बेचारी घास दिहेसि,

ऊ घसिया हम गैया का खियायेन,

गैया बेचारी दूध दिहेसि,

ऊ दुधवस हम खीर पकायेन,

खिरिया गइ जुड़ाइ,

मुन्ना-मुन्नी गये कोहाँय!”

   

यहि गीत कै बतवैया: अमित पांडेय। प्रतापगढ़-अवध कै रहवैया हुवैं। यहि साइत बंबई मा ११-हीं मा पढ़त अहैं। अपनी मातरी भासा ‘अवधी’ से बहुत प्यार करत हैं। इनसे आप amitansu1995@yahoo.com पै संपर्क कइ सकत हैं। 

अपडेट: फेसबुक पै सिरी पुरुसोत्तम बाजपेयी जी के सौजन्य से यहि बालगीत कै यक औरउ वर्जन मिला, जौन यहि तरह है: 

“ खंती – खनैयाँ घुन्घू मैया ,
डगर चलत एक कौड़ी पाई,
कौड़ी ले हम बनिया का दीन,
बनिया हमका घिउ – गुड दीन, 
घिउ गुड लै हम गंगाजी का चढ़ावा ,
गंगाजी हमका बालू दीन, 
बालू लै भड भुजवा का दीन
भड भुजवा हमका लावा दीन,
लावा लै हम गैया का खिलावा,
गैया हमका दुद्धू दीन,
दुद्धू लै हम खीर पकाई ,
आले धरी, टिपहरे धरी,
जाजमऊ का बिल्लर आवा ,
खायगा ढर्कायेगा ,
अउर सबका खिसियायेगा, 
बवुआ का झूला झुलायेगा ”

 तरे कमेंट मा यहिकै एक  भोजपुरी वर्जन फरीद जी लिखे हैं, दिलचस्प है। सबका सुक्रिया! 

~सादर/अमरेन्द्र अवधिया  

4 responses to “अवधी बालगीत : अंथा पंथा दुइ कौड़ी पायेन..!

  1. Yaanden taza ho gayi ………is Lokgeet ko maine bhee apni Nani Ji ke ghar raibareli me suna tha.

  2. Bachpan Ki yade taja ho gayi, dadi se ye sab geet aur kahaniya sunne ko milti thi

  3. इसका भोजपुरी संस्करण :

    चलते चलते कौड़ी पईनी
    ऊ कौड़ी गंगा मईया के देनी
    गंगा मईया बेचारी बालू दीहिन
    ऊ बालू भुजभुड़वा के देनी
    भुजभुड़वा बेचारा भूना दीहिन
    ऊ भूना घस गढ़वा के देनी
    घस गढ़वा बेचारा घास दीहिन
    ऊ घास गईया मईया के देनी
    गईया मईया बेचारी दूध दीहिन
    ऊ दूध के खीर पकल
    सब जना खा लीहिन
    बबुआ के हिस्सा रख दीहिन
    बबुआ गईल रहल खेले
    कुतउवा आके सूंघ गईल,
    बिलईया आके चाट गईल।

  4. जिनका बचपन अपने चाचा ताऊ बाबा के घुटने पर “अंथा पंथा दुइ कौड़ी पायेन, करते हुए बीता हो वही इन बाल गीतों की तासीर समझ सकता है… ऐसे मोहक बालगीत यहाँ संरक्षित रहेंगे यह सुखद है

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