ब्लाग – जगत पै फगुवा – गदर …अदा-ओ-बाऊ तोहरौ नेउता … सर्वं प्रिये ! चारुतरं वसन्ते.. अउर यक अवधी फगुनी – गीत ……..

                                                                          
ब्लाग – जगत पै फगुवा – गदर … 
                     मनोविसलेसन कहत है कि जे अपने व्यक्तिगत जीवन मा जवन काम नाय कै पावत ऊ काम कला के स्तर पै कै डारत है .. अंतरजाल पै पिछले दिदन मा कुछ अइसने फगुवापा देखन .. पता नहीं इन ब्लागरन का अपनी जिन्दगी मा थोरौ के बसंतियाय कै मौका मिला कि नाय , पै इनकी बलबली देखि के अंदाज कुछ अइसने लागत है .. चलौ अच्छा भा , फगुनाय लिहिन और अबहिनौ फगुनात अहैं , इच्छा दबावै कै का फायदा ! .. अब  आप सोचत होइहैं कि हम आखिर ई सब कहे बकित अहन , तौ भैया बताय दी कि ये लोग हमैं
( यन्हीं के अंदाज मा न फगुनाय के कारन ) बसंत – ‘बिलेन’ घोषित कै दिहिन .. होलिहार गिरिजेस राव उर्फ़ ”बाऊ’ तौ हमैं व्यंग्य मा ‘आचारज’ कै खिताब दै डारिन जैसे भारत सरकार आज-काल्हि अयोग्यन का पदुम पुरस्कार बाँटति अहै  .. हाँथ जोरि के बिनती किहेन कि भैया जुलुम न करौ हमरे साथे , आप लोगन की कविता पै टीपै कै अस खिताब (?) न दियौ मुल फगुनांध – महासय हमार यक न सुनिन .. हमहूँ कहेन मने-मन ” सच बोलने की ऐसी सजा हमने पायी है / फूल(?) बरस रहें हैं हमारे मकान पर ! ” .. कुछ वखत बीता कि नायिका – बरनन – प्रबीन श्री अरविन्द मिसिर जी ‘बसंत कै संखनाद ‘ कै दिहिन .. हमैं तौ यही लागत है कि पूरे माहौल के पीछे यन्ही मिसिर जी प्रेम-फागुन-छड़ी घुमाय रहे हैं .. मिसिर जी के हियाँ टीपेन कि जोगीरा – लताड़ खाय के औंधे मुंह गिरि परेन .. ई ‘एक्सीडेंट’ भवा अदा जी की जोगीरा – टीप से , मिसिर जी की वही पोस्ट पै .. ‘बैकफुट’ पै आइ के जवन क-न-ड-हा तीर मारिन कि ” इन बानन्ह अस को नहिं मारा / बेधि रहा सगरौ संसारा | ” .. अब तौ ‘आचारज’ कै हालत खराब ..अगर-कपूर-बाती  लै के मनायेन मुला अदा जी मखाये के बाद मानीं नाहीं .. सोचौ तौ फगुनी-बयार यतनी कमजोर हुवत है..
कुछ कसर बाकी रही तौ ‘मुक्ती’ जी टीप दिहिन —
”  देख लीजिये, आपके द्वारा इतनी चेतावनी देने के बाद भी कुछ लोग जोगीरा का साथ ही नहीं छोड़ रहे हैं.
और भी… एक नये तपस्वी आविर्भूत हो गये हैं-श्री श्री अमरेन्द्र जी महाराज. बाकी सब लोग तो भभूत खाये हैं.
ई जाने कौन सी बूटी खाये हैं कि इन पर कोई रंग ही नहीं चढ़ रहा है. निर्लिप्त…निष्काम…बेचारे.
… …
अमरेन्द्र बुरा न मानो होली है!!!!! ”
.
अब तौ ‘आचारज’ कै सिट्टी-पिट्टी गुम्म ! सोचे रहेन कि सुहृद ‘हिमांसु‘ कुछ कहिहैं हमरे वारी से , मुला उनका
तौ जैसे साँप सूंघ लिहे हुवे , यहि फागुन मा ! अब समझ मा आवत अहै कि मिसिर जी पिछले महीनन से केतना बरनन-गदरापा कै डारिन ! कम-से-कम फगुनातुर गिरिजेस जी कै रुतबा तौ इहै कहत है ! क-न-ड से फगुई टेसू सूरज के साथ बारह घंटा कै फगुई-जात्रा कैके गोमती मा बिसर्जित ह्वै जात है ! धन्य हो सूरुज !
.
हम सोचेन कि काहे न अपने आभासी – अजथारथ बसंत-बिलेन का मारि दी !
नाहीं तौ लोगई ”निर्लिप्त…निष्काम…बेचारे ” समझिहैं .. हमहूँ कहेन —
.
” आज अपने ही हाँथों से क्यूँ न क़त्ल हो जाएँ ,
अब तो मेरे कातिल के हाँथ थक गए होंगे | ” (  अज्ञात सायर ) 
.
यहि लिये ई फगुई – पोस्ट आप सबके सामने रखत अहन .. बुरा न मानेउ फागुन है !!!!
.
 सर्वं प्रिये ! चारुतरं वसन्ते..

                  ”बरजोरी करौ न मोसे फागुन में ”,बार – बार गूंजत है मन मा यहि मौसम मा .. ”न” मा फागुन कै
बिराट काव्य भरा अहै .. सहमति अउर असहमति के बीच कै काव्य ! .. संजोग अउर बियोग के बीच कै काव्य ! ..भाव व अभाव के बीच कै काव्य ! .. दिल अउर दिमाग के बीच कै काव्य ! .. पार्थिव अउर अपार्थिव के बीच कै
काव्य ! .. जागब अउर सोउब के बीच कै काव्य ! .. ‘फॉर्म’ अउर ‘मैटर’ के बीच कै काव्य ! .. चिंतन अउर बिउहार
के बीच कै काव्य ! ..औरउ-अउर .. ‘गहि न जाय अस अद्भुत बानी’ .. कुछ अस परभाव है बसंत कै .. पूरी प्रकृति
उत्सव मनावत है जिहमा मनई स्वयं अहै .. कालीदास के कबिता मा झाँका चाहित है ई फगुई-फुहार —
.
” द्रुमाः सपुष्पाः सलिलं सपद्मं
स्त्रियः सकामाः पवनः सुगन्धिः ।
सुखाः प्रदोषा दिवसाश्च रम्याः
सर्वं प्रिये ! चारुतरं वसन्ते ॥ ‘
.
यहि तरह बसंत मा सब चारुतर होइगा हैं .. का जानवर , का मनई , का दिन , का रात .. पाँचौ तत्व .. यही मौसम है जेहिमा गांव कै इठलात जवानी टका-लोभी ( डालर-लोभी भी ) सैंयाँ से सीधे – सीधे कहति है — ” अइहौ न सैंयाँ हमार अगर फागुन में / पड़ोसी संग जाबै बाजार , यही फागुन में ” .. अब सैंयाँ सम्हले नहीँ तौ जाय सरगहि .. कम-से-कम अतना साहस तौ दियत है बसंत !
का ई नायिका कौनौ गलत कहत है ?
हमैं तौ नाहीं लागत , बसंत मा बियोगी कै हालत बड़ी खराब हुअत है , संजोग का चाहब कौनौ गलत न आय .. ई तौ खालिस प्राकृतिक बात है .. वहै फागुन बियोगी के लिए बिस कै काम करत है .. संजोग से ई बिस दूर हुअत है .. नायिका अस न कहै तौ का कहै ! संस्कृत कै कबि भरथरी के यक श्लोक मा ई दुःख देखा जाय सकत है —
.
” मधुरयं मधुरैरपि कोकिला कलरवैर्मलयस्य च वायुभिः |
विरहिणः प्रहिणन्स्तिशरीरिणो विपदि हंत सुधापि विषायते || ” 
.
जब कोयल कै ‘कुहूँ’ और मलय-समीर बिरही के मन का काटे तब बिरही करबै का करै !
.
बसंत कै आवेग , मधुरिमा , रीतुराज -पन आदि-आदि , हर कवियन का अपनी वारी खींचिस है ..
तुलसी जी की चौपायिन मा बानगी के तौर पै ई देखा जाय सकत है ..
.
” संत सभा चहुँदिस अँवराई | श्रद्धा रितु बसंत सम आई || ” ( बाक-काण्ड )
.
” रितु बसंत यह त्रिविध बयारी | सब कंह सुलभ पदारथ चारी || ” ( अयोध्या-काण्ड ) 
.
” देखहु तात बसंत सुहावा | प्रिया हीन मोंहि भय उपजावा || ” ( अरण्य-काण्ड ) 
.
ई बात फुर है कि नाय कि पिय-हीन बसंत भय पैदा करत है !!!!
.

अउर अंत मा : फगुनी – गीत 
                        चलत – चलत अवधी कै  यक गीत आप सबन के सामने रखा चाहित है .. ई गीत
आय ” गीता श्रीवास्तव ” कै  रचा .. इनके बारे मा ज्यादा जानकारी नाय न , जब जानकारी होये
तौ साझा करब .. फिलहाल तौ याहि गीत कै आनंद उठावा जाय —
.
                                डोले फगुनी बयार ..

.                                                                                                           
महकै भोरही सपनवां |
खनकै बैरी हो कंगनवा  |
डोले फगुनी बयार .. 
.
अमवां की गाँछी – गाँछी , मंजराई डरिया |
सुधिया क s बीन बाजै ,  मन महुवारिया |
बाजै बनपंखिया क s मौसमी सितार ..
                           डोले फगुनी बयार ..   .. .. || 
.
टेसुआ फुलाने , ओठे दहकइ अगिनियां |
गदरी ढकुलिया क s खुलि गै मौनियां  |
भँवरा – भंवरिया क s रितु गुंजार ..
                           डोले फगुनी बयार ..   .. .. || 
.
मटकै सेवान , ओढ़े गाढ़ी हो चुनरिया |
घुंघटा के ओट झांकइ , सरसों पियरिया |
पपीहा बिरावै टीहूँ – टीहूँ सीटी मार ..
                          डोले फगुनी बयार ..   .. .. ||
.
घन बसवरिया में कुहकै कोइलिया |
बिरहा कै पाती बांचें,सखिया,सहेलिया |
खनकै बिरहिया सनेहिया क s तार ..
                        डोले फगुनी बयार ..   .. .. ||
.
यहि तरह आज कै अत्तवार कै महफ़िल आपके हवाले .. सबका राम राम !!!

 छबी स्रोत : गूगल )

38 responses to “ब्लाग – जगत पै फगुवा – गदर …अदा-ओ-बाऊ तोहरौ नेउता … सर्वं प्रिये ! चारुतरं वसन्ते.. अउर यक अवधी फगुनी – गीत ……..

  1. जाई, कमॉडिटी मार्केट देखी! भांग लागथ सस्ताइ गयि बा!🙂

  2. तुलसी माला बाँध गले में आ पहुँचे आचारज जी
    भरथरी अउ कालिदास के साथ निभावें आचारज जी
    हीरो हीरो कहि के हारे पर बिलेन बतावें आचारज जी
    गरमा के धीरे धीरे चारज हुए आचारज जी

    फोटो बहुत अच्छी लगी। जैसे फागुन का भोलापन साक्षात उतर आया हो। संस्कृतावधी का लालित्य दर्शनीय है। पूर्वार्ध से तो चचा की बात ही सही लगती है कि भाँग सस्ती हो गई है। बात भी सही है फाग महीने का उत्सव फागुनी तरीके से होना चाहिए। गीता जी का गीत भी जमा।
    अब फरमाइश यह है कि अवधी का कोई प्रेमसिक्त फाग पोस्ट करें।

  3. आवत हई हम…
    ठाढ़े रहियो तनी..भिनसरिया भईल बा अभी ईहाँ..
    किलास लेब हम…:):)

  4. साज वही अंदाज वही गाते चलो तुम गीत नए
    प्रीत के मुखड़े तो प्रियवर ,अब पुराने हो गये

    मजा आ गया ,अमरेन्द्र जी ,वाकई फागुन तो फागुन ही होता है
    हम भी पड़ोसी के साथ बाजार जायेंगे फागुन में ,इन्हें तो ब्लॉगर मीट घुमने और चैटिंग करने से ही फुर्सत नहीं है

  5. ओह! मुझे अभी बहुत कुछ सीखने की ज़रूरत है…. अवध में रह कर…. अवधी… में बहुत कुछ सीखना है….

    अभी तो छत पर चढ़ कर…रोज़ जोगीरा सा र र र र र र र र र र र्रर्रर र्रर्र र्रर्रर र्रर्र चिल्ला रहा हूँ………

  6. हम ई जानत रहे की अमरेंद्र भाई छुपा रुस्तम हौवें -झूठै गिरिजेश के पीछे हाथ धोय के पद गए रहें
    आज की यहिं पोस्टवा को मैं पोस्ट आफ ईयर के खिताब से नवाजा चाहित है !
    मस्त मस्त

  7. @ अदा जी !
    ————- कलेस मिटा करेजे कै कि आप पधारिन .. यानी हमैं माफी(?) मिलि गै अहै .. :):)
    ………… @ ठाढ़े रहियो तनी..भिनसरिया भईल बा अभी ईहाँ..
    — अरे हमका भयाकुल मनई न समझौ ..
    …………. @ किलास लेब हम…:):)
    — जरूर .. काहे नाय .. मास्टर तौ हम जैसे सीधे बच्चन कै खुब कान एंठत रहा .. आपौ
    न चूकिव .. है न !

  8. @ …अब फरमाइश यह है कि अवधी का कोई प्रेमसिक्त फाग पोस्ट करें।
    ——– ''प्रेम को पंथ कराल महा तलवार की धार पै धावनो है'' , फिर भी
    हुकुम कै परवाह जरूर करब .. भले ही ह-म-श tun -tun कै सहजोग ली ..

  9. @ अलका जी !
    फागुन में तो समय निकलना ही पड़ेगा ! बड़ा आग्रही मौसम है यह !
    @ महफूज भाई !
    धरती पर आ जाइए .. बहुत लोग साथ में हो लेंगे आपके जोगीरे में .. छत
    पर तन्हा चिल्लाने से क्या फायदा !
    @Arvind Mishra जी
    छुपा रुस्तम ! हा हा हा !!!🙂
    हमारी इसमें कौन गलती🙂
    …… सच में पोस्टवा अतनी अच्छी बनी गै ! आभार मिसिर जी !

  10. दुबारा आय गए…
    हाँ , जोगीरा सर र र र र र र र र ।

    खुले हजारो दल यक यक
    कमल गंध सगुनाई फैली
    .
    .
    कविता का प्रारम्भ तो मिल गया। कभी पूरी भी हो जाएगी। कोशिश कीजिए न ।

  11. वाह मज़ा आ गया. धन्यवाद अमरेन्द्र! आपकी यह पोस्ट पढ़कर बहुत दिनों बाद मैं इतना हँसी हूँ कि मेरी आँखों से आँसू निकल पड़े. एक तो अपनी यह अवधी भाषा, जो मेरे ख्याल से हास्य-व्यंग्य के लिये सर्वोत्तम भाषा है, ऊपर से आपका कातिलाना अंदाज़, जो बढ़िया लेखनी चलाई आपने…
    टिप्प्णी करते समय मुझे नब्बे प्रतिशत विश्वास था कि इसपर कोई न कोई प्रतिक्रिया तो ज़रूर होगी, पर इतनी खूबसूरत प्रतिक्रिया…आनंद आ गया.
    और एक बात सबसे ज़्यादा खिंचाई उसी की होती है, जो सबसे ज़्यादा लोकप्रिय होता है. समझ गये न…

  12. अउरौ याक बात. हमरौ ओर से ई पोस्ट “पोस्ट ओफ़ द इयर” घोषित कीन्ही जात है. मिसिर जी की बात ते हमहूँ सहमत अहिन.

  13. हम्म..
    बात ई है..कि..फागुन में माफ़ी… तो झोला में लेके घूमत हैं हम…
    और ई बात भी ठीक है…फागुन के बिलेन का तमगा सही मिला रहा आपको ..
    बाऊ आचारज तुमको माना
    ब्लॉग जगत वोही पहचाना
    फगुआ में भी भंग है डारी
    बन गए जी बिल्लेन भारी
    फ्रंटफुट पर मोहि बुलावा
    अचरज है बेचारे कहावा
    आचारज की महिमा भारी
    दौड़ो बाऊ अब तुम्हरी बारी
    ई अमरेन्द्र नटखट है भारी
    अरविन्द जी लेवें खबर तुम्हारी
    पहिले हम महफूज़ हो जावें
    फिर तोहे नानी याद करावें
    धाँसू ये पोस्टवा लिख डारी
    मुक्ति जी की कथन हमारी
    हमहूँ पोस्ट ऑफ़ दी इयर माना
    सब कुछ लागा बड़ा सुहाना
    अब हम बंद करें ई बाजा
    जो पसंद तो टिपण्णी ई साजा

  14. @ अदा जी !
    '' अदा भवानी मानि गयिउ तू |
    छिमा-दया कै खानि भयिउ तू ||
    सुघर टिप्पनी तू लिखि डारिउ |
    यक बालक का तू उद्धारिउ ||
    अस किलास तू खूब लगावौ |
    आचारज कै ज्ञान बढ़ावौ ||
    आचारज अघाय गा देवी |
    फागुन हिय समय गा देवी || ''
    ………… आभार ,,,

  15. @ गिरिजेश राव जी
    कोसिस कै सकत हन पै फागुन मा आपके नाईं
    प्रयत्नज – सहजता कहाँ से लाउब !
    तब्बो कोसिस करब ..
    .
    @ मुक्ती जी !
    सत्य वचन कहि रहीं हैं आप !
    ब्यंग्य कै कारीगरी तौ हम सबका भासै से मिलि जात है ..
    आप खूब हसीं , समझौ पोस्ट सार्थक !

  16. मेरे मन के आकाश में वाणी हुई है कि हिमांशु जी चुप चाप ऐसा कुछ लाने में लगे हैं जो हम सब छुटभैयों की बोलती बन्द कर देगा।
    हाथी का पाँव – सब पाँव समा जाएँगे।

  17. Amar ji,

    Atyant sundar post hai.

    Tareef uparwale ki, jisne tujhe banaya,
    Itni achhi awadhi, jane kahan se laya !

    Bura na mano phagun hai….Lekin Amar ji, kabhi bura maan-ne layak kuchh likha to kijiye.

    Aapki posts mann ko chhu jati hain.
    phagun kya karega, nahi jaanti, parr ..
    aapki posts aatma ko bhi gudgudaati hain.

    Shubhkamnaayein avam Badhaai !

  18. नामी चोर कमाए खाए
    बदनामी चोर मारा जाये …..:):)

  19. @ गिरिजेश जी
    सहमत अहन आपसे ..
    हम सबकै आचारज तौ ह-म-श हैं ..
    इंतिजार हमहूँ का अहै ..

  20. @ दिव्या जी
    यह अवधी तो उसी दुनिया ने दी जिसने बचपन को लडखडाना और सम्हलना सिखाया ..
    जिसने तोतले बैन दिए .. माँ और मातृभूमि के बीच का अक्षय – बंध बनी यह प्यारी अवधी ! ..
    सहजता इसी में पाता हूँ क्योंकि जिन्दगी के दो दशक इसी भाषा की गोद में खेलते हुए
    बिताया है ..
    मेरी पोस्ट आपकी आत्मा तक पहुँचती है .. लेखन की यही पूंजी तो मुझसे आगे भी लिखाती है ..
    .
    .
    @ वाणी जी
    आपकी बात पर हसूँ ! .. लो हँस दिया … हा हा हा :):):)

  21. आपको हंसने को तो नहीं कहा … ये सिर्फ मेरी मुस्कराहट थी …क्योंकि जब कुछ समझ नहीं आये तो सिर्फ मुस्कुरा लेना चाहिए ….

  22. @ वाणी जी
    …. अच्छा तो सारी हंसी वापस …🙂
    आपकी समझ पर मुझे भरोसा है !

  23. अपनी आंचलिकता में फगुनहट
    वह भी सभ्यता व साहित्य के साथ
    जबर्दस्त है भाई !
    चस्का लगाय दिये तो फागुन भर आस रहेगी ।

  24. आइ गये महराज ।
    बाउ के दुआरे हाजिरी लगाय आये –

    “यह फगुनाई मची जब तें, तब तें यहि ब्लॉगहिं धूम मच्यौ है।
    ब्लॉगर-ब्लॉगरा एक बचे नहिं, सबके हिय-अन्तर प्रेम अंच्यौ है॥
    देर से आइ कहैं फगुनाय इ ’बाउ’-सुभाव कै खेल रच्यौ है ।
    छोड़ि अचारहिं कूदि पड़्यौ सब , कौन अचारज शेष बच्यौ है ॥”

    फिर-फिर आवौं, फिर-फिर पढ़ौं, फिर-फिर लिखौं-इहै इच्छा हौ भइया !
    सो फिर आउब !

    मार डाला !

  25. आय गए हम फिन-फिन ब्लागा
    ब्लॉग फाग का भाग है जागा
    देख रहे हैं सबका मुस्काना
    कुटिल मुस्की हम सब है जाना
    काव्य-रंग भरी पिचकारी
    पर बुढ भये हैं हम बेचारी
    जो जदी दस बरस पीछे मिलाना
    छट्ठी का दूध याद कराना
    छोड़ दिया आभारी मानो
    अभियों हम बहुत भारी जानो
    वाणी हमको करीब से देखा
    जाके पूछो उनको जोखा
    अरविन्द जी बस पलीता लगावें
    और गिरिजेश माचिस सुल्गावें
    आवे साल हम भविष्य देखाना
    अरविन्द, अमरेन्द्र बन जाना
    और गिरिजेश की कुर्सी सुखारी
    ता बनेगी वो हिमांशु धारी
    जोगीरा सा र र र र र र र र र र र्रर्रर र्रर्र र्रर्रर र्रर्र
    हा हा हा हा …

  26. @अदा जी,
    किसी से पूछने की क्या जरूरत ! क्या अबहिऔं नहिं समझेंगे अमरेन्दर भाई !
    अब उहै बतावैं !

  27. देर आए मगर दुरुस्त आए
    भई वाह!
    अब समझे कि काहे 'गिरजेश' आचारज आचारज कहत रहें
    सौ सुनार की एक लोहार की ..भई वाह!
    प्रणाम प्रणाम करी के जौन धड़ाम किए हो कि जितनी भी तारीफ़ करें कम है..
    ई त वैसे ही है कि 'सचिन' के लोग खूब आलोचना करें और जब ऊ सेंचुरी मार दे त सब चुप!
    ..बधाई ई मस्त पोस्ट के लिए.

  28. @ अदा जी ,
    फागुन के कार्य-कारण-सम्बन्ध को भी आपने रख दिया .. हर
    व्यक्ति की भूमिका ही नहीं बतायी आपने बल्कि भविष्य भी
    बता दिया ! धन्य हैं आप !
    इनमें सबसे कमजोर हम ही हैं .. हम पर आपकी ज्योतिष फेल , पक्का !🙂
    @हिमांशु । Himanshu
    समझ गए हो … इतना भी लोढ़ा नहीं हैं …🙂

  29. आपकी पोस्ट पढने में मेरा तो सारा दिन का खाया पिया निकल जाता है….पर फिर वसूल भी हो जाता है….बहुत रोचक लगी ये पोस्ट..जितनी भी समझ आई😦

  30. वाह भैया..दिल-दिमाग सब खुश/दुरुस्त होई गए ई तोहार दिलकश पोस्ट पढ़ी के ….ऊपर क भूमिका क रोचकता से आजकल जवन फगुनाहट मचल है..बलागिंग में..एकर पता तुरंतै लग जात है..

    और भईया तोहार ई अदा..कि–'' आज अपने ही हाँथों से क्यूँ न क़त्ल हो जाएँ ,
    अब तो मेरे कातिल के हाँथ थक गए होंगे | ''
    तो एक जान मार है ..एकदम झक्कास..!

    संस्कृत के और मानस के इतने सुन्दर और भव्य वर्णन करने में आप समर्थ हैं और आपने क्या खूब इसे निभाया भी है..सच तो ये है कि आपकी मौज भी कितना कुछ सिखा देती है. आपके सहज अनुशीलन को प्रणाम.

    और फागुनी गीत तो शानदार..कितना कुछ बटोर के ले आते हैं आप अपनी पोस्ट में.. आदरणीया अदा जी इस गीत को अपना स्वर दे दें तो फागुन का रंग और भी सांचा हो निखर जाए..!

  31. @ पर बुढ भये हैं हम बेचारी….
    काहे जी जला रही हैं …थोडा भरम बने रहने दीजिये …
    क्या मिलेगा ऐसे दिल तोड़ कर ….बिगाड़ा फागुन सारा …
    जोगीरा ….धुत्त

  32. @ शिखा जी ,
    चलिए कभी – कभी गरिष्ठ – पचाऊ और मजा – दियाऊ पोष्ट का
    भी आस्वाद किया कीजिये🙂 .. '' … पर फिर वसूल भी हो जाता है '' … इसी में मेरा भी संतोष है !
    .
    @ श्रीश भाई ,
    देखौ दोस्त ! का अवधी लिखने लगे हौ अब !
    हम सबसे ज्यादा खुश तौ यही से ह्वै रहे हैं ..
    .
    काश अदा जी इस गीत को अपने कोकिल-कंठों से निखारतीं ! मजा आ जाता मित्र !
    अदा जी से विनती तो करूँगा ही …
    .
    @ वाणी जी ,
    आ रही होंगी अदा जी … वही जवाब देंगीं …

  33. बहुत सुन्दर ..अच्छा लगा ।

  34. अमरेन्द्र जी

    क्या कहर ढाया है आपने अवधी में………होली की आमद हो गयी ब्लॉग जगत में आपकी इस पोस्ट से…….

    जोगीरा सर र्र र्र र्र र्र र्र र्र र्र र्र र्र ……….! इतना तो हम भी समझ गए है दोस्त…!

  35. ka amerendra tripathi babu.bada fagunahat chadhal ba tuhare uper.Aaj kal bhang chada ke awadhi ke blog likhat bata.Abaki holiyo maien kauno dhamal karba ki blogwe pe dhamal hoi.hamare taraf se comment Ihe hauve baki holi ki shubh kamana rahi.sadhanyawad manish

  36. अमरेन्द्र जी
    होली के रंग में रंग हुआ बेहतरीन पोस्ट
    साथ में गाना तो खूब जमा भाई
    आपकी प्रस्तुति जोरदार है
    होली की बधाई

  37. tripathi ji fagua par bahut sunder aalekh !
    adbhut sanyojan !

  38. का कही!
    बौड़म त हइयै हन, बौराइउ गएन आज।
    पहिले पढ़े काका क्यार कबित्त,
    फिर गएन पढ़ै उनका जीबन चरित्त,
    अब हियाँ आय के फगुनाय गए, शिवजी की बूटी से मस्त अंटा-चित्त!
    अब का कही – ई गर्मियौ माँ ठण्डाई त नीकै लागी न! कम से कम भेजा त ठण्डाय गवा तुहार पोस्टिया पढ़िके!
    मस्त जिया!

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