पाहीमाफी [७] : परदेसी कै चिट्ठी-पाती

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग”  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई ७-वाँ भाग:

‘पाहीमाफी’ अब काफी उठान पै आइगा बाय। जे रचना से लगातार जुड़ा होइहैँ ते जानत होइहैं कि जौन हियाँ अहै ऊ अन्तै नाहीं। कयिउ उत्साह बढ़ावै वाली टिप्पनिउ मिलति अहयँ। आज हम ऐसनै यक टीप का हियाँ रखित अही, जेहिमा पाहीमाफी के रचनात्मक खूबी का हिगारा गा अहय:
capture-20170319-125648         “बहुतै गंभीर विवेचना क माँग करत है आशाराम जागरथ जी कै इ छोटी सी कविता। ई बतावत है कि ऊँच-नीच, भेद-भाव अउर छुआछूत के जवन धारा हमरे सब के निजी जीवन औ संस्कृति के करिखा अउर जहरीली कीचड़ से बोरत हजारन साल से बहत जात बा, ओकर अंत करै के समय नजदीक आवत बा। एतना गनीमत रहे प्रकृति के कि जेकरे कपड़ा-लत्ता , घर-दुआर के बोरत ई गंदगी के धारा बहावे क जतन किहा गा ओकर कपड़ा गंदा होइ गा मुदा ओकर हृदय बिलकुल साफ सोना एस रहि गा, अउर जे आपन कपड़ा साफ चमाचम राखे खातिर गंदगी दुसरे के तरफ बहाएस ओकर हृदय गंदगी अवर बदबू के घर होइ गा। पाहीमाफी के ई सब कविता कुसुम ओही कीचड़ आ गंदगी के दर्द के बयान हौ। अउर एहि बात के सबूत हौ कि कल जब नये भारत के निर्माण में एही कीचड़ वाले हाथ जुटिहैं तो जौने कुसुम के सुगंध से दिशा दिशा महकी ऊ गंध अब से पहले केहू के नसीब ना रही। जागरथ जी के बहुत बहुत बधाई कि आपन गांव अउर गांव के खुशबू अपने भीतर जिआये हएन।” (टीप-कार : ओमप्रकाश मिश्र

आज जवन अंक हियाँ रखा जात अहय वहिमा रचनाकार अपने चिट्ठी-लिखायी कय अनुभव बाँटे अहय। चिट्ठी के माध्यम से भीतरखाने कय ऊ सच आवा अहय जेहका बहुत कमै देखा गा अहय। रचनाकार कय निजी अनुभव हुवय के कारन बात बहुत पते पै बैठत चली गय हय। ई समझौ कि चिट्ठी लिखी गय है आपके दिलो-दिमाग मा सनेस पहुँचेक्‌ ताईं। : संपादक 
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  • परदेसी कै चिट्ठी-पाती

काहे गुलरी कै फूल भया
लागत बा रस्ता भूलि गया
बहुतै दिन बाद भेटान्या है
का हो काका ! तू भले हया
बोले, कुलि हाल ठीक बाटै
बचि गयन बेमारी से ज़िंदा
अपने घर सुखी हईं बिटियै
यकठू बेटवा कै बा चिंता
सोचिअ थै अबकी पठय देई
कुछ जाय कमाय बम्बई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

परदेसी परदेस कमायं
लौटैं गाँव बघारैं सान
लाल अँगोछा मूड़े बान्हें
लिहें रेडियो अइठें कान
नई साइकिल, लाल रुमाल
दांत मा सोना, मुँह मा पान 
बम्बहिया लाठी कान्हें पै
विरहा गावैं टेरे तान
तहमद-बंडी पहिर कै घूमैं
चमकै घड़ी कलाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कच्छा तीनै मा पढ़त रहेन
कागज़–पाती सब बचवावैं
पाई न पकरि कलम ढंग से
तब्बौ सब चिट्ठी लिखिवावैं
मुल काव करैं वनहीं सबहीं
पढ़वइया गाँव मा कमै रहे
जे रहा तनी बड़वरकन मा
छोटवरकै जात डेरात रहे
घर आवैं मेल-मेल मनई
भिनसारे–संझा–राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

खत लिखा सिरी उपमा जोगे
कि हियाँ पै सब कुछ कुसल बाय
ईस्सर से नेक मनाई थै
वंहकै नीकै उम्मीद बाय
आगे कै हो मालूम हाल
कातिक मा करिया जात हये
वनके हाथे कुछ सर-समान
पइसा–कौड़ी बाटी पठये
पंहुचिहैं तौ जाय कै लइ आयू
वकरे ना रह्यू भरोसे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

करिया-करिया धगरिन काकी
पहुँचीं लइकै यक पोसकाड
बेटवा कमात बा डिल्ली मा
थोरै मा लिखि द्‌या हाल-चाल
बिचकावत मुंह वै देखि लिहिन 
बोलिन अच्छा हम जाई थै
तू पढ़ा–लिखा बाट्या बचवा !
तब्बै चिट्ठी लिखिवाई थै
हम कहेन बिहान इतवार हुवै
निस्चिंते आयू छुट्टी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चिट्ठी लिखवावै यस बइठिन
झौवा भै गऊवाई गावैं
आंसू पै आंसू बहा जाय
बोलत–बोलत रोवै लागैं
“हाँड़ी–गगरी ठन-ठन गोपाल
अपुवां कामे नाहीं जाते
पंडित कै लरिका मारे बा
घर हीं लंगड़ात चलत बाटे
कुछ पइसा जल्दी भेजि दिहा
यक्कै धोती बा देहीं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जूड़ी बोखार हमरे बाटै
लिखि द्‌या बाकी ठीकै बाटै
भैं’सिया बियानी बा पड़िया
गइया बिकात नाहीं बाटै
सुरसतिया सरियारिग होइ गै
कसि मा नाहीं बाटै हमरे
अब वोकर गवन जरूरी बा
निबकावै क् बा निबरे-पतरे
समधी अबकी मागैं अइहैं
तौ मान जाब हम अगहन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पकरे हाथे अन्तरदेसी
मुस्की मारैं नइकी भउजी
चुप्पे अइसन पाती लिखि द्‌या
घर भागा आवैं परदेसी
लिखि द्या कि बहुत अगोरी थै
ससुरे मा नाहीं लागै मन
दस दिन कां ताईं आइ जायँ
नाहीं, चलि जाब नइहरे हम
बुढ़ऊ कै मुंह फूला बाटै
मनिआडर पाइन देरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लिखि द्‌या घर कां जब्बै आया
खुब नीक-नीक साड़ी–साया
अन्दर वाली दुइ ठू बंडी
यक लाल लिपिस्टिक लइ आया
सेंनुर औ’ टिकुली ना लइहैं
बस क्रीम-पाउडर लइ अइहैं
महकौवा साबुन यक दरजन
पाये पइहैं तौ लइ अइहैं
यक बहुत खुसी कै बात बाय
लेकिन लिखिबै ना पाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चिट्ठी न केहू कां दिखलाया
ना सास-ससुर कां बतलाया
धइ ल्या किताब के बीचे मा
सीधे डाखाना लइ जाया
वै खड़ी–खड़ी अँगिरायं बहुत
बोलिन अच्छा अब जात हई
चुप्पै बिहान हम दइ जाबै
यक कलम नीक कै धरे हई
माई बोलिन हरजाई बा
ना आया यकरे बाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भउजाई कै गदरान गाल
हथवा-गोड़वा कुल लाल-लाल
बोलैं तौ मुंह से फूल झरै
पायल झनकावत चलैं चाल
चिट्ठी लिखवाइन तब जानेन
अंदरखाने कै बुरा हाल
पहिले खुब छटकत चलत रहीं
अब तौ बिलकुल भीगी बिलार
बैरंग वै पाती लिखवावैं
पइसा नाहीं जब जेबी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

छोटकना पढ़ै नाहीं जातै
बड़कनी सयान हुवत बाटै
गोहूँ सीचै ताईं पइसा
फूटी कौड़ी नाहीं बाटै
घर कै बटवारा भवा बाय
यक ठू पाये बाटी कोठरी
बाटै वोरान रासन-पानी  
कुछ पइसा भेज दियौ जल्दी
बड़कऊ कै नीयत बिगड़ी बाे
वै बहुत सतावत हैं हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लेकिन तू फिकर न किह्यौ कभौं
दहकच्चर-करकच झेल लियब
जिउ-जान से ठान लिहे बाटी
लरिकन ताईं अब जियब-मरब
दीवार फोरि कै रहत हई
कोठरी मा दरवज्जा नाहीं
बस साल-खांड़ दिन काटै क् बा
यहि घर मा अब रहिबै नाहीं
माटी कै भीत उठाइब हम
सरिया के बगल जमीनी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लिखि द्‌या भइया कसि कै लिखि द्‌या
लिखि द्‌या कि जल्दी आइ जांय
अम्मा बीमार अवाची हैं
गटई बोलअ थै सांय-सांय
हम अपने घर लइ आयन हैं
बड़कऊ की वोरी रहत रहीं
अब चला-चली कै बेरा बा
कुच्छै दिन कै मेहमान हईं 
आवा मुंह देखि लिया जीतै
अटका परान बा तूहीं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [६] : तीज-तिउहार (होली)

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग”  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई ६-वाँ भाग:

ई भाग तिउहार क लयिके रचा गा बाय। होरी क लयिके। होरी के सिलसिले मा जे होलियात हय ऊ बहुत कमय सोचत होये कि समाज कय यक हिस्सा हय जौन होरिउ जेस खुसी कय तिउहार नाहीं मनाय सकत। वहिका कब्बौ ई मौका नाहीं मिला कि सबके साथ वहू जिंदगी के रंग मा रँगि सकय। भेदभाव वाली बेवस्था उल्लासौ मा भेदभाव बनाये रहत हय। मतलब पूरी जिंदगी दुख कय, अपमान कय, जिल्लत कय, दूसर नाव बनी रहय। ‘अछूत की होरी’ लिखत के १९३६ मा वंसीधर सुकुल लिखे रहे:

खेत बनिज ना गोरू गैया ना घर दूध न पूत।
मड़ई परी गाँव के बाहर, सब जन कहैं अछूत॥
द्वार कोई झँकइउ ना आवइ।
..हमैं यह होरिउ झुरसावइ। 

हियाँ आसाराम जागरथ विस्तार से ‘भोगे सच’ क रखे अहयँ। कयिसे दूसर जाति वाले खुसी-उल्लास के मौके पै ई महसूस करावत हयँ कि ‘ई तुहुँहा नाहीं चाही।’

पढ़ा जाय ई भाग। साथे बना रहा जाय रचना के। आपनि राइयु बतावा जाय। : संपादक
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  • तीज-तिउहार (होली)

लइकै उपरी-करसी- कंडा
छोटका- बड़का, लोहरी-लरिका
फागुन म बसन्त पञ्चमी के दिन
गाडैं रेंड़, बनावैं होलिका
उखुड़ी औ आमे कै पाती
सरपत-झाँखर- टिलठा-रहँठा
ढोय- ढाय सब ढूह लगावैं
ऊँचा खूब सजावैं होलिका
बाजै ढोलक रोज ढमाढम
गाना गावैं राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

होलिका जरै चाँदनी रात
ऊँची लपटि उठै आकाश
सन्नाटे मा दहकै आग
देहियाँ चुन-चुन लागै आँच
भूज-भाज गोबरे कै छल्ला
गुहि कै, जौ के पेड़ कै बल्ला
सब अपने घर मा लइ आवैं
दरवाजा ऊपर लटकावैं
बोलैं जय होलिका माई कै
फूकैं वन्हैं आगी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कुछ लरिकै, कुछ बूढ़-ज़वान
सबकै सब दिन भै बौरांय
गावैं कबिरा सा-रा-रा-रा
तनिकौ ना झेपैं, सरमांय
जवन-जवन गारी गरियावैं
केउ मेहरारू सहि न पावैं
कबहुं-कबहुं पंडोहे क पानी
कीचड़-गोबर मारि भगावैं
खीस निपोरे, दांत चियारे
हँसैं लोग मन ही मन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जेकरी खेती ऊ बलवान
रहै गाँव कै ऊ धनवान
बाभन-ठाकुर- बनिया के घर
पाकै नीक-नीक पकवान
मेंड़ुवा कै लपसी, गुलबरिया
बनै सोहारी औ दलभरिया
आलू कै पापड़, रसियाव
बरिया अउर फुलौरी-गोझिया
पौनी-परजा खाना पावैं
थरिया भै तिउहारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

घूमि-घूमि नाचैं सब गावैं
बीच म ढोलिहा ढोल बजावैं
चमरौटी कां छोड़ि कै बाकी
घर-घर जाइ कै फगुआ गावैं
वनकै लरिकै घूमैं साथे
पितरी कै पिचकारी हाथेे
हमरे घर ना रंग-अबीर
टीका काव लगावै माथे
माई बोलिन सेंनुर लइ जा
के देखत बा राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

यक साल ‘अबीर’ कै सौक चढ़ा
मांगेन दुई पइसा अइया से
बोलिन जा ! थोरै मांग लिया
बम्बहिया वाले भइया से
हरियर ‘अबीर’ जब पाय गयन
फूटै मन लड्डू अजब-गजब
‘पंडित जी हमैं पढ़ावत हैं
वनकै हम आसिरबाद लियब’
सोचिहैं हमार ई सिस्य हुवै
कम से कम मानअ थै हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पुड़िया मा धरे ‘अबीर’ रहेन
पंडित जी राही मिलिन गये
हम हाथ जोरि पैलगी किहेन
बिन बोले वै आसीस दिहे
जब चलेन अबीर लगावै कां
सोचेन मुराद अब मिलि जाई
झट ‘बाभन-माथा’ झिटिक दिहिन
बोले ‘तुहंका नाहीं चाही’
आपन मुँह लइकै खड़ा रहेन
बहुतै देरी तक राही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पता नहीं कैसे लिखने वाला स्विच फिर से ऑन हो गया : डॉ. प्रदीप शुक्ल

ई पोस्ट हम यहि मकसद से रखित अहन कि ई पता चलय कि यक रचैया कैसे अपनी मातरी भासा से आपन रचनात्मक रिस्ता बनावत हय। केतना उतार-चढ़ाव आवत हय। दुसरी आपाधापी मा ऊ भाखा-माहौल बिसरि जात हय। फिर जब कौनौ गुंजाइस बनत हय तौ फिर रचनात्मक हरेरी आइ जात हय। दुसरी बात कि ई सनद हमयँ यक दस्तावेजी रूप मा देखाइ परी। डाकटर साहब यहिका हियाँ राखय कय इजाजत दिहिन, यहिते आभार! : संपादक
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अवधी हमारि – अवधी हमारि
हमका सबते जादा पियारि
लारिकईयाँ मा वह दुलराइसि
अब कईसे देई हम बिसारि

अवधी मेरी मातृभाषा है पर अवधी को अभी भाषा का दर्जा नहीं मिल सका है. अब अगर अवधी को हिंदी की बोली कहें तो हिंदी मेरी मातृभाषा हुई. भाषा – बोली के झंझट में न पड़ते हुए मैं ईमानदारी से यह कह सकता हूँ कि खड़ी बोली हिंदी में लिखने के लिए मुझे अक्सर अपनी अवधी की पुरानी गठरी खोल कर शब्दों के भावार्थ तलाशने पड़ते हैं.

मेरे जीवन में अवधी साहित्य या यों कहें कि साहित्य की शुरुआत अम्मा, बुआ की गौनई के बाद तुलसी बाबा की रामचरित मानस से ही हुई होगी, ऐसा मेरा अनुमान है. मैं जब 8 बरस का था और तीसरी क्लास में पढता था, मुझे पूरा सुन्दर काण्ड कंठस्थ था. कुछ सालों तक यह उपलब्धि मेरे परिचय का हिस्सा भी रही. बाद के वर्षों में काफी समय तक अपने गांव में ही नहीं अपितु आस पास के गांवों में भी अखंड रामायण ( रामचरित मानस ) के पाठ करने वाली टीम का मैं एक अभिन्न सदस्य हुआ करता था.

हालाँकि मैं 16 बरस की उम्र में गांव से लखनऊ आ गया था पढने के लिए पर यहाँ भी अवधी मेरी सामान्य बोल चाल की भाषा कई बरसों तक बनी रही. कारण था मेरे गांव का शहर के बहुत पास होना. हर शनिवार की शाम साईकिल से गांव आ जाते और सोमवार की सुबह फ़िर लखनऊ. पर धीरे धीरे अवधी बोलचाल की भाषा के रूप में साथ न दे सकी. शहर में अवधी गंवारों की भाषा समझी जाती है. इस पर एक किस्सा याद आता है.

मैं उन दिनों बी एस सी कर रहा था कान्यकुब्ज कॉलेज से. हमारी मित्र मंडली में एक दीक्षित नाम का लड़का हुआ करता था, उसका मूल नाम भूल रहा हूँ. केमिस्ट्री की लैब में कोई सल्यूशन दीक्षित से कॉपी पर गिर गया था. तभी वहाँ विभागाध्यक्ष प्रकट हो गए. देखते ही दीक्षित के मुँह से निकला, ” सर, ढरक गवा रहै ” फिर तो सर ने जो उसकी क्लास लगाईं कि वह आँसुओं से रो दिया. जाहिल, गंवार, बेवकूफ आदि अनेकानेक उपाधियों से नवाजा गया उसे. अब पूरा क्लास दीक्षित को ‘ ढरक गवा ‘ के नाम से बुलाने लग गया. कुछ दिनों बाद उसने कॉलेज आना ही बंद कर दिया.

गीत मुझे बचपन से ही आकर्षित करते रहे हैं. अपनी कक्षा में पाठ्यपुस्तक से कविता याद कर सबसे पहले सुनाने वाला विद्यार्थी निर्विवाद रूप से मैं ही होता था. इसका श्रेय जाता है मेरे नाना जी को. मेरे नाना जी पं सीताराम त्रिपाठी संस्कृत के विद्वान्, श्रीमद् भागवद्गीता के मर्मग्य और अवधी के कवि थे. मेरे जन्म लेने से पहले ही वह इस संसार से चले गए. मैं अपने भाईयों बहनों में अपने आपको सबसे भाग्यशाली मानता हूँ कि उनके डीएनए में लिखी हुई कविता मेरे हिस्से आई.

पं सीताराम त्रिपाठी ने ‘ महाभारत ‘ को अवधी छंदों में लिखा था. उनके दो या तीन खंड ही प्रकाशित हो पाए थे. उसी दौरान उनके बड़े बेटे का देहांत हो जाने के कारण मेरी नानी ने आगे का प्रकाशन रुकवा दिया था. उस हादसे के बाद इस महाकाव्य की चर्चा पर ही प्रतिबन्ध हो गया था मेरे ननिहाल में. बहुत बाद में गठरी में बंधी हुई पांडुलिपियाँ मैंने भी देखीं थीं. अब मेरे पास उनकी कोई भी किताब या पांडुलिपि नहीं है. मैंने बचपन में पिता जी से उनके अनेकों छंद सुने हैं. पिताजी जब भी कभी खाली होते और मौज में होते तो नाना जी के, और बहुत सारे कवियों के छंदों का सस्वर पाठ करते. रामचरित मानस के तो वह विशेषग्य ही हैं. आज भी मानस प्रवचन उनकी दिनचर्या का हिस्सा है.

जीवन में पहली बार की तुकबंदी मुझे अभी भी याद हैं. याद इसलिए है कि फिर अगले तीस – पैंतीस सालों तक और कुछ लिखा ही नहीं. मैं उस समय कक्षा 7 का विद्यार्थी था. बंथरा में मेरे स्कूल से लगा हुआ एक मात्र इंटर कॉलेज ( लाला राम स्वरुप शिक्षा संस्थान इंटर कॉलेज, बंथरा, लखनऊ ) हुआ करता था. हम लोग उसे लाला वाला स्कूल कहते थे. पढ़ाई न होने के लिए कुख्यात इस कॉलेज में एक नए प्रिंसिपल का आगमन हुआ था उन दिनों. पंक्तियाँ देखें –

“लाला स्कूल तो बना है अब धरमसाला
लरिका तौ घुमतै पर मास्टरौ कुर्सी फारति हैं
पान के बीड़ा धरे मुँह मा चबाय रहे
अउरु बईठ होटल मा चाय उड़ावति हैं
आवा है अब यहु नवा नवा प्रिंसपलु
जहिके मारे उई अब बईठे नहीं पावति हैं
खुद तो न पढ़ि पावैं अँगरेजी क्यार पेपरु
जानै अब लरिकन का उई का पढ़ावति हैं.”

ये पंक्तियाँ मैंने 13 वर्ष की उम्र में लिखीं थीं फिर लिखने वाला स्विच ऑफ हो गया. अगले कई दशकों तक लिखने का ख्याल ही दिमाग में नहीं आया. हाँ कविता पढने और सुनने का मौक़ा कभी नहीं छोड़ता था. पिताजी की किताबों में एक मात्र कविता की पुस्तक जो मुझे याद है, रमई काका की ‘ बौछार ‘ थी. उसकी बहुत सारी कवितायेँ मुझे याद थीं और गाहे बगाहे उन्हें सुना कर वाह वाही लूटता था. अभी इधर 2013 के आखिरी महीनों में पता नहीं कैसे लिखने वाला स्विच फिर से ऑन हो गया है और फिर से तुकबंदियों का सिलसिला शुरू हो गया.
__डॉ. प्रदीप शुक्ल 

सम्पर्क:
गंगा चिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल
N. H. – 1, सेक्टर – डी, LDA कॉलोनी, कानपुर रोड, लखनऊ – 226012
मोबाइल – 09415029713
E – Mail – drpradeepkshukla@gmail.com

पाहीमाफी [५] : विद्या-विद्यालय-छूतछात

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग”  , तिसरका भाग , चौथा भाग , के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई ५-वाँ भाग:     16838136_1774772422548857_416297774_n

  • विद्या-विद्यालय-छूतछात

ज्यादा ना गुन गावा साथी
अपने आँखी देखे बाटी
पेड़े-पालव कै जात हुवै पर
मनई मा बस यक्कै जाती
मुला काव कहै अध्यापक कां
स्कूल म जाति कै जड़ खोदैं
ठाकुरे कां वै ‘बावू साहब’
बाभन कां ‘पंडित जी’ बोलैं
सब कहैं ‘मौलवी’ मुसलमान कां
‘मुंशी’ बाकी जाती कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जो जाति-पाँति कै ज़हर रहा
कुलि इस्कूलेन मा भरा रहा
जे पढ़त रहा वोकरे माथे पै
ऊँच-नीच भी लिखा रहा
देखतै हमकां छाती फाटै
तिरछी आँखी रहि-रहि ताकै
‘हमरे बेटवा के बगल बइठ
ई धोबिया सार पढ़त बाटै’
वै तौ कहि कै बस खिसिक लिहिन
यक तीर लाग हमरे दिल मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

देखा यक दिन कि हद होइ गय
कलुवा चमार कै भद पिटि गय
अँजुरी से पानी पियत रहा
यक उंगुरी लोटा मा छुइ गय
कछ्छा दुइ मा ऊ पढ़त रहा
दुनिया-समाज से सिखत रहा
इस्कूले मा हल्ला होइ गय
कि जान-बूझ कै छुवत रहा
झाऊ कै डंडा घपर-घपर-घप
सिच्छा पाइस पीठी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

खुब सुबुक-सुबुक कलुवा रोवै
रहि-रहि मुँह हाथे पोछि लियै
लइकै तख्ती- झोरा-बोरा
पेड़े के नीचे खड़ा रहै
रोवत-सोवत फिर जाग गवा
जइसै कि रस्ता पाय गवा
यक ढेला जोर से पटक दिहिस
औ भूईं थुकि कै भाग गवा
वहि दिन के बाद से ना देखा
वोकाँ कउनौ इसकूले मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जे जहाँ रहा ऊ वहीँ खड़ा
आतंकी लोटा रहा पड़ा
पिपरे कै चैली बीन-चून
सब ढूह लगाइन बहुत बड़ा
खुब नीक आग दहकाय लिहिन
डंडा से लोटा डारि दिहिन
जब लाल-लाल लोटा होइ गय
बाहर निकारि ठंढाय लिहिन
यक बड़ी समिस्या दूर भवा
जंग जीत लिहिन मैदाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

पूछैं सवाल देखैं जब भी
पावैं जवाब वै सही-सही
तब सीधे मुँह बोली बोलैं
केतनौ पढ़बा रहिबा धोबी
जियरा मा सीधै तीर लगै
हम मन मसोस चुप रहि जाई
माई बोलिन यक काम करा
अबसे ना दिहा जवाब सही
नाहीं तौ अइसन नज़र लगी
कि लागी आग पढ़ाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

खेतिहर ठकुरे कै यक लरिका
खुद पढ़ै न पढ़ै दियै हमकां
यक दिन कसि कै झगरा होइ गै
बोलिस बाहर पीटब तुंहकां
समझअ थ्या काव तू अपुवां कां
मुंह लाग्या न हम जाईअ थै
जेतना तोहार औकात बाय
वतनां तौ दारू पी लीअ थै
हम रहेन डेरान घरे आयन
माई समझाइन तब हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कहूँ से आवत रहा करेठा
हमसे बोला कहौ बरेठा
पढ़ि लेबा के कपड़ा धोई
फांदौ ना किस्मत कै रेखा
बोलेन हम बोली बोलत हौ
जो कहत हया ऊहै करिबै
दस बिगहा खेत नावं लिख द्या
आजै से हम नाहीं पढ़िबै
ऊ बोला बहुत चलांक हवा
अंगारा तोहरे बाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

दादा कहैं कि चला घाट पै
बइठा हया बना धमधूसर
तबौ सवेरे करी पढ़ाई
कउनौ काम करी ना दूसर
माई  तब वन्हैं समझावैं
बहुत काम बा वकरे ऊपर
करै द्या वोकां जवन करत बा
गठरी धइ द्या हमरे ऊपर
काम करे के वोकर संती
के जाई  इसकूले मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

तू लिहें किताब खाट तूरा
औ’ काम करैं बूढ़ी-बूढ़ा
खबवा बनि कै तइयार भये
कूँड़ा यस पेट भरा पूरा
पहिरै कां नीक-नीक चाही
काटी उँगरी मुत त्या नाहीं
नोखे मा हया पढ़ैया तू
देहियाँ धुनियात तोर नाहीं
आगम देखात बाटै हमकां
सूअर पलबा तू घारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पँचवां दरजा जब पास किहेन
माई कै चेहरा खिला-खिला
बोलिन मेहनत से खूब पढ़ा
औ गाँव छोड़ि बाहर निकरा
यहि गाँव म काव धरा बाटै
सीधे कै मुँह कूकुर चाटै
खेती ना धन-दौलत-पूँजी
खाली गँहकिन कै मुँह ताकै
पढ़ि-लिखि लेत्या दिन बहुरि जात
उजियार हुअत हमरे कुल मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पढ़वइया नीक रहा साथी
जाती मा नीचे से अछूत
पहिरे फटही जन्घिहा-आगाँ
सथवैं उ जाय रोज इस्कूल
बोला अब कइसै काव करी
गवने आई  बाटीं मेहरी
कच्छा नौ नाहीं पास किहेन
गटई ठेंकुर कै फाँस परी
जिउ कै खंइहस–कपछई बहुत
बाटैं घनघोर गरीबी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

माई तोहार दुलरुवा लरिका
पढ़ी न अबसे लइ ल्या बस्ता
लावा परसा खाना खाई
आज दिमाग बहुत बा खट्टा
कागज़-कलम कां पइसा नाहीं
देहीं ढंग कै कपड़ा नाहीं
बाभन-ठाकुर रहत हैं अइंठे
काव करी घर बइठे-बइठे
जाबै हम परदेश कमाय
आग लगै हरवाही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

माई रोवैं कहि ना पावैं
अपने शकि भै खुब समझावैं
सोचत रहेन कि पढ़ि-लिखि लेबा
जिनगी  नाहीं  होई  रेंगा
बाप कहैं कुछ करै क चाही
कब तक करिबै हम हरवाही
मुन्नी बोलिस भइया जाया
हम्मै ताईं खेलौना लाया
ठौरिग होय कै सोच लिया तू
दुविधा ना पाल्या मन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भिनसारे यक दिन उड़ी हवा
‘तेजू खां’ चुप्पे भाग गवा
मेहरारू घूंघुट मा सुसकै
महतारी बोलै गजब भवा
केव कहै कि लरिका रहा नीक
परदेश चला गै भवा ठीक
पढ़वइया बनत रहे सरऊ
अब जाय क् मागयँ हुवां भीख
केव कहै कहूं न गै होई
गइ होई नाते-बाते मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

अवधी कवि सम्मेलन की रपट (29/1/2017)

विगत रविवार (29-1-2017) को दिल्ली के क्नॊट प्लेस इलाके में अवधी प्रेमियों ने एक कवि सम्मेलन का आयोजन किया। कवि सम्मेलन ‘दिल्ली परिछेत्र अवधी समाज’ की तरफ से आयिजित किया गया था। सहयोग किया था, दलित लेखक संघ, दिल्ली ने। इस गोष्ठी के बहाने दिल्ली व इस परिछेत्र में सक्रिय अवधी रचनाकारों की रचनात्मकता का बखूबी परिचय मिला। यह पता चला कि अवधी कवि और कविता का अपने वर्तमान से, वर्तमान के राजनीतिक घटनाक्रमों से कितना नजदीकी जुड़ाव है। अवधी के इन कवियों ने, जिसमें युवा कवियों की भी अच्छी भागीदारी थी, अवधी कविता से श्रोताओं दिल जीत लिया।   1

अवधी काव्य गोष्ठी की शुरुआत में ही अवधी के युवा कवि राघव देवेश ने अपनी कविता से गंभीर समाज में नफरत फैलाने वाले तत्वों की हकीकत खोलते हुए कहा, “मजहब के नाम पै रोज मिलैं साम के / न यै रहीम के, न तौ यै राम के / यै सब बिना काम के।” व्यंग्यकार संतोष त्रिवेदी ने पहले और आज के समय में क्या परिवर्तन आया, क्या गायब हुआ, इसे अपनी कविता में रखा, “बाबा कै बकुली औ धोती, अजिया केरि उघन्नी गायब / लरिकन केर करगदा कंठा, बिटियन कै बिछिया भै गायब।” अपने खांटी मिजाज की कविताएँ करने वाले कवि अमित आनंद ने जिंदगी को नये उपमानों और गँवई क्रिया-व्यापारों में याद किया, “पातर के मेढ़ पर बिछलात बीत जिंदगी / पुरइन के पात अस सरमात बीत जिंदगी।” हिन्दी में मीडिया विश्लेषक के रूप में चर्चित कवि प्रांजल धर की काव्य-पंक्तियाँ इस तरह रहीं, “अम्मा कै लाड़ला बनौ औ सही सही कुछ काम करौ / नाम के झालर से दूर रहिके जननी जनमभूमि कय नाव करौ।”

कवयित्री मृदुला ने उस दशा को कविता में व्यक्त किया जिसमें गाँव छोड़ कर कई वर्षों के बाद जाने पर हमें दूसरा ही गाँव मिलता है, तस्वीर काफी बदली हुई मिलती है, “यहिका अँजोर कही याकि अँधियारु कही / केउ केहू से बोलै न केउ दुवारे डोलै न / साँझै से कुल जवार देखत बिग बॊस बा / का इहै ऊ गाँव आ का इहै ऊ देस आ?” कवि सम्मेलन का संचालन कर रहे अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने डॊ. प्रदीप शुक्ल की कविता सुनाई जिसमें नोटबंदी पर जनता की निगाह से सवाल किया गया, “बिटिया ब्याहै खातिर लल्लन अपनै पैसा न निकारि सकैं / दस दिन ते लैन म लागि-लागि अब देखौ उल्टा सीधु बकैं / जो बाहुबली हैं उनके तौ घर मा नोटन कै लागि तही / काका तुम ब्वालौ सही-सही!” उन्होंने अपनी भी कविता सुनाई जिसमें इन अराजकताओं से निकलने का आशावाद था, “माया छटे, भ्रम मिटे, मुला धैर्ज राखौ यहि बेरिया।”

पत्रकार अटल तिवारी ने पत्रकार कृष्ण कांत की कविता सुनाई जो शासन व्यवस्था पर तंज कस रही थी, “का हो लड्डन लड्डू खाबो, लाइन लगि कय सरगहि जाबो!’ विष्णु ‘वैश्विक’ की पंक्तियों ने लोगों से खूब तालियाँ बजवायीं। नोटबंदी की पोल उन्होंने अपने ढंग से खोली, “नोटबंदी कै किहिन तमासा जनता का फुसिलावै का / जंग अउर माल्या वाला मामलवौ तौ रहा दबावै का।”

अवधी में प्रगतिशील परंपरा के सशक्त हस्ताक्षर और अवधी गजलों से कविता के परिदृश्य को समृद्ध कर रहे आलोचक बजरंग बिहारी ‘बजरू’ ने सर्वप्रथम कवि प्रकाश गिरि की कविता पढ़ी, “साहेब नीक चलायेव डंडा / जनता है हलकान मुला तू झारेव देसभक्ति कै फंडा!” कवि बजरू ने फिर अपनी दो बेहतरीन गजलें सुनायीं। लोकलय की चाल चलती हुई पंक्तियाँ चित्त में बैठ गयीं जो अवधी काव्य की सघन राजनीतिक चेतना, जिसमें सधा आक्रोश भी हो, का परिचय दे रही थीं, “पापी निरहुवा सतावै नासकटवा / करिया कानुनवा लगावै नासकटवा।….खुद तौ उड़ै देस दुनिया मा टहरै / पब्लिक का दँवरी नधावै नासकटवा।”

अंत में अवधी के जाने माने कथाकार और कवि भारतेंदु मिश्र ने अपनी कविताएँ सुनाईं। अपने चुनिंदा दोहों से उन्होंने सभी का ध्यान गाँव की स्थितियों की ओर खींचा। उन्होंने अवधी में मुक्तछंद की कविता सुनाई, ‘कस परजवटि बिसारी!’ वर्तमान राजनीति को संबोधित उनकी कविता खासी सराही गयी, “चरखा काति रहे मलखान / रामलला की जयकारा ते बना न तिनकौ काम। / सैकिल पंचर हुइगै वहिपै बैठे दुइ नादान। / हैंडिल लयिके भागि लरिकवा बापू हैँ हैरान।” भारतेन्दु मिश्र के कविता पाठ के साथ ही कविता पाठ का यह सिलसिला खत्म हुआ। अध्यक्षता कर रहे साहित्यकार मामचंद रेवाड़िया जी ने अवधी कविताओं की सराहना की। आगे भी ऐसे आयोजन की जरूरत पर जोर दिया। सभी अवधी कविता प्रेमियों का धन्यवाद ज्ञापन किया गया।

[रपट : ‘दिल्ली परिछेत्र अवधी समाज’ की तरफ़ से]

पाहीमाफी [४] : मौज-मस्ती, काम-काज

sssssसिसिलेवार ढंग से पोस्ट कीन जाति, आशाराम ‘जागरथ’ कय रचना, ‘पाहीमाफी’ कय ई चौथा हिस्सा आपके सामने रखा जात अहय। यहिके पहिले केरी कड़ियन क पढ़य खातिर यहिपै क्लिक करैं : “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग”  , तिसरका भाग। तौ आज यहि चौथे हिस्सा कय पाठ कीन जाय औ अपने बिचार से अवगत करावा जाय। : संपादक
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मौज-मस्ती, काम-काज

हल्ला होत भोरहरी होय
दोगला चलै सिंचाई होय
थोरै देर चलाई हमहूँ
देहियाँ खूब पसीना होय
सूख जाय कुछ ताल कै पानी
लइकै धोती मछरी छानी
कनई मा जब पाई सुतुही
जियरा गद-गद काव बखानी
घर सइतै कां चिक्कन माटी
ढोय कै लाई पलरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बरहा ऊँच बनावा जाय
ढेंकुर–कूँड़ चलावा जाय
गोहूँ अउर केराव कय खेत
हाथा से हथियावा जाय
अन्नासै काँ दीहन बोय
पानी आवत बाटै रोय
हाली-हाली जाय कै देखा
बरहा कहूँ कटा न होय
कउनौ खानी फसल जो होई
आधा मिली बटाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

फरवारे मा दँवरी नाधे
लोगै गोहूँ दाँवै साथे
करैं बैल मिलि घुमरपरैया
मुँह मा जाबा बांधे-बांधे
अखनी-पैना-पाँची-पाँचा
झौवा-झौली-खाँची-खाँचा
बभनन के खरही पै खरही
बोझै-बोझ अलग से गाँजा
बाकी जात बेचारे ताकैं
लेहना पीटैं कोने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

चलै न पछुवा ना पुरवाई
मारि परौता करी ओसाई
भूसा चमकै ढूह सोहाय
दमकैं अन्नपूर्णा माई
कुचरा लेहें बटोरी  कूँटी
कूँटी मा गूंठी ही गूंठी
छूटै खुलरा ताकै दाना
जब मुंगरी से वोका कूटी
कुछ छिटका कुछ गिरा अनाज
बीन धरी हम मौनी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गड़ही मा खोदा गय चोंड़ा
फूटा पानी छाती चौड़ा
फरवारे कै बैल पियासा
पानी पीयैं जोड़य-जोड़ा
कोहा भै बारी-फुलवारी
वहमां खूब हुवै तरकारी
ढोय-ढोय चोंड़ा से पानी
सींचैं बेटवा औ महतारी
उज्जर-हरियर अउर बैगनी
भाटा लउकै पाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गरमी कै बेहाल महीना
माथे तल-तल चुवै पसीना
‘ढोलिहा’ साथे भइंस चराई
छाँहे बइठे गप्प लड़ाई
लाठी बजा-बजा वै गावैं
हमहूँ साथे तान भिड़ाई
गोरु चरत दूर जो जावैं
वन्हैं हाँक नगीचे लाई
बगिया सुर्र-कबड्डी खेली
भंइस जुड़ावैं पानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गले जुआठा नाक नकेल
हर नाधी औ जोती खेत
‘वा-वा’ कहे दाहिना समझै
‘तता-तता’ से बाँवा बैल
कुर्ह कै मूंठ पकरि यक हाथे
सीधी कूड़ रही हम साधे
पाछे-पाछे गोहूँ बोवत
माई चलैं सिकहुली लादे
दुइयै बाँह जो दियै हेंगाय
चमकै खेत दुपहरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सरसइया पै चढ़ै केराव
मेर-मेर कै फूल फुलाय
पोपटा से गदराई छीमी
मौनी लइकै तूरा जाय
आपन खेत रखावा जाय
चिरई हुर्र, उड़ावा जाय
अक्सा अउर केराव कै फुनगी
खोंट-खांट कै खावा जाय
छौंकी घुघुरी, भात-निमोना
रोजै रोज बनै घर मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

चैत माह कटिया भदराय
झुर-झुर-झुर-झुर बहै बयार
बड़े भोरहरी खेते जाई
कुर-कुर-कुर-कुर करी कटाई
ऊपर चटक चनरमा चमकै
दूर-दूर तक गोहूँ दमकै
दुई-यक पहँटा काटी हमहूँ
बोझा बान्ही रसरी लइकै
घर भै मिलि कै खरही गांजी
ढोय-ढोय फरवारे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

हमरौ छपरा लिऔ छवाय
काव कहत बाट्या तू भाय
हूँड़-भाँड़ मा हमहूँ तोहरे
कामे कबहूँ जाबै आय
बटवारा मा भीत उठाइन
दादा वोकां रहे छवाइन
पाँच साल के उप्पर होई गै
छपरा मा बस बाय कराइन
अबकी नाहीं होई गुजारा
पातर-पुतर पलानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

ताले बीचे कनई म् जाय
रहंठा दबा के दिहिन भिगाय
भूसा ताईं एक मंडिला
पांडे ऊंचे दिहिन छवाय
पांच जगह रहंठा कै बाती
कौंची अइंठ बनाइन टाटी
गोल-गोल लम्मा कै गोला
आरी-आरी पाटिन माटी
चुरकी वाला टोपा पहिरे
खड़ा मंडिला घामे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

का हो तू काव करत बाट्या
मेला नाहीं देखै जाब्या
भिनसारे से देखत बाटी
खटिया कै बाध बरत बाट्या
वै झारि कै बिड़वा डारि दिहिन
बोले नियरे आवा बइठा
फिर बोले बोली ना बोलौ
माचिस लइ ल्या बीड़ी दागा
तोहरे माफिक कउनौ हमार
बेटवा कमात ब दिल्ली मा ?
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

घासी ताँईं खेते  जाई
मेंड़े बइठा गाना गायी
सरसौ कै कँड़री तूरि-तूरि
छिलका निकारि कच्चै खाई
‘गुलुरू’ गोहराइंन आय जाव
झौवा लै हमरे खेत चलौ
सरसौ-केराव कां छोड़ि-छोड़ि
अंकरा- बहलोलिया छोल लियौ
सरसइया वोहरी गझिन बाय
थोरै उखारि ल्या सागी कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बिन खाये गयन खेत गोड़य
दुपरिया भये घरे आयन
निकरी बिलार चूल्ही मा से
दरवज्जा खुल्ला हम पायन
बरतन-कुरतन छितरान परा
घर मा ना रहे परानी क्यौ
बटुली बोलिस ठन-ठन गोपाल
कुछ काछि-कूछ कै खाय लियौ
मोटकी रोटिया बा तुहै अगोरत
उप्पर धरी सिकहुली मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा
unnamed गन-गन जेठ दुपहरी बाय
बइठा येक गपोड़ी बाय
आवा, छाँहें बइठ बगल मा
घेरि-घेरि बतियावा जाय
वत्ते चला ना बइठा हीयाँ
गिरत बाय पेड़े से कीयाँ
गोटी खेल ल्या हमरे साथे
धरे हई इमली कय चीयाँ
मजे-मजे अब जूड़ हुवत बा
चलै का चाही घासी कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

 __आशाराम जागरथ

[जारी….]

औपनिवेसिक सत्ता सभ्यता कय भ्रमजाल अउर लोकगीत : बजरंग बिहारी ‘बजरू’

ई आलेख  आकार मा भले थोर लागय मुला निगाह मा बहुत फैलाव औ गहरायी लिहे अहय। कयिउ बाति अस हयँ जौन चेतना का कुरेदयँ। औपनिवेसिक सत्ता के दौरान जौन भरम-जाल रचा गा ऊ गजब रहा। यहिमा सोझैसोझ जे फँसा ते फँसबै भा और जे बिरोध कय जिम्मा उठाये रहा उहौ, आनी-आनी मेर से, फँसि गा। यहि भरमजाल के चलते लोकगीतन (लोकभासन) के साथ जौन असावधानी औ जादती भै, वहिका जहिरावत ई आलेख पढ़य जाय कय माँग करत हय। : संपादक
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औपनिवेसिक सत्ता सभ्यता कय भ्रमजाल अउर लोकगीत : बजरंग बिहारी ‘बजरू’   

तब बच्चा रहेन| प्राइमरी इस्कूल कय बिद्यार्थी| यक बियाहेम गयन रहा| अपनेन गाँव मा| पंडित जी मंत्र पढ़िन| दुलहा से कुछ करय का कहिन| फिर रोकि दिहिन| हमरे बगल मा यक बुजुर्ग बैठा रहे| वय कहिन की अबहीं मेहररुअन कय मंगलगीत सुरू नाहीं भवा| जब तक ऊ न पूर होये पंडितजी आगे ना बढ़ि पैहैं| तब तौ यहि बातिक मर्म समझि नाहीं पायेन| बादि मा धीरे-धीरे अर्थ खुला की समाज जतना महत्त्व (बेद)मंत्र का देत है वतना महत्त्व लोकगीतौ का मिलत है|
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परम्परा से लोकगीत का मौखिक साहित्य या वाचिक साहित्य के अंतर्गत रखा जात है| मानव जाति कय सबसे पुरानि अभिव्यक्ति गीतन मा भई होये| बिद्वानन कय कहब है की लोकगीत औ’ लोककथा सभ्यता के आदिकाल से रची जाति हैं| रचना कय ई दूनौ रूप अलग-अलग औ’ यक-दुसरे मा घुलिमिलि कय बनत हैं| लोकगीत कय यहै परिभाषा है की वहका लोक रचत है| मतलब की वहकै रचनाकार अग्यात रहत है| जैसय कौनौ गीत कय रचनाकार कय नाम पता चलि जात है ऊ लोकगीत के दायरा से बाहर होय जात है| कबीर कय निरगुन लोक मा खूब गावा जात है मगर वहका लोकगीत नाहीं कहा जात है| यहै हालि तमाम भक्त कबियन के गीत, कबिता कय बाटै| भजन लिखै वाले, बिरहा रचै औ गावै वाले लोककवि कहा जात हैं लेकिन उनकै रचना लोकगीत नाहीं कही जाति है| लोकगीत कय असली ठेकाना ताम्रपत्र, भित्तिपत्र, पोथी ना होय| ऊ तौ लोक के कंठे बिराजत है| अपने सुभाव से लोकगीत करिया अच्छर मा ढलै से बचा चाहत है| वहका आजादी चाही| ऊ ‘प्रामाणिकता’ के फेर मा नाहीं पड़त| जब छापाखाना आवा तब्बौ ओपहर ध्यान नाहीं गवा| वहका लिखित रूप बहुत बादि मा दीन जाय लाग| वहकै इतिहास लिखित साहित्य के इतिहास से बहुत पुरान बाटै जद्यपि इतिहास कय चिंता लिखित साहित्य का जादा रहति आई है| लोकगीत केर जड़ समय के अनंत बिस्तार मा फैली बाटै यहीलिए ऊ आपन प्राचीनता साबित करय खातिर परेसान नाहीं होत| लिखित साहित्य तौ मुट्ठी भर लोगन के बीच मा पढ़ा-समझा जात है मगर मौखिक कय पसारा सबके बीच मा रहत आवा है| आधुनिक काल मा जब साक्षरता कय प्रसार भवा तब लिखित साहित्य कय दायरा बढ़ा| ओहके पहिले जनता कय भावधन यही मौखिक साहित्य या लोकगीतन मा यकट्ठा होत औ बहत रहा| पूरे समाज कय सांस्कृतिक जीवन यही जलधार से सींचा जात रहा|

लगभग दुय सौ बरस देस फिरंगी गुलामी मा रहा| यहि दौरान वह पर ‘सभ्यता’ कय अतना दबाव पड़ा की ऊ नकलची लोगन से भरत गा| अपने धरती से, भासा से, भेस से, कथा औ गीत से दूरी बढ़त गय| यक उधार लीन्ह बनावटी जिंदगी हावी होत गय| हिंदी वर्द्धिनी सभा मा भाषण देत भारतेन्दु बाबू याद देवायिन की अंगरेज तौ यहर कय गीत बटोरे जात हैं लेकिन देसबासिन का कौनौ परवाह नाहीं है| फिरंगी हमरे लोकचित्त का परखे लेत हैं औ हम उनके सेक्सपियर या मिल्टन का पढ़िकै गदगद बाटेन| वहि देस कय अनपढ़ किसान, मजूर और घरैतिन का सोचत हैं, उनकय जीवन मूल्य कौने गीतन मा कौने तरह से जाहिर होत है यकरे प्रति हम यकदम उदासीन हन| वय अंगरेज हमरे लोकजीवन मा पैठ बनाय लेहें मगर हम उनके लोकजीवन के सम्बंध मा कुछू ना जानि पाइब-

आल्हा  बिरहहु  को  भयो  अंगरेजी  अनुवाद|
यह लखि लाज ना आवई तुमहिं न होत बिखाद||

भारतेन्दु बाबू ई बाति 1877 मा कहिन रहा| आजव ई वतनय सही लागत अहै| भारतेन्दु के करीब पचास साल बाद रामनरेश त्रिपाठी अवधी लोकगीतन कय संग्रह सुरू किहिन| अपने ग्रामगीत कय भूमिका मा वय हैरानी जताइन की हम लोगन का अपने धरती से अतनी दूर के खींच लयिगा! नई पढ़ाई हासिल कैकै जवन पीढ़ी सामने आवति है ऊ अपने घर-परिवार से, गाँव-जेंवारि से कतना अजनबी होय जाति है| जतनय ऊंच डिग्री वतनय जादा दूरी| रामनरेशजी नई सिच्छा ब्यवस्था कय पैरोकार रहे| खड़ी बोली हिंदी कय कट्टर समर्थक| वय सवाल तौ नीक उठायिन मगर वहकै जबाब तक नाहीं पहुँचे| औपनिवेसिक सत्ता सभ्यता कय जौन भ्र‘मजाल रचिस रहा वहके चक्कर मा ऊ पूरा जुग थोर-बहुत फंसा रहा| यक बिचित्र संजोग के तहत आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी वाली ‘सरस्वती’ पत्रिका खड़ी बोली के पच्छ मा आन्दोलन चलाइस| यहसे तौ कौनौ दिक्कत नाहीं रही मगर ई आन्दोलन अवधी, ब्रजभाषा के खिलाफ खड़ा होइगा! ई प्रचार कीन गा की यहि भासा के ब्यवहार से ‘राष्ट्र’ कय उन्नति ना होय पाये| यहव कहा गा की देहाती भासा मा नवा बिचार नाहीं कहा जाय सकत है| सभ्यता कय मानक बनाय दीन गय खड़ी बोली औ हिंदी कय दूसर बोली हीनतासूचक मानी जाय लागि| 1900 से लैकै 1940 तक जवन जहर बोवा गा वहकय फसल अब लहलहाति बाटै| मैथिली अलग भै, राजस्थानी आपन झंडा उठायिस| अब भोजपुरी अलग होति है| काल्हि का हिंदी कय बाकी हिस्सेदार सामने अइहैं| आगमजानी कबि तुलसीदास ‘मानस’ मा चेताइन रहा-

स्याम सुरभि पय बिसद अति, गुनद करहिं सब पान|
गिरा ग्राम्य सियराम जस, गावहिं सुनहिं सुजान||

बर्णबोध औ भासाबोध दूनौ पूर्वग्रहग्रस्त हैं| यहि दोहम तुलसी पूछत हैं की का करिया गाय कय दूध गोरहरि गाय के दूध से कमतर होत है? अक्सर अस मानि लीन जात है| जबकि असलियत ई है कि करिया गाय के दूधे मा जादा गुण होत है| ऐसे भासा कय मसला है| चहै गाँव कय बोली होय या संस्कृत, वहि भासा मा का कहा गा है, यहसे बाति कय महत्त्व तय होये| कथ्य निर्धारक होत है, भासा नाहीं| महत्त्व रंग से या वर्ण से तय न करौ, पहिले वहकय गुण देखौ| समझदार कय यहै पहचान है| सयान लोग संस्कृत मा रचित रामायण से अवधी मा लिखित रामचरितमानस से भासा के आधार पर छोट-बड़ा ना मनिहैं| वय गुण के कारण दूनौ कय सम्मान करिहैं|

अंगरेजन के सासनकाल मा जवन मानसिकता बनी ऊ अब तक कायम है| लोकगीतन का आजौ स्कूली पाठ्यक्रम मा कौनौ जगह नाहीं मिली है| पहली से लैकै बारहवीं तक बिद्यार्थी कौनौ दर्जा मा अपने इलाका के लोकगीत कय दरसन नाहीं कय सकत हैं| हिंदी मा एम.ए. करय वालन का लोकगीत नाहीं पढ़ावा जात है| हाँ, केऊ-केऊ हिम्मत कय-कय लोकगीत का रिसर्च खातिर चुनत है| यहसे कौनौ खास फरक नाहीं पड़ै वाला है|

जनजीवन बहुत तेजी से बदलत है| लोकगीतन के संग्रह कय तरफ विसेस ध्यान दियब जरूरी है| पूरी सावधानी से उनकय दस्तावेजीकरण होय| जिंदगी तौ अपने गति से चले लेकिन परम्परा से जौन धरोहर हमका मिली है वहका संजोय लेब आवस्यक लागत है| यहि बीच लोकगीतन कय स्वरूप बदला है, उनकय भासा बदली है| वहका बारीकी से समझैक चाही| जागरूक लोग ध्यान देंय, लोक मा काम करय वाली संस्था ध्यान देंय औ सबसे जादा सरकार कय यह पर ध्यान जाय| तब्बै कुछ बाति बनि पाये| सोसल मीडिया अब गाँव-गाँव मा फैलि गय है| यहका रोकब संभव नाहीं है| हाँ, यह स्थिति कय लाभ उठावा जाय सकत है| लोकगीतन कय छेत्रीय बिबिधता का समझय मा नई मीडिया से सहायता लीन्ह जाय सकत है|

अवधी लोकगीतन कय बिसयबस्तु लगभग वहै है जौन हिंदी छेत्र के दोसर जनभासा मा मिलत है| अलगाव दुइ मामला मा देखाय पड़े| पहिल भिन्नता अवधी लोकजीवन मा राम कय मौजूदगी के कारण है औ दोसर वहके मिली-जुली संस्कृति के कारण| मध्यकाल मा मुस्लिम जनता हिंदी प्रदेस के हर भासा-बोली मा रही मगर यहि जमीन से निकले सूफी कबि अवधी का अपने कबिता के लिये चुनिन| 1350 से लैकै 1900 तक लगातार सूफी प्रेम कबिता अवधी मा लिखी गय| यहिकै ई असर पड़ा की अवधी मा मुस्तर्का तहजीब मजबूत होत गय| संत लोग यहि धारा मा खूब जोगदान किहिन| आजादी के आन्दोलन मा अवधीभासी जनता बढ़ि-चढ़ि कय हिस्सा लिहिस| यहि दौरान अवधी मा स्वतंत्रता का लैकै खूब जज्बाती गीत लिखा गा| यहि संग्राम मा अगुआई करै वाले नवा नायक उभरे| लोकगीतन मा वय पूज्य नायक बनावा गे| आजादी मिलय के बाद अवधी लोकगीत मा फिर थोरै तब्दीली आई| अब जनता कय सुख-दुःख का केन्द्रीयता मिलय लागि| धर्मभावना थोरै पीछे पड़ी| सिच्छा औ राजनीति मा लोकगीतन कय रूचि बढ़ै लागि|

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