लघु कहानी [ १ ] : किचड़ही राह ..

पढ़ैयन का राम राम !!!
अवधी कै अरघानकी महफ़िल मा आप सबकै स्वागत अहै ..
आप सबके सामने पब्लो कोल्हो के ब्लाग पै लिखी यक लघु कहानी कै अनुबाद रखत अहन . कहानीपब्लो कोल्हो के ब्लासे साभार लीन गै हैकिचड़ही राह पै हम सब पबित्तर कै ढोंग पाले चलत रहित है जबकि उपदेसक से हटिके इमानदार  आत्मसमीछा कै दरकार हमरे अन्दर रहत है . हमैं दिमाग बंद कैकेलकीर कै फ़कीरनाय बना रहय का चाही . बाति दुइ जापानी भिच्छुवन के जरिये कही गै है . उम्मीद है कि कहानी आप सबका पसंद आये
                     
                    लघु कहानीकिचड़ही राह 


तंजान अउर इकीडो , दुइनौ जने , यक चहटाबोंदा से भरी राह के किनारेकिनारे जात रहे . मजे कै बरसातौ हुवति रही . दुइनौ जने धीरेधीरे यक चौराहे पै पहुंचे . चौराहे पै उनका रेसमी किमोनो पहिरे अउर वहिका कमरबंद से कसे यक प्यारी बच्ची मिली , जिहके ताईं  किचड़हा चौराहा पार करब परबत होइगा रहा

तंजान यकायक कहि परे : ” इधर आओ , बच्ची , ” 
तंजान वहि बच्ची का हाथे मा उठाय के किचड़हा चौराहा पार कराइ दिहिन . बच्ची सुरछित दुसरी वारी पहुंचि गै .

वहिके बाद इकीडो तंजान से कुच्छ नाहीं बोले . राति मा जब दुइनौ जापानी भिक्खुसराय (लाजिंग टेम्पुल) मा पहुँचे , तब इकीडो से रहाइस नाय भै

तंजान के ऊपर इकीडो बरस पड़े : ” हम भिक्खुवन का इसतिरी से दूरै रहय का चाही , जवान हुवत अउर सुन्दर इसतिरी से तौ ख़ास तौर से ! सब हमरे ताईं  खतरनाक है . काहे तू वहि बच्ची का पार करायेउ ? ” 

तंजान कहिन : ” हम बच्ची का पार कराइ के छोड़ि आयेन , अउर तू वहिका अबहीं ले ढोए जात अहौ ?? ” 


—  आभार — 
अमरेंदर नाथ तिरपाठी 
chabi:google 

26 responses to “लघु कहानी [ १ ] : किचड़ही राह ..

  1. जियो बबुआ बहुतहि बढ़िया अनुवाद भवा है। बस इस आत्मसमीछा का कौनो देसी विकल्प अऊर ढ़ूंढ़ा जाय्…कहानी बहुते अच्छी है…तुहका बधाई

  2. बहुत बढ़िया कहानी, हमहू पढीस जी के जिला केरे रहवैइया हन.यू बिलाग (ब्लॉग)देखि केरे आँखी जुडाइ गयीं ..
    भगवान तुमार भला करिहैं…बधाई!

  3. वाह! बहुत सुंदर संदेश। समझ तो गए, पर लिख पाना मुश्किल है .. अवधी में।
    सार्थक प्रयास। हमें इन भाषाओं को बढाना चाहिए।

  4. फेसबुक पर ये कमेन्ट थे :
    Vandana Sharma >> wah ..sare shabd to nahi samajh paye ..kahani avshya samajh aa gai..bahut achha prayas…achhi lagi … :))
    Manas Khatri >>बहुत ही अच्छी कहानी है..शुभकामनाएं..||
    Arun Misra >> बढ़िया कहानी है भईया ! पहिले ते पढी भई है ,मुला फिर ते पढिके औरऊ नीक लाग !
    खुस रहऊ !

  5. ‎@वन्दना जी , देशज भाषा है इसलिए शब्द अपरिचित से यकायक लगेंगे , पर धड़कन हिन्दी के वैविध्यगत सौन्दर्य की ही है , इसलिए आपको रुचा भी , आभारी हूँ !
    @अनुज मानस , तुम्हें कहानी अच्छी लगी , खुशी हुई , तुम्हारे लिए तो आँगन की भाषा है !
    @अशोक जी , आपको अनुवाद पसंद आया , समझिये सफल रहा प्रयोग . 'आत्मसमीक्षा' का देशी विकल्प जरूर ढूंढता हूँ !
    @ज्योत्स्ना जी , मोद दे गयी है आपकी टिप्पणी . इस तरह अपने यत्किंच प्रयास पर खुशी होती है !
    @अरुण जी , दरअसल ई कहानी परम्परागत ढर्रे कै कहानी है , यहि लिए ई औरउ जगहन पै नाव-ठाँव की अदलाबदली के साथ मिलि जात है , आपका कहानी नीक लागि , आभार !

  6. @ मनोज कुमार जी ,
    आपको समझ में आ गया , मेरी खुशी इसी में . इस देश भाषाओं का सौन्दर्य बचा रहे , यही कामना है मेरी भी . ब्लाग लिखना अपने बूते में है , सो यह किये जा रहा हूँ . हौसला-अफजाई का शुक्रिया !

  7. जियो बबुआ..तुहर ई बात माँ दम रहेल “हमैं दिमाग बंद कैके 'लकीर कै फ़कीर' नाय बना रहय का चाही”

  8. अब हम का कही , इत्ता अच्छा लिखे हो कि मन प्रसन्न हुई गवा ।आपन भासा का सम्मान करै का तुम्हार प्रयास बहुत नीक लाग ।

  9. अरे हमहूँ क समझ माँ आइ गवा!
    नीक कहनी।
    तुलसी बाबा त अवधी माँ ब्रज अउर संसकीरतो रखलें। आत्मसमीछा से काहें 'आब्जेक्शन' जब 'इमानदार' लगवें बा?
    वैसे खाँची भर कहावतो होइहें जौन 'आत्मसमीछा' पर बीस परिहें। वोहि में से कछु लिखि देइँ आचारज जी😉

  10. बहुत अच्छी कहानी …

    '' हम बच्ची का पार कराइ के छोड़ि आयेन , अउर तू वहिका अबहीं ले ढोए जात अहौ ?? ''
    कितनी सटीक बात कही है …दूसरे भिक्षुक के दिमाग में अभी तक वो लडकी घूम रही है …

  11. भाई अमरेंद्र त्रिपाठी जी सादर अभिनंदन| भाषा पूरी तरह समझ में नहीं आई, पर अंतिम पँक्ति सब कुछ बता देने में सक्षम लगी|

    सुंदर लघु कथा| बधाई|

  12. अमरेन्द्र भाई…अवधी से हमारे “छत्तीसगढ़ी” [भाई /संजीव तिवारी का “गुरतुर गोठhttp://www.gurturgoth.com” ] के बहुत से शब्द और अर्थ समान है. आपने अनुवाद के लिए भी एक अच्छी लघुकथा चुनी, जिसकी प्रभावोत्पादकता ज्यादातर पाठकों तक पहुँच रही है…भले इंगित आपको किया जा रहा..! हा..हा. निरंतर रहें.

  13. @ श्याम जी , अवधी और भोजपुरी दोनों को मिलाकर आपने सुन्दर लिखा है और उसपर भी 'जियो बबुआ' ! आभार !

    @ पलाश , आप बहुत प्यारी अवधी लिखे हैं . अउर उप्पर से बैसवाड़ी कै छौक ( तुम्हार ) आनंद दै दिहिस ! आभार !

    @ संगीता जी , सही कहा आपने . यही है कहानी का मंतव्य ! आभार !

    @ नवीन जी , इसीलिये ऐसी कथा चुना कि उसका 'कंटेंट' भाषा को भी निखारता हो , सम्प्रेषणीय बनाता हो ! आभार !

  14. @ गिरिजेश जी ,
    आर्य , आप ने निरखा – परखा , अच्छा लगा ! 'आत्मसमीक्षा' के बहाने कुछ बढियां सोचने की तरफ दिमाग दौड़ा . आतम / आतमा तो खूब चलता है . 'समीक्षा' पर जरूर लोक की निगाह कम है . और ऐसी स्थिति में तुलसीदास जी ने एक रास्ता तो बना ही दिया है जिसमें लोक या शास्त्र कोई भी वर्ज्य नहीं . मैं व्यक्तिगत तौर पर शास्त्रीय शब्दों को ग्रहण कर लेता हूँ , बिना किसी 'परवाह' के . आपको तो संस्कृतावधी पसंद भी आती है🙂

  15. @ समीर जी ,
    सर जी , आपने सही कहा . अवधी और छत्तीसगढ़ी में काफी समानता है . इसका एक कारण यह भी है कि ये एक कुल से सम्बद्ध भाषाएँ है जैसा कि भाषा-वैज्ञानिकों का मानना है कि अवधी-बघेली-छतीसगढ़ी पूर्वी अपभ्रंश के अर्द्ध मागधी स्वरूप से ताल्लुक रखती हैं . संजीव तिवारी जी का प्रयास 'गुरुतर गोठ' अत्यंत सराहनीय है . फीड संजो लिया हूँ . देश भाषाओं के वैविध्य की मनोहर झांकी आनी चाहिए . और यह बात सही लक्षित की आपने कि 'टेक्स्ट' ऐसा है कि वह खड़ी बोली के किसी भी पाठक को अत्यल्प प्रयास से ही संप्रेषित हो जाय . निरंतर रहूंगा . शुक्रिया !

  16. सुन्दर सार्थक लघुकथा!!!
    शुभकामनाएं!!

  17. बहुत सुन्दर बोधकथा है भाई ।

  18. बहुत ही खुबसूरत रचना…मेरा ब्लागः”काव्य कल्पना” at http://satyamshivam95.blogspot.com/ मेरी कविताएँ “हिन्दी साहित्य मंच” पर भी हर सोमवार, शुक्रवार प्रकाशित…..आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे……धन्यवाद

  19. कुछ समझ नही आया .

  20. दुबारा ध्यान से पढ़ा तब समझ में आया .
    अच्छी कहानी है .सच है ऐसे ही न जाने कितने विचारो को हम ढोते रहते है

  21. वाह अमरेन्द्र बाबू ! बहुतै नीक लगी कहानी. अवधी बोली में बहुतै सुघर अनुवाद.
    मुला हमार कहा मानो तो मौलिक कथा-लेखन मा भी थोड़ा-बहुत हाथ आजमाव.

  22. ई बोध कथा पढ़िके चौचक मजा आई गवा। अवधी नाहीं हमका तs बनारसिए भाषा मा बधाई देवे क मन भवा। एहसे हम ई सीखली कि मन चंगा रहेके चाही।
    …जीया राजा अवध नरेश।

  23. आप हमरे ब्लाग पर आये , हमार परम सौभाग्य , हमार उत्साह बढाऐओ बहु नीक लाग । हम आपकी सीख का जरुर ध्यान देबे । पहली बार कोई हमका आगे बढे का रस्ता दिखावा है । वइसन तौ बहुतैरी टिप्पणी अउती है , पर जउन आप कहैओ वा कोउ नही कहा
    आपका बहुतै धन्यवाद

  24. @ अनुपमा जी ,
    आत्मसमीक्षा पर जोर देती लघुकथा है . शुक्रिया !

    @ शरद जी ,
    सोचिये अब बौद्ध-भिक्षु भी बोध से यूँ कट जाते हैं😦

    @ सत्यम जी ,
    आपका यही कमेन्ट कई ब्लागों पर देखा , बेहतर है कि पढ़कर बात कहा करें , आभार !

    @ अभिषेक जी ,
    कहानी पढने और मर्म पकड़ने के लिए शुक्रिया भाई !

  25. @ मुक्ति जी ,
    आप सबका अनुबाद रुचा , यहिते परयास सारथक समझब . मौलिक कथौ लिखब मुला पहिले कुछ अनुबाद अउर परम्परागत लघुकथन का सामने लै आई , तौ फिर ! नीक सुझाव खातिर धन्नबाद !

    @ देवेन्द्र जी ,
    बनारस तौ अस सहर है जौन देस भर की कल्चर का सम्हारिस है . गजब है मेल-मिलाप किहिस . यहू यक वजह है कि बनारस कै बोली खूब समझ मा आवत है . सुक्रिया भैया !

    @ पलास
    ईमा 'परम सौभाग्य' कै कवन बाति ! , ई तौ हर टिपैया कै धरमु आय कि पढ़े के बाद 'सै भाठै' के अंदाज मा टीप ना करै . जौन ठीक जनाय तौन कहै . पोस्ट लेखकौ का चाही कि बात का सकारात्मक तौर पै लियय . हमरे बलाग पै कुछ संसोधन – सुधार बतावै का होए तौ बेखटके आपौ कहा जाए . कहा गा है न – 'हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः' . सुक्रिया !

  26. very motivational story sir..!!!!!!!!!!!!

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