अवधी लोकगीत-२ : बाज रही पैजनिया.. (कंठ : डा. मनोज मिश्र)

ई गीत ‘बाज रही पैजनिया..’ होरी गीत हुवै। ई उलारा बोला जात है। यू फाग गीत के अंत मा गावा जाय है। यहि गीत मा नयी नबेली दुलहिनी के आवै के बाद वहिके गहना गढ़ावै के बारे मा घर वाले आपन-आपन जिम्मेदारी कै बाति मधुरता औ खुसी के साथे करत अहैं! इहै मिरदुल भाव गाना केरी मधुर परकिति मा उतरि आवा है। बतकहीं कै ढब औ गाना कै लय-गति यक्कै परकिति मा आय जाँय तौ सोनेम सुहागा होइ जात है। यहि गीत मा भारतीय संजुक्त परिवार कै मिलि बटुर के कौनौ चीज/मुद्दा का संहारै-सुगतियावै कै रेवाज देखा जाय सकत है। ई गीत मनोज जी की पोस्ट ‘फागुन का चरम और चैत का आरंभ’ से यहि साइट पै लावा गा है। गीत कै बोल यहि तरह है:

अवधी गीत : बाज रही पैजनिया..

बाज रही पैजनिया छमाछम बाज रही पैजनिया..

के हो गढ़ावै पाँव पैजनिया, के हो गढ़ावै करधनिया ..?/!

… … छमाछम बाज रही पैजनिया!!

के हो गढ़ावै गले कै हरवा, के हो गढ़ावै झुलनिया ..?/!

… … छमाछम बाज रही पैजनिया!!

ससुर गढ़ावैं पाँव पैजनिया, जेठ गढ़ावैं करधनिया ..!

… … छमाछम बाज रही पैजनिया!!

सैयाँ गढ़ावैं गले कै हरवा, देवरा गढ़ावै झुलनिया ..!

… … छमाछम बाज रही पैजनिया!!

कंठ : यहि गीत का आपन समूह मा मेन आवाज दियत मनोज मिसिर जी लोक-तत्व के संरछन के लिहाज से सराहनीय काम किहिन हैं। मनोज जी कबि सरल जी के गीत ‘मन कै अँधेरिया’ अउर पारंपरिक गीत ‘बालम मोर गदेलवा’ का कंठ दै चुका हैं। अब यहि गीत कै यू-टुबही प्रस्तुति आपके सामने है, आप लोग आनंद उठावैं: 

~सादर/अमरेन्द्र अवधिया 

7 responses to “अवधी लोकगीत-२ : बाज रही पैजनिया.. (कंठ : डा. मनोज मिश्र)

  1. लोकजीवन की सुन्दर अभिव्यक्ति।.

  2. सुर अच्छे लग रहे हैं पर ताल में कहीं मेल-मिलाप नहीं हो पाया…प्रयास सराहनीय है ,भाई !

  3. Dear Amrendra Ji, Awadhi geeton ko National level par pracharit karne ka aapka prayas bahut sarahniya hai. Badhayii.

  4. संतोष भइया,ई ठीक होली के दिन घर में ही बच्चा लोगन के साथ पिछली होली पर भांग की तरंग में समूह के साथ गाया गया था -सुर ताल कहाँ से मिलेगा.
    ईत हमरी ब्लॉग पर था अमरेन्द्र भाई नें प्रेम से यु ट्यूब पर लगाई दिया.

  5. Saurabh Pandey (सौरभ पाण्डेय)

    अमरेंद्र भाई, आप जन-लोक में छितरे-बिखरे रत्नों को ढूँढने का तप कर रहे हैं. साधु.
    गवनई की तर्ज़ पर भाई मनोजजी के लगे सुर पूरा समाँ बाँध देते हैं. ऐसे ही अनायास-से लगते प्रयास लोकरचनाओं और गीतों की आत्मा को संतुष्ट किया करते हैं, जहाँ अनावश्यक साहित्यिक-शिष्टता का तनाव नहीं होता, होता है तो मानवीय भावनाओं का सहज उद्गार और धमनियों में रुधिर संग बहता त्यौहारी उत्साह.

    मनोजभाई को मेरा अभिनन्दन पहुँचा देंगे.

  6. मनोज मिश्र सुन्दर आवाज में गीत सुनकर आनन्द आ गवा।

  7. mree bhojpuriua man ki paijaniya bhi jhankar karne lagi.

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