लोक गाथा : अइसन जोग भरथरी कीन ..

वधी इलाका मा घूमत कनफटे गोरखपंथियन से अक्सर गोरखनाथभरथरी जैसे महा पुरखन  कै गाथा सुनै मिलि जात है . हमैं यहि लोक गाथा कै पहिल परिचय यक गोरखपंथी जोगी के जरिये भा रहा . अक्सरहा गाँव आवत रहा . हम गाँव कै गेदहरै वहिका परेसान करत रहेन किहे  जोगी , सारंगी कै दूधभात वाला मसला सुनाओ ‘ . यहि तिना ऊ  पहिले  अपनी सारंगी का दूधभात खवावत रहा फिर हमैं भरथरी कै गाथा सुनावत रहा . सग्यान लोग यहिका बड़े मन से सुनत रहे . वहि माहौल का याद कैके आजौ मन भावबिभोर होइ जात है !
        जोगी सारंगी कै तार मिलाइस अउर बतावै लाग : ” राजा भरथरी गुरु गोरख से दिच्छा लियै बदे रानी पिंगला से भीख मांगै आवा हैं . मेहरारू भरथरी का बेटवा मानि के भीख देई , तबै गोरख बाबा उनका ग्यान कै गठरी देइहैं . भरथरी रानी पिंगला के सामने हैं . पिंगला समझावति हैं की काहे राजपाट छोडि के सधुवान जात हौ , काहे गुदरी चढ़ाइ लिहेउ :
कहती सोमदेव गुजरिया , धूमिल भई है मोर चुनरिया 
पिया कौने रंग रंगाया गुदरिया ना
छोडि के धन दौलत माल , काहे बने हौ कंगाल 
कौने कारन बनि के घूमत हौ भिखरिया ना |
मेहरारू कै बात सुनि के भरथरी कहिन कि हमरे करम मा जोग लिखा है , तोहार सेजरिया नाय . हम मूड़ मुड़ाय चुका हन , घरगिरिस्ती की ओरी हमार ध्यान  आये अउर अब हमैं भीख दियौ , देरी करौ :
बोले राजा भरथरी , सुनौ नारी पतरी 
हमके भावे नाहीं सेजिया गुजरिया ना
करम मा लिखा है जोग , कैसे करी राज भोग 
हमका नीक लागै तोहरी सेजरिया ना
मूड़ तौ मुडायन हम , अब लागी तोर बालम 
माता दै दे हमका भीख , करौ अबेरिया ना |
हमैं नाहीं धन कै आस , बिस्तर है जंगल कै घास 
बलकल सोइ रहबै करबै हुंवहीं गुजरिया ना
भरथरी कोटि जतन कैके समझावत हैं . अंतिम मा अपनी मेहरारू का माता कहिके गुरु कै नाव बतावत हैं अउर कहत हैं कि भीख दै दियौ , सब दिन तोहार फुलवारी हरियर रहे :
मोरी माता सुनौ कलाम , हमरे गुरु कै गोरख नाम 
जे देइहैं हमका ग्यान कै गठरिया ना
जोगी खड़ा है तोहरे द्वार , माता कै दा भिच्छा दान 
सब दिन फूली रही तोहरी फुलवरिया ना
मेहररूवौ बहुत समझाइस , मुला भरथरी अपने इरादा से टस से मस भये . अंत मा जाइके बेटवा कहिके रानी भीख दै दिहिन :
बेटवा कहिके भिच्छा दीन , अइसन जोग भरथरी कीन
बनइके कहै मुसरिया दीन , झुमरिया ना | ” 
                                                
                                                ============================== 
फूल मरै पर मरै बासू : 


आजु पता लाग कि भोजपुरी कै बिरहा गायक बालेसर यादव हमरे बीच नाय रहि गए . भोजपुरी के ठेठपने का बचायिके नए समय मा गायन की चुनौती का बालेसर जीवन भै निबाहिन . दुइ गीत बिसेस तौर  पै सुना जाय सकत हैं जौन यूटूब पै मिले हमैं . पहिला गाना है : ‘ कजरा काहे नाहिं देहलू ‘ | दुसरका गाना है : ‘ एम्मे बीए कइले में कोई दम रोजगार चाही ‘ | बालेसर के जाए पै बड़ा अफ़सोस है , यहिते जौन अस्थान खाली भा है पुराय वाला नाय है !


9 responses to “लोक गाथा : अइसन जोग भरथरी कीन ..

  1. बालेसर कै यक गीत औरउ सुनै लायक है : ' ' दुनिया वाले हमका कहेला बिहारी मितवा ' '
    लिंक है :

  2. बालेसर यादव को समर्पित शानदार पोस्ट के लिए धन्यवाद।

  3. भरथरी की उज्जैन के पास गुफा देखने पर लगा था कि वे मालवी में बोलते रहे होंगे! वे शायद समस्त उत्तर की विरासत हैं।

    बालेसर यादव का गीत सुना – मुँह में केक नहीं – जलेबी; आइब्रो लाइनर नहीं, काजल। हम गंगा किनारे वालों को यही तो भाता है।

    श्रद्धांजलि।

  4. बहुत बढ़िया लिखे हौ भर्तहरि केरी कथा, ई बिलुप्त होति कथा का हियाँ प्रस्तुत करइ बदि तुमका बहुत बहुत धन्यबाद!….

    बालेसर यादौ कहियां हमार श्रद्धांजलि…

  5. बहुत सच्ची श्रद्धांजलि दिये हो आप ।बालेसर जी की कमी की पूर्ती कौनो नाही कर सकत ।

  6. अवधी लोक साहित्य के बिसाल भण्डार ते
    चमकुआ मोती निकारि के लाय हौ भईया !
    बालेसर को हमरी श्रद्धांजली !

  7. मजा आ गइल। बूढ़ जोगी के गावल गोपीचन्द अउर महतारी के बात हमरे लग्गे रिकार्ड में बा। कब्बो पोस्ट करबे।

  8. भाव प्रवण-इन लोक चरित्रों के बारे में विस्तार से लिखे की जरुरत है -अभी बहुत कुछ तिलिस्मी /रहस्य आवरण में ही है !

  9. अमरेन्‍द्र भाई, भरथरी लोक गाथा छत्‍तीसगढ़ में भी गाई जाती है। कहानी संपूर्ण उत्‍तर व मध्‍य क्षेत्र में लगभग-लगभग एक ही है। अवधी में लोक गाथा भरथरी के अंशों को पढ़ना अच्‍छा लगा, बालेसर जी के आवाज में इसे सुनने का प्रयास करते हैं।
    छत्‍तीसगढ़ी भरथरी गाथा यहां पढ़ी/सुनी जा सकती है – http://hi.wordpress.com/tag/%E0%A4%AD%E0%A4%B0%E0%A4%A5%E0%A4%B0%E0%A5%80/

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