कवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ [ ३ ] : इहवइ धरतिया हमार महतरिया ..

वि रमासंकर यादौ ‘बिद्रोही’ ३ दिसंबर १९५७ क सुलतापुर – अवध – के अइरी फिरोजपुर गाँव म पैदा भये। आर्थिक तंगी के चलते साइन-साइड कै पढ़ाई छोडि के नौकरी पकरिन। कुछ समय आंतर नौकरी छोड़ दिल्ली आये। दिल्ली आयके जेयन्नू ( J .N .U. ) म यम्मे कोर्स म दाखिला लिहिन। छात्र राजनीति से जुड़ा रहे और अबहिनउँ हिस्सेदारी लेत हैं। कुछ बिसंगति के चलते आगे कै पढ़ाई नाय होइ सकी। फिलहाल बिद्रोही जी जेयन्नू कैम्पस म अक्सर हम सबसे मिलत हैं अउर ग्यान कै बातैं करत हैं। बिद्रोही जी कै कविताई अउपचारिकपने से कोसन दूर है। यनके ताईं कबिता लिखै कै, सोझुवावै कै, बैठावै कै, छपुवावै कै, चीज नाय है। यै साफ तौर पै कहै वाली परथा कै कवि हैं, जेकर जोर पहिले आपन बात कहै पै रहत है। यानी सामने वाला पहिले समुझै अउर वहसे संबाद बनै। हाजिर है बिद्रोही जी कै कविता ‘इहवइ धरतिया हमार महतरिया’:

इहवइ धरतिया हमार महतरिया

अमवा इमिलिया महुवआ की छइयाँ
जेठ बैसखवा बिरमइ दुपहरिया
धान कइ कटोरा मोरी अवध कइ जमिनिया
धरती अगोरइ मोरी बरख बदरिया
लगतइ असढ़वा घुमड़ि आये बदरा
पड़ि गईं बुनिया जुड़ाइ गयीं धरती
गुरबउ गरीब लइ के फरुहा कुदरिया
तोरइ चले बबुआ जुगदिया कै परती
पहिलइ वरवा पथरवा पै परिगा
छटकी कुदार मोर खुलि गा कपरवा
मितवा न जनव्या जमिनिया क पिरिया
टनकइ खोपड़ी मोरा दुखवा अपरवा
खुनवा बहा हइ मोरा जइसे पसिनवा
तोर तोर परती बनाइ दिहे जमता
इहवइ धरतिया हमार महतरिया
मरेउ पै न जइहैं जमिनिया क ममता
उहवइ धरती मोरी होइ गइ हरनवा
इहवइ हयेन मोरे दुख के करनवा
सथवा निभाइ देत्या मितवा दुलरुआ
छिड़ी बा लड़ायी मोरे खेते खरिहनवा
हमरी समरिया गहे जे तरुअरिया
ओनही के गीत गाना ओनही के रगिया
हम खुनवा रँगि-रँगि रेसम कै पगड़िया
बबुआ बाँधब तोरे मथवा पै पगिया
हमरा करेजवा जनमवइ क बिरही
अब न बुतायी मोरी छतिया कै अगिया
हम छनही मा बारि के बुताइ देबइ दुनिया
बहुतइ बिरही मोरे बिरहा कै अगिया ..
                        [ ~ कवि रमासंकर यादौ ‘बिद्रोही’ ]

हिन्दी में भावार्थ: धरती के प्रति किसान का अप्रितिम प्रेम इस कविता में व्यक्त हुआ है। उस धरती से किसान का दूर कर दिया जाना, सहज रोष के रूप में कविता में आद्यंत विन्यस्त है। कवि वाणी है: (एक चित्र खींचा जा रहा है, कहिये तो भूमिका बनायी जा रही) आम इमली महुआ की छाया में जेठ/बैसाख की दोपहर के बीच थोड़ा सुस्ताना होता है। अवध की जमीन धान का कटोरा है। धरती अधीर होकर वर्षा की बाट जोहती है। असाढ़ लगते ही बादल घुमड़ आते हैं, धरती पर कुछ बूँदें पड़ जाती हैं गोकि धरती को ठंडक पहुँची हो। इस समय गरीब-गुर्बा जन फावड़ा/कुदाल लेकर युगों की परती पड़ी जमीन को तोड़ने निकलता है। पहला ही वार जैसे उस ठोस परती पर डालता है, कुदाल छनक जाती है। प्रभाव कुछ ऐसा कि जैसे सर पर गिरे और खोपड़ी दुख जाए। वह ऊसर/बंजर को उपजाऊ बनाने वाली कठिन प्रक्रिया सोचता है। अपार दुख सह कर उसने धरती को उपजाऊ बनाया है, इस जमीन से जुड़ी पीड़ा को कोई और क्या जाने, यही धरती उसकी माँ है, मरने पर भी इसकी ममता कहाँ जाने वाली!! उसकी इसी जमीन का हरण हो गया है। ( या कर लिया जाता है ) यही उसके दुख का कारण है। किसान कहता है: हे मित्रों/दुलारों , खेत/खलिहान में लड़ाई छिड़ी है, मेरा साथ निभा दो। इस संग्राम में मेरे साथ जो तलवार गहेगा, उसी का गीत गाया जायेगा, उसी की रागें छिड़ेंगी। मैं खून से रेशम की पगड़ी रंगूँगा और हे बबुआ, तुम्हारे माथे पर पहनाउँगा। मेरा कलेजा तो जन्म से ही बिरही है। इस छाती की आग कहाँ बुताने वाली ! हम सब संघर्ष की जोत जला कर इस अन्याय की दुनिया को बुझा देंगे। देखिये, मेरे बिरहे(काव्य-रूप) में कितना बिरह है, इसकी राग कितनी बिरही है। यानी संघर्ष की बहुतै उत्कंठा है।
नोट : ई कबिता बिद्रोही जी कै कबिता संग्रह ”नयी खेती” से लीन गै है , जौन अबहीं कुछै महीना पहिले आवा है।
सादर;

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

4 responses to “कवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ [ ३ ] : इहवइ धरतिया हमार महतरिया ..

  1. बहुत ही सुन्दर कविता है….और बहुत ही सरस भाव लिए हुए….कही कहीं लगता है कि किसी खेत की मेड़ पर बैठकर सुन रहा हूं।

  2. बहुत बढिया कविता है! किताब में पढ़ी है!🙂

  3. बहुतै नीक!!!!!!!!!!!
    आइस लागत है जइसे अपने गाँव पहुँच गएन|

  4. अब न बुतायी मोरी छतिया कै अगिया
    हम छनही मा बारि के बुताइ देबइ दुनिया…

    बड़े फलक की बात…

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