रमई काका कै कबिता : यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो …



पढ़ैयन  का राम राम !!!
    पहिले हम माफी मागत अहन उन लोगन से जे कौवा-बगुला संबाद देखै की आसा से 
    आये होइहैं …अब कारन बतावा चाहित अहन…हमसे कइव जने ई सिकाइत दर्ज किहिन
    कि लगातार संबाद चले से मामिला बड़ा गंभीर ह्वै जात अहै …उनकै कहब रहा कि कुछ 
    रस-बदल भी करै का चाही …भइया ! पंचन के राय कै सम्मान करब भी तौ जरूरी अहै!
   …यही वजह से हम ई फैसला किहेन कि यक अत्तवार का तौ  ‘ कौवा-बगुला संबाद ‘रहे 
   लेकिन यकये ( यानी दुसरके ) अत्तवार का अउर चीजैं…जैसे आज कै प्रस्तुति …

रमई काका कै कबिता : यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो …

         [ रमई काका बिस्व-कबि तुलसीदास के बाद सर्बाधिक लोकप्रिय अवधी कै कबि हुवैं |
          इनकी अवधी मा बैसवाड़ी कै छौंक देखी जाय सकत है | आकासवानी से काका जी कै 
          कार्यक्रम सुनै के खातिर जाने केतना जने  रेडियो खरीदिन … काका जी  कै पूरा नाव
        रहा – चंद्रभूसन तिरबेदी | जन्मा रहे – १९१५ मा अउर निधन भवा – १९८२ मा | काका 
           जी कै प्रस्तुत कबिता अंगरेजी के परभाव कै सांसकिरतिक  समीछा करति अहै …]


” लरिकउनू बी ए पास किहिनि, पुतहू का बैरू ककहरा ते।

वह करिया अच्छरू भैंसि कहं, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।


दिनु राति बिलइती बोली मां, उइ गिटपिट गिटपिट बोलि रहे।

बहुरेवा सुनि सुनि सिटपिटाति, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।


लरिकऊ कहेनि वाटर दइदे, बहुरेवा पाथर लइ आई।

यतने मा मचिगा भगमच्छरू, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।


उन अंगरेजी मां फूल कहा, वह गरगु होइगे फूलि फूलि।

उन डेमफूल कह डांटि लीनि, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।


बनिगा भोजन तब थरिया ता, उन लाय धरे छूरी कांटा।

डरि भागि बहुरिया चउका ते, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।


लरिकऊ चले असनान करै, तब साबुन का उन सोप कहा।

बहुरेवा लइकै सूप चली, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो। ”
                                     
                                                      ————- रमई काका 

17 responses to “रमई काका कै कबिता : यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो …

  1. गजबै रचना पढ़वला भईया ! लेकिन अरविन्द जी कै टिप्पणिया काहे मिटाय देहला । पुरनकी पोस्ट पर रहै, त ओके कॉपी कैके रख नाहीं लेहला ?
    अगर उ टिपणिया होय, तो खुदै लिख दा !
    पढ़ै बदे आवत रहब ई रमई काका कै कबिता ! बहुतै सुन्दर !

  2. आदरणीय अरविन्द मिश्रा जी कै टिप्पणी मिस होइगै रही , संजोग से
    ई-मेल पै रही | अब टिप्पणी प्रस्तुत करत अहन …
    '' यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो…..बाह भैयिया बाह मजा आयिगा !
    तोहोऊ त सनलायिट सोप सबुनवा से कपडवा धोयें होहिं ! ''

  3. अब लो! हम रमई काका के बारे में जानते ही न थे!
    चंद्रभूषन तिरबेदी की बायोग्राफी का विस्तार होना चाहिये। कहीं चित्र होगा उनका?

    लरिकऊ कहेनि वाटर दइदे, बहुरेवा पाथर लइ आई। >> वाह!

  4. @ चंद्रभूषन तिरबेदी की बायोग्राफी का विस्तार होना चाहिये…
    …………अस बात है तौ आवै वाले दुसरके अत्तवार
    कै पोस्ट रमई काकै पै केन्द्रित राखब …
    कोसिस करब कि चित्रौ हाजिर कै सकी …

  5. सुन्दर। जिन विजय त्रिवेदी ने एक इंटरव्यू में मोदीजी की बोलती बंद कर दी थी वे इन्हीं रमई काका के पोते हैं। रमई काका की और रचनायें पढ़वायें!

    • शशांक शिरोमणि

      श्री अनूप शुक्ल जी,
      रमई काका जैसे महान कवि की रचना के सन्दर्भ में आपका उपर्लिखित राजनैतिक उल्लेख अशोभनीय है। कृपया बताएँ कि किस इंटरव्यू में विजय त्रिवेदी ने मोदी जी की बोलती बंद कर दी थी? आज २०१४ में मोदी जी कहाँ हैं और विजय त्रिवेदी कहाँ? ऐसा उल्लेख कर आपने रमई काका का अपमान ही किया है जो अक्षम्य है। कृपया भविष्य में ऐसी राजनीतिक टिप्पणियाँ कर महान साहित्यकारों का अपमान न करें। धन्यवाद।

  6. बहुत बहुत नीक काम कीन्ह्यौ भइया अमरेंद्र। हमका लागत रहै कि अवधी म बस हमहीं खूंटा गाड़े बैठ हन। तुम आए ग्यौ तौ चलौ अब हम फिर तै गिटिर पिटिर करब सुरू करिबै।

    रमई काका रहइया उन्नाव क्यार रहइया रहैं अउर बैसवारी अवधी म बहुत कुछ लिखेन। उनक्यार लिखा प्रहसन “बहिरे बाबा” आकाशवाणी लखनऊ के सबते मसहूर कार्यक्रमन म माना जाति है। रमई काका केरे बारे में विस्तार म जल्दी ही लिखब, उन केरि लिखी हास्य कविता – यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो- रमई काका केरि कवितन के संकलन “बौछार” तेरे लीनि गइ है, जेहिकार प्रकासन पहली दांय 1944 म भा रहे। तब एहिकेरि भूमिका मसहूर साहित्यकार राम विलास शर्मा लिखी तेइन।
    अवधी पर हमहूं एक ब्लॉग बनावा है..वहि क्या लिंक है-
    http://manjheriakalan.blogspot.com/

  7. shukria;apke comment ke liye aur usse bhi badhkar ramai kaka se parichay karwane ke liye.
    kaash main puri rachana samajh paati ,agar aap sanshep men matlab bh samjhte chalein to accha haga.

  8. videshaj shabdon ka prayog hindi bhashi to bakhubi kar rahe hain magar anchalik bhasha me inaka prayog aisi hi hasyaspad isthithi bana deta hai….
    Achha likha hai apane.

  9. का कही भैया, इ कबिता पढ़ि के त बहुतै मजा आवा। सबसे बड़ी बाति इ कि रमई काका के बारे म अपने बाबूजी से थोर बहुत सुने रहेन लेकिन कुछ पढ़े ना रहेन । बहुतै अच्छा लाग ।

    इहां आइ के इहौ पता चला कि टी वी वाले विजय त्रिवेदी उनकर पोता अहिन ।

    बहुतै धन्यवाद ।

    बहुतै धन्यवाद ।

    बहुतै धन्यवाद ।

  10. ramai kaakane to mahfil jama di..bahut majedaar chand…badhai bhai aise geet kahan mil pate hai ab..bahut sundar ..dhanywaad amrendra ji

  11. यह कविता कितनी प्रसिद्द है इसका कथ्य बाद की बहुत सारी कविताओं में दुहराया जा चुका है, इससे समझा जा सकता है..|
    यह छीछालेदर तो मचेगी ही जब चयन की सहज बुद्धि किसी नए चमक के अन्धानुकरण के आगे गिड़गड़ायेगी….!
    रमई काका का नाम तो सुना था पर अब महसूस रहा हूँ..बेहद आभारी हूँ..!

  12. भाई अमरेन्द्र! ई त ढेर नीक कीन्ह्यौ जउन ई कविता लेआय का बड़वार काम कइ रहे हौ। हम का बताई, केतना आसिस त हम दीन्ह है अ केतना हमार अम्मा देइहीं – जब हम आज उनका बताउब ई तोहार सुन्दर प्रयास।

  13. PADHAIN MA BAHUT NEEK LAAG

  14. शशांक शिरोमणि

    अनूप शुक्ल | November 29, 2009 at 4:08 PM | Reply
    सुन्दर। जिन विजय त्रिवेदी ने एक इंटरव्यू में मोदीजी की बोलती बंद कर दी थी वे इन्हीं रमई काका के पोते हैं। रमई काका की और रचनायें पढ़वायें!
    —————————
    श्री अनूप शुक्ल जी,
    रमई काका जैसे महान कवि की रचना के सन्दर्भ में आपका उपर्लिखित राजनैतिक उल्लेख अशोभनीय है। कृपया बताएँ कि किस इंटरव्यू में विजय त्रिवेदी ने मोदी जी की बोलती बंद कर दी थी? आज २०१४ में मोदी जी कहाँ हैं और विजय त्रिवेदी कहाँ? ऐसा उल्लेख कर आपने रमई काका का अपमान ही किया है जो अक्षम्य है। कृपया भविष्य में ऐसी राजनीतिक टिप्पणियाँ कर महान साहित्यकारों का अपमान न करें। धन्यवाद।

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