‘श्री हरिश्चंद्र चंद्रिका’ – १८८५ ई.- मा छपी कबिताई कै यक झलक

ज ई पोस्ट लिखत के बरबस याद आवति है चार-पांच साल पाहिले कै यक घटना ! जेयन्नू-दिल्ली आये पै घर-दुवार से तौ बिछुरबै भयेन , अपनी मादरे जुबानौ से बिछुरि गयेन . संजोग से कौनौ काम से खड़ी बोली कै बहु नामी पत्रिका ‘हंस’ के दफतर जाय क परा . हुवां हंस पत्रिका केर सम्पादक राजिंदर जादौ से मुखातिब भयेन . जादौ जी से यक सहज इच्छा कहेन कि ” जादौ जी , का आपकी पत्रिका मा अवधी भाषा के बरे यक पेज छपै क मिलि सकत है ? ” यहि बात पै 
जादौ जी पहिले हम फटीचर मनई का अपने साहित्तिक रौब के साथे देखिन , थोरक हसिन , फिर उवाचिन ” तमाम क्षेत्रीय बोलियों के लिए हंस कितने पन्ने देगी ? ” फिर राजिंदर जी हमरी बाति से साफ नट गये . हम कहित है भइय्या कि हर महीना अवधी-भोजपुरी-ब्रजी के खातिर अगर तीन-चार पेज हंस पत्रिका दै दे तौ का ऊ ‘हंस’ से कौवा या बगुला होइ जाई ? मुला यहि घटना से हिन्दी साहित्त अउर साहित्तकारन कै लोकभासा बिरोधी रवैय्या जाहिर होत है जबकि साहित्त कै खेला लोकवाद-लोक-लोकजीवन के इर्द-गिर्द गजब कै खेला जाय रहा है🙂   
    अबहीं कुछ दिन पहिले जब ‘श्री हरिश्चंद्र चंद्रिका’ की उदार सम्पादक नीति से गुजरेन तौ हमैं बहुत समय पहिले कै ई घटना याद आइ गै . हरीस बाबू खुदौ देसी भासा मा कबिताई किहिन अउर देसी भासा केरी कबिताई का अपनी पत्रिका मा छपबो किहिन . फुर लागत है कि भारतेंदु जुग कै अप्रोच यक्कइसहीं सदी वाली आज कै हिंदही साहित्तकी दुनिया से ज्यादा उदार रहा . अइसनै नाय बिजय संकर मल्ल भारतेंदु जुगीन साहित्त का ‘हंसमुख गद्य’ कहिन ! आज कै  हिंदही साहित्तकी दुनिया केतनी महीन अउर राकस होइ गै है , ई बात से बहुत लोगै इत्तफाक रक्खत हैं . १८८५ मा ‘श्री हरिश्चंद्र चंद्रिका’ मा ‘मुशायरा’ के तहत दुइ अवधी गजलैं छपी रहीं , आज की पोस्ट के तौर पै वही माहौल का उधार लैके इन्हैं रक्खत अही :
 मुशायरा
चिड़िया मार का टोला ,
भांत भांत का जानवर बोला | 
लखनऊ दिल्ली बनारस पूरब अउर दक्खिन कै कयिउ मुफुतखोर सायर यकट्ठा भये अउर रंग बिरंगी बोली बोलै लागे . हमहूँ वहीं मैक्राफून कै कल लगाय दिहेन . जौनौ कुछ वहि आवाज मा बंद होइ पावा , आप लोगै सुनैं .
                                     सबते पहिले लाला साहब उठे , बंदगी किहिन अउर अस चोंच खोलिन :
गजल 
गल्ला कटै लगा है कि भैया जो है सो है ,
बनियन का गम भवा है कि भैया जो है सो है |
लाला की भैसी शोर निचोरत मा शाशी जब ,
दूध ओह मा मिलि गवा है कि भैया जो है सो है |
इक तो कहत मा मर मिटी खिलकत जो हैगा सब ,
तेह पर टिकस बंधा है कि भैया जो है सो है |
अंगरेज से अफगान से वह जंग होता है ,
अखबार मा लिखा है कि भैया जो है सो है |
कुप्पा भये हैं फूल के बनिया के फर्ते माल ,
पेट उन का दमकला है कि भैया जो है सो है |
अखबार नाहीं पंच से बढ़कर भवा कोऊ ,
सिक्का यजम गवा है कि भैया जो है सो है | 
    यहिके बाद लाला साहब रें रें कैके होरी गाइन ………. लाला साहब के गाये के बाद ललाइनिउ साहब से न रहा गा . थोरक मेम साहब कै तालीम तुन्दी किहिस तौ चट्ट-धेनी परदे के बहिरे कूदीं अउर बेतकल्लुफ तसरीफ लाइन फिर मटक मटक के कहै लागीं :
सिखाय नाहीं देत्यो पढ़ाई नाहीं देत्यो ?
सैंया फिरंगिन बनाये नाहीं देत्यो ?
लंहगा दुपट्टा नीक न लागे ,
मेमन का गौन मंगाय नाहीं देत्यो ?
वै गोरिन हम रंग संबलिया ,
रंग से रंग मिलाय नाहीं देत्यो ?
हमना सोइबे कोठा अटरिया ,
नदिया पे बंगला छवाय नाहीं देत्यो ?
सरसों का उबटन हम न लगैबै ,
साबुन से देहिया मलाय नाहीं देत्यो ?
डोली मियाना प कब लग डोली ,
घोड़वा प काठी कसाय नाहीं देत्यो ?
कब लग बैठी काढ़े घुंघुटवा ,
मेला तमासा जाये नाहीं देत्यो ?
लीक पुरानी कब लग पीटों ?
नई रीत रसम चलाय नाहीं देत्यो ?
गोबर से न लीपब पोतब ,
चूना से भितिया पोताय नाहीं देत्यो ?
खुसलिया छदम्मी ननकू हन कां ,
बिलायत मा काहें पठाय नाहीं देत्यो ?
धन दौलत के कारन बलमा 
समुन्दर में बजरा छोड़ाय नाहीं देत्यो ?
बहुत दिनां लग खटिया तोड़िन ,
हिंदुन कां कान्ह जगाय नाहीं देत्यो ?
दरस बिना जिय तरसत हमरा ,
कैसर का काहें देखाय नाहीं देत्यो ?
हिज्र पिहा तोरि पय्यां पड़त हैं ,
पंचा मा एहकां छपाय नाहीं देत्यो ?
ललाइन साहब कै ई आजादी देखिके बनारस कै साहु जी साहब मुत हैदर ह्वै घबड़ाइके रेंकिन…………|  

नोट : हम यहि माल कै खुन्ची ” खड़ी बोली का पद्य ” – संकलयिता : अयोध्या प्रसाद खत्री – सम्पादक : रामनिरंजन परिमलेंदु – से लगाएन हैं . अउर यहि पूरे मसले कै जानकारी हमैं अपने दुइ दोस्तन – रबी अउर दीपांकर – से मिली . दुइनौ जने का सुक्रिया !

सादर ;
~ अमरेंदर  

2 responses to “‘श्री हरिश्चंद्र चंद्रिका’ – १८८५ ई.- मा छपी कबिताई कै यक झलक

  1. फेसबुक पर आये कमेन्ट
    >>संतोष त्रिवेदी Santosh Trivedi kabo-kabo yahi tanaa likhi dyava karo !
    >>Nirmal Paneri ‎!गोबर से न लीपब पोतब चूना से भितिया पोताय नाहीं देत्यो ?…..सर मुझे ज्यदा समझ नहीं आई पर कही ग़ज़ल में ..बयां ऐ haqiकत है दुनिया की …और दुsरी बात में ये pankti कही समझती हुई की शायद तो जो दीवारें गोबर से बना या लिम्पा जाता था आज उसकी जगह चूने ने ले ली है कही ????????
    >>Aditya Dubey मन खुश होई गई भैया …..!

  2. FB पर मेरी प्रति टीपें :
    @ संतोष त्रिवेदी जी ,
    भैया , यहि तिना की पोस्टन का रखै कै पूर कोसिस करब !

    @ @ निर्मल जी ,
    यह तो सही पकड़ा आपने की हकीकत का बयान किया गया है उस समय की . बात १८८५ है . पहली गजल में आर्धिक विसंगति , लूट , का स्वर है , गल्ला और उसकी लूट , 'पंच' उस समय का अखबार है , ये ख़बरें उसके लिए अहम नहीं रही होंगी , मीडिया का चरित्र पराधीन भारत में और स्वाधीन भारत में एक जैसा ही दिखेगा . स्वाधीन भारत में तो और भी पराधीन है मीडिया !
    दूसरी गजल में अंगरेजी फैसन आ गया है और उसका चाल-चलन देखा जा सकता है उस समय . नयी सिखाई , पढ़ाई , स्त्री के लिए फिरंगिन होने की कामना ( उलाहना की ध्वनि भी है ) , लंहगा नहीं गाउन चलेगा अब , सरसों का उबटन पुराणी बात है अब साबुन की टिकिया चलेगी , पुरानी रीत की जगह नयी रसम चलनी चाहिए , ननकू ( आदि नाम ) आदि लोगों को बिलायत क्यों नहीं भेजा जाय , कैसर अंगरेज राजा था – उसको देखने की इच्छा का हुलास बढ़ा है , फिर पंच अखबार का जिक्र है शायद इस सारी चीजों से वह बहुत बेखबर था ! दूसरी बात जो खासी अहम है की नए दौर में तद्युगीन स्त्री की अपनी आजादी की वाजिब चाह भी देखी जा सकती है ! मुझे महत यह लगता है की उस समय एक आम आदमी ऐसे ही तो सोचता रहा होगा !
    आपने कोशिश की , इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ ! सादर..!

    @ @ आदित्य जी ,
    बस अइसनै साथ-सहजोग दिहे रहौ , बन्दा जेतरा खुसी दै सके , दियै कै पूर-पूर कोसिस करे🙂

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