रमई काका के जनम दिन पै यक कविता : ” धरती हमारि ” …

पढ़ैयन का राम राम !!!
‘ अवधी कै अरघान ‘ की महफ़िल मा आप सबकै स्वागत अहै ..
आज रमई काका कै जनम दिन आय .. काका कै जनम २  फरौरी १९१५ मा भा रहा ..  अबहीं कुछ देरि पहिले 
काका जी के सुपुत्र सिरी अरुण त्रिवेदी जी से बात भै , काका के जनम दिन के निस्बते  .. का करी ! .. कीन तौ 
बहुत कुछ चाहित है .. काका जी से जुड़ा जाने केतरा काम करै का बाकी अहै , लेखन के स्तर पै .. मुला बहुत बड़ा दुर्भाग्य पूरे अवध अंचल कै अउर हम – आप जैसे काव्य प्रेमिन कै ई अहै कि यतने दिन बादौ काका यस महान कवि कै ‘ग्रंथावली’ नाय आय पायी अहै .. जाने केतना जने बस कवितन कै सुवाद याद करत हैं लेकिन पढ़ै का नाय पउते .. बस यहै बिनती है भगुवान से कि कैसेउ ई ग्रंथावली आइ जात !!! 
             आज यही मौके पै काका जी कै यक बहुत नीक कविता आप सब के सामने रखा चाहित अहन ..कविता कै सीर्सक है — ” धरती हमारि ” .. हियाँ किसान अउर धरती कै प्यार देखा जाय सकत है .. किसान कै मेहनत देखै लायक है ..
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                                                             कबिता : धरती हमारि 
                                                   
                                     धरती हमारि ! धरती हमारि ! 

है धरती परती गउवन कै औ ख्यातन कै धरती हमारि |

                                      धरती हमारि ! धरती हमारि ! 

हम अपनी छाती के बल से धरती मा फारु चलाइत है |

माटी के नान्हें कन – कन मा , हमही सोना उपजाइत है ||

अपने लोनखरे पसीना ते ,रेती  मा ख्यात बनावा हम  |
मुरदा माटी जिन्दा होइगै,जहँ लोहखर अपन छुवावा हम  ||
कँकरील उसर बीजर परती,धरती भुड़गरि नींबरि जरजरि |
बसि हमरे पौरख के बल ते,होइगै हरियरि दनगरि बलगरि ||
हम तरक सहित स्याया सिरजा , सो धरती है हमका पियारि …
                                         धरती हमारि ! धरती हमारि ! 
हमरे तरवन कै खाल घिसी , औ रकत पसीना एकु कीन |
धरती मइया की सेवा मा , हम तपसी का अस भेसु कीन ||
है सहित ताप बड़ बूँद घात , परचंड लूक कट – कट सरदी |
रोंवन – रोंवन मा रमतु रोजु , चंदनु अस धरती कै गरदी || 
ई धरती का जोते – जोते , केतने बैलन के खुर घिसिगे |
निखवखि,फरुहा,फारा,खुरपी,ई माटी मा हैं घुलि मिलिगे ||
अपने चरनन कै धूरि जहाँ , बाबा दादा धरिगे सम्हारि … 
                                         धरती हमारि ! धरती हमारि ! 
 हम हन धरती के बरदानी ,जहँ मूंठी भरि छाड़ित बेसार |


भरि जात कोंछ मा धरती के,अनगिनत परानिन के अहार||
 ई हमरी मूंठी के दाना , ढ्यालन की  छाती फारि – फारि |
हैं कचकचाय के निकरि परत,लखि पुरुख बल फुर्ती हमारि||
 हमरे अनडिगॆ पैसरम के , हैं साक्षी सूरज  औ अकास  |
परचंड अगिन जी बरसायनि,हमपर दुपहर मा जेठ मास ||
ई हैं रनख्यात  जिन्दगी के ,जिन मा जीतेन हम हारि-हारि … 
                                          धरती  हमारि ! धरती  हमारि !

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(आप चाहैं तौ काका के बारे मा पिछली दुइ पोस्टन का पढि सकत  हैं … ) 

15 responses to “रमई काका के जनम दिन पै यक कविता : ” धरती हमारि ” …

  1. रमई काका के जन्मदिन पर उनकी कविता की सुन्दर प्रस्तुति ! एक दायित्व तो बनता ही हमारा कि हम इन हीरक-अक्षरों को सम्हाल कर, सजा कर रखें ।
    आपकी संवेदनशीलता की कद्र करता हूँ । आपकी विनती में मेरा भी स्वर !
    अंत में यह पंक्ति पढ़ ली क़ायदे से –
    “ई हैं रनख्यात जिन्दगी के, जिन मा जीतेन हम हारि-हारि …”

  2. रमई काका के जन्म दिन पर उनकी यह कविता पढ़ाकर अपने बहुतें नीक काम किया अमरेन्द्र जी !

  3. रमई काका के जन्मदिन पर उन्हें शिद्दत से याद किया आपने……! बहुत ज्यादा नहीं पता है साहित्य जगत को उनके बारे में, ऐसे में आपकी जिम्मेदारी है कि इस नायाब लोक सर्जक और उनके कृतित्व को आप दुनिया के सामने लायें…… ! किसानो कि व्यथा कथा का चित्रण जबरदस्त है बाबा की कविता में……….पैरों कि बिबायिओं में दर्द और लू धूप में हल जोतते किसान के दर्द और एहसास को बेहतरीन स्वर मिला है इस कविता में……..अमरेन्द्र जी आपको इस प्रस्तुति के लिए दस में दस अंक…….! आगे भी इसी तरह कि रचनाओं का इंतिजार रहेगा.

  4. ामरेंद्र जी आपके ब्लाग पर पहली बार आयी हूँ मगर नवोत्पल पर आपको देख कर बहुत प्रभावित हूँ। रमई काका के जन्म दिन पर उनकी यह कविता तो बहुत अच्छी लगी अगर पूरा परिचय भी देते तो अच्छा था। धन्यवाद कविता सुन्दर और सच मे अपनी माटी से जुदी हुयी अपनी विरासत को सहेजती हुयी है
    शुभकामनायें

  5. रमई काका के जन्मदिन पर उनकी कविता की सुन्दर प्रस्तुति ! सुंदर पोस्ट….

    नोट: लखनऊ से बाहर होने की वजह से …. काफी दिनों तक नहीं आ पाया ….माफ़ी चाहता हूँ….

  6. बहुत सुन्दर! अवधी में धर्म विषयक सामग्री से अलग बहुत कम पढ़ा है। यह धरती से जुड़ी रमई काका की रचना तो मेरे गांव की जमीन की गंध सुंघा रही है – जिससे बिछुड़े अर्सा हो गया।

    अब तो गांव-जमीन के बारे में सोचने पर प्रबन्ध की भाषा दिमाग में आती है। अमरेन्द्र को पढ़ते रहे तो जैसे हिन्दी में लिखते हिन्दी में सोचना आ गया है, वैसे अवधी में भी हाथ खुलेगा। वही स्वप्न भी है!

    धन्यवाद बन्धु यह पढ़ाने को!

  7. लाजवाब कविता है अमरेंद्र जी ……… रमई काका के जन्मदिन पर उनकी कविता की सुन्दर प्रस्तुति ……..

  8. हिमांशु भाई !
    कोसिस तौ हमार इहै है कि इन हीरक-हस्ताक्षरन लाई .. ई परयास करत रहब ..
    निर्मला जी !
    आप पहली बार आयीं .. अच्छा लाग .. और जानकारी पिछली दुई पोस्टन मा दै
    दिहे हन …
    ज्ञान जी ! आभार ,,

  9. वाह रमई काका की यह कविता भी मिट्टी की सौंधी खुशबू से ओत-प्रोत है. आपने बहुत दिनों बाद कुछ लिखा और बहुत अच्छा लिखा. रमई काका की मेरी वाली कविता मिली या नहीं.

  10. एक बेहतरीन कविता भाई जी..! आप नहीं होते इधर दृष्टि कैसे जा पाती..? आपके तो वाकई कर्जदार हैं हम लोग…!

  11. Amrendra ji aapne bahut sundar tana bana buna hai,aur isper aapko bahut bahut badhai.

  12. —-bahutay achhee rchna,hmar bdhai sweekar kren.

  13. वाह भइया,जियौ बढाये रहौ यहे तना अवधी केरि नैया।
    काका के सुमिरन का परनाम।
    भारतेन्दु मिश्र

  14. राम-राम भैया अमरेन्द्र!
    काका के जनमदिन के अवसर पर सुमिरन करावै क बधाई! आभार और धन्यवाद।
    काका की कविता पढ़ाय के बहुत बड़ा अउर नीक काम कै रहे हौ आप। सबते बढ़िके त ई बात कि हमका लगत है कि कउनो किहिस नाहीं ई सब पहिले -बहुत पहिले ई होय का रहा, मुला अबहूँ देर नाहीं भै।
    इहौ जनात है कि कहौ बहुत लोग -बैसवारेओ के – कहौ जनतै न होयँ ई आपन थाती के बारे में!
    अउर बेढब बनारसी क्यार शायरी, युक्तिभद्र दीक्षित जैसन क रेडियो कार्यक्रमन के माध्यम से अवधी माँ रचनात्मक कार्य… ई त जानौ पतै न होई?

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