कवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ [ १ ] : ” मां ”

वि रमासंकर यादौ ‘बिद्रोही’ ३ दिसंबर १९५७ क सुलतापुर – अवध – के अइरी फिरोजपुर गाँव म 
पैदा भये . आर्थिक तंगी के चलते पढ़ाई छोडि के नौकरी पकरिन . कुछ समय आंतर नौकरी छोड़ दिल्ली आये . दिल्ली आयके जेयन्नू ( J .N .U. ) म यम्मे कोर्स म दाखिला लिहिन . छात्र राजनीति से जुड़ा रहे और अबहिनउं हिस्सेदारी लेत हैं . कुछ बिसंगति के चलते आगे कै पढ़ाई नाय होइ सकी . फिलहाल बिद्रोही जी जेयन्नू कैम्पस म अक्सर हम सबसे मिलत हैं अउर ग्यान कै बातैं करत हैं . ई रचना ‘मां’ पै है . माई दहिउ मथत है औ अंतिम म नैनूं सार-तत्त निकारत है . बिसमता कै महाहौ अगड़म-बगड़म के बीच माई के मथानी कस ध्यान जरूरी है . बाकी चीजन का आप सब रचना से द्याखैं , ढेर हम का बकी , कबिता अस है ( तर्ज बिरहा कै है ) :- 
मां 
ऊपर असमान बाटइ निचवा महियवा
महइ महतारी मोरी बिचवइ दइयवा 
घुमइ देंइ मथानी अम्मा नाचइ देंइ दुनियवा
रिसी नाचइं मुनी नाचइं ओझवा गुनियवा
नाचइं भगवान येनकइ झुठवा सहियवा
महइ महतारी मोरी बिचवइ दइयवा 
राजा नाचइं बाबू नाचइं पुलिस औ सिपहिया 
गुरु औ पुरोहित नाचइं होमिया करहिया 
सेठ साहूकार नाचइं खतवा बहियवा 
महइ महतारी मोरी बिचवइ दइयवा
नाचइ सरकार एनकइ टिकली दललिया
ताज नाचइ तकथ नाचइ किलवा महलिया 
नाचइ एनकइ पाप मुड़े जइसे पहियवा
महइ महतारी मोरी बिचवइ दइयवा
बिचवा अकासे मइया बरलें दियनवा 
खरइ देइ मसका माई पसइ दे घियनवा
रहि जातीं लाज तोरिउ हमरिउ कहियवा
महइ महतारी मोरी बिचवइ दइयवा !

नोट : ई कबिता बिद्रोही जी कै संग्रह ”नयी खेती” से लीन गै है , जौन अबहीं कुछै दिन पहिले आवा है .

सादर ;
~ अमरेंदर

4 responses to “कवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ [ १ ] : ” मां ”

  1. बस एक ठो कविता -विद्रोही जी नाम सार्थक वाली एकाध कविता भी देनी थी न ….मुला इहौ जोरदार है …

  2. @ Arvind Mishra
    आर्य , यक यक दिन के आंतर पै अबहीं बिद्रोही जी की पांच कवितन का रखब , एक कै तौ वीडियो प्रस्तुतियौ रहे ! सादर !

  3. जब बुदबुदाकर पाठ किया…
    तब थोड़ा बहुत समझ आया…

    अर्थ दें…तो हमारी अवधी भी ठीक हो…

  4. @ रवि कुमार जी
    हुजूर , आगे से आपके सुझाव के मद्देनजर , काव्य-खण्डों के , हिन्दी में अर्थ जोड़ने की कोशिश रहेगी ! बेहतर सुझाव के लिए शुक्रिया ! सादर !

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