बजार के माहौल मा चेतना कै भरमब .. रमई काका कै कविता ” ध्वाखा ” … …

पढ़ैयन का राम राम !!!
‘ अवधी कै अरघान ‘ की महफ़िल मा आप सबकै स्वागत अहै ..
स्त – व्यस्त जीवन , दौड़ – भाग , यनही सबके बीचे मा ई अवधी ब्लाग पै काफी समय से कुछ नाहीं आय पावा , जात्रा-बरनन चलत रहा पिछली पोस्ट मा , वहकै ‘स’ हिस्सा कै बिधान नहीं बनि पावा अउर अब देखित है तौ यादन कै तल्ली खियाई मिलत है .. अब देखौ कब लिखी वहका ! .. आज फिलहाल प्रिय कवि रमई काका कै यक कविता रखि के आपन बात ख़तम करब .. रमई काका कै कविता ” ध्वाखा ” ( यानी धोखा ) बहुचर्चित कविता है , ई कविता इंटरनेट पै आय जाय , हमार ई कोसिस अहै .. यहि कविता का उपलब्ध करावै मा रमई काका के सपूत अरुण काका कै भूमिका है .. ई कविता के फरमाईस पै वै हमैं यहिका हाथेस लिखि के बाई पोस्ट भेजिन .. अरुण जी का धन्यवाद !
कविता पै : यहि कविता मा लखनऊ के बजार मा यक गाँव कै मनई पहुँचत है , कक्कू संबोधन वही मनई या खुद रमई काका के लिए है .. बजार के माहौल मा मनई कै चित-भ्रम होइ जात है .. वैसउ बजार कै बजार भ्रम पै ज्यादा टिकी अहै .. अइसनै कबीर बजार मा लुकाठी लै के नाहीं पहुँचते , सायद झूठ – भ्रम जलावै कै सूझी हुवै कवि महराज का और चिल्लाय दिहे हुवें कि ‘ जो घर फूंकै आपना चलै हमारे साथ ! ‘ .. बहरहाल .. मनई लखनऊ मा भरम के चलते बार बार उल्लू बनत है .. बजार अनात्मीय माहौल पैदा करत है  .. जहाँ सहज पहिचान मिटत है .. मनई कईव प्रसंगन मा कहै के लिए बाध्य है — ” हम कहा फिरिव ध्वाखा होइगा ” ! .. अचरज हुवत है कि चालीस के दसक मा रमई काका बजारवाद कै केतनी सही नब्ज पकरत रहे .. गाँव की आँख से देखत रहे नए फैसन का , अंगरेजी फैसन का ! .. सुमित्रा नंदन पन्त के तरीके से रमई काका का कहै कै जरूरत नाहीं महसूस हुवत कि  ‘ देख रहा हूँ आज विश्व को मैं ग्रामीण नयन से ‘ ! .. काका कै पूरा काव्य बड़े सहज ढंग से ग्राम-गाथा है , किसान-गाथा है ! .. आज हिन्दी साहित्य मा गाँव अउर किसान कै बिदाई अफ़सोसनाक है ! .. काका की कविता से सुकून मिलत है कि कविता अबहिउं हमैं चेतावत है ! .. अब कविता प्रस्तुत अहै ——— 
कविता : ” ध्वाखा ” 

हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा !

[ १ ] 

हम गयन याक दिन लखनउवै , कक्कू संजोगु अइस परिगा |
पहिलेहे पहिल हम सहरु दीख , सो कहूँ – कहूँ ध्वाखा होइगा —
जब गएँ नुमाइस द्याखै हम , जंह कक्कू भारी रहै भीर | 
दुई तोला चारि रुपइया कै , हम बेसहा सोने कै जंजीर ||
लखि भईं घरैतिन गलगल बहु , मुल चारि दिनन मा रंग बदला |
उन कहा कि पीतरि लै आयौ , हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा || 

[ २ ]

म्वाछन का कीन्हें सफाचट्ट , मुंह पौडर औ सिर केस बड़े |
तहमद पहिरे कम्बल ओढ़े , बाबू जी याकै रहैं खड़े || 
हम कहा मेम साहेब सलाम , उई बोले चुप बे डैमफूल |
‘मैं मेम नहीं हूँ साहेब हूँ ‘ , हम कहा फिरिउ ध्वाखा होइगा || 
[ ३ ] 

हम गयन अमीनाबादै जब , कुछ कपड़ा लेय बजाजा मा |
माटी कै सुघर महरिया असि , जहं खड़ी रहै दरवाजा मा ||
समझा दूकान कै यह मलकिन सो भाव ताव पूछै लागेन |
याकै बोले यह मूरति है , हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा || 

[ ४ ]  

धँसि गयन दुकानैं दीख जहाँ , मेहरेऊ याकै रहैं खड़ी |
मुंहु पौडर पोते उजर – उजर , औ पहिरे सारी सुघर बड़ी ||
हम जाना मूरति माटी कै , सो सारी पर जब हाथ धरा |
उइ झझकि भकुरि खउख्वाय उठीं , हम कहा फिरिव ध्वाखा होइगा || 

————— रमई काका 

आज जब माल-कल्चर हमरी सुध-बुध की लीलति अहै , ई कविता औरउ प्रासंगिक है ! 

भैया , ई रही कविता .. कस लाग ? बतावैं ! 
राम राम !!! 

आभार –
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी 

कार्टून – गूगल बाबा की मेहरबानी से 

37 responses to “बजार के माहौल मा चेतना कै भरमब .. रमई काका कै कविता ” ध्वाखा ” … …

  1. आहाहा.. भैया तोहार ई प्रयास बडा प्रशन्सनीय है..

    “धँसि गयन दुकानैं दीख जहाँ , मेहरेऊ याकै रहैं खड़ी |
    मुंहु पौडर पोते उजर – उजर , औ पहिरे सारी सुघर बड़ी ||
    हम जाना मूरति माटी कै , सो सारी पर जब हाथ धरा |
    उइ झझकि भकुरि खउख्वाय उठीं , हम कहा फिरिव ध्वाखा होइगा ||”

    ऎसन ध्वाखा होत रहे के चाही.. बहुत अच्छी कविता यार सुपर डुपर..

  2. kavita pahle bhii sunii hai…yahaan dekhkar khushii hui. yah bhii ek jaroorii kam hai. aanchalik bhashaon men charchit aise kaviyon kii kavitaen antarjaal men daalna jo atyadhik janpriy rahe hain aur jinhe nai piidhii nahin janti.
    ..umda post.

  3. झन्नाटेदार चित्र लगाया है ।

  4. बहुत-बहुत आभार। लिखित रूप में पहली बार देख रहा हूँ यह कविता। हमेशा रेडियो पर ही सुनी, लगभग पूरी याद भी थी। सबसे ज़्यादा मज़ा बचपन से ही – वहीं आता था हमें जब “खौख्याय” उठती थीं आधुनिका भद्रशीला!
    जब आप का संपर्क अरुण जी से हो ही गया है तो “जब डगदर कीन्हेस अपरेसन – अउजार भूलिगा पेटे माँ” और अन्य ऐसी ही रचनाएँ पढ़वाने की जुगत कीजिए अमरेन्द्र! बहुत आभारी रहेंगे -हमारे साथ अन्य भी कई लोग।
    फ़िलहाल धन्यवाद और शुभकामनाएँ,

  5. दु बेर धोखा हमहु खाएन।

    बहुत बढिया कविता रमई काका के।

    आभार

  6. @ पंकज जी ,
    पधारै कै सुक्रिया …

    @ बेचैन आत्मा जी ,
    हुजूर , इस कार्य को भरसक करता रहूंगा ..

    @ प्रवीण जी ,
    हूँ, इसीलिये रख दिया यह चित्र , मानीखेज लगा !

    @ ललित जी ,
    वाह ! आपौ धोखा खाइन –🙂 , फिर आगे काव भा ?

  7. @ हिमाशु मोहन जी ,
    आपकी टीपन से आपकै आंचलिक भाषा के प्रति लगाव व्यक्त हुवत है ..
    अइस लागत है कि हमार उद्यम सार्थक हुवत अहै ..
    बड़ा दुलार दै गयी हैं आपकी टीपैं !!!

    जौनी कविता कै फरमाईस कीन गा है , वहू कै जुगाड़ करब , वाहिका आप सबके सामने रखत हमहूँ का बहुत खुसी होये !

    बहुत आभारी अही हम आपकै !

  8. khushi hui ki is blog me jan baki hai.

  9. FILM आँखें से हमारा यह प्रिय गीत है .. इसकी इस तरह दुर्गति होगी हमे नही पता था हाहाहा…..

  10. aap to lok sahitya ke dhrohar ko sanjone ka bara kaam kar rahe hain. aapke is junoon ko pranam.

  11. कविता की भावना सीधे दिल को छुने वाली है ,अमरेंद्र जी हमे आप ऐसे ही स्थापित रचनाकारो को पढवाटे रहिये

  12. ramai kaka ka padhaavai ke bare bahutai dhannabaad,hamka bada neek laag…..

  13. घर पर नहीं हूँ । सम्पर्क नहीं हो पा रहा ।
    बहुत दिनों बाद ब्लॉग की चौखट पर आया हूँ !
    काका को पढ़ना अदभुत अनुभव है । अन्तर्जाल पर इन्हें उपलब्ध कराना आप-से लोगों की जिम्मेदारी है !
    कविता-कोश पर काका हैं? नहीं, तो जोड़ें,जुड़वाएं !

    सदैव याद रहने वाली इस रचना की प्रस्तुति का आभार ।

  14. रमई काका…और अवधी…

    बहुत कुछ दिमाग में इधर-उधर हो गया…आभार…

  15. रमई काका की कविता….लोक भाषा के जिन शब्दों से गढ़ी है… वो सिर्फ लोक भाषा में ही संभव है…. बहुत पहले किसी से यह कविता /गीत सुना था….आज आपके ब्लॉग पर पूरा गीत पढ़ आकर आनंद आ गया….सच में लोक भाषा का अपना स्वाद है जो खाए वही जाने……!

  16. अब आपके बीच आ चूका है ब्लॉग जगत का नया अवतार http://www.apnivani.com
    आप अपना एकाउंट बना कर अपने ब्लॉग, फोटो, विडियो, ऑडियो, टिप्पड़ी लोगो के बीच शेयर कर सकते हैं !
    इसके साथ ही http://www.apnivani.com पहली हिंदी कम्युनिटी वेबसाइट है| जन्हा आपको प्रोफाइल बनाने की सारी सुविधाएँ मिलेंगी!

    धनयवाद …
    आप की अपनी http://www.apnivani.com

  17. इस भाषा के बारे में हम अल्प ज्ञानी है बंधू …..कार्टून बड़ा झकास लगाये हो !!

  18. अमरेंद्र जी,

    बहुतै अच्छा लाग इ कविता पढ़ि के । बचपन म सुने रहेन , थोर बहुत ध्यान रहा , पढ़ि के याद ताजा होइ गै अ‍उर मजा आइ गवा । बहुत धन्यवाद ।

  19. महराज,हम तौ बचपनै ते रमई काका के दिवाने हन.'बौछार' के पहिले 'मतोले'के रूप ते भी परिचित होइ गैन रहै.बादि मा लौडी स्पीकर व रेडिओ मा उनके बनाये नाटक खूब सुना. उनका जैस चरित्र जल्दी देखाय क नहिन.आप उनकै यादि दिला रहें हैं,नई पीढ़ी के बरे बहुतै बढ़िया है…

  20. लगे रहौ भैया, अवधी मा पहिली बार कुछ मिला बा नेटवा पे। बधाई होय।

  21. फोटू उम्दा है बिल्कुल जे.एन.यू. के हिसाब ते बहुत बढिया,लेकिन यह अतनी ही कविता है कि और बडी है?

  22. बहुत मजा आवत है भाई आपके ब्‍लाग में। ऐका अईसेन लिखत जाएं, हमार लोगन की शुभकामना तुमहरे साथ है।

  23. Awadi bhasha ko to apne jiwant roop mein prastut kar diya hai.Badhai.PLz. visit my blog.

  24. अरे, मॉल में जा कर देखो, जाड़े के हिसाब से नया नया सामान आया है। उसपर भी तो रमई काका कुछ कहे होंगे। वह कब आयेगा ब्लॉग पर? जेठ के महीने में?

  25. सही कहेउ भइया,आज तौ लरिकईं यादि आइ गयी. यह कबिता तौ हम बचपने माँ सुना रहय, रेडियो परिहाँ.
    जियु जुडाइ गवा.खुस रहऔ….

  26. आप सब कविता का एतना पसंद किहिन अउर हौसिला-अफजाई किहिन ! बार बार शुक्रिया !

  27. ई अपने अम्मा केरे मुँह ते सुनेन है कइयो दफा बकिर खाली एतनै सुनेन हैं कि “हम कहा बड़ा ध्वाखा होईगा।”

    पूरी कविता सुनाये बदे धन्यबाद..!

  28. कविता बहुतै नीक लागी…आपन लोक परम्परा के देखावे वारी…पर मुला काका हैं बड़ा रंगीन…मूरत से बतियावत हैं और असली पे हाथ धरत हैं🙂

  29. एस.चन्द्रशेखर

    अमरेन्द्र भईया,

    राम राम जी की ।

    तुम्हरी कृपा ते रमई काका केर कबिता हम लोगन का पढ़ै के मिल गई, मन परसन होइगा।
    काका केर कबिता का कउनौ संग्रह पायै जायैँ तौ आनंद आय जावे। जनकारी होय तो साझा कर लिन्हो, तोहार उपकार होई।

    सादर

  30. respected amarendra ji aapke is sarahneeya apraysh ke liye kotishah dhanyavad,kripaya kaka ji ki kavita budhaoo ka biyahu bhi sampadit karen namaskar………………….!!!!!!!!

  31. arun kumar nigam

    ye kavita hai to hasya ki par thodi der ke liye to aankhon mein aansoon aa gaye. kaaran? us bachche se poochiye jo kisi mele mein kho gaya ho aur bahut der ke baad apni maan se mil paya ho. is kavita ko radio par, 50-52 saal pahlesuna aur phir to baar baar suna. kaka ke suputr arun ji se lakhnau vishwavidyalay mein milne ki bhi yaad hai. ab to lakhnau chhode hue bhi 46 saal ho gaye. khair ! insaan na kabhi apni maan ko bhool pata hai, na apni matrabhasha ko. aap ke is prayaas se mere jaise kitne logon ko ki purani yaadein jeevant ho gayi hongi, aap nahin jaante. DHANYAVAAD … arun kumar nigam

  32. bhanu pratap singh

    BHANU PRATAP SINGH
    अमरेन्द्र भईया,

    राम राम जी की ।

    तुम्हरी कृपा ते रमई काका केर कबिता हम लोगन का पढ़ै के मिल गई, मन परसन होइगा।
    काका केर कबिता का कउनौ संग्रह पायै जायैँ तौ आनंद आय जावे। जनकारी होय तो साझा कर लिन्हो, तोहार उपकार होई।

    SADAR PARNAM

  33. डा.शशिप्रभा बाजपेयी

    अमरेन्द्र भैया ,जै राम जी की. रमई काका केर या कविता बचपन म उनहे केरे मुँह ते सुने रहन,अब फिरि पढ़ि कै बहुतै नीक लाग .हमरे तीर पं केदारनाथ त्रिवेदी ‘नवीन’ सीतापुरी जी की तमाम अवधी कविता है,जल्देन पठइब. शशिप्रभा बाजपेयी

  34. bhiya hamhuk baht neek lagi

  35. ajhain hum ya kavita apan guru ji se sitapur ma suni rahain aur ab pari hai.. super duper fantastic.. hats off

  36. dheeraj kumar awasthi

    ramai kaka ki kavita bahut hi sunder hai hamne kai kavita ylad bhi kiya .

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