कबिता : ” नौ दुइ ग्यारह हैं ” ..

पढ़ैयन का राम राम !!!
‘ अवधी कै अरघान ‘ की महफ़िल मा आप सबकै स्वागत अहै ..
        इधर आप सब लोगन कै प्रोत्साहन हमरे लिखै का सार्थक बनावत अहै . जब लिखै का सुरु किहे रहेन तौ हमैं सहज बिस्वास नाय हुवत रहा कि लोगन कै एतना स्नेह मिले . पर आज पता चलत अहै कि लोगन के दिल मा यहि भासा से केतना ज्यादा लगाव अहै . ई भासा सिरफ अवध इलाकै मा नाय बोली जाति,बल्कि हनुमान की तरह कयिव समुन्दर पार कैके बिदेसन मा भी ‘पूर्वी’ के नाव से बोली जाति अहै .गाँव-जँवार की भासा की ताकत यहै होत है भैया .जब पता चलत है कि बिदेसन मा ‘राम चरित मानस’ कै अखण्ड पाठ हुवत है तौ गोस्वामी तुलसीदास जी के चरनन मा सीस झुकि जात है . अगर पढ़ैयन कै यही स्नेह बना रहे तौ हमरे जैसा अग्यानी भी अपने सक भर भासा कै सेवा बड़े गरब से कीन करे . 
        आज कै प्रस्तुति यक कविता के रूप मा अहै . ई कबिता अबहीं काल्हिन लिखेन हैं . यहि कबिता मा संख्या से जुड़े अर्थन का रखै कै कोसिस किहेन है . हमरी  बात – चीत मा अंकन से जुड़े मुहावरन अउर कहावतन  कै परयोग अक्सर हुवा करत है . बस यही का कबिता के ‘सिल्प’ मा साधै कै कोसिस कीन गै है .यक नजर इनपै डारब ठीक होये — यक अउर यक ग्यारह यानी ‘संघे शक्तिः’ , नौ दुइ ग्यारह यानी गायब हुवब , तीन कै तेरह यानी करेर ठगी , छत्तिस यानी झगडा-रगडा( गंवईं मा गड़ धक्कि क धक्का ),तिरसठ यानी काफी करीबी ( गंवईं मा मुंह चुम्मि क चुम्मा ),चार सौ बीस यानी जालसाज , जीरो यानी गोबर गनेस , नंबर दुइ यानी धोखाधड़ी अउर काली कमाही , छिहतरा यानी छिनरा ( दुइनिव सब्द मा जबरदस्त ध्वनि-गत अउर अरथगत साम्य अहै , अबहीं परवैं यक छिहतरा राजभवन मा पकरा गवा , जाने केतरा कम्बल मा घिउ पियत होइहैं !) तीन-पांच करब यानी कमी निकारब अउर अरचन डारब( हर गांव मा ई कम करै के ताइं यक नारद जरूर मिलिहैं ) , निन्न्यान्न्बे कै फेर यानी हमेसा ‘यक कम अहै’ , यहिकै टीस सताये रहै ,
चौवन यानी कौनौ काम करै मा तेज ,,, अब आगे कबिता बोलै तबै ठीक अहै …
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                                                  कबिता : ” नौ दुइ ग्यारह हैं ” ..

याक याक मिलि जांय तौ भैया ग्यारह हैं ,
औ’ गायब होइ जांय ,तौ नौ दुइ ग्यारह हैं |

‘नंबर  दुइ’  कै काम  फबत है  नेतन का ,
पांच साल के जसन मा नौ दुइ ग्यारह हैं |

भेद खुला बनि गये ‘छिहतरा’ कुछ,तौ कुछ 
कम्बल मा घिउ पी के, नौ दुइ ग्यारह हैं |

 कोटेदरऊ अहैं ‘ चार  सौ  बीस ‘ बड़े ,
चीनी तेल उड़ाय के, नौ दुइ ग्यारह हैं |

‘तीन-पांच’ कै काम हर जगह नारद कै
आग लगाये, खुसी मा नौ दुइ ग्यारह हैं |

गरज फंसे पै भैया वै तौ ‘तिरसठ’ हैं 
गरज घसक जाए पै,नौ दुइ ग्यारह हैं |

सौत रहै तौ कटाजुज्झ है ‘छत्तिस’ कै ,
मिलै अकेली छांह तौ नौ दुइ ग्यारह हैं |

पढ़ै लिखै मा उनके ललऊ ‘जीरो’  हैं ,
यही लिये परिनाम मा नौ दुइ ग्यारह हैं |

प्यार करै मा उनके ललऊ ‘चौवन’ हैं ,
लिहे मेहरिया संघे नौ दुइ ग्यारह हैं  |

‘ तीन कै तेरह ‘  करैं वही ब्यापारी हैं 
हचकके प्राफिट लैके नौ दुइ ग्यारह हैं |

ब्लाग-जगत , टिप्पणी-‘फेर-निन्न्यान्न्बे’
अर्द्ध-सतक कुछ ठोंक के नौ दुइ ग्यारह हैं | 
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ई तौ रही कबिता जौन हमसे खदर-बदर बन पाई , अब आपके  राय कै दरकारि अहै .परौं जाइत अहन घरे , यहिलिये संभव अहै कि अगले अत्तवार का हाजिर न ह्वै पाई .यहिकै हमैं बड़ा अफ़सोस अहै मुला वहिके बाद वाले अत्तवार का ‘ अवधी कै अरघान ‘कै महफिल मा आपके स्वागत मा बंदा फिर हाजिर रहे …तब तक के लिये सबका राम राम !!!     

20 responses to “कबिता : ” नौ दुइ ग्यारह हैं ” ..

  1. हमके ई नाहीं पता लगा कि चलनिया में बहत्तर छेद काहे होथीं। और के गिने रहा।
    (कहावत – सूप बोले त बोले, चलनियौ बोले जेमे बहत्तर छेद)

  2. अंको से कविता..बेहतरीन प्रयोग!

  3. शानदार है आपकी यह अंको की गणित..
    खूबसूरत और मनभावन भाषा के प्रयोग से कविता और बढ़िया लगताई है..
    बधाई भाई..नौ दो ग्यारह बढ़िया लगी..

  4. बहुत बढिया रहा गिनती का हिसाब
    अब हम 3-5 नही करते, 9-2-11 हो लेते हैं-आभार

  5. इ सच है कि लोगन के दिल मा यहि भासा से केतना ज्यादा लगाव अहै …… काहे से इ आपन भासा है….. कबिता नीक लगल….

  6. बाह अमरेंदर भैया बाह -गजब का कविता बा हो -एक ठू सवाल याद आईग जौन एक ठू मजाकिया मास्टर साहब अक्सर ह्न्सावाईवई बदे पूछत रहेन-
    कई नवा मुंह चुम्मी क चुम्मा
    औ कई नवा गड़ धक्की क धक्का
    कौनो ब्लागर यी पहेली क उत्तर देई भला !

  7. @ अरविन्द मिसिर जी वैसे यहि सवाल कै उत्तर आय रहा है मुला
    चाहित है कि केहू और ब्लागर यहिकै जवाब
    दियैं तौ अउर मजा आवै ..

  8. 'तीन-पांच' कै काम हर जगह नारद कै
    आग लगाये, खुसी मा नौ दुइ ग्यारह हैं |

    बहुत सुन्दर रचना
    बहुत -२ धन्यवाद

  9. अरविन्द जी कै जबाब त पोस्टवै में पहिलवां लिखल समझाइस में हौ । ऊ बाद में त नाहीं लिखै? हम तऽ पहिलकी दुलइनिया पर निछावर हैं –

    “याक याक मिलि जांय तौ भैया ग्यारह हैं ,
    औ' गायब होइ जांय ,तौ नौ दुइ ग्यारह हैं |”

    अर्धशतक वाली त नाहीं (ऊ तऽ सपनै हौ ) पर हमरी ई दहाई वाली टिप्पणी स्वीकारो भईया !

  10. दस ठो ले त सही रहल हवे.. अब ई मिला के ग्यारह हुई जाई..

  11. अरविन्द जी के सवाल के जवाब देत बाटीं-

    सात नवा मुँह चुम्मी के चुम्मा ७*९= ६३
    चार नवा गड़ धक्की क धक्का ४*९= ३६

    बताईं पंच जने.. सही बा कि नाईं..

  12. thodi der se smjh aai par kavita bdi achhi thi

  13. अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी जी , आपको एवं समस्त पारिवारिक जनों को मेरी तरफ से नववर्ष की मंगलमय कामनाये !

  14. इस सुन्दर रचना के लिए धन्यवाद
    नव वर्ष की शुभ कामनाएं

  15. अमरेन्द्र जी क्या कमाल का लिखा है………सचमुच नए साल पर इससे बेहतर और क्या हो पढ़ा जा सकता था……

    नव वर्ष 2010 की हार्दिक शुभकामनायें…..!
    ईश्वर से कामना है कि यह वर्ष आपके सुख और समृद्धि को और ऊँचाई प्रदान करे.

  16. भाई अमरेन्दर जी, आप किहाँ त बड़ी निम्मन ब‍इठकी चल रहल बा। एह भोजपुरिया भाई के दुआ सलाम कबूल करीं। हम पछता तानी कि एहिजा पहुँचे में हमरा देरी काहें गो ग‍इल। अब कोसिस रही कि बिना नागा आइल करीं। राम-राम।

  17. मजा आ गया भाई ,मुझे क्षेत्रीय भाषा के साहित्य बहुत अच्छे लगते हैं ,ललित शर्मा जी हरियाणवी हिन्दी की वजह से मुझे याद रहते थे ,अब आप अवधी हिन्दी के कारण याद रहोगे
    ज़रा किसी कविता में इसे प्रयोग कीजिये —
    आन के पाड़े दीन देखावे …….

  18. भाई इस कविता के सस्वर पाठ का आनन्द हमने लिया ।

  19. आप लोगन का कबिता रुची , ई जानि के बड़ा नीक लाग , आभार सबका …
    मिसिर जी कै पहेली तौ कार्तिकेय भाई बूझिन चूका हैं , बधाई वनका …
    कुछ लोग नवा आये सबका हमार नमस्कार और बिनती कि हमार हौसला
    बढ़ाये रहैं , , ,

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