हिम के आँचर से ताँक-झाँक [अ] ,,,,,,

                                          हिम के आँचर से ताँक-झाँक [अ] ,,,,,,
पढ़ैयन का राम राम !!!

‘ अवधी कै अरघान ‘ की महफ़िल मा आप सबकै स्वागत अहै ..
…………….
अजीब हुअत है जब केहू से बाति करौ अउर ऊ मन का बिना बताये पढि लियय .. कुछ अइसने भा यक 
दिन हमरे हिमाचली दोस्त मनोज से बाति करै के दौरान .. कहिन कि बस चला आओ हम तोहार इंतिजार 
करत अहन अउर काल्हि कै ‘डिनर’ तोहरे साथे करब .. हमहूँ तुरंत राजी भयेन .. अगले दिन पहुँच गयन
सिरमौर जिला , हिमाचल .. हिमाचल के बारे मा सिरी मनोज मिसिर जी कै कहब रहा कि ‘अपनी चमक 
खो रहे हैं पहाड़’ .. सोचेन कि देखी तौ ज़रा .. वैसे जायका-बदल करब मेन मकसद रहा जाहे खातिर दोस्त 
हमैं बलाए रहे .. पर लगे हाथ चारै दिन मा औरौ कुछ जानै का मिला ..
                                     बाएं से सुरुआत मा हम अउर मनोज कै बाबू – अम्मा ,मनोज

                 मित्र  मनोज  हिमाचल सरकार कै यक कुसल अधिकारी हैं .. बानी कै मधुर हैं .. अधिकारौ बड़े 
मधुरता के साथ देखावत हैं .. कहूँ हमैं कौनौ दिक्कत नाय उठावै दिहिन .. अपने घरे टिकाइन .. घर कै हर 
केहू वतनै सरीफ .. ‘नाहन’ मा घर है बंधुवर कै .. हुवाँ कै बजार घूमेन , बजार मा बड़ी सांती रही , हमैं आपन
कुचेरा  बजार याद आवै लाग जहां एतनी देर मा कम-से-कम दुइ जगह झगरा हुवत मिलि जात .. इहाँ यक 
तरह कै सराफत दिखी लोगन मा .. सोचै लागेन कि एतरा  धैर्य काहे है हियाँ के लोगन मा .. हमैं लाग कि 
 सुभाव  कै  ताल्लुक भौगोलिक बनावट से भी हुवत है .. पहाड़ पै बिना धैर्य के जीवन कैसे कटे ! .. बिसम भूमि 
पै तौ चलहिन का परे तौ बेहतर है कि ठंढेपन का सुभाव कै स्थायी-धरम बनाय लीन जाय .. 
                 

        हिमाचल के सिरमौर जिला कै रेनुका झील पै काफी समय बितायन .. ई झील हिमाचल कै सबसे बड़ी झील है  .. यहिकै नाव परसुराम जी की माता  
जी के नाव पै रखा गा अहै .. पूरी झील कै बनावट यक लेटी  स्त्री के  आकार मा है .. यहीं सरकार के तरफ से परसुराम ताल बनावा गा अहै .. यहि चित्र मा मनोज भाई के साथ वहिकै नाव देखा जाय सकत  है .. 

साम के मंदिर से उठै वाला स्वर झील के पानी के साथ मिल के जलतरंग-सुर  कै अहसास करावत रहा .. 

यही झील की नजदीकै रुकय-ठहरय कै इन्तिजाम भा रहा .. सिरी दीप सर्मा जी कै बिवस्था मा कौनौ कोर – कसर नाय रही .. रात के साथे भोजन-पानी कीन गा .. अस लगबै नाय भा कि अपरिचत के बीच आवा अहन .. उदासी अउर प्रसान्ति कै अंतर जानै का हुवे तौ पहाड़ – दरसन सबसे सटीक परे .. कुछ लोग पहाडन का उदास इलाका बोलत हैं बरु हम यहका  प्रसान्ति इलाका कहब ज्यादा सही मानित है .. यहि चित्र मा बाएं से हम, दीप जी अउर मनोज भाई ..  


लौटानी मा गिरि नदी के साथ बड़ी देर तक चलत रहेन .. दोस्त कै आपन कार रही जिहसे मन-मुवाफिक                    
ढंग से आउब-जाब ह्वै पावा .. जहां चाहा गा , हुवाँ रुका गा .. सीढ़ीदार खेतन कै खूब दरसन कीन गा .. पहाडन पै लोगन कै गाँव देखै मा अलग सुन्दरता बनावत रहे .. जिन्दगी कठिन है पै हियाँ के लोगन मा जिजीविसा वतनै ज्यादा है .. बीच बीच मा लोगन  से बात करत रहेन .. इधर के लोगन मा ( जे आदिवासी मतिन जीवन जियत अहैं , उनमा ) आजौ यक से अधिक 
पति कै परथा चलति अहै .. यक समूह है जौन अपने का पांडव की थाती से जोड़त है .. घूमै पै कई चीजन कै नई जानकारी मिलत है .. यहि चित्र मा किनारे हम अही अउर बाकी गिरि नदी कै पूरा प्रांगन … फोटू मनोज भाई खीचिन जिनके मन मा सदैव ई बसा रहत रहा कि हम उनकै नीक फोटू नाय खीचित .. :) 
               
                               प्राइमरी इस्कूल मा जाय कै ख्वाहिस रही हमार .. पहाड़ के यक प्राइमरी इस्कूल पै गयेन  , वहीं , जहाँ पै मित्र तहसीलदार के पद पै तैनात अहैं .. सारी बिवस्था वनहीं  कराइन .. तस्वीरन से गुजरब भले रहे .. 
                                                                                        ई है प्राथमिक विद्यालय , संगडा .. अउर ई हैं हियाँ के मेन महट्टर .. नाव है सिरी भगवान सिंह .. ‘सेंटरल हेड टीचर’ कै कमान यन्ही के हाथे माँ है , जिहसे यई बहुत दुखी अहैं .. पूछे पै कहिन कि ”सरकार,हमारे ऊपर ज्यादा लोड डाल दे रही है . मिड दे मील का रजिस्टर ढोने का काम सौंप कर डाकिया समझ रखा है . इस वजह से मैं बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पा रहा हूँ …. ” हम कहें कि तौ का कीन जाय तौ बताइन कि सरकार का यक अलग व्यक्ति का हर प्राइमरी इस्कूल 
पै  तैनात करै का चाही यहिके खातिर , यद्यपि अंतिम नियन्त्रन यनहीं के हाथे मा चाही , ऐसी हसरत भी बताये बिना न रहे ….
    




ई दुइ मास्टरनी हैं जिनका जिम्मेदारी सौंपी गई है कि ई मिड दे मील कै रजिस्टर बनाओ .. यई यही मा परेसान हैं ..






ई है भोजनालय .. जहां की भंडारी आजौ परम्परानुसार इस्तिरी – सक्ति ही है .. मास्टर साहब हमैं लै गये हुवाँ ले .. वहीं बड़े प्यार से चाय पिलवाइन .. खिचरी के बीच मा चाय चढाय के निकारि लीन गै , कुछ पतै नाय चला .. चाय के चुस्की लियत के मास्टर साहब बताइन कि हियाँ हर डेढ़ किलोमीटर पै यक स्कूल है , अउर 
                                    
स्कूलन  मा मास्टरन कै पूरी  भरती कीन गै है .. 

  



अउर ई हैं देस कै भविस्य .. नौनिहाल गेदहरै .. यक्कै कमरा मा तीन किलास कै गेदहरै बैठावा गा अहैं .. मास्टर यक्कौ नाहीं न .. सब कै डिउटी इन गेदाहरन के भोजन का लै के अहै .. सोचौ ,,, इनके पढ़ाई कै रामै मालिक हैं !!!                                                             


…………………………
             यहि तरह आज कै महफ़िल आपके हवाले करत अहन .. [अ] हिस्सा आज रखि दिहेन .. [ब] हिस्सा के लिए अगली महफ़िल का लैके फिर आउब .. तब तक के लिए राम राम !!!                                                           



21 responses to “हिम के आँचर से ताँक-झाँक [अ] ,,,,,,

  1. बहुतय बढ़िया भाय,गजबे लिखे हया,बढ़िया किहा जौन घूम आये ,
    मस्त पोस्ट है,बहुत बधाई.

  2. आपकी अवधी के तो हम कायल हो गए और शब्द चित्रों के भी.

  3. Nice Post !!
    keep is up Ami, love this post !!

  4. Paristhitiyan kathin hai….fir bhi humari sarkaar jitna kar rahi hai, uske liye hum unke shukraguzar hain.

    Ummeed hai Desh ka bhavishya ujjwal hoga !

    Nice post !

  5. चकाचक वर्णन है। भाग ब का इंतजार है। फ़ोटू-शोटू भी चकाचक हैं। बिन्दास!

  6. अच्छा लगा यह पढ़कर

  7. बहुतै नीमन यात्रा वृत्तांत -कलेजा में ठंडक पड़ गयी !

  8. अवधी-महफ़िल मा पधारे सब लोगन का सुक्रिया..
    .
    @ ZEAL
    ……………. @ fir bhi humari sarkaar jitna kar rahi hai, uske liye hum
    unke shukraguzar hain.
    ————– सही कहिउ ,,, पै सरकारी प्रयासन कै गति बड़ी धीम अहै ..
    आजौ 'सकल घरेलू उत्पाद' कै सिच्छा पै कीन गवा खर्चा बहुत कम
    अहै .. ऐसी स्थिति मा कठिन है , यहि व्यवस्था कै सुधार ! … पै आप के
    सुरन मा हमरौ सुर है — Desh ka bhavishya ujjwal hoga !
    …. आभार !

  9. घूम आये ! बहुत कुछ बटोर कर लाये होंगे वहाँ से ! धीरे-धीरे सुरुकते हुए पी रहे हैं हम!
    शायद कुछ बाद में कहें !

  10. जिन्दगी कठिन है पै हियाँ के लोगन मा जिजीविसा वतनै ज्यादा है
    एकदम सच्ची लगी ई बात।

  11. वाह, वाह! अवधी में इतना सुन्दर ट्रेवलॉग भी लिखा जा सकता है! मुझे तो आइडियाज़ की जगमगाहट लग रही है। यह पढ़ कर लग रहा है कि हम जैसा गांगेय प्रदेश का मनई पहाड़ पर पंहुच गया हो!
    स्टार लेखन! और स्टार प्रस्तुति।

  12. नज़र रहती है हमारी ज्ञान जी के स्टार-फीड चयन पर ! यह पोस्ट शामिल हो चुकी है वहाँ ! यहाँ तो लिख भी गये हैं आदरणीय ! ज्ञान जी की इस टिप्पणी ने संतोष दिया होगा न!

    सच्ची बात ! अवधी कविता की भाषा रही है ! खूब ऊँचाईयाँ पायी हैं इस भाषा ने काव्य-रचना के माध्यम से !
    गद्य में अवधी यहाँ सध रही है ! सम्भवतः अवधी का पहला यात्रा-विवरण/संस्मरण लिख गए हो गुरु !
    अभी इस यात्रा-विवरण को और अधिक सौन्दर्यपूर्ण होते देखना चाहता हूँ ! प्रकृति के प्रत्येक संस्पर्श की अभिव्यक्ति होते देखना चाहता हूँ इधर ! सौन्दर्य का जो साक्षात्कार किया है आपने, उसे इधर प्रवहित होते देखने की इच्छा है ! विवरण से अधिक मुझे वहाँ की वस्तु-वस्तु का आचरण भी जानना है ! इसे और कौन लिख सकता है सामर्थ्य से सिवाय आपके !

    कविताई तो दिखी ही नहीं यहाँ ! अगले भाग में उसे भी तलाश करुँगा !

  13. हिमांशु भाई ,
    सच कह रहे हैं आप .. ज्ञान जी की टीप ने बहुत संतोष दिया है ..

    जिस सामर्थ्य की आपने बात की है , संभव हो मुझमें न हो पर
    लगा रहूँगा सतत , आप लोगों के सहयोग और मार्गदर्शन में
    '' मूक पुनि बोलै … … '' का यथार्थ मेरे साथ भी क्या पता घट जाय !
    .
    अगले भाग में कविताई देखाये हो , भैया !

  14. अमरेन्द्र जी
    हिमाचल की यात्रा को जीवंत चित्रण करने का शुक्रिया……अपने मित्र , सिरमौर , मंदिर और सरकारी स्कूल के बारे में आपकी टिपण्णी अपनी भाषा में बहुत ही रोचक लगी. हिमाचल के बाद अब यूपी की तरफ कब रुख कर रहे हैं ? डिनर में हिमाचली गट्टे खाए या नहीं…..? ज्ञान जी की टीप से पूरी तरह सहमत !

  15. अमरेन्द्र जी ,
    हिमालय की क्या तारीफ़ करू और इस पोस्ट की क्या तारीफ़ करू
    मैंतो बस यही चाहती हूँ की आप लिखते रहिये ,अवधी में लिखते ही रहिये और खबरदार लेखन में गलती न हो
    मुझे पढने में थोड़ी परेशानी तो होती है मगर पढ़ना अच्छा लगता है ,लेकिन मैं यह जरुर सोचती हूँ कि ऐसे साहित्य त्रुटिहीन लिखे जाएँ .

  16. वाह भैया, यहु यात्रा प्रसंग बहुत बढिया बनिगा है। फोटू तो चारि चाँद लगाय रही हैं।

  17. अमरेनदर जी ! इहाँ आय के बहुत नीक लाग !!!!!! अवधिय्यै कै हमहू !

  18. हमैं मालुम न रहै कि अवधी माँ कोऊ ब्लाग लिखत है। बहुत बढिया लिखत हौ औ तस्बीरैं भी झकाझक हैं। बधाई।

  19. जन्मदिवस की शुभकामना के लिए आपको बहुत धन्यवाद.

  20. भाई अमरेन्द्र! बहुतै बढ़िया बातन ते भरी पोस्ट रही ई आपकी। हम पहिली बार पढ़ी रही जब भाग 'ब' पढ़े रहे – तब्बै। मुला अबहिन तलक हम टिपियाय नाँय पाय रहे।
    अब का कही! चला आज यहिका एकै बाक्य उठावा चहित हि कि काहे क पहाड़ क मनई धीरज क ब्यौहार करत हैं। त समझ माँ इहै आवा कि क्रोध और जोश का नाता गर्मियौ ते अहै अउर भूखेओ ते।
    और धीरज का संबन्ध ठण्डियौ ते है और थकान-पौरुखौ ते।
    अब ई समझा – कि जैसे धावक होवत हैं – मैराथन वाले – तौ ऊ रखिहैं धीरज, औ सौ मिटरिया होइहें त धरिहें धीरज किनारे, अ रहिहैं मार गुस्साए-जोस भरे! पाय जायँ त आकास हिलाय दें – कि जनात है आकास नहीं मकरजाला आय जौन ताना है ऊपरे।
    मैराथनिये खावत होइहैं घिउ, त ई खावत होइहैं मिर्चा-मसाला।
    जस रहनि-तस मिजाज-तैसै ब्यौहार।
    तबबै पहाड़ का धीरज का परतीक माना गा है।
    बहुत-बहुत आभार, बहुतै बिचारन ते सजी पोस्ट अहै – अ का कही कि तुहार लेखनियै सजी बा बिचारन के मोतियन ते!

  21. baba, tum akele-akele kaha ghoom rahe ho……??
    khair jo bhi ho, jindagi ka maja aisi jagah par ghoomne me hai.
    awadhi ke ardhan ki mahfil ka holi ke baad sabse rangeen page laga…
    charan sparsh.

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