कौवा-बगुला संबाद , भाग – १ : यक दुसरे से चीन्हि-पहिचानि अउर दोस्ती


पढ़ैयन का राम राम !!!  

आज यहि संबाद कै पहिला भाग आप सबन के सामने रखत अहन | यहिमा दुइनिव पच्छिन(कौवा-बगुला) कै मुलाकात होये | पहिले हम अपनी तरफ से कुछ निबेदन कीन चाहत अही—  


पढ़ैयन से निबेदन– यै दुइनिव पच्छी प्राथमिक रूप से कौवा अउर बगुला हुवैं , मुला कहूँ -कहूँ यै माया के सहारे आपन रूप बदल लियत हैं, हजारन साल पीछे कै बाति जानि लियत हैं , दूर कै खबर जानि जात हैं , आदि-आदि | कौवा का बड़प्पन दीन गा है ,कारन ई है कि यहिकै तन अउर मन यक्कै नाई है | बगुला मा ई बाति नाहीं है | कबि कबीर दास कै इसारउ यही तरफ अहै —” तन मैला मन ऊजरा बगुला कपटी अंग | / तासों तौ कौवा भला तन मन एकहिं रंग || ” लेकिन त्रिगुनात्मक सृस्टी मा बगुलौ कै आपन महत्व है , बावजूद यहिके कि बगुला कै मूल्यन अउर आदर्सन से दुराव अहै | कहूँ – कहूँ ई आपन बगुलाई छोड़े (!) अउर बगुला भगत के रूप मा उपदेसउ दे | आपन रवायतन पेसा ई कहाँ छोडि पाये !  
इन दुनों की बातिन मा कहूँ सपाटपना रहे तौ कहूँ दुंद (द्वंद्व) |  





दुनू पच्छिन से निबेदन – कौवा से – ” दुनिया तौ दीवानी है कोइली कै माधुरी बानी कै / हम तौ तोहरी कांव-कांव कै सच्चाई सुनबै भाई | ” अउर बगुला से – ” हे बगुला ! हम जानित है भीतर से उज्जर होबो ना / लेकिन उपदेसय के जरिये ह्वै पाये तौ सच बोलेउ | ”  
अब आगे ———–  

भाग – १ : यक दुसरे से चीन्हि-पहिचानि अउर दोस्ती  



(यक ताले के किनारे दुइनिव मिलत हैं )

कौवा : (मन मा) अच्छा अहै ई ताल | खाजुल्ला कै ताल पै ना जाय के हियाँ आयन अच्छा किहेन | हियाँ सोर-गुल नाय अहै अउर सुस्ताय कै बिवस्था जादा भले अहै |  
बगुला : (पास मा बैठा कौवा के मन कै बाति जानि के) ठीक सोच रहे हौ , भाई !  
कौवा : तू के हौ भइया अउर ……… बगुला : जाने केतरा सालन से हम हियाँ मछरी मारित अहन … मुला जहाँ तक हमैं समझ मा आवत अहै तू खाजुल्ला कै ताल छोड़ि के हियाँ आवा हौ | 
कौवा : सही कहत हौ | हुवां मेला लाग अहै अउर बहु सोर-गुल हुवत रहा , सो हियाँ चला आयन | मुला तू कैसे जानेउ … बगुला : जइसे तुहैं जानकारी ह्वै जात है वइसे हमहूँ का | हमरेउ लगे माया कै खेल अहै | 
कौवा : ‘ जइसे तुहैं ‘ से का मतलब … 
बगुला : अय इहै कि अतरी दूरि से जानि गयउ कि कालीदीन के ताले पै माहौल बढ़िया है |  
कौवा : अच्छा तौ ई कालीदीन कै ताल आय !  
बगुला : हमहीं से मजाक…माया के खेल मा तू कम माहिर थोरै हौ … 
कौवा : नाहीं भाय… हरदम माया कै सहारा नाय लियै का चाही | जवन चीज आसानी से पता चल जाय वहिके खातिर माया कै सहारा नाय लियै का चाही | 
बगुला : अतरा बिबेक बचाये रहत हौ … हम तौ माया कै सहारा छोड़ि दी तौ जी न पायी |  
कौवा : कइसे … 
बगुला : भरम पैदा न करी तौ जी न पायी | माया त्यागि दी तौ भरम कइसे पैदा कै पाउब | न मछरी फंसे न जीवन चले | यही वजह से भीतर जेतना करिया हन बाहर वतनै सफेद | उज्जर रंग कै पहिचानि हमरे उदाहरन से हुवत है | 
कौवा : हम तौ भइया … जस भीतर तेस बाहेर … वइसे तौ करिया रंग कै मिसाल हमहूँ से दीन जात है … 

बगुला : लेकिन इन्सान तुहसे वतनी प्रेरना नाय लियत जेतनी हमसे… इहै देखव, नेतन का लियौ , यै आज के समय मा सर्बेसर्बा हैं | इनका धरती कै देउता समझौ | यै हमरेन नाई भीतरे के करिखाई कै यक्किव लीक बाहेर नाय आवै देते | कपड़उ हमरेन नाई पहिरत हैं | यहितरह हमार सक्सेज जगजाहिर अहै | 
कौवा : सही कहत हौ | तुहँसे बाति करै मा बड़ा मजा आये | 
बगुला : हमरौ इच्छा अहै कि केहू से बतलावा करी | मछरिन से बतलाई अउर दोस्ती करी तौ खायी केहका..यही से तुहसे दोस्ती करा चाहित अही | 
कौवा : हमैं कवनिव दिक्कत नाय ना |  
बगुला : सुक्रिया दोस्त … 
कौवा : दोस्त अंधियार हुवत अहै …अब चलै का चाही … 
बगुला : हाँ, जल्दी जाव नाहीं तौ तोहार घरैतिन तोहरे उप्पर बिगड़िहैं | 
कौवा : न न न हमरे खियाँ घरैतिन नाहीं ना | 
बगुला : यानी हमरेन नाई … आगे नाथ न पाछे पगहा …दोस्ती जमे … 
कौवा : अच्छा अहै …अब चलब … राम राम !!! 
बगुला : यही ताले पै फिर मिलेउ … राम राम !!!  


( जारी …)  
[ अगिले अत्तवार तक हमरौ राम राम !!! ]  


(छबि-स्रोत-गूगल बाबा)

9 responses to “कौवा-बगुला संबाद , भाग – १ : यक दुसरे से चीन्हि-पहिचानि अउर दोस्ती

  1. अमरेंदर भैया ई ससुरी राजनीतिया के चलते हर घर परिवार और गाँव माँ बगुलंन और कौवन का बतकही होत बा हो -साझे सकारे ! अब चला आगे सुनावा !

  2. bahut neek lag amarindar ji,tani aapan foon nambar deo,batiyay ka man karat hai.hamar to hai-09441735311,040-27627831.

  3. बहुतै नीक अहै भैया.. भाखा का गहिर तक आनन्द आय गै.. मुसकिरा किरा के गाल पिराय लागें.. बहुत बधाई भैया.. अइसे लिखत रहा.. तोहार लिखवाई जीयत रहे भैया..

  4. सुन्दर है यह पेयर ऑफ अपोजिट्स का संवाद।
    जरा सोचें गहरे से तो अपने में ही हैं कौव्वा और बगुला! बिल्ली और बन्दर!
    ऐसा लिखा पहले न देखा!

  5. व्यक्तिगत तौर पर मै बहुत ही उत्साहित हूँ, आपकी योजना सुन्दरतम है, ना केवल शिल्प और विधा की दृष्टि से बल्कि प्रासंगिकता और महत्ता की दृष्टि से भी…आश्वस्त हूँ, कि अवधी भाषा में आपका यह प्रयास सबसे यादगार और अमूल्य होगा…

  6. kya likhte ho dost……sthniy bhasha ke prati aapka anurag prashanshniy…….mere blog par aane ka shkriya.

  7. बहुत गज़ब का प्रयास है भाई आप अवधी भाषा के लिये कुछ बेहतर कार्य करिये जैसे हमारे लोगो ने भोजपुरी के लिये किया है, अवधी यानी काव्य की बेहतरीन भाषा ।

  8. पूरब की झलक है इस अवधी में हमारे खीरी में ब्रज के साथ अवधी और मधुर हो जाती है

  9. नवा..नवा..टंपलेट क बधाई, बड़े भईया..

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s