अवधी हमारि…अवधी हमारि…

सबन का राम राम !

भासा-परेम पै कविता _____

जँह भिनसार हुवै चिरइन से ,

फूटै किरन-उछाह |

स्रम-संसकीरत-देव किसानै

पकड़ै खेती-राह |

मंदिर-मंदिर ‘मानस’ गूंजै,

महजिज करै अजान |

प्रगटै अस भिनसार जहाँ पै,

तहां काह कै चाह |

यहु अवध इलाका औ’ अवधी का,

कइसे केयु पाए बिसारि…..

अवधी हमारि …अवधी हमारि …

जँह साहित्य लिखा गा उत्तम,

भारत कै जगजाहिर |

दंग कै दिहिन निज कवित्त से,

काव्य-विवेकी-माहिर |

सूफी कवियन कै बानी,

भाखा-समता बरसायिस,

तुलसी जी अंधियार भगायिन,

बचा न अन्दर-बाहिर |

पढ़ि-पढ़ि बाबा कै चौपाई

जन जीवैं जीवन निखारि…..

अवधी हमारि …अवधी हमारि …

ऊ जे ‘पढ़ीस’ का पढ़िस नाय..

‘बंसीधर’ कै बंसी ना सुनिस

‘रमई काका’ मा रमा नाय

ते का जानी अवधी हमारि..

अवधी हमारि …अवधी हमारि …

हाँ! आजहु जब मन दुखी हुवै,

औ’ करम करै से जिउ पछरै,

अवधी साहित्य उलटि डारौ,

ई भासा ले तुँहका सम्हारि…….

अवधी हमारि …अवधी हमारि …

छबि-स्रोत : गूगल बाबा

8 responses to “अवधी हमारि…अवधी हमारि…

  1. अमरेन्द्र जी बाबा तुलसीदास जी की रचनाएँ छोड़ दी जाएँ तो संभवतः मैंने अपने जीवन में पहली अवधी की रचना पढ़ी. एक संक्षिप्त सी रचना में आपने पूरे अवधी जगत की क्या खूब झांकी बनाई है, यदि देख सकेंगे तो इस कविता को अवधी के जानकार लोगों के अतिरिक्त निश्चित ही अन्य लोग भी पसंद करेंगे….बधाइयाँ….अनगिन…

  2. जो भाषा मानस की भाषा बन गयी उसकी बात ही क्या ?
    बहुत आभार इस जोरदार कविता के लिए त्रिपाठी जी !

  3. आपकी ये रचना पड़कर स्कूल के दिन याद आ गए…बहुत अच्छा लिखा है..बहुत आभार आपका ब्लॉग पर जर्रा नवाजी का.

  4. जँह भिनसार हुवै चिरइन से ,
    फूटै किरन-उछाह |
    स्रम-संसकीरत-देव किसानै
    पकड़ै खेती-राह |
    मंदिर-मंदिर 'मानस' गूंजै,
    महजिज करै अजान |
    प्रगटै अस भिनसार जहाँ पै,
    तहां काह कै चाह |
    यहु अवध इलाका औ' अवधी का,
    कइसे केयु पाए बिसारि….. bisarna sambhaw hi nahi

  5. bahut achchi lagi yeh rachna..aur apka awadhi prem bhi…….

  6. अवधी की शान मे यह कलाम अच्छा है ।

  7. aapki kavita achchhi lagi jari rakhen…….. badhai.

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