दिल्ली के दरबार कै अब हम का बिस्वास करी ? (कवि अउर कंठ : समीर शुक्ल)

अवधी कवि : समीर शुक्ल

कबि समीर सुकुल जी अवधी के नये कबियन मा गिना जइहैं, इनकै नवापन यहि बात मा है कि अब तक हम नये कबियन के रूप मा जिन कबियन कै चरचा करत रहेन वै आजादी के पहिले पैदा भा रहे। समीर जी आजादी के बाद पैदा भई कबि-खेप मा बिसेस हैं। इनकै जनम १९६६ ई. मा भा रहा। गाँव : सेमरा मानापुर, थाना : हथगाम, तहसील : खागा, जिला : फतेहपुर-अवध। इनकेरी माता जी सिरी मती रामसखी देवी हैं अउर पिता जी सिरी राम आसरे शुक्ल। सुकुल जी खास रूप से खेती-किसानी कै काम करत हैं, कबिता यही के संगे-संगे जिंदगी कै हमसफर है। 

समीर जी कै अबहीं ले कौनौ कबिता संग्रह नाय आय पावा है। कबिता लिखि के यकट्ठा किहे अहैं, इंतिजार है सँगरह केर संजोग बनै कै।  ्समीर जी सामाजिक चेतना का कबिता के ताईं अत्यंत जरूरी मानत हैं, यही वजह से वै अपनी कबिता का लाजमी तौर पै सामाजिक चेतना से जुड़ा राखत हैं। यै कबिताई मा छंद क्यार समर्थन करत हैं, यहीलिये इनकी कबितन मा छंद केर सुंदर मौजूदगी अहै। 

हाजिर है समीर सुकुल जी कै कबिता ‘दिल्ली के दरबार कै अब हम का बिस्वास करी?’ कबिता पढ़े के बाद कबि समीर जी की आवाज मा ई कबिता सुनौ जाय: 

कबिता : ‘दिल्ली के दरबार कै अब हम का बिस्वास करी?’

दिल्ली के दरबार कै अब हम का बिस्वास करी?
लरिका बच्चा लैके कौने कुआँ मा फाटि परी??

दिनभर फरुहा पेट की खातिर फिरउ मिलै न पगार

हिम्मत करी दिहाड़ी माँगी तौ भुकुरै ठेकेदार

मुँहनोचवा का बाप नरेगा, चूसे जाय नरी!……लरिका बच्चा लैके कौने कुआँ मा फाटि परी??

कइसे कही बिकास होइ रहा हमका बड़ा है ध्वाखा

उपरेन ऊपर चमाचम्म है भितरेन भीतर ख्वाखा

खाय मोटाने भये चौतरा, चर्बी हवै चढ़ी!……..लरिका बच्चा लैके कौने कुआँ मा फाटि परी??

उद्घाटन रिमोट कै डारिस डलमऊ पुल मा अचंभा

हार्ट अटैक भवा असनी के पुल का धसक गा खंभा

आपनि आपनि मौका ताकैं दुइ-दुइ ठे मछरी,

यहिका जानैं कितौ सोनिया या जानैं सुसिरी!…….लरिका बच्चा लैके कौने कुआँ मा फाटि परी??

(कवि : समीर शुक्ल)

अब यहि कबिता का आप लोग सुना जाय, कवि समीर शुक्ल जी के कंठ मा: 

~सादर/अमरेन्द्र अवधिया  

10 responses to “दिल्ली के दरबार कै अब हम का बिस्वास करी ? (कवि अउर कंठ : समीर शुक्ल)

  1. समीर शुक्ल नयी पीढी के अवधी कवियों की अगली कतार में हैं !

  2. बेहतरीन प्रस्तुति,शुक्ल जी का भविष्य सुखमय है.

  3. भई,समीर सुकुल कै खोज अवधी कै बरे बड़ी उपलब्धि अहै!उनका शब्द-चयन अउर कंठ दूनों सरस हवैं ! आपका अउर सुकुल भइया का अभार !

  4. नवीन भोजपुरिया

    सुकुल जी कविता मा बहुतै प्रवाह है , एक दम से सुरहुर बेधढक ढुलमुल आ पुरहर आवाज मा सुकुल जी घटित सरकारी दुरघटनावन प जबरजस्त प्रहार किये है !

    आप के बहुत बहुत धन्यवाद एह विसेस कवि से परिचय खातिर !

  5. शुभकामनायें समीर शुक्ल को ….
    आभार उनका परिचय कराने के लिए

  6. पढ़ तो पहिले ही लिये थे। आज समीर शुक्ल की कविता सुनकर आनन्दित हुये। सुनवाने के लिये शुक्रिया।

  7. बहुते धाँसू कबिता …. जय होय

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