कबिता : प्रीति तौ बरबस होय (कवि : हरिश्चंद्र पांडेय ‘सरल’)

कवि हरिश्चंद्र पाडेय ‘सरल’ कै जनम सन १९३२ मा फैज़ाबाद-अवध के पहितीपुर-कवलापुर गाँव मा भा रहा। इनके बप्पा कै नाव महादेव प्रसाद पाड़े रहा जे बैदिकी कै काम करत रहे। कबि कै सुभाव बहुतै सरल रहा यहीते होइ सकत है ‘सरल’ नाव परा हुवै। गजब कै रचनाई है इनकी कबिता मा, कुछ रचना जुगड़ियाय गई हैं, वन्हैं हम आस्ते-आस्ते रखत जाब यहि साइट पै, आप सबन के आस्वाद खातिर! कबिता से गुजरत-गुजरत आप जानि सकिहें कि सरल जी कै दीठ केतनी सजगि अहै! हमैं सरल जी कै फोटू नाय मिलि पाई है, जैसेन मिले तौ हर पोस्ट मा परिचय के साथे साँटि दियब। सरल जी कै कबिता “प्रीति तौ बरबस होय..” आपके सामने रखित अहन::

कबिता : प्रीति तौ बरबस होय 

जब कोऊ मन मा यस आवै मन का खबर न होय,

तब जानौ कोऊ प्रीति करै न प्रीति तौ बरबस होय।

    नैन ही पूछै नैन ही बूझै बिन बोले कहि जाँय,

    दूर रहैं मुल सैन सैन मा नैनन से बतियाँय,

    बड़री अँखियाँ नैन समाय औ नैनन खबर न होय!

… … प्रीति तौ बरबस होय।

    कान्ह की बंसी जब जब गूँजै ऊधौ बुद्धि हेराय,

    पनघट कदम की डार पै जल मा बहियाँ गहत देखाय,

    जब मन यस तन का भरमावै तन का खबर न होय!

… … प्रीति तौ बरबस होय।

    अनगिन फूल खिलैं बगियन मा कोउ यक नैन समाय,

    बिना छुये तन मन गमकावै चन्दन गंध हेराय,

    जब यक गंध बनै कस्तूरी मृग का खबर न होय!

… … प्रीति तौ बरबस होय।

[ ~ हरिश्चंद्र पांडेय ‘सरल’ ] 

5 responses to “कबिता : प्रीति तौ बरबस होय (कवि : हरिश्चंद्र पांडेय ‘सरल’)

  1. एस.चन्द्रशेखर

    बहुत सुंदर मन को छूकर आनंद का अनुभव कराती कविता। नाम के अनुरुप सरल जी के सरल शब्द मन मेँ पैठ कर गए , अमरेन्द्र भाई आपका आभार यह रचना पढ़वाने के लिए व आगे के लिए मंगलकामनाएँ …..

  2. निहायत सरल और मोहक कविता… निश्छल और निर्मल

  3. हा भाय अमरिंदर, बहुतै धन्यवाद…
    बड़ी नीक कविता लिखी बाय. मज़ा आय गवा पढिके.

  4. ‘सरल’ जी कै बड़ी नीकि रचना ! आभार !

  5. प्रेम का अपने नाम अनुरूप बड़ी सरल भासा मा बांच दीन्हिन “सरल”जी…आभार

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