रमई काका कै कबितन कै यक बानगी ..

पढ़ैयन का राम राम !!!
आज कै प्रस्तुति रमई काका कै कबितन कै बानगी के रूप मा अहै  | काका जी कै जीवन-चरित और चित्र के लिए परयास  जारी अहै अउर जैसे ही सफलता मिले यक पोस्ट बनाइ के आप सबके सामने प्रस्तुत करब |
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                                              रमई  काका कै कबितन कै यक बानगी ..
                 रमई काका कै  कबिता पै बरिष्ठ आलोचक डा. राम बिलास सर्मा कै मान्यता गौर करै लायक है —
”उनकी गंभीर रचनाओं में एक विद्रोही किसान का उद्दात्त स्वर है , जो समाज में अपने महत्वपूर्ण स्थान को
पहचान रहा है और अधिकार पाने के लिए कटिबद्ध हो गया है | ‘ धरती हमारि ‘ इसी कोटि की श्रेष्ठ रचना है | ”
‘ धरती हमारि ‘ से कुछ पंक्तिन का  देखब समीचीन होये —
‘ हम हन धरती के बरदानी ,जहँ मूंठी भरि छाड़ित बेसार |
भरि जात कोंछ मा धरती के,अनगिनत परानिन के अहार||
 ई हमरी मूंठी के दाना , ढ्यालन की  छाती फारि – फारि |
हैं कचकचाय के निकरि परत,लखि पुरुख बल फुर्ती हमारि||
 हमरे अनडिगॆ पैसरम के , हैं साक्षी सूरज  औ अकास  |
परचंड अगिन जी बरसायनि,हमपर दुपहर मा जेठ मास ||
ई हैं रनख्यात  जिन्दगी के ,जिन मा जीतेन हम हारि-हारि |
                धरती हमारि ! धरती हमारि ! ”
काका जी कै कबिता अस है कि जौन जन-सामान्य की सीधे समझ मा आय जाय | काका की सफलता कै
रहस्य इहै समझौ | इनकै कबिता चौपाल मा , किसानन के खेत मा , मेलन मा , चौराहन पै सहजै मिलि जात
है | ‘ भिनसार ‘, ‘बौछार ‘,’फुहार ‘,’गुलछर्रा ‘, ‘नेताजी ‘ जैसे काब्य-संग्रह हजारन की संख्या मा छपे अउर बिके |
जन-जुड़ाव इनकी कबिता कै प्रयोजन  रहा —
‘ हिरदय की कोमल पंखुरिन मा,जो भंवरा अस ना गूँजि सकै |
 उसरील  हार  हरियर  न  करै , टपकत  नैना  ना  पोंछि सकै |  
 जेहिका  सुनिकै  उरबंधन  की  बेडी  झनझनन  न  झंझनाय |
 उन  प्रानन  मा  पौरूख  न भरै , जो अपने पथ पर डगमगाय |
अन्धियारू  न दुरवै सबिता बनि, अइसी कबिता ते कौनु लाभ ?”
गांव कै जेतरी सुन्दर तस्बीर काका जी के कबितन मा मिले वतरी सुन्दर कहूँ अउर मुस्किलई से | गांव कै
सांसकिरतिक-बिम्ब देखै के लिये ई कबिता कै दरसन कीन जाय सकत है —
” सुनत मन बिरहा क्यार बिरोग , ख्यात कै ढ्याल चूर ह्वै जायं |
 अगिनी अस आल्हा  कै  ललकारि , कायरौ सुनै , सूर  ह्वै जायं |
 बसे घर – घर मा ‘ तुलसीदास ‘, सिखावै धरम – करम आचार |
 घुसे  हरिजन  के  घरन  कबीर ,  चिकारन  के  घर पलटूदास |
 कन्हैया  नैनू   ढ़ूढत   फिरैं ,  सूर  के  हिरदय  हरस –  हुलास |
 घाघ  हैं  ख्यातन  के रखवार  ,  गांव  है हमका  बहुत पियार |
 करमठी  ये  लोहे  के हाँथ , तड़क्के  छक – छक  चलैं  गंडास |
 तपस्यै  मयिहाँ  बीती जाति , हियाँ  कै यक-यक साँस उसांस |
 अपनहे  हाँथ  अपन  तलवारि ,  गांव है  हमका  बहुत  पियार |”
काका जी कै कबिता कै यक बहुत बड़ी बिसेसता है – प्रकृति कै सहज अउर मर्मस्पर्सी चित्रन | संसकीरत के
कबियन  के नाईं काका  बिराट बिम्बन  कै रचना करत हैं | किरण कै बरनन इतना सहज सायदै कहूँ मिलै —
‘ नीचे उतरि किरिनिया चौका लगाइ दीन्हिसि |
…खटिया तरे लखत हैं लरिका अजब तमासा |
 किरनें  चुवाय  दीन्हिन  हैं  धूप  के  बतासा |
  पूरब  कै  लाल  गैया  नभ  मा पन्हाय  गैहै |
  किरनन  कै धार  दुहिकै  धरती  नहाय  गैहै | ”
हास्य  रस पै तौ काका कै महारथ हासिल अहै  | हास्य भी अस हैं जौन सोचै पै मजबूर करत हैं , महज फुलझड़ी
नाय हैं | यक उदाहरन ठीक परे — लखनऊ मा यक बज्र दिहाती जात है अउर ऊ यक फैसनेबुल नर का नारी
समझ  लियत है , अब देखौ कबिता मा यही बात —
” म्वाछन का कीन्हें सफाचट्ट,मुख पौडर औ सिर केस बड़े |
    लूंगी पहिरे ,  चद्दर  ओढ़े ,  बाबू  जी  बाएँ  रहे  खड़े |
    हम कहेन मेमसाहेब सलाम, उइ कहिन अबे चुप डैमफूल |
                                       हम कहेन फिरिव ध्वाखा ह्वैगा || ”
जात-जात काका जी के कबितन मा ‘उत्प्रेक्षन’ पै आपकै ध्यान दिलावा चाहित है —
०  गिरी थारी अइसी झंनाय ,
    कबौं  छंउकन अइसी खउख्याँय |
    पटाका अइसी दगि – दगि जांय |
०   उइ उछरे लवा मकाई अस |
०   लरिकौनू गर्जैं बादर अस , बहुरेवा तड़पै बिजुरी असि |
०    बिजकुहर बैला अस फन्नआय |
०    उइ लकरी अइसी तुरती हैं , औ उइ चैला अस फारत हैं |
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10 responses to “रमई काका कै कबितन कै यक बानगी ..

  1. बने सुग्घर अऊ सुंदर लिखे हस तिरपाठी जी, बने लागिस, अईसने लिखत रहव,अवधी के ता मिठासे अलगे हवे, फ़ेर आबो पढे बर,
    जोहार ले।

  2. प्रस्तुति का आभार । ई तो गजबै हौ भईया –

    “म्वाछन का कीन्हें सफाचट्ट,मुख पौडर औ सिर केस बड़े |
    लूंगी पहिरे , चद्दर ओढ़े , बाबू जी बाएँ रहे खड़े |
    हम कहेन मेमसाहेब सलाम, उइ कहिन अबे चुप डैमफूल |
    हम कहेन फिरिव ध्वाखा ह्वैगा ||”

  3. बहुत सुन्दर! रमई काका अगर पुन: हों और विद्रोही किसान को कवित्त में वित्तीय समझ के सूत्र दें तो बहुत भला हो इस अवध का इस बदले समय में!
    अवधी में यह समझ प्रसारित होनी चाहिये।

  4. काश विद्रोही किसान का यह्स्वर उन कानो तक पहुंच पाता जिनकी वजह से उन किसानो को आत्महत्या करनी पड़ रही है ।

  5. बहुत खूब अमरेन्द्र जी मज़ा आगया
    बहुत -२ आभार

  6. वाह बड़का और छुटका रमई काका !

  7. बेहद सुंदर और एक आलोचकीय प्रस्तुति…अवधी मे वैसे ही थोड़ा कम काम हो रहा है..आपका यह प्रयास मील का पत्थर बने….!

    क्या उद्धरण दिये हैं आपने..इससे सुंदर शैली क्या होगी प्रस्तुतिकरण की..बेहतरीन…गदगद हूँ…!

  8. बहुत अच्छी एवं सुन्दर रचना
    बहुत -२ आभार

  9. कमाल लिखते हैं आप, मन तो हो आता है की अवाफ्धि में ही नाप्को जवाब दूं मगर तंग हूँ इस स्थानीय भाषा के लिखने से समझ में तो सब आता है मगर लिख नहीं पाता !………

  10. यूरेका-यूरेका!!!! याद है अमरेन्द्र, बहुत पहले मैंने आपकी पोस्ट पर टिप्पणी में “हम कहेन यहौ ध्वाखा होइगा” कविता का उल्लेख किया था. यह रमई काका की यही कविता है. आपके पास पूरी कविता हो तो मुझे भेज दीजिये. इसके साथ मेरे बचपन की बहुत सी यादें जुड़ी हैं. इस पोस्ट की अन्य कविताएँ भी पढ़ीं. रमई काका का तो कोई जवाब नहीं. लोकचेतना से जुड़े कवि थे वे. उनकी अवधी ही शुद्ध अवधी है.
    और आपको बहुत साधुवाद!! बहुत अच्छा काम कर रहे हैं आप अवधी के लिये. शुभकामनाएँ!! आज से आपका ब्लॉग फ़ालो कर रही हूँ और ट्विटर पर भी.

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