बाबू तुम यादि बहुतु आयेउ

बाबू तुम यादि बहुतु आयेउजब ते यू मायानगर छ्वांड़ि
बाबू तुम क्रिसना धाम गयेउ
बाबू तुम यादि बहुतु आयेउ
बाबू तुम यादि बहुतु आयेउ .

अम्मा जब मांदी बहुतु भईं
औ खटिया परिहाँ रहइं परी
तुम्हरी तस्बीर निहारत कै
आँखी कोरन लौ रहइं भरी

बाबू तुम यादि बहुतु आयेउ

अम्मउ कै छीछाल्यादरि हइ
सोंचती हइं कौने घर जाई
भइयन बँटवारा करि डारिनि
उइ कहती हैं की मरि जाई

बाबू तुम यादि बहुतु आयेउ

अपनी बिटियन का चच्चू जब
छाती तेरे चपटाइ लिहिनि
मूड़े परि धरिकै हाथु अपन
मुँह हमरे तइं बिचकाय दिहिनि

बाबू तुम यादि बहुतु आयेउ

जौ सासू लगीं गरियावइ औ
ननदेऊ मुँह टेंढ़े घूमइं
मात-पिता कै आदर बदि जौ
पति देव बचन अपने भूलहिं

बाबू तुम यादि बहुतु आयेउ

उइ दह्युबरा औ सकपहिता
भारुआं भांटा, मटरा खिचरी
जब बनइत बेझरा की रोटी
तौ कहइ कउन यह अधकचरी

बाबू तुम यादि बहुतु आयेउ

पाठ पढ़ाएउ रहय जौनु
वइ आजउ हम दोहराइति हन
संस्कार जौनु हमका दीन्हेउ
उइ लरिकन लौ पहुँचाइति हन

बाबू तुम यादि बहुतु आयेउ ……

 

नोट : यहि पोस्ट क ज्योत्स्ना पांडेय जी पोस्ट किहे रहीं, मुला ब्लागर से वर्डप्रेस पै लावै म तकनीकी वजह से पोस्टेड बाई म उनकै नाव नाहीं आय सका, ब्लागर वाले ब्लाग पै अहै, यहिबरे ई नोट लिखत अहन! सादर; अमरेन्द्र ..

19 responses to “बाबू तुम यादि बहुतु आयेउ

  1. बहुत अच्छी कविता है. पढ़कर भाव-विभोर हो गयी हूँ. अपने बचपन की बोली के कारण और भी अधिक प्रिय लगी. ज्योत्सना जी को मेरी ओर से बधाई.

  2. प्रिय पाठकों ,
    ज्योत्स्ना जी ने मेरे निवेदन को स्वीकार कर ब्लॉग में अपना बहुमूल्य सहयोग करने दिशा में यह पहला कदम रखा है , ज्योत्स्ना जी के प्रति हार्दिक आभार ! मैं तो बेहद खुशी हूँ ! रचना भी उस सोंध को लिए है जो 'अवधी कै अरघान' के अर्थ को विस्तीर्ण करती हो .

    बाकी कविता पर कुछ कहने फिर आउंगा ……….

  3. @ उइ दह्युबरा औ सकपहिता
    भारुआं भांटा, मटरा खिचरी
    जब बनइत बेझरा की रोटी
    तौ कहइ कउन यह अधकचरी

    मुग्ध हो गए! लोक का सौन्दर्य ही अलग है।

    एक दूजी बात – तुलसी बाबा की पंक्ति में 'राजपूत' है या 'रजपूत' ?
    कुछ और भी खटक रहा है। कवितावली में एक बार और देख लीजिएगा। मारे आलस के खुद नहीं देख रहा। ठंड है और रजाई में घुसा हूँ :
    )


  4. अवधी कै अरघान: पर ज्योत्सना जी का स्वागत है,यह मेरा प्रिय ब्लॉग है। यहां आकर मुझे अच्छा लगता है।
    आभार अमरेन्द्र जी।

    एंजिल से मुलाकात

  5. bhaiya, jyotsna aur aapko mubarakbad!

  6. बड़ी नीक लागी हो। जौनो “नोस्टाल्जिया” हो थ, नीक लागथ!

  7. बहुतु सुन्दर!

  8. अमरेंद्र जी नमस्कार,
    मैं आज मनोज कुमार जी के पोस्ट पर आपकी प्रतिक्रिया को देखा। आप के पास ज्ञान का विपुल भंडार है। समीक्षा के ऊपर समीक्षा का अंदाज कटु न होकर विचारनीय रहा। इस पद्धति के दौरान गुण-दोष का भी उदघाटन आवश्यक है। अनुरोध है कि मेरे पोस्ट पर आकर मुझे प्रोत्साहित करने की कृपा करें। धन्यवाद।

  9. गिरिजेश जी , आपने सही कहा , तुलसी बाबा की पंक्ति में रजपूत ही है , ध्यान न देने के कारण वैसा हो गया था . अब ठीक कर दिया हूँ . ध्यान दिलाने का शुक्रिया !

    दीदी , आपने अवधी ब्लॉग पर आशीष दे दिया है , एक आश्वस्ति सा ! एक शक्ति सा ! मेरी एक क्षुद्र सी कोशिश भर है कि जिस देशभाषा में कोटि कोटि कंठ लोल-किल्लोल कर रहे हैं , वह अंतरजाल के पृष्ठों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराये . आप सबका प्रोत्साहन और साथ हुलास बनाए रखता है .

    @ प्रेम सरोवर ,
    हुजूर , आये ही थे तो एक प्रयास कविता को देखने का भी करते🙂 | आपकी जानिब आने की पूरी कोशिश करूंगा ! आभार !

  10. फेसबुक पर कमेन्ट आया –

    Bhartendu Mishra >> वाह, ज्योत्सना जी का बधाई। अबही जो अस सुरुआत है तो आगे और सुन्दरि कबिताई जरूर हुइ जायी। & कविता पढिकै जिउ जुडाय गवा |

    — कुछ बात कविता पर —

    देशभाषाएँ अपने अंतस में आदिम महक लिए होती हैं , यह महक अनगढ़पन की होती है , इसलिए इनमें दीर्घकाल की अनुभूतियों की छुवन मौजूद होती है . देशभाषा की कविताओं में यह अनायास ही आ जाती है . ज्योत्स्ना जी की उक्त कविता में यह 'छुवन' मौजूद है . इसे देख के सहज ही लगता है कि 'खड़ी बोली' में यह संवेदना कैसे पिरो सकती है ?/! उपरोक्त कविता में हर शब्द का अपना देसी सन्दर्भ है , बिम्ब है , उन्हें पढ़ते बिना प्रयास के साधारणीकरण हो जाता है .

    स्मृति की कुहुक कैसे अपने विधान में बृहत्तर को समेटती है , कविता में देखा जा सकता है . सारी स्थितियां हमारे सामने आ जाती हैं और हम एक दूसरे परिवेश में स्वयं को पाते हैं , कविता-सृजित औदात्य-लोक में ! जहां जीवन-शब्द-अर्थ-मर्म-ध्वनि-भाव सब जुट जाते हैं !

    पिता की अनुपस्थिति , मां की स्थिति , संयुक्त परिवार की चित्र-स्थिति और पिता की अमूर्त संस्कारात्मक उपस्थिति को ख़ूबसूरती के साथ रखा गया है . ' बाबू तुम यादि बहुतु आयेउ' का टेक चित्त को रोक लेता है . ज्योत्स्ना जी की पहली ही कविता इतनी सुन्दर होगी , साश्चर्य सुखद है , और आगे सहज उम्मीद बंधने लगती है . समकालीन अवधी उपन्यासकार भारतेंदु मिश्र जी का कहना सही है कि '' अबही जो अस सुरुआत है तो आगे और सुन्दरि कबिताई जरूर हुइ जायी '' !

    आभार ज्योत्स्ना जी !!

  11. वाह ज्योत्सना जी , बहुतै सुन्दर लिखेऊ ! वैसे अवधी माँ लिखब कलेजे क काम है !आजु- काल्हि हिन्दी केरि छीछाल्यादरि हुई रही है ,तौ अवधी और ब्रिजभासा केरि का
    बिसात ! हिन्गलिस क्यार ज़माना है ! मुला आप येहिकै मिठास बचावैक कोसिस किहे हौ , येहिके बदि बधाई !आगे लिखति रहौ ! आसिरबाद !

  12. आपकी कविता का पठन कर जियरा मे हिलोर उठ गया।

  13. अम्मा जब मांदी बहुतु भईं
    औ खटिया परिहाँ रहइं परी
    तुम्हरी तस्बीर निहारत कै
    आँखी कोरन लौ रहइं भरी

    बाबू तुम यादि बहुतु आयेउ

    अम्मउ कै छीछाल्यादरि हइ
    सोंचती हइं कौने घर जाई
    भइयन बँटवारा करि डारिनि
    उइ कहती हैं की मरि जाई

    बाबू तुम यादि बहुतु आयेउ

    अपनी बिटियन का चच्चू जब
    छाती तेरे चपटाइ लिहिनि
    मूड़े परि धरिकै हाथु अपन
    मुँह हमरे तइं बिचकाय दिहिनि

    कविता तो पूरी ही मन में हूक उठाती है, पर ये तीनों बंद उस हूक को कुछ नमी दे जाते हैं…!

  14. अमरेन्द्र भाई, बहुत बहुत धन्यवाद् आपको,
    मैनें अवधी में बहुत कम कवितायेँ सुनी हैं🙂
    बहुत ही मर्मस्पर्शी लिखा है ज्योत्स्ना जी ने .

  15. “बाबू तुम यादि बहुतु आयेउ” अवधी लेखन में मेरा प्रथम प्रयास है, आप सभी पाठक बंधुओं/बहनों को ह्रदय से आभार व्यक्त करती हूँ,कि आपने मेरा हौसला बढ़ाया, धन्यवाद करती हूँ आपके प्रेरक शब्दों के लिए….
    अमरेन्द्र जी को विशेष धन्यवाद, उन्होंने मुझे अपनी लोकभाषा के प्रति मेरे कर्तव्य और प्रेम को अभिव्यक्त करने के लिए एक मंच प्रदान किया…
    -सादर

  16. अमरेन्द्र त्रिपाठी जी आप कई लेख हमका बहुत सुन्दर लाग अऊर बहुत ख़ुशी भई
    बहुत सुन्दर बहुत – बहुत शुभकामना सहित दीपांकर पाण्डेय

  17. ज्योत्स्ना जी,
    बहुत ही भावुक और आज की हकीकत लगती है.

    अम्मउ कै छीछाल्यादरि हइ
    सोंचती हइं कौने घर जाई
    भइयन बँटवारा करि डारिनि
    उइ कहती हैं की मरि जाई
    – विजय तिवारी

  18. बाबू तुम यादि बहुतु आयेउ

    अपनी बिटियन का चच्चू जब
    छाती तेरे चपटाइ लिहिनि
    मूड़े परि धरिकै हाथु अपन
    मुँह हमरे तइं बिचकाय दिहिनि

    उइ दह्युबरा औ सकपहिता
    भारुआं भांटा, मटरा खिचरी
    जब बनइत बेझरा की रोटी
    तौ कहइ कउन यह अधकचरी

    अब अभी अवधी के इस सोंधे से nostalgia में हूँ।
    अत्यंत मनमोहक, आप दोनों को आभार।
    -सादर

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