कौवा-बगुला संबाद , भाग- ५ : हिन्दी-बिरोध मा राग ‘ अंधेरिया ‘ कै भूमिका ..



पढ़ैयन का राम राम !!!
आज के संबाद प्रस्तुति मा भारतीय राजनीति के सम्बेदनहीन अउर अवसरबादी चरित का रक्खै कै कोसिस करत
अहन . आपकै राय अपेक्षित अहै . केहू नेता कै नाव लियय कै झंझट नाय उठायन .परसंग लम्बा न हुवै के लिए .
संकेत से समझ मा आय जाये.
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कौवा-बगुला संबाद , भाग- ५ : हिन्दी-बिरोध मा राग ‘ अंधेरिया ‘ कै भूमिका ..
( कौवा आज कालीदीन के ताले पै बगुला से मिलै आवा अहै . बगुला अपनी धुन मा मगन-मन ह्वै के खाये-पिये-
अघाये सांगीतिक डकार लियत अहै …)
बगुला : ( मुंडी हिलाय-हिलाय के गावत अहै …)
             ” ई है बंबई नगरिया तू देख बबुवा .
               नेतवन कै अंधेरिया तू देख बबुवा ..
               … देख बबुवा … रे देख बबुवा … ”
कौवा : राम राम ! साथी ! का राग ‘ अंधेरिया ‘ छेड़े हौ का ?
बगुला : राम राम ! हो , सही फरमायौ . ई हमार पसंदीदा राग आय . सही कहत अही कि पूरी दुनिया मा यहिसे
बढियां और उपयोगी कौनो राग नाहीं न . यहि राग कै जे जेतना बड़ा साधक अहै ऊ वतना बड़ा मनई बनि जात है .
कौवा : यहि राग कै साधै कै योग्यता का है ?
बगुला : सबसे बड़ी योग्यता है सम्बेदनहीनता . ई राग जिन्दगी के साज पै सम्बेदनहीन बने बिना नाहीं गावा जाय
सकत .
कौवा : यहिके गवैया हैं दुनिया मा ?
बगुला : या लेव ! पूरी लंका जरि गै कहत है कुछ धुवां उठा ! अदना से लैके बड़े-बड़े महारथी तक यहि राग कै गवैया
पूरी दुनिया मा भरा परा अहैं . यहि राग कै महान साधकन मा नेता लोगै आवत हैं . ई राग देस – काल की सीमा से
परे अहै . खून मा रंगा लेकिन बाहर से यकदम ‘धवल’ कपड़ा पहिर के ई राग गावा जात है . गवैया कै  साथ दियै के
लिये इंसानी हड्डिन कै बना अउर चमड़न से तना बाजा बजावा जात है . खैर , यहिकै परतख मजा तू का जानौ !
कौवा : यहि राग कै मजा सिरिफ गावै वाले लियत हैं या सुनै वाले भी ?
बगुला : मेन मजा तौ गवैया लियत है , थोर बहुत मजा सुनैया भी लियत है मुला भ्रम वाला मजा . सुनैयन का खून
दियै मा मजा आवत है , राग पै रीझि के ” नाद रीझि तन देत मृग नर धन हेत समेत ” अस है यहि महान राग कै
परभाव .
कौवा : यहि राग कै नाव ‘ अंधेरिया ‘ काहे है ?
बगुला : यहि राग कै लक्ष्य है अँधेरे का बनाये राखब . निपट अँधेरा . रोशनी से साफ बगावत . जेतनै ज्यादा अंधेर
वतनै ज्यादा असरदार हुवत है ई राग . बस यही है यहिके नामकरन कै मूल .
कौवा : तू गावत रहेव … यहि राग कै सम्बन्ध बम्बई नगरिया से कैसे अहै .
बगुला : यहि राग से सम्बंधित बड़ा सुन्दर सो भा रहा बंबई नगरिया मा . बस कुछै दिन पाहिले . बड़ी दिलचस्प रही
नेतन कै अंधेर-पैतरेबाजी . जब बंबई मा यहि राग कै तारसप्तक अररान तौ पूरे देस मा बलबली मचि गै . बस यही
गुनगुनात रहेन जौन तू सुनेव .
कौवा : हुवां तौ हिन्दी अउर हिन्दी पट्टी कै बिरोध कीन गा रहा …
बगुला : अरे ऊ सब तौ बस ऊपरी बाति है . मेन चीज तौ नेतन कै आपन खेल है . हिन्दी बिरोध मा राग अंधेरिया कै
भूमिका  अहै .
कौवा : यहि परसंग मा के – के  गवैया रहे ?
बगुला : यक दूइ हुवैं तौ बताई . जिन्दगी भर नाव लीन करब तब्बो कम परि जाये . बस इहै समझौ कि केंद्र सरकार
से लैके राज्य स्तर तक कै छुट भैया कलाकार भी हाथ साफ करै से नाय चूके . ” अहो रूपं , अहो ध्वनिः ” ! अउर तौ
अउर यहि राग के बिसलेसन कै ठेका लिहे पत्रकारौ तक राग के गावै मा सामिल ह्वै गये . बुद्धिजीवी बौद्धिक तरीके से
गाइन , खालिस अपने अंदाज मा . सबका लाग कि ” मार ले सटाक से लोहा गरम बा ” …
कौवा : यहि राग कै प्रेरना कहाँ से आयी ?
बगुला : वैसे तो यहिके प्रेरना कै बात निरर्थक है . आदिकाल से ई राग अपने वजूद के साथ कायम अहै . कभौ कम तौ
कभौ ज्यादा . हाँ , ई राग साधै कै बेहतरीन ‘स्मार्टनेस’ इन भारतीयन का साठ साल पाहिले  अंग्रेजन से मिली रही  .
”फूट डालो , राज करो” के रूप मा . गुरुदच्छिना मा आजौ यै ”योर मैजेस्ट्री – योर मैजेस्ट्री” चिल्लावा करत हैं, अंग्रेजन
की  खिदमत मा . लैटेस्ट प्रेरना इहै समझौ …
कौवा : यानी हिन्दी मराठी के नाम पै फूट डारै अउर राज करै कै चाल है ई सब …
बगुला : लगभग पहुँचत अहौ🙂 . मराठी मानुस के उद्धार कै बीड़ा उठाये यक राछस-परिवार अपने पारिवारिक – धरम
कै निर्वाह के नाम पै यहै सब करत अहै … यहिरी आजादी के बाद लगभग समपूरन सासन कै मलाई खाय वाली केंद्र
सरकार ,पूरे देस का आपन जंगल समझ के, औव्वल सातिरपने कै परिचय दियत इन राछसन कै सहयोगौ करत है .
ई सरकार केवल भारतीय ही नाय बल्कि लंका तक के राछसन कै सहयोग कै चुकी है …
कौवा : लंका ?
बगुला : समझ मा न आवत हुवै तौ लंका के आगे ‘श्री’ लगाय दियौ🙂
कौवा : बहुत बुरा हुवत अहै देस के साथे …
बगुला : कुछ बुरा नाय हुवत अहै . हमै तौ यहै पसंद है . अपने खातिर तरक गढ़े का चाही . तुहिन बताओ कि मराठी
नेतन कै मांग का गैरवाजिब अहै ? हिन्दी-पट्टी वाले उनकी नौकरी पै कबजा कै लियत अहैं . उनके ‘मुंबई’ का आपन
घर  समझि लियत अहैं . हिन्दी के कारन मराठी कमजोर परि जाति अहै . मराठी संसकारन का चोट पहुँचति अहै .का
मराठी कौनौ चीजै न आय . हे मित्र काक ! इन सब बातन मा कौनौ दम नाहीं न ?
कौवा : देखौ , इन बातन मा दम देखब तोहार मजबूरी ह्वै सकत है लेकिन हमार नाय . ‘बम्बई’ यक ‘कास्मोपालिटन’
सहर के रूप मा बना – निरमित भवा , सबके सहजोग से . हियाँ सभी बसि सकत हैं . जैसे दिल्ली सबकै आय वैसे ही
बम्बइऊ .हुवां रहै कै अधिकार संबिधान के तहत मिला अहै.रही बाति कबजा कै तौ जब हिन्दी पट्टी वाले कब्ज़ा किहिन
तौ का मराठिन का सांप सूंघ लिहे रहा . तब लोग का पागल रहे !,नहीं , इंसानी जरूरत रही जिहसे लोग हुवां बसे,सबकी
जानकारी मा , धोखा कैके नाय . काम कैके . केहू भी आपन घर-वतन छोड़ा नाय चाहत .इहै पैसवा खींचत है —” रेलिया
न बैरी, जहजिया न बैरी , इहै पैसवा बैरी हो ” . बिभिन्न परकार कै सम्बन्ध मराठिन कै सीमावर्ती मध्य परदेस वालेन
से अहै , हाँ राजनीति अब नयी पहचान बनावै तो दिक्कत औबै करे . मराठी कै सम्मान जरूर हुवे का चाही लेकिन
कौनो भासा के बिरोध के द्वारा नाय .मराठी कै आपन महत्व है अउर हिन्दी कै आपन .आज कै ई सच है कि हिन्दी
अधिकतर भारत  कै समपरक भासा ह्वै चुकी है . यहि वजह से यहिकै परभाव ज्यादा है . ई कौनौ भासा के लिये समस्या
न आय . हिन्दी बिरोध से मराठी – उद्धार नाय जुड़ा है . बस तोहरी अंधेरिया राग कै सत्ता देखात है इन नेतन की बातन मा .
बगुला : चलौ ठीक अहै तुहूँ बोलि लिहेव , नाहीं तौ कहतेव कि हमार दोस्त हमें बोलहिन नाय देतै . अब आराम चाहत
अही , हमरे प्रिय राग के बीच मा फाट परेव🙂
कौवा : हमें तौ ई राग यकदम नापसंद है . मजबूरी है कि दुनिया मा यहि राग के वजूद का देखै का परे . हाँ , अब हमहूँ
चला  चाहत अही . फिर मिलब ..
राम राम !
बगुला : राम राम ! भैया !
( यहि तरह कौवा आपन राह पकरत है अउर बगुला अंधेरिया राग मा खोवै कै परयास करत है …)
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 [ आज एतनै , अब अगिले अत्तवार तक हमरौ राम राम !!! ]

14 responses to “कौवा-बगुला संबाद , भाग- ५ : हिन्दी-बिरोध मा राग ‘ अंधेरिया ‘ कै भूमिका ..

  1. अमरेन्द्र……. hats off to you….

  2. अब जब करिआ कौवा और सफ़ेद बगुला में अंधेरिया राग पर बतकही होई लाग तो मनयींन का मुंह शर्म से नीचे गद जाई क चाही !

  3. अमरेन्द्र,
    आजै सायद अढा‌‍ईमाह बाद कम्पूटर खोलेन तो अवध प्रावास पै आप कै टीपन ऊभी अवधिय मा देख कै हिया जुराए गये । अउर जब आप कै ”अवधी कै अरघान” अउर ओ पै रमई काका का देखेन तो खुसी कै कउनो हदै नाही रह गै । अउर ऊ कै अलाववौ एक सै एक बढ कै मनभावन रचना हम बखान नाही कर पाय रहेन हैई । आजुकाल सरीर अउर मन दोनो ढील बाटे बड़ी जल्दिये थकाय जात है,एकरा वज़ह से ब्लोग्पै आवब छूट बा: इतनै मा थकाय गयेन । हमार अउरो ब्लोग बाटे ओहरौ खयाल किहेओ।

  4. अमरेन्द्र
    आपन ”फ़्लैग-शिप” ब्लोग कै लिन्क देइत है उहौ देखा—
    http://anyonasti-kabeeraa.blogspot.com/
    इपै हमार अऊर ब्लागन कै लिन्क मिल जहिये

  5. “बस इहै समझौ कि केंद्र सरकार से लैके राज्य स्तर तक कै छुट भैया कलाकार भी हाथ साफ करै से नाय चूके .'' अहो रूपं , अहो ध्वनिः '' ! अउर तौ अउर यहि राग के बिसलेसन कै ठेका लिहे पत्रकारौ तक राग के गावै मा सामिल ह्वै गये . बुद्धिजीवी बौद्धिक तरीके से गाइन , खालिस अपने अंदाज मा . सबका लाग कि '' मार ले सटाक से लोहा गरम बा '' …”

    सही कहत हैं आप । सबै फरियाय लिहिन एह लगले !
    सबसे बड़ी बात त भईया ई हौ कि कि नेता लोगन कै कौनो इलाज नाहीं हौ का, कभौं धरम पै लड़ावत हैं, कभौं जात पै, कभौं भासा पै ! मनवैं उचट गय हौ ! का करीं ! ई सच के समझाई एह मनइन के कि ” हिन्दी बिरोध से मराठी – उद्धार नाय जुड़ा है”

  6. अमरेन्द्र जी
    आप की टिप्णी के लिए बहुत -२ धन्यवाद
    दरसल बाहर शब्द में टाइपिंग की मिस्टेक है
    आपको पढने की असुविधा के लिए मुझे खेद है |

  7. amrendra ji aapki rai ke lie bahut-bahut aabhaar..
    main is par amal karungi…parantu mere aage yah samasya hai ki 'bahar' likhna kisse seekhun..

  8. han maharaj ji! hum hiyain dilli ma master han .

  9. you are doing a fantastic job in the service of our mother tongue awadhi.i m not a bloggar but i just wanna appreciate you.keep it up.

  10. जरूरत है बन्धु राग अंधेरिया के टक्कर पर राग अंजोरिया छेड़ने की। पर इतनी चिरकुटई है कि राग अंजोरिया में लोग रोशनी के फ्रीक्वेंसी स्पेक्ट्रम पर लठबाजी करने लगेंगे – ये आवृति मराठी है और ये वाली बांगला।🙂
    हिन्दी तब भी दरकिनार रहेगी!

  11. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com
    Email- sanjay.kumar940@gmail.com

  12. अमरेन्द्र जी- कौवा अउर बगला के बतकही जोरदार रही,
    यहि राग कै जे जेतना बड़ा साधक अहै ऊ वतना बड़ा मनई बनि जात है . ई बगला सही फ़रमा रहा है। बढिया सुग्घर रचना, बधाई

  13. हमें तौ ई राग यकदम नापसंद है . मजबूरी है कि दुनिया मा यहि राग के वजूद का देखै का परे . हाँ , अब हमहूँ
    बहुत खूब मौजू आलेख

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