राजू श्रीवास्तव का स्वागत करें, ट्रोलिंग नहीं.

राजू श्रीवास्तव का स्वागत करें, ट्रोलिंग नहीं : अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी 

राजू श्रीवास्तव के जिस वीडियो को लेकर अवधी पेज, या दूसरी जगहों, पर उनकी ट्रोलिंग की जा रही है (उसका लिंक इस पोस्ट के आखिरी में दिया गया है, उसे देख लें) वह अनुचित है। आपका उनकी कामेडी कला को न समझ पाने का प्रमाण है यह। यह भी साबित होता है कि आप कामेडी देखते हुए एक ‘टाइप’ को ज्यादा देखते हैं, उसे पसंद करते हैं, कंटेंट को नहीं।

44249928_2761128750579881_3972386411365007360_nराजू श्रीवास्तव से आपको शिकायत है कि वे रमेश दूबे ‘रमेशवा’ की नकल कर रहे हैं। नकल कंटेंट की मारी जाती तो मैं इसे नकल कहता। ‘फार्म’ में उन्होंने बेशक रमेशवा से प्रेरणा ली है। दुपट्टा रखकर, माहौल बनाने की। लेकिन पूरी कामेडी सुनिये। उनकी स्क्रिप्ट पूरी अलग है। ओरिजनल है। वैसी स्क्रिप्ट रमेशवा की नहीं हो सकती।

फार्म के लेने को आप नकल बोल रहे हैं। इसका मतलब आपको नकल का मतलब भी ठीक से नहीं आता। रमेशवा ने एक बीडियो गब्बर वाला बनाया है। जाइये उसे देखिये। आप इसी पैमाने पर उसे राजू श्रीवास्तव की नकल कहेंगे क्या? क्योंकि शोले के कामेडी फार्म को पेश करने का शुरुआती काम तो राजू श्रीवास्तव का है।

अगर इस तरह से देखेंगे तो पाएंगे कि इक्कीसवीं सदी में हिन्दी में कई कामेडी करने वाले, जिनमें कुछ अच्छे भी हैं, वे राजू श्रीवास्तव के नकल कहे जाएंगे। कई ने फार्म छोड़िये, कंटेंट के स्तर पर भी राजू की नकल की है। कुछ तो उनकी जेब से निकली खनकती अठन्नियों की तरह।

जिस बात के लिए मैंने राजू श्रीवास्तव को धन्यवाद दिया है उसे यहाँ बताना चाहूंगा। अब के पहले राजू अवधी लहजे, अवधी मुहावरे, अवधी पद-बंध और अवधी चरित्रों को सामने ला रहे थे। पहली बार वे ‘अवधी भाषा’ में कामेडी लेकर आये हैं। भाषा की पूरी पहचान को रखने की कोशिश पहली बार उनके कामेडी प्रयास में दिखी है।

उनके पहले के प्रयासों को अवधी भाषा की दृष्टि से अनावश्यक नहीं कहूंगा। उसके साथ दो बातें रहीं। एक बात जिसे सीमा कह सकते हैं वह थी कि भाषा टुकड़े में जा रही थी लेकिन, दूजी बात, एक शक्ति भी भाषा के साथ जुड़ रही थी कि अवधी अखिल भारतीय स्तर पर, भारत के बाहर विश्व भर में भी, जा रही थी। यह काम भी जरूरी था।

अब वे जो कर रहे हैं, वह भी जरूरी है। आज का समय आनलाइन का समय है। इंटरनेट का खुला इलाका है। इससे लोकभाषा को लोकतंत्र मिला है। इसमें भाषा के खांटी और पूर्ण रूप को पसंद करने वाले भी बहुत आ गये हैं। वे उसे दिलचस्पी के साथ देखते-सुनते हैं। आज जो दर्शक वर्ग बना है, बढ़ा है, उसे पिछले दस सालों से देख रहा हूँ। साक्षी हूँ। अवधी का काम करते हुए। इसलिए खुशी होती है। अब कोई भी कलाकार देखा-सुना जाएगा। इसलिए मुमकिन है राजू इस दौर में अवधी की पूरी अस्मिता के साथ बीडियो लाते। और उन्होंने लाया। उम्मीद है आगे भी लाते रहेंगे। यह उनका एक सराहनीय कार्य होगा।

जहाँ तक रमेशवा की बात है, उन्हें इसके लिए खुश होना चाहिए कि राजू श्रीवास्तव ने उनके फार्म को विस्तार दिया। उसे स्वीकार किया। यह रमेशवा की, उनके कामेडी फार्म की, जीत है। लेकिन उल्टे वह उनपर गलत-सलत बोल रहे। उनके इलाकाई ट्रोलर्स यही कर रहे। बोल रहे कि उन्हें अवधी नहीं आती। ऐसा वे कह रहे हैं जिन्हें खुद दो वाक्य अवधी में लिखना नहीं आता। होना तो यह चाहिए कि अब एक स्वस्थ प्रतियोगिता का माहौल हो, इसलिए ऐसे प्रयासों को प्रमोट किया जाना चाहिए।

स्वस्थ प्रतियोगिता से रमेशवा भी बेहतर करने की ओर बढ़ेंगे। नहीं तो पिछली कई प्रस्तुतियों से वे चक्कर काट कर वहीं पहुंच जा रहे हैं जहाँ से उन्होंने अपनी बात कहनी शुरू की थी। एक टाइप होते जा रहे। कंटेट का नयापन व पैनापन जैसा उनके दो-तीन शुरुआती वीडियोज में था, वह बाद में नहीं दिख रहा। इस दृष्टि से राजू श्रीवास्तव का आना, इस दिशा में प्रयास करना सभी के लिए लाभदेय है। एक स्वस्थ प्रतियोगिता के माहौल को बनायें तो बेहतर।

एकाध लोग बकवास कर रहे हैं कि मैंने रमेशवा को प्रमोट नहीं किया। वे थोड़ा रिसर्च करें। रमेशवा पर पहला उत्साहवर्धक आलेख मैंने ही लिखा। मैंने ही लल्लनटाप को रमेशवा के लिए सबसे पहले टैग किया। फोन करके उनकी तारीफ की। दूर-दूर तक, जितना संभव हुआ, उन्हें शेयर किया। पचासों ने मुझसे उनका नंबर पाकर उनसे बात की। तब जब उनके यू-ट्यूब सब्सक्राइबर तीन हजार ही थे। मैंने ही उनसे कहा कि आप ‘अवधी कामेडी शो’ लिखकर अपने काम को आगे बढ़ाएं। उन्होंने यह बात मानी।

लेकिन जैसे-जैसे मैं उनकी सीमा उन्हें बताने लगा वे कन्नी काटने लगे। खास कर गब्बर वाली प्रस्तुति से। उन्हें अब सिर्फ़ तारीफ सुनने की आदत पड़ चुकी थी। वे दिल्ली आये तो मेरे साथ एक इंटर्व्यू जिसे उन्हें अवधी में देना था, समय तय करके भी बिना सूचना के नहीं दिखे। मुझे थोड़ा अखरा भी। उसके बाद वे मिलना चाहे तो मेरे पास समय नहीं था। अब उनसे मिलने की मेरी कोई इच्छा नहीं।

मुझे न रमेशवा से कुछ लेना है, न राजू श्रीवास्तव से। जिसका जैसा काम है, उसे वैसा ही बोलना पसंद करूंगा। रमेशवा से जब संवाद था तो भी उनका भला चाहा। जो ठीक लगा, उन्हें बताया। अब नहीं संवाद है तो भी उनके बेहतर भविष्य की कामना है। प्रमोट नहीं किया, यह बोलने वाले अपना बकवास बंद करें।

रमेशवा का अभिनय उस ‘फार्म’ की मौलिकता लिये हुए है जिसमें राजू ने भी अवधी कामेडी की है। उस ‘फार्म’ में राजू श्रीवास्तव उनकी तुलना में अ-मौलिक लगें, संभव है। इसलिए भी, क्योंकि उस फार्म को रमेशवा ने शुरू किया है। लेकिन ज्यों ही आप कंटेंट की तरफ से देखेंगे आपको राजू की मौलिकता समझ में आयेगी। और यह भी समझ में आयेगा ‘फार्म’ की मौलिकता के बावजूद रमेशवा की कुछ सीमाएं/दिक्कतें हैं जिनसे वह निकल नहीं पा रहा। जबकि राजू श्रीवस्तव में ‘कंटेंट’ की क्षमता अधिक है। समझ का पुख्तापन अधिक है। जिससे वे भारत के किसी भी कामेडियन को हमेशा पीछे छोड़ देते हैं। यह राजू की मौलिकता है। जिसका ‘फार्म’ के बावजूद स्वागत किया जाना चाहिए। यद्यपि अभी उनके और अवधी बीडियोज का इंतिजार है…

राजू श्रीवास्तव और रमेशवा दोनों को मेरी शुभकामनाएँ! रमेशवा को चाहिए कि अपने लोगों से ट्रोलिंग न करवाएं। राजू श्रीवास्तव ने तो आपकी तारीफ की है, यह कह कर कि “मैं तो आपका फैन हो गया हूँ।’’ कुछ उनसे भी सीखें। धन्यवाद.

राजू श्रीवास्तव के अवधी कॉमेडी शो का लिंक –  https://www.youtube.com/watch?v=ntmRnJFEJ28

— अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
#अवधी_कामेडी_शो ॥ Raju Srivastava ॥

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यक संबाद अवधी के बर्तमान दसा क लयिके

44106521_2751698151522941_1129920941124485120_nअवधी कय आज काहे यतना बे-पहिचान होइगा अहय, यहि बाति क लयिके यक संबाद फेसबुक के अवधी पेज पै भा रहा। संबाद के आधार मा अमरेन्द्र अवधिया कै यक पोस्ट रही। अवधी सीनियरन क संबोधित कीनि गय रही। ओहपै टिप्पनी करत ‘अवधी ज्योति’ अवधी पत्रिका केर संपादक रामबहादुर मिसिर सीनियरन के ऊपर धरे सारे आरोपन के जवाब मा युवा लोगन क बयान बीर औ जाने काव-काव कहिन। वहिके जवाब मा शैलेन्द्र शुक्ल औ अमरेन्द्र अवधिया आपन जवाब रखिन। ई बतकही यक दस्तावेज के रूप मा सहेजी जाति अहय। बाति अवधी पेज पै भय रही। यही आठ अक्टूबर का। पेज से अनुमति लयिके संबाद हियाँ पेस कीन जात अहय। : संपादक 
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  • यक संबाद अवधी के बर्तमान दसा क लयिके

अवधी Awadhi :  ई पोस्ट पढ़ा जाय….. दुसरे के वाल से लीन गय अहय, यहिलिये ओही केरी भासा, खड़ी बोली-हिन्दी मा, अहय! मुला बात मार्के कय कही गय अहय…..

यह सवाल उन अवधी सीनियरों से पूछिए जो आज अवधी युवाओं के सामने आने पर खदबदा जाते हैं, जद्द-बद्द बकते फिरते हैं…पूछिये कि :

जब दिल्ली में मैथिली-भोजपुरी अकादमी बन रही थी तब आपने अपनी अवधी के लिए अवधी अकादमी का सवाल क्यों नहीं उठाया? भारत की राजधानी में आपको अपनी भाषा के लिए अकादमिक प्रतिनिधित्व की जरूरत क्यों नहीं महसूस हुई?

अवध के अमेठी और रायबरेली ने भारतीय राजनीति में कितने प्रधानमंत्री दिए, किससे छुपा है! फिर भी आप राजधानी दिल्ली में अपना भाषिक-सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व कभी नहीं सुनिश्चित कर पाए?

तब आप ‘कभी अवधी कभी हिंदी’ का गेम व्यक्तिगत लाभ के लिए खेल रहे थे, तब आप मारीसस, सूरिनाम, रूस…घूमने का मजा ले रहे थे, तब आप पुरस्कारों की घटिया राजनीति कर रहे थे, खास कर उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान में, तब आप यश लोलुप होकर व्यक्ति से आगे बढ़ कर साहित्य की सामाजिक भूमिका नहीं समझा पा रहे थे, सरकार से निजी लाभ ले रहे थे। कुछ तो गांधी-गांधी-गांधी करते पेट्रोल टंकी तक जुगड़िया लिए।

तब आप, अवधी सीनियर, अवधी ग्रंथावली जैसे छद्म-सम्पादकीय-प्रकाशकीय उत्पाद को उस नेता से लोकार्पित करवा रहे थे जिसे अवधी का अ भी नहीं आता। लेकिन वह आपकी लोलुप राजनीति की चिरकुट गोटियों के लिए तो सही था ना!

तो आज जब आप कभी-कभी चिहुंकते हैं कि भोजपुरी वाले फला-फला अवधी को अपना क्लेम कर रहे हैं, तो आप एक जोकर या जमूरे से अधिक कुछ नहीं लगते। आप जैसों का दिया हुआ रूग्ण व गतिहीन परिवेश ही था जिसमें पिछले कई दशकों में अवध की भाषिक-सांस्कृतिक चेतना इतनी खौर-भौर हो गयी कि अवध का व्यक्ति अपनी मातृभाषा भी न पहचान सके। फिर आपका भकुवाना एक स्वांग से अधिक कुछ नहीं कि यह देखो, अवध इलाके का व्यक्ति अपनी मातृभाषा को भोजपुरी काहे बोल रहा है!

भोजपुरियों को अवधी साहित्य कब्जियाने वाला कहना उनके कब्जे से अधिक आपकी अपनी नाकामयाबी, लापरवाही और निजी लाभ तक केंद्रित रहने को दर्शाता है। इसकी ईमानदार समीक्षा के लिए आप अपनी गिरेबान में झांके तो आपको शायद चुल्लू भर पानी की दरकार हो! लेकिन आपका काला दिल-दिमाग यह भी न कर सकेगा।

आभार – Amrendra Nath Tripathi केरी फेसबुल वाल.

तौ भैया, आप सब जरूर यहि बात पै सोचौ.!

रामबहादुर मिसिर  – बनिया के बगचा पै झींगुर दलाल, अइसनै लोग अवधी के बैरी हैं।उनके बरे तौ यहै कहा चाहित है.बतिया हैं करतुतिया नाही, मेहरी हैं घर खटिया नाही।सीनियर्स पै सवाल उठावै के पहिले अपने गिरेबान म झांकै।ई फेसबुकिया पहलवान दूरै से ताल ठोंकत है,आखाड़ा म कूदै क नानी मरत है।25 साल से अवधी कै खालिस पत्रिका हैदरगढ़ से छपि रही है,5-6अंक उनके लगे पठवा मुला वहिकै जिकिर को कहै नाम लेब गुनाह समझिन,अइसनै बयान बहादुर अवधी कै लोटिया बोरै म लाग हैं।जिहसे जौन सपरत है तौन करत है,तुमहू कुछ कैके देखाऊ तौ जानी बस भूसा म लाठी खोंसै जानेउ

Shailendra Kumar Shukla – का हो मिसिर जी तोहरी नजर मा अवधी बनिया कै बगचा है ?

Shailendra Kumar Shukla – “तुम करौ कवितई बंद
बुढ़उनू जगु बदला

तुम तौ पुरान बकवादी
नायिका भेद के आदी
का भूलि गएउ भारत मा
है मनइन का आजादी ?

कविता हुइ गै स्वच्छंद
बुढ़उनू जगु बदला ।”

मृगेश जी कहिन रहे…

रामबहादुर मिसिर – पहिले ई कहकुति कै भाव समझौ,मृगेश कै तू नाव सुने होब्या हम पचासन बैठकी म बतियावा है।ई कविता पर वंशीधर शुकुल दादा उनका अवधी कविता म जौन जबाब दिया हिन रहै वहौ हमरे लगे है

 Shailendra Kumar Shukla – अरे महाराज तू भावै लिखा करौ कहकूति तोहके सोभा न देत है। नेक सुझाव है ई।

Shailendra Kumar Shukla – भाषा कै भाव तोहरे बखार की तौ जजमानी न मानी जाई। बाकी तौ हम समझत अही। भले मनईन के संग 50 बैठकी ते जरूरी नाय है की बैठकबाज महान हुइ जाई। अउर बताई कि चेत जाउ की हम नाव सुनि के तोहरे सीनियरन जैसन बकैती करे वालेन म नाय हन। और न ऐसा नई पीढ़ी म कोई बकैत है।

रामबहादुर मिसिर – जौने तेवर म तू बात करत हौ ऊ उमिर ३० साल। बीते भै।तोहरी नजर म सब पुरनिया बकैत है तौ माना करौ।कूकुर भूंकै हजार, हाथी चलै बजार।अब यही बात कहिके बकैती बंद करत अही

Shailendra Kumar Shukla – अरे मिसिर जी 30 की हमारि उमिर जउन तोहके बड़ी ओछी लागत है। लेकिन असिलियत यह है कि सभ्यता की उमिर म हम तोहसे वहे तीस साल आगे हन जउन तोहके छोट सूझात है। चेत जा महाराज।

Shailendra Kumar Shukla – फिर कहकूति में मनुष्यता विरोधी धृष्टता निखर आई। छोटे लोगों से सीख लो क्या दिक्कत है, लेकिन बड़प्पन का का कीन जाय, ऊ का मानी

Shailendra Kumar Shukla – वंशीधर शुक्ल और मृगेश के बीच कविता में तोहके तोहरे पर्याप्त दिमाग भर दीखी।

Shailendra Kumar Shukla तोहरी हर ‘कहकूति’ तोहरे स्वभाव के खोल देत है प्रभू

Amrendra Nath Tripathi  – रामबहादुर मिसिर जी, अपने करतूत पै एतनौ गुमान नाय हुवय क चाही कि अंगुरी डारि-डारि के देखायौ पै आप आपन दोख न देखि पावैं। अवधी कै भला कौनौ चापलूस, दृष्टिहीन औ स्वारथी नाहीं कयि सकत। ऊ नकारात्मक माहौल भले बनवाय सकत हय। हम इन अवधी के लंपट घाघ बुढ़वन का ललकारित हय, जौन बरदास काहे होये! यहिलिये हम आप लोगन कय छिछलहर-छरछरात प्रतिक्रिया कारण समझित हय।

हां आप अवध ज्योति कै कुछ भाग हमरे लगे भेजे रहे। मुला कयिउ चीजन पै हम नाहीं लिखि सका हन। हमयं जौन तुरंत जादा जरूरी लागत हय, ऊ करय लागित हय। सोचव आप कय निगाह केतनी पतित होइ गय अहय कि अवधी के ताईं केहू कुछ करत अहय, यहिकै आकलन आप यहिसे करिहैं कि ऊ ‘आपकय लिखी चीजन’ पै केतना बोला। हद है यहि स्वार्थीपन कय!

आप यतना संकुचित अवधी बड़प्पन(?) देखावत हव कि कहय क परत हय :
“तुम बड़े भयेव तौ ताड़ भयेव… नाहक खंबा अस ठाढ़ भयौ…!’
यहि बड़प्पन के सामने हम जैसे करतूत-हीन कुकुरमुत्तै कौन खराब अहयं :
“तुम्हते तौ नीकि कुकुरमुत्ता / जो भुइं मा छतुरी गाड़े है…’
(काका केरी कविता क याद के आधार पै लिखित अहन, अनुमान कयि लिहेव!)

आपसे बहुत उम्मीद कयिके सात-आठ साल पहिले मिलत रहेन। बहुत कम लोगन के घरे जाइत हय। आपके गांव आपसे मिलै गा रहे। सोचेव तनिका कि कौन सनेह रहा होये हमरे अंदर आपके ताई! मुला आप तौ हमरे निरदोख मन क थोर चूतिया नाहीं बनायेव। आपसे मांगेन अवधी कै बुनियादी किताबन क कि अच्छे से पढ़ि सकी, आप हमका ‘बौरही कुकुरिया’, कोहड़ा, बिलार पाथर, बज्जर… जैसे लेबल कै चीज दयि के बौरहा बनाये जात रहेव। का आप वहि सनेह कै पात्र रहेव? हम तब कौन गलती किहेन रहा?

जारी … १/३

Amrendra Nath Tripathi – रामबहादुर मिसिर जी, आप अपने साथ के कयिउ मठाधीसन के साथ पिछले कयिउ सालन से मजा मारत अहयं। अपनेन मा बूड़ेव-बाढ़ेव! यहिसे केतनी प्रतिभन क पिछले दसकन मा निकरै कै मौका नाहीं बना, कब्बौ सोचेव! अवधी के चेतना कै अस्तर तुलसीदास के पूजा तक सीमित काहे अहय। बतावत हौ कि पचीस साल से पत्रिका निकारत अहव मुला अवधी के ताईं भासायी पहिचान बनावै के ताई, राजनीतिक प्रशासनिक और सामाजिक, का किहेव? भोजपुरी क बस गरियावो! आठवीं अनुसूची के ताईं हम सब बाति उठाइत हय तौ आपकै, आप जैसे अवधी मठाधीसन कै, कपार फाटय लागत है!

पूछत अहौ कि हम आप कै केतना जिक्र किहेन? सरम नाहीं आवत? हम तौ आपका २०१२ मा लखनऊ मा ‘अवधी-कल, आज और कल’ कार्यक्रम मा सादर बलुवायेन। आयोजकन से हमहीं कहे रहेन कि रामबहादुर जी कै राय जरूर लीनि जाय। ओनका सुनब जरूरी अहय। मुला आप वहि कार्यक्रम मा कौन लच्छन देखायौ। पूरे कार्यक्रम मा हमहिन क जद्द-बद्द सुनावय लागेव। आपन किताब निकारि-निकारि के नुमाइस देखावै लागेव कि जौन किहेन हमहीं किहेन। (जैसे हियौं बोलत अहौ) हमैं कहेव कि हम दिल्ली से आवा नासमझ होई। कहेव कि हमयं अवधी कै कुच्छ नाहीं आवत। काहे से कि आपसे तार्किक मतभेद रक्खत रहेन। आत्मालोचना करै कै बाति करत रहेन। कहेव कि यक ‘लउंडा’ अब हमयं सिखाये! पत्रकार अवनीश अवस्थी बताय सकत हयं, वै हुवां रहे।

हमयं पता नाहीं रहा कि आप अस परफारमेंस करिहौ, नाहीं तौ आपसे पहिलेन से बचय लागित! तब्बो हम बादि मा आपसे बातचीत के मौके पै सहज होइके मिलेन। मुला आपकै ऐंठि मानय वाली कहां। चाहत हौ सब युवा लोगय आपका भगवान मानिके पूजयं। आरती उतारयं। हमसे ई ना होये। कुछ जने करत अहयं। ओनका छापौ अपनी अवधी ज्योति मा। हमयं बख्से रहौ! बस गरियावै कै किरपा किहे रहौ, हमार भला यही से करिहैं आप।

अवध ज्योति क केतनी दाईं आपसे कहेन कि हम खरीदा चाही तौ कहां से खरीदी? कुछ नाहीं बतायेव। छापि के अपने तक धरै कै आदति अहय साइद। जैसे अवधी के तमाम बढ़िया आधुनिक कवियन के साहित्य पै आप सब मठाधीस कुंडली मारे बैठा अहयं, कुछ वैसनै!

जारी….. २/३

Amrendra Nath Tripathi – रामबहादुर मिसिर जी, अब आप लोगन कै छटपटी समझी जाय सकत हय। सोसल मीडिया आये से पहिले के तुलना मा अवधी कै यक बड़ा दायरा बनय लाग। आठवीं अनुसूची के ताईं अवधिउ वाले कुनमुनाय लागे। आप सबकै चौधराहट उपेच्छित हुवय लागि। ‘अपने मुंह ते आपन करनी’ आप बार-बार बजावैं तब्बो यहि बाजा क लोग सुनयं, जरूरी नाय। कठकरेजी के साथ अब लोगय वहि समय मा अवधी के ग्राफ के डाउन हुवय पै बोलय लाग अहयं जौनी समय मा आप सब अवधी के नाम पै केवल मठाधीसी किहेव, अवधी केर चेनता-प्रसार नाहीं किहेव। यहीते सात-आठ करोड़ अवधी जनता अपनी भासै क नाहीं पहिचानि पावति अहय। ऊ भोजपुरी कहि दियत हय तौ आप भोजपुरी क गरियावै लागत हौ। अपने गिरेबान मा नाहीं झकतेव।

आप आज ईमानदार होइके सोचौ, तौ साइद आपौ समझि पावो कि हम अवधी लोगन कै चिन्ता का हय! तब नये सवालन के साथे न्याय कयि पउबो। नाहीं तौ नये युवा लोगन कय पीढ़ी आवति अहय। ऊ बेचैनी से राह खोजे। Shailendra Kumar Shukla जैसे युवा यही पीढ़ी कय प्रतिभासाली नाव हयं, जेहसे आप अनाहूतै क उलझत अहौ। अस समझदार बेटवा अवधी माई केरी कोखी मा बहुत समय बादि जनमा होये! साधनहीन-कठिन जिंदगी जियै के बादौ अवधी पै यतनी दुरुस्त समझ औ अवधी बरे कुछ करै कै जज्बा काव हुअत हय, आप जइसे सीनियरन क यहि सपूत से कुछ सीखेक चाही।

हम कब्बौ सोचे नाहीं रहेन कि हमयं आपसे अस संबाद करेक परे। मुला आप अपनी बुजिर्गियत केरी हनक मा हर जगहीं सामने वाले कय मुंह बंद करवावै कै जेस कोसिस करत हयं ओहसे कहे बिना रहि ना गवा! यतना कहे के बाद हमरे भीतर दुख अहय। अपने भीतर झांका जये, अगर आपकै आत्मा तनिकौ बची होये, तौ यहि दुख क थोर-मोर आपौ समझि पइहैं। आभार!

३/३…..समाप्त।

‘अवधी कामेडी सो’ केरी सुरुआत ‘रमेश दूबे’ से

ई बहुत खुसी केरी बाति हय कि अब अपनी अवधिउ भासा मा, निउ मीडिया मा, ‘कामेडी सो’ केरी सुरुआत होइ गय हय। ई जिम्मा उठाये अहयँ रमेश दूबे ‘रमेश्वा’। यहि आसय कय यक पोस्ट फेसबुक पै लिखे रहेन जेहिका हुयौँ रखित अही। आप सब रमेश दूबे केरी यहि कोसिस क सराहैँ औ ओनकै उत्साह बढ़ावैँ। : संपादक
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रमेश दूबे ‘रमेश्वा’

AWADHI COMEDY SHOW – का पहला प्रयास शुरू हो गया है। हिन्दी और दूसरी भाषाओं में कामेडी शो होते रहते हैं। लेकिन गाँव-देहात की तस्वीर तभी जिन्दा हो पाती है, जब उस परिवेश की भाषा में कामेडी शो किए जाएं। लोकभाषाओं में कामेडी शो हों। अवधी में यह प्रयास शुरू हुआ जो बहुत सराहनीय है।

Ramesh Dubey की एक हास्य-व्यंग्य प्रस्तुति को कुछ दिन पहले मैंने देखा था। प्रस्तुति इतनी मोहक थी कि मैंने, कई दूसरों ने भी, उसे कई-कई बार देखा। नशा यों चढ़ा कि कलाकार से बात करके ही मन माना। बात करने के दौरान मैंने उनसे कहा कि आप ‘अवधी कामेडी शो’ के, नये मीडिया में, आरंभकर्ता हैं, इसे इसी रूप में आगे बढ़ाइये। भाषा की पहचान के साथ आपकी कोशिश और महकेगी। उन्हें बात जमी। अपने अगले एपीसोड (८-वें) को उन्होंने ‘अवधी कामेडी शो’ के साथ पेश किया।

रमेश के कामेडी की सबसे बड़ी खासियत है माहौल को उतार देना। आप थोड़ी देर के लिए भूल जाते हैं कि आप किसी महानगर/नगर के किसी कमरे में हैं। उस वक्त आप वहीं होते हैं, जहाँ कामेडी पेश करने वाला आपको ले जाता है। आपका डूबना (साधारणीकरण) ऐसा होता है कि अगर आप उस माहौल में कभी रहे-जिये हैं तो उन स्मृतियों और चरित्रों को अपने नजदीक धड़कते हुए महसूस करते हैं। फिर, जैसे एक सुन्दर कविता आपसे कहती है कि आप उसे कई-कई बार पढ़ें वैसे ही यह कामेडी भी आपसे कहती है कि इससे फिर-फिर गुजरें।

कंटेंट (अंतर्वस्तु) का नयापन अपनी प्रस्तुतियों में रमेश लाते जा रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि अपनी प्रतिभा के दम पर जिस नयी चीज़ को उन्होंने शुरू किया है और जितनी लगन से कर रहे हैं, उसे बहुत आगे ले जाएंगे। दूसरे भी इस तरह के प्रयासों को करने की कोशिश करेंगे।

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हम सबका कर्तव्य है कि रमेश दूबे जो प्रयास कर रहे हैं उसमें उनका उत्साह बढ़ाएँ। उनका सहयोग करें। उनके कामेडी एपीसोड्स को और लोगों तक पहुंचाएँ। कलाकार के लिए जन-जुड़ाव व जन-फैलाव आक्सीजन का काम करता है। इससे रमेश और ऊर्जावान होंगे। The Lallantop ऐसा नया मीडिया चैनल है जो लोक-प्रिय-रंगों को अपने अभियान में शामिल करता रहा है। मेरा अनुरोध है कि जैसे आपने हिन्दी के कामेडी शो वालों के साक्षात्कार आदि किये, उन पर नजर मारी, वैसे ही रमेश दूबे के इस आरंभिक कार्य को लखें। ~अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी.

कल रमेश दूबे का जो अवधी कामेडी शो यू-ट्यूब पर आया है, और वाइरल है, उसे आप सबके देखने के लिए यहाँ रख रहा हूँ। यू-ट्यूब लिंक यह रहा – https://www.youtube.com/watch?v=9f5epJvfwho

पाहीमाफी [२१] : लागि कटान, कुल बहि बिलान -२

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग१३-वाँ भाग १४-वाँ भाग , १५-वाँ भाग१६-वाँ भाग , १७-वाँ भाग , १८-वाँ भाग , १९-वाँ भाग , २०-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई २१-वाँ भाग :

Uttarpradesh_20379गाँव मा बाढ़ कयिसे आयी, ई ‘लागि कटान कुल बहि बिलान’ के पहिले हिस्सा मा देखावा गा अहय। बाढ़ मा अउर का-का भा अउ रचनाकार कयिसे गाँव से बहिरे निकरै पै मजबूर भा, ई यहि दुसरे भाग मा देखा जाय सकत हय। यहितिना ई बहुत कम सबदन मा बाढ़ कय बड़ा मार्मिक बयान बनि परा हय। पानी कय बाढ़ तकलीफौ कय बाढ़ बनिगै। मुला जब यहि बाढ़ मा छोट गेदहरै डूब-मरयँ तौ वहि कोहराम मा दूसर दुख भुलाय जात रहे :
दुख-दर्द दूरि भय छोट-मोट

कोहराम मचा पूरे घर मा…
बाढ़ के सामने मनई टिक नाहीं पावा। ऊ गाँव छोड़य क मजबूर होइगा। गाँव से कहूँ बहिरे बसै-जियै कै ठीहा मिलब रचनाकार के ताई बिन माँगे मिली मुराद हय, तब्बो गाँव छोड़य कय कसक बहुत कसकी बाय : लागै कि देश-निकाला हन / सोची,रोई मन ही मन मा! : संपादक 
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  • लागि कटान, कुल बहि बिलान -२

यक तौ कटान दुसरे बहिया
ऊपर से पानी झमा झम्म
घर गाँव बिलाय गवा जड़ से
आफ़त नाचै छम छमा छम्म
‘पाहीमाफी’ छितराय गवा
पूरब बगिया मा आय गवा
जेकरे जमीन यक्कौ धुर ना
ऊ गाँव छोड़ि बिलगाय गवा
पांड़े बोले मड़ई धइ ल्या
नीबी के बगल जमीनी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सरजू मा जब घर-गाँव कटा
कटि कै बहि गै नरिया-खपड़ा
बखरी-कुरिया कै भेद मिटा
सबके टाटी सबके छपरा
देखै मा सब यक्कै घाटे
पर जाति कै बीज रहै बिखरा
जब बाढ़ आय तब काव करैं
गंधाउर पानी रहै भरा
पानी रस्ता, रस्ता म पानी
बाहर पानी, पानी घर मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

ईंटा – खपड़ा – नरिया – लकड़ी
बड़वरकन के बड़की बखरी
बरियान रहे जे गुमान करैं
लइकै भागैं बटुला-बटुली
जे चलत रहीं अइंठी-अइंठी
लरिका दुपकाय रहीं बइठी
छोटवरकै खीस निपोर दियें
जब कहैं कि ना आवा अइसी
उकडूँ बइठी नइकी दुलहिन
किस्मत कां कोसै घूँघुट मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

नित-क्रिया कै कठिन समिस्या,
सब पानी मा सुबहोशाम करैं
सरियारिग लरिके चला जायँ
पेड़े ऊपर मैदान करैं
छपरा कै लकड़ी खींच-खाँच
माई ईंधन चीरैं- फारैं
पटरा बिछाय खटिया उप्पर
ईंटा धइ कै चूल्हा बारैं
पानी लावै कां कहाँ जाय
जब कुआँ डुबा हो बाढ़ी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

दइ कै थपकी सन्हें सोवाय
कहूं भीतर- बाहर गयीं चली
दुधमुहीं बिटियवा दूबे कै
खटिया के नीचे डूब मरी
अइसै यक दिन हमारौ बिटिया
पानी मा झम्म से लुढ़ुक गयी
सुनतै अवाज़ मलकिन दौरीं
देखिन कि खटिया खाली पड़ी
जुरतै कइसौ बस पकरि लिहिन
वै टोय-टाय कै पानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बैठा खटिया पै पड़ा रहै
नीचे से पानी भरा रहै
बुनियाय लगै, लइकै कथरी
कहूं देख सुभीता खड़ा रहै
नीचे से ईंटा लगत जाय
खटिया कै पावा उठत जाय
कथरी-गुदरी कुलि भीजि जाय
कहुं यक्कौ ईंटा खिसक जाय
यक दिन भहराय पड़े ‘दादा’
सोवत कै आधी राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

पानी घटि गय जब बहिया कै
चिपचिपा नमी बाहर – भित्तर
सूखै जइसै तनिकौ कीचड़
पानी बरसै वकरे उप्पर
सर्दी-खाँसी तौ आम बात
जूड़ी – बोखार कै ताप बढ़ा
घर-घर मा लोग बेमार मिलैं
खटिया लइकै सब रहैं पड़ा
कुछ घूमैं झोरा-छाप डाक्टर
लिहें दवाई झोरा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

अब काव कही केतना गाई
खोपरी फोरिबा हमारी ताईं ?
बाढ़ी से बरपा कहर रहै
टी० बी० जोरान, खांसै माई
बिखरा-बिखरा साजो-समान
मुँहफटा चिढ़ावै आनबान
माई कै खाँसी जोर किहिस
खंसतै-खाँसत निकरा परान
दुःख-दर्द दूरि भय छोट-मोट
कोहराम मचा पूरे घर मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जिनके धन-दौलत ना खेत
वै का जानैं देश-विदेश
गाँव-गाँव मा करैं मजूरी
वनकै तौ गाँवै ‘परदेश’
धरती माई बनिन विमाता
फेर लिहिन मुँह ‘भारत माता’
नदी म कटि गै ठौर-ठिकान
टूटा जनम-भूमि से नाता
भागैं जेस पलिहर कै बानर
माझा मा केऊ डाड़े मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

घाटे पै यक दिन खड़े-खड़े
‘भैरव पंडित जी’ बोल पड़े
कपड़ा तू धोवत हया आज
कब्बहुँ ई सब कुछ याद पड़े
यक काम करा तू चला जाव
यहि गाँव म काव धरा बाटै
मड़ई धइ लिया अमोढ़ा मा
थोरै जमीन हमरे बाटै
बिलगाय गये तोहरे गंहकी
नाहीं कुछ खेती-बारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

हमरे मन मा जो बात रहा
ऊ ‘भैरव पंडित’ छीन लिहिन
बिन मांगे मिली मुराद हमें
हमकां वै आशीर्वाद दिहिन
छपरा उजारि कै बान्ह लिहन
यक ठू लढ़िया पै लाद लिहन
लादे गुबार खट्टा- मीठा
हम गाँव छोड़ि कै चला गयन
लागै कि देश-निकाला हन
सोची,रोई मन ही मन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

तू कहत हया कि बहुत कहेन
लेकिन बहुतै छूटा बाटै
जेतना सपरा सब कहे हई
यतना ही कहा बहुत बाटै
का खाली-खाली नीक कही
औ सबके मन कै बात कही
दुःख-दर्द सभी केव् मनई कै
यक ठू किताब मा छाप कही
ई पढ़ा किताब, विचार करा
सोचा अपने भीतर मन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा.

— आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [२०] : लागि कटान, कुल बहि बिलान -१

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग१३-वाँ भाग १४-वाँ भाग , १५-वाँ भाग१६-वाँ भाग , १७-वाँ भाग , १८-वाँ भाग , १९-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई २०-वाँ भाग :

Gopalganj_flood_1502984559पाहीमाफी गाँव मा बाढ़ि आइ गय हय। पूरा गाँव छर-छर कटान मा कटत-कटत सरजू नदी मा बिलोपि उठा। सरजू माई गाँव लील लिहिन। सब कुछ उछिन्न होइगा :
उच्छिन्न होइ गय पूरा गाँव
ओन्नइस सौ इक्यासी मा!
आशाराम जागरथ बाढ़ कय पूरा विवरन यहि तिना करत अहयँ कि आपौ क वहिकै नजदीकी अहसास हुवय लागे। आहिस्ता-आहिस्ता नदी बाढ़ति जाति अहै। यहि बाति कय घर वालेन मा, गाँव मा, चरिचा हुअति अहय। कवि तब लरिकईं मा अहय। ऊ राति के सोइ जाहीं पावत। ओहकै बालमन ह्वईं अनिस्ट के आसंका मा उलझा रहत हय :
जल्दी न औंघाई आवै
सोची दूर तक राती मा.
गौर करय वाली बाति हय कि जब खोपड़ी पै जल-ताण्डव मचा अहय, तब्बौ जाति व्यवस्था, भेद व्यवस्था, आपन असर देखाये अहय। बावजूद कि ‘न ऊंचनीच न भेदभाव / सबकै घर कटै कटानी मा.’! जहाँ एक तरफ़ बाढ़ कै भुक्तभोगी अंसुवान बिलखत अहय, ह्वईं सवर्न दंभ मौजिउ लियत अहय। : संपादक
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  • लागि कटान, कुल बहि बिलान -१

बरखा कै मौसम जब आवै
काटै नदिया काटत आवै
जेस कउनौ अजगर बहुत बड़ा
मुंह बाय-बाय लीलत जावै
सीवान कटा, मैदान कटा
खेती – बारी, खरिहान कटा
दक्खिन-पुरवा, कुटिया कटि गै
लरिकइयां कै अरमान कटा
घर-गाँव समाकुल बचा बाय
दिन बीतै यही तसल्ली मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लोगै मिलि गउवाई गावैं
आपस मा बोलैं आवं-बावं
जउने मेली बाटै कटान
अगले साली न बचे गाँव
राती मा जुगुनी जुगुर-जुगुर
ताखा मा ढेबरी लुपुर-लुपुर
हम रहेन छोट कै बात सुनी
जिउ बाहर-भीतर धुकुर-पुकुर
जल्दी ना औंघाई आवै
सोची दूरी तक राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

गाँव के गोंइंड़े सरजू माई
करैं तांडव, बनी कसाई
चुप्पे- चुप्पे, कल्ले-कल्ले
काटत आवैं वै हरजाई
हर-हर-हर-हर बोलै धारा
झम-झमाझम गिरै करारा
जनम-भूमि कै नावं-निशान
कटि गय, बहि गय, मिटि गय सारा
उच्छिन्न होय गय पूरा गाँव
वन्नइस सौ यक्क्यासी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

दक्खिन कै टोला कटै लागि
लागै रणभेरी बजै लागि
खुब उमड़-घुमड़ काटै नदिया
धारा मा जइसै धार लागि
दुश्मन कै सेना बढ़त जाय
जंगल-ज़मीन सब कटत जाय
घर-गाँव, खेत-खरिहान कुलै
देखतै ही देखत मिटत जाय
केव काव करै औ कहाँ जाय
सूझै ना अफरा-तफरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

घर पुश्तैनी नदिया काटै
कुलि देखि-देखि छाती फाटै
सनपाता सब भागैं -बिड़रैं
केऊ न केहू कै दुःख बांटै
वीपत मूड़े भीजै सबके
उजड़त घर दूरै से ताकैं
वै बान्हि करेजे पै तावा
बरतन-कुरतन लइकै भागैं
न ऊँच-नीच ना भेदभाव
सबकै घर कटै कटानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

अनजानी जगहीं गड़ा रहा
चाँदी कै रुपिया खखरा मा
वै बनिया धनी पुरान रहे
रोवैं, हेरैं, खोदैं घर मा
दीवार गिरी जब आँगन कै
खखरा देखान दौरे पकरै
करिह्याँव छाँन्हि छोटका लरिका
घिसिरावत दूर जकड़ लइगै
तू जान दिहे से का पइबा
हम बहुत कमाबै जिनगी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

खुब कटै कटान करार गिरै
घर आँगन कै दीवार गिरै
लागै कि चिउंटी के बिल मा
फरूहा – कुदार कै वार चलै
टोला कै टोला उजड़ गवा
दस-बीस बोझ मा सिमिट गवा
कोरौ औ बाँस, थाम-थून्ही
कुछ हाथ लगा, कुछ छूट गवा
पहुँची पिछवारे बा नदिया
दादा गोहराये राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

संकट कै बादर सिर उप्पर
मन मा हमरे चिंता दूसर
हम नावं लिखावै इंटर मा
कुलि छोड़ि-छाड़ भागेन पैदर
फिर वाल्मीकि इंटर कॉलेज से
नाना के घर चला गयन
कुलि हाल बतायन नानी कां
वहीँ रात भये पै ठहरि गयन
कुछ लोगन कां लइकै साथे
उठि कै चल दिहन भोरहरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सोचै, मूड़े कै नस फाटै
रस्ता नाहीं काटे काटै
घर कइसै कही कि पहुँच गयन
देखी थै घर नाहीं बाटै
माई चिल्लाय लगीं देखतै
आंसू पै आंसू बहा जाय
‘नीबी के नीचे, बगिया मा
उजरा घर आपन धरा बाय’
कापी-किताब, बस्ता तोहार
वहिं भरा धरा बा बोरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

केतनौ हम बहि-बिलान बाटेन
तब्बौ सूदे नाहीं पइहैं
जब पेट बरै लागी कसिकै
मिनकत अइहैं मूड़े चुरिहैं
मूई हाथी नौ लाख बिकै
पैलगी बहुत सम्मान बाय
बनि जाब पुजारी मंदिर कै
घर कथा सुनाइब जाय-जाय
भागा – बिड़रा जे जात हये
फिर लउट कै अइहैं गाँवैं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

निहचिंते ससुरा बइठा बा
औ’ कहत बा गाँव भले कटिगै
घर कवन खजाना गड़ा रहा
रोना रोई जेका लइकै
बौरान हये मनई – तनई
कउनौ कामे ना आवअ थैं
बिखरा समान सब परा बाय
कुलि देखि मुसुक्की मारअ थैं
तूहूँ बेघर हमहूँ बेघर
बोलअ थैं बोली आड़े मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [१९] : मजूरी नाहीं, हींसा – २

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग१३-वाँ भाग १४-वाँ भाग , १५-वाँ भाग१६-वाँ भाग , १७-वाँ भाग , १८-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १९-वाँ भाग :

Indian woman drawing water from one of several shallow wells in village - October 1962कुछ बात ‘मजूरी नाहीं, हींसा-१’ के संपादकीय मा कहि चुका हन्‌। दुहराउब ना। चारि आना के बदले बारह आना मजूरी क पावै के ताईं जौन संघर्ष सुरू भा ऊ हियाँ अंतिम छंद तक ठकुराने से आपन हिस्सा मांगै के रूप मा खतम हुअत हय। ई हिस्सा कै मांगि सपने मा देखी गय हय। वास्तविकता मा नाहीं घटी। लेकिन चाहत यही कय हय। ठकुराने कय हारौ सपनेन मा हुअत हय। आगे जौन-जौन सामाजिक उलटफेर भा, वहिमन यहि सपने कय, थोरै बहुत सही, पूर हुअब देखा जाय सकत हय। लड़ाई आसान तौ अहय नाहीं, थोरौ पुराब थोर नाहीं अहय। एक बात बढ़िया उठायी गय हय — आंदोलन मा दगा दियय वाले लोगन कय जिक्र। गँवई मजूर आंदोलन के नेता कय भाय बिभीसन कय भूमिका खेलि गा। जबर ताकतै अस बिभीसनन के जरिये अपन काम ख़ूब सिद्ध करति हयँ। यहि जरूरी गँवईं सच का समझय के ताई ई भाग पढ़ा जाय। अऊर जादा जुड़य के ताईं मजूरी नाहीं, हींसा-१’ देखा जाय सकत हय। : संपादक
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  • मजूरी नाहीं, हींसा – २

सूद-अछूत औ’ मुसलमान
छुटजतियन मा छोटे किसान
जमिदारी के चाकी बीचे
गोहूँ साथे घुन हूँ पिसान
मूड़े साफा लाठी कान्हें
गोलियाय उठे अपुवैं पाठे
कुछ भाग बहानेबाज गये
कुछ दगाबाज, दुश्मन साथे
कुछ यहर रहैं कुछ वहर रहैं
कुछ यहरी मा ना वहरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

अकिल कै आन्हर गाँठ कै पूर
सग्गै भाय बिभीसन गूढ़
चकमा चकाचौंध चम-चम-चम
मियाँ कै जूती मियाँ क् मूड़
खुब ढूढ़ लियौ पत्ता-पत्ता
गोलियान मजूरेन कै छत्ता
धुइंहर कइकै घर फूँक दियौ
जरि जायँ मरैं सब अलबत्ता
ना, खबरदार ! अइसन नाहीं
फटकारिस बुढ़वा बीचे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

छाँटत हौ सभै कबोधन मिलि
सौ कै सीधी हम बात करी
सच सोरह आना का बोली
मुल पौने सोरह खरी-खरी
अगुवान बना बड़का नेता
मिलि गेंछिकै पकरि लियौ नोटा
यक्कै कां धुनुक दियौ गतिकै
बाकी तौ बिन पेंदी लोटा
ठकुरई मार मारौ अइसन
सुनि परै आदि-औलादी कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

काहे अकड़ा अइंठा-गोइंठा
घिर्राय खटोला पै बइठा
पच्छू से सूरज उगा आजु
गुलरी कै फूल भयौ ‘नेता’
बइठे तो करर कर्र पाटी
फुसफुस बतुवात रहे साथी
चारिउ वोरी से घेरि लिहिस
ठकुरेन कै झुंड लिहे लाठी
‘नेता’ भागैं तौ कहाँ जायँ
घुसि गये लुकाय कोठरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भै गिध-गोहार हल्ला-गुल्ला
बल्लम फरसा छूरी-छूरा
छपरा पै लाठी घपर-घपर
हूलयं पल्ला हूरै-हूरा
हीलै-डोलै किल्ली खटखट
जब-तब बाहर झाँकै लकझक
चिल्लाय टेंगारी ‘नेता’ कै
घुसि आओ ताजा खून पियब
सब कहैं कि फूँक दियौ छपरा
मुल गोड़ हलै ना भितरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कउनौ खानी आये हत्थे
बहु घंटन बाद मसक्कत के
घिर्राय कै भूईं मारैं सब
लाठिन-लाठी लातै-लाते
कुनबा परोस छित्तर-बित्तर
दूरै से बस हुम्मी-हुम्मा
चिल्लायं डेरान गेदहरे कुलि
फेंकुरै मेहरी फेंकै गुम्मा
खाली यक मुसलमान साथी
कूदा लठ लइकै बीचे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

दूनौं कां मारि वलार दिहिन
अधमरा जानिकै छोड़ दिहिन
नेता कै भाय भिभीषण जब
दुई गोड़ पकरि कै छानि लिहिस
हाय रे ददई ! हाय रे मइया !
अइसन नाहीं जानेन दइया
मुंह काव देखाइब दुनिया कां
मरि गये कहूँ बड़के भइया
बुद्धी भरभस्ट रहा माथे
अपजस कलंक जिनगानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चिरई-चुंगा चौवा-चांगर
चौकन्ना कान दिवार खड़ी
कूकुर बिलार कूँ-कूँ माऊं
पुरबी बयार चहुँवोर बही
सग भाय भिभीसन भेदी कै
जब खुली आँख चिल्लाय बहुत
चिरई चुग गै सगरौ खेतवा
ऊ मलै हाथ पछिताय बहुत
पूरे जवार अललाय खबर
कुछ-कुछ हरकत भै थान्हें मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जोगियै जोगी मुल मठ उजाड़
सोहै नाहीं यक्कौ सिंगार
मानौ जबरी घरहिम् लूटी
मुड़ियाये मूड़ी चलै रांड़
सन्नाटा सायँ-सायँ टोलिया
भौकाल्यू बोलैं ना बोलिया
आखिर दम साथ देवइयौ अब
बगली से नाप लियैं कोलिया
बरसात महिन्ना झमाझम
आगी बुताय ना पानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कहँरे नेता मिनके कांखे
हमकां ना जाय दिह्यौ थान्हें
झाकै न जात-बिरादर क्यौ
बड़का सग्गै सब बेगाने
जब नात-बाँत सबका टोयन
तब पलिहर मा मूजा बोयन
अइसनै नाहिं कहकुत बाटै
जिउ-जान जरे आंखी देखेन
लधिकै खटिया कउनौ खानी
नेता उखुड़ी के खेते मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जुग्गातन घर नाहीं आवा
लापता ‘बहदुरा’ सुनि पावा
थान्हें कै ‘मोस्ट वांटेड’ ऊ
अन्हियारी राती मा आवा
माई रे ! हमका जाई दियौ
मेहरारू नइहर पठय दियौ
समझौ यक ठू बेटवा नाहीं
माथे पै कप्फन बान्हि दियौ
दुस्मने कां कोसै सात पुस्त
सुमिरै महतारी देवतन कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

अन्हराय जायँ कोढ़ियाय जायँ
हइजा पकरै निकरै खटिया
पानी बिन घटका लागि रहै
कीयाँ परि जायँ मरत बेरिया
लकवा मारै मुहँ टेढ़ हुवै
माँगे जल्दी ना मउत मिलै
भगवान भगवती माई हो !
कइ द्या उच्छिन्न बंस कुल कै
हम टूटत बहुत सरापत हन्
जिउ जरे डाह भारी मन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

अइंचा-ताना कोढ़ी–काना
ठट्ठा ठहाका ठकुरहना
अब दियौ बढ़ाय मजूरी सब
चार आना से बारह आना
बाचैं, परधान येक पाती
बागी तुहरे सबकी जाती
परनाम करै जल्दी अइबै
अबहीं हम आज जात बाटी
बौरान ‘बहदुरा’ बमकत बा
बनरे यस घुड़की पाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बहिनी ! कलिहां सपने म् देखेन
मरदेन कै रहै लहास परी
कौववै काँव कौं काँव करैं
गिद्धै ही गिद्ध उड़ैं बखरी
सूदै मिलि ढोल बजावअ थैं
चढ़िकै लहास पै नाचअ थैं
कोठरी करियाय लरिकवन कां
मेहरारुन कां पलझावअ थैं
बोलैं, ‘ठकुराइन मान जाव
हींसा अब खेती-बारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [१८] : मजूरी नाहीं, हींसा – १

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग१३-वाँ भाग १४-वाँ भाग , १५-वाँ भाग१६-वाँ भाग , १७-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १८-वाँ भाग :

Village_Life_in_India रचना मा, सोसित वर्ग सोसन कय विरोध करै — ई बड़ी बात तौ हयिन हय, मुला ओहसे बड़ी बात हय कि ई विरोध अपने पूरे पेंच के साथे जहिराय। ई नाहीं कि यक सरलीकरन मा तमतमाय के चीजन का देखाय दीन जाय। यक उदाहरन दीन चाहित हय। अगर केहू देखे हुवय तौ यक फिलिम अहय — हजारों ख्वाहिशें ऐसी। सुधीर मिसिर के निर्देसन मा आयी। यहि फिलिम मा यक जगहीं मजूरन-सोसितन कय विरोध देखावा गा अहय। मुला साथेन यक कमाल कय चीज पकरी गय अहय। ऊ ई कि जब ठाकुर देखत हीं कि अब उनकय विरोध कीन जाये, तौ वइ बेहोस हुवय कय नाटक करय लागत हीं। हियाँ सगरौ ट्‌विस्ट अहय। अब जौन लोगय विरोध करत रहे, वइ लोगय विरोध करब छोड़ि के ठाकुर के सेहत कय चिन्ता करय कागत हयँ। ठाकुर का खटिया पै लेटाय के इलाज के ताई लयि जात हयँ। मतलब ई कि विरोध कय हर सकल, हर कोसिस, सोसकन के धूर्त मंसूबन कय सिकार होइ जात हय। ई जटिलता तौ देखात हय, हर विरोध के लहर के साथे। पाहीमाफी केरी गाँवगाथा मा मजूरन के विरोध कय आवाज, यहितरह से, पहिली दायँ आवति अहय। मजूरी नाहीं, हींसा — के रूप मा। अबही कुछ हिस्सा अगली पोस्टन मा आये। देखेक होये। ई यक बहुत बढ़िया परसंग उठावा गा हय। यहिसे पाहीमाफी कय गतिसील जीवन कय झांकी अपने हकीकत के साथे हाजिर होये। मुला, पाठक खुदै नियाव करयँ कि ऊ जटिलता, या द्वंद्वात्मकता, या ‘टाइलेक्टिक्स’, या ‘क्रिटिक’, पाहीमाफी के यहि प्रसंग मा देखात अहय?/! यहिमा दुइ राय नाहीं कि ई बहुत खास स्थल साबित होये, यहि ग्रामगाथा कय। : संपादक

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  • मजूरी नाहीं, हींसा – १ 

गोहरायन मुला जुहाते नाहीं
फूटी आँख सुहाते नाहीं
सूदै बहुत मोटान हये यक
दाईं कहे वोनाते नाहीं
खर येक वोर से जाम बाय
बीचे-बीचे मा धान बाय
बोलअ थैं खुदै निराय लियौ
हमकां नाहीं पहुँचान बाय
मूड़े पै चढ़ा चला आवत
बाटे कुलि मूर-मुरौवत मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जमिदारी गये भवा कै दिन
लागत बा आइ गवा दुरदिन
आजा-बाबा से चलि आवा
आसामी काम करैं सब दिन
लावा कुदार जोन्हरी गोड़ी
सुनि लेबै जे केऊ बोलिहैं
जे देखै हँसी उड़ावै खुब
बड़मनई खेत खुदै जोतिहैं
गोड़त-गोड़त गोड़वै कटिगै
कुलि गति होइगै यक कोहा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

झूठी नाहीं टूटी-फूटी
बतिया मोरी सच्ची-मुच्ची
मेहनत कै काम करैं कइसै
पूरे जवार बोलै तूती
झारत बाटे माटी-कूटी
टाँगे धोती – कुरता खूंटी
देहीं कै मइल पसीने से
बोली संग्हरी अब्बै छूटी
हमरे सबकै बढ़िया निबाह
मेहनतकस मनई-तनई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पसियाना अउर चमरटोलिया
छोटजतिया कुल जोरे गंठिया
मिलि कहैं बढ़ाय मजूरी द्या
यक रुपिया उप्पर दुपहरिया
घाऊँ-माऊं चौं-चौं- चाई
चार आना हमकां ना चाही
जे टूका से संतोष करी
पूरी रोटी कइसै पाई
मरि जाबै खाय बिना चाहे
अबकी फइसिला यही दम मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

दक्खिन टोलिया बोली-ताना
भुन भुनभुनाय भुन पसियाना
करिहैं ना काम कहाँ जइहैं
चुन चुनचुनाय चुन ठकुराना
घर से निकरब भारू होइगै
बाहर-भित्तर मेहरारुन कै
चउवा-चांगर अब कहाँ जायं
सीवान-खेत कुलि ठाकुर कै
फेंचकुरी छगड़िया मिनमिनाय
घेंटा घें-घें-घें बाड़ा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

मरि जात्यौ सभै खाइ माहुर
उल्टा-पुल्टा लटक्यौ गादुर
बोले टेटियाय ‘बहदुरा’ से
मोछी पै ताव दिहे ठाकुर
करिबौ ना काम काव खाबौ
ई गाँव छोड़ि कहवाँ जाबौ
काहे बौरान मतान हयौ
समझाये बिना मान जात्यौ
मिलि बैर किहौ घड़ियाले से
मानौ रहिबौ ना पानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

मनबढ़ा ‘बहादुर’ बरबराय
समझै ना बात सुनै यक्कौ
बिन रुके बढ़त गै चलत-चलत
ताकै, डेराय नाहीं तन्चौ
ज्यौं चिढ़ी ठकुरई ठाकुर कै
नेकुना रहि-रहि फूलै-पचकै
दउराय कै गटई पकरि लिहिन
घमकाइन मुक्का पीठी पै
भन्नान ‘बहदुरा’ चढ़ि बइठा
दुहराइस सोंटा गोड़े मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बाबू साहेब लंगड़ात फिरैं
केसे वै कइसै काव कहैं
सूदे से खाये मार रहे
पीरा कइसै बरदास करैं
पटिदारी कै मुच्छड़ काका
बोले तनिकी यहरी ताका
पुरखन कै नावं डुबाय दिहौ
बड़का जमिदार बना बाट्या
मरि जात्या डूबिकै बाप-पूत
भरिकै चुल्लू भै पानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

यक्कै थैली कै खान-दान
अपसै मा ना झगरौ जवान
इरखा दुसमनी कां समझावै
खतरे मा बाटै आन-बान
सन्हें-सन्हें, काने-काने
गोलबंदी होइगै ठकुरहने
मौके मूड़ी कुचला ना गै
चुकिहै ना पाछे पछिताने
मुंह बान्हें मिलौ-जुलौ सबसे
बतिया ना पहुँचै थाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लुप लुपुर-लुपुर दीया-बाती
नाचै कपार साढ़े साती
बइठका मां सबकां समझावैं
नब्बे साली बेवा आजी
वनहूँ सबके लरिके-बच्चे
वनहूँ के पेटे भूख बाय
आसामी दादा-बाबा कै
हमरे हिल्ले उम्मीद बाय
छिन जाई नाहीं राज-पाट
‘दुपहरिया’ येक रुपल्ली मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बोले ‘मुंहबोले’ मिन्न-मिन्न
उठिकै भागे तिनमिन-तिनमिन
घर-आँगन कै सासन देखौ
मरदेन के बीचे बोलौ जिन
यक रुपिया माँग मजूरेन कै
सीधे जौ मान लियब वनकै
चढ़ि लेइहैं मनबढ़ मूड़े पै
रहिहैं कुलि खड़ा रोज तनकै
रिरियाने खुला खजाना बा
गुर्राने फूटी कौड़ी ना
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जोरा – जोरी, सीना – जोरी
चिट भी मोरी पट भी मोरी
सूदन के मुंह अब के लागै
बेवजह करै तोरी – मोरी
जौ बीचे मा परबतिया जौ
धाने जइसन डउंरा – डउंसी
बस तड़े रहौ पहिचान करौ
लंका ढाहे घर कै भेदी
काली थान्हें पूजैं मजूर
हमरे सब पूजब थान्हें मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भिनसरवैं से छिनरी-बुजरी
‘नेता’ से खूब लड़ै मेहरी
घर-बार बहारै बरबराय
निहुरे-निहुरे लइकै कुचरी
सबकै संती दुसमनी लिहेव
अगुवान हयौ नाहीं सोचेव
मुरदेन कै फउज जुहाये हौ
कामे नाहीं अइहैं यक्कौ
ठकुराइन तुहैं बोलाइन हैं
बेजा नाहीं बा माफी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बहिन के घर मा भाई कूकुर
ससुरे घरे जमाई कूकुर
मूँछ रखाये कवन नफा जब
पूँछ हिलावै बनिकै कूकुर
सुनिकै अकच्च ताना-बोली
छगड़ी-बकरी जनता भोली
आपन तौ बीत-बिताय गवा
हम ना बोलब तौ के बोली
जिन्नगी नरक वइसनै बाय
मरि जाबै पर-उपकारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]