अवधी गजल : “ का करी?” ( आद्या प्रसाद ‘उन्मत्त’ )

 

 आधुनिक अवधी कविता के खास कवियन मा गिना जाय वाले आद्या प्रसाद ‘उन्मत्त’ कै जनम १३ जुलाई १९३५ ई. मा प्रतापगढ़ जिला के ‘मल्हूपुर’ गाँव मा भा रहा। यै अवधी अउर खड़ी बोली दुइनौ भासा मा लिखिन। ‘माटी अउर महतारी’ उन्मत्त जी की अवधी कबितन कै संग्रह है। अवधी गजलन और दोहन के माध्यम से काफी रचना किहिन। इनकै काब्य-तेवर ललकारू किसिम कै है: “तू आला अपसर बना आजु घरवै मूसै मा तेज अहा, / अंगरेज चला गे देसवा से तू अबौ बना अंगरेज अहा।” कुछ इहै तेवर देखा जाय उन्मत्त जी की यहि गजल मा:

“ का करी ?”

पोल खोली, कुछ न बोली, डोलि जाई, का करी,

ओनकी जफड़ी मा कसत इज्जत बचाई, का करी?

बूँद भै जानै न हमरी जात कै औकात जे,

वहि समुंदर की लहर कै गीत गाई, का करी?

फूस की मड़ई मा बनि बारूद हम पैदा भए,

आग देखी तौ भभकि के बरि न जाई, का करी?

छाँव की खातिर पसीना खून से सींचा किहे,

झोंझ से माटा झरैं तौ मुँह नोचाई, का करी?

पूत जौ पूछै बमकि के बाप से तू का किह्या,

ऊ बेचारा हाथ मलि के रहि न जाई, का करी?

 

19 responses to “अवधी गजल : “ का करी?” ( आद्या प्रसाद ‘उन्मत्त’ )

  1. आनंद आ गया ….

  2. bahut achhi hai mere blog par apni raay chhode yaha se mere blog me pahuche

  3. dinesh tripathi

    bhai maja aayi gava , unmatt ji kai yi gazal ma apni boli baani ma vyang kai gajab dhar hai , padhvavai bade dhanyvaad

  4. उन्मत्त जी की चार पंक्तियाँ ये भी रहीं:
    “बिरथा उ बिरिछ जौन न फूलै न तौ फरै,
    बिरथा उ बाति जौन कि सुनतै के जिउ जरै,
    बा जनम अकारथ धरा पे राम धे जेहसे,
    दुनिया के दुख-दरद म न कौनौ फरक परै।”

  5. पूत जौ पूछै बमकि के बाप से तू का किह्या,

    ऊ बेचारा हाथ मलि के रहि न जाई, का करी?

    —————————————–
    वाह भईया ! बहुत नीक लाग इ दुई लाइन !! तोहार इ कोशिश बहुत बढ़िया बा भईया अमरनाथ, अवधी ताईं.
    एका अईसय आगे बढ़ावत रहा. ई खूब फलै- फूलै तौ बड़ा नीक लागे.

  6. बहुत बढ़िया.

  7. जी यही का करी के साथ तुलसी ने कहाँ जाई भी जोड़ा था ..
    कहाँ जाई का करी …उन्मत्त जी ने इसी का करी को बढियां पकड़ा है -एक खीझ है,एक बेबसी -का करी !

  8. “फूस की मड़ई मा बनि बारूद हम पैदा भए,
    आग देखी तौ भभकि के बरि न जाई, का करी?
    भाई !!….अदभुत ..!! एगो आम आदमी के जीवन के केतना करीब बा ee गजल…!..ओकर कुछ का कर पावे के बेबसी ,,,खीज……साफ़ झलक रहल बा ……..!!पढके मन के एगो संतुष्टि भेल …धन्यवाद् ऐसन रचना के हम सब के संगे साझा करे बदे …….
    …….

  9. जब लरिका अपने बाप ते यह पूछै कि वह उनके बरे का किहिसि तो यहिते ज्यादा ‘संतान-सुखु’ कुछौ न आय !बढ़िया दरद दिखायो है !

  10. फूस की मड़ई मा बनि बारूद हम पैदा भए,

    आग देखी तौ भभकि के बरि न जाई, का करी?
    ==========
    वाह!
    बाकी, कुछ शब्द मेरी डिक्शनरी में नहीं हैं – जफडी, झोंझ।😦

    • सर जी, जफड़ी कै मतलब जुलुम फांस जौने मा मनई कैद हुवै, इज्जत के साथे जी न पावै। फारसी कै सबद है ‘जफा’ जेहिके माने जुलुम हुअत है।
      झोंझ, तौ गाँव मा खुबै बोला जात है, यहिकै मतलब माटा(पेड़े पर कै ललछर चिउंटा) कै घोसला माना जाय, कयिउ पातिन क यकट्ठा कै के यै मटवै का जनी कौने सफेद सफेद चिपकाव से आपन घर बनाय लियत हैं, इहै माटा कै झोंझ कही जात है। यै मटवै बहुत काटत हैं, चमड़ी मा चिपक के कटिहैं तौ सर्तिया पानी निकरि आये, यही खातिर यक किसिम के अत्याचार अउर पीड़ा कै रूपक बनिगा; “झोंझ से माटा झरैं तौ मुँह नोचाई, का करी?”

      सादर;
      अमरेन्द्र

  11. वाह ,बहुत सुन्दर ! ‘उन्मत्त’ जी की झन्नाटेदार ग़ज़ल पढिके हमहूँ थ्वारा थ्वारा उन्मत्त हुई गएन !

  12. फूस की मड़ई मा बनि बारूद हम पैदा भए,

    आग देखी तौ भभकि के बरि न जाई, का करी?

    बड़ सुग्घर ग़ज़ल.

  13. bahut badhiya

  14. बहुत दिन बाद उन्मत्त जी का पढ़े मिला… उनकर दुई कबिता और सुने रहे… “तोहरी नानी के हांडे माँ” और “भाग बचौवा आँधी आय”

    एक लाइन याद अहै देखैं –

    बाबा दौड़ेंन बछिया खोलै
    खूँटा लाग पड़े भाहराय
    भाग बचौवा आँधी आय…

  15. अमरेन्द्र जी
    सादर अभिवादन !

    ग़ज़ल का आदमी हूं … कोई भाषा हो , … खिंचा चला आता हूं ।
    फूस की मड़ई मा बनि बारूद हम पैदा भए,
    आग देखी तौ भभकि के बरि न जाई, का करी?

    वाह ! क्या अंदाज़ है !

    भाषा अड़चन नहीं बनी … पूरी ग़ज़ल संप्रेषित हुई है … आभार !
    स्वयं मैं राजस्थानी में भी ग़ज़लें लिखता हूं … वर्ष2002 में मेरा पहला राजस्थानी ग़ज़ल संग्रह रूई मांयीं सूई प्रकाशित हुआ था ।]

    श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई-शुभकामनाएं !

    – राजेन्द्र स्वर्णकार

  16. Pingback: नोट्स : कवि ‘उन्मत्त’ कै कविता-१ | अवधी कै अरघान

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