अलाउद्दीन साबिर केर अवधी गजल : का हुइहै!

अलाउद्दीन साबिर साहब कय ई गजल यहि अवधी ठीहे पै आवय कय गजब कहानी हय। यक दाँय हिमांशु बाजपेयी हमयँ ई गजल सुनाये रहे। सुनायिन तौ हमयँ बहुत नीकि लाग। तब उनका गजल कय पाँचौ सेर याद रहा। हम कहेन लिखाय दियव। कहिन बाद मा। फिर वय बाद मा यक सेर भूलि गये। बाकी बचे चार। पिछले यक साल से उइ, ऊ भूला सेर याद करत अहयँ मुला यादि नाहीं कइ पाइन। हमयँ लाग कि लावो चारै सेर डारि दी; का पता, यक सेर याद करय का छोड़ौ, उइ बाकी चारिउ भूलि जायँ। फिर आज उनका हम धइ दबोचेन, फेसबुक पय। चारौ सेर उइ लिखिन जौन हियाँ दीन जात अहयँ। साबिर साहेब के बारे मा पूछेन तौ वै एतना बतायिन कि साबिर साहेब कानपुर के यक मिल मा मजूर रहे। साच्छर नाहीं रहे। लखनऊ केरी बिक्टोरिया इसट्रीट मा रहत रहे। बादि मा कुछ समय के ताईं बंबयिउ गा रहे। हिमांशु क ई गजल बिलायत जाफरी साहेब सुनाये रहे जे साबिर साहेब के साथे कौनौ प्रोजेक्ट मा काम किहे रहे। यनहूँ से पहिले ई गजल हिमांशु कआबिद हुसैन साहब सुनाये रहे जे साबिर साहेब कय दोस्त रहे। तौ हाजिर हय ई गजल! : संपादक
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का हुइहै! : अलाउद्दीन साबिर

ब्योपार करे जे मज़हब का ऊ साहिबे ईमां का हुइहै
सिख और इसाई का हुइहै, हिन्दू औ मुसलमां का हुइहै।

रहबर जो रहेैं इल्मी हुइगे शाइर जो रहैं  फिल्मी हुइगे
जो आम रहैं कलमी हुइगे अब बारिसे इरफां का हुइहै।

उइ लूटि लिहिन हमरी बगिया उइ खाइ लिहिन सगरी अमिया
बस तन प लंगोटी बाक़ी है, अब चाक गिरेबां का हुइहै।

बरबाद गुलिस्ता करिबे का बस ऐकै उल्लू काफी है
जहां डाल डाल पर उल्लू हैं अंजामे गुलिस्ता का हुइहै।

अवधी गद्य में अनंत शक्ति है : त्रिलोचन

बरवै छंद मा ‘अमोला’ लिखय वाले अवधी अउ हिन्दी कय तरक्कीपसंद कवि तिरलोचन से अवधी कथाकार भारतेन्दु मिसिर बतकही किसे रहे सन्‌ १९९१ मा, जवन १९९९ मा रास्ट्रीय सहारा अखबार के लखनऊ संस्करन मा छपी रही। बाद मा यहय बतकही तिरलोचन केरी ‘मेरे साक्षात्कार’ किताब मा छापी गय। मजेदार लाग कि यहि बतकही कय आधा हिस्सा अवध अउ अवधी से ताल्लुक राखत हय। ई हिस्सा काहे न यहि बेबसाइट पय आवय; इहय सोचिके यहिका हियाँ हाजिर कीन जात अहय। छापय कय अनुमति मिसिर जी दिहिन, यहिते आभारी हन्‌। : संपादक
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वर्तमान हिन्दी कविता पर महानगरीय बोध या कोरी आंचलिकता का प्रभाव है परन्तु आपकी कविताएं अवधी चरित्र से अधिक जुड़ी है इसका मूल कारण क्या है ?
  
नगर में रहने वालों का व्यावहारिकimg_20161111_174813 ज्ञान का स्तर कम होता है क्योंकि गांव वालों का व्यावहारिक प्रत्यक्षीकरण करने का उन्हें सुयोग ही नहीं मिलता। मिलना-जुलना भी बहुत कम होता है। महानगरीय जीवन में फूल-पौधे वन आदि दुर्लभ होते हैं। ये सब गांवों में सुलभ हैं। गांव का बालक किताब पढ़ने में भले ही कमजोर हो वनस्पति ज्ञान में नगर के बालक से आज भी असाधारण है। वह वनस्पति, पशु और मनुष्य के नाना रूपो में चेतना के विकास के साथ-साथ जिसकी चेतना का विकास होता है। रचनाकार होने पर वह जीवों के पारस्परिक सम्बन्धों को भी अच्छी तरह रख सकता हैं। हमारे प्राचीनतम महाकवि न नगर निंदक थे न ग्राम निंदक और न अरण्य जीवन के; इसी कारण वे पूर्ण कवि थे। जीव और जीवन के निकट होने पर ही कोई कवि हो सकता है। मेरी चेतना का विकास या निर्माण अवध के परिवेश में हुआ, यदि अवध को मेरा पाठक मेरी रचना से पहचानता है तो मेरा रचना कार्य सफल ही कहा जाना चाहिए।

भौजी’, ‘उस जनपत का कवि हूं, झापस, नगई महरा तथा चैती मेंकातिकपयान जैसी कविताएं आपकी मौलिकता को रेखांकित करती हैं, आपको इन चरित्रों ने किस प्रकार प्रभावित किया?

मेरी रचनाओं में जो व्यक्ति आए हैं वे इसी भूतल पर मुझे मिले, उनमें से आज कुछ हैं कुछ नहीं हैं। लोग चाहें तो कह सकते हैं कि मेरी अनुभूतियां अवध को नहीं लांघ पातीं लेकिन मैं भारत में जहां कहीं गया हूँ वहां के भाव भी वहां के जीवन के साथ ही मेरी कविताओं में आए हैं। मेरे यहां अवध के शब्द मिलते हैं लेकिन अन्य राज्यों के अनिवार्य शब्दों का आभाव नहीं है। मैं आज भी गांव की नीची जाति के लोगों के साथ बैठकर बात करता हूं। अवध के गांवों को तो मैं विश्वविद्यालय मानता हूं। ‘नगई महरा’ से बहुत कुछ मैंनें सीखा, वह कहार था- गांजा पीता था पर उसे बहुत से कवियों के कवित्त याद थे। सांईदाता सम्प्रदाय तथा बानादास की कविताएं भी उससे सुनी थीं। उसी के कहने से मैं सांईदाता सम्प्रदाय को जान पाया। नगई उस सम्प्रदाय से भी जुड़ा था। उस पर अभी एक खण्ड और है जो लिखना है। अवध में गांव के निरक्षर में भी सैंकड़ों पढ़े-लिखों से अधिक मानवता है। गांवों में शत्रुता या मित्रता का निर्वाह है, यहां ऊपर की मंजिल वाले नीचे की मंजिल वालों को नहीं जानते।

बंसीधर शुक्ल, गुरुभक्त सिंह मृगेश पढ़ीस, रमई काका, चतुर्भुज शर्मा, विश्वनाथ पाठक, दिवाकर आदि के बाद अवधी लेखक में किस प्रकार के परिवर्तन की आवश्यकता है ?

अवधी में पढ़ीस, रमई काका, बंशीधर शुक्ल, चतुर्भुज, विश्वनाथ पाठक आदि उस कोटि के आदरणीय कवि हैं जैसे छायावाद के हैं। निराला ने प्रभावती उपन्यास में तीन पद अवधी में लिखे हैं, एक भोजपुरी पद भी सांध्य काकली में लिखा है। मानसिकता का अंतर मिलता है। गांव में पुस्तकालय हो तो गांव साक्षर हो। मानसिकता, शिक्षा व उनके व्यवहार आदि में विकास हो। मैं समझता हूं कि चेतना के कुछ ऋण होतें हैं उन्हें उतारना चाहिए। मैंने अपने गांव के केवटों को अवधी कविताएं सुनाई, उन कविताओं को सुनकर एक संतवृत्ति के बूढ़े केवट ने कहा ‘यह सब तो क्षणिक हैं।’ दूसरी बार वहां के चरित्रों को लिखा तो उसने पसंद किया। जिसे आज लिखा जा रहा है उसे समझने वाले लोग भी होने चाहिए। गांवों में सदाचार को प्रतिष्ठित करने का काम अवधी से किया जा सकता है। यदि रीतिकालीन कविता पर भक्तों व संतों की कविता का प्रभाव न जमा रहा होता तो गांवों में अशालीनता बढ़ गयी होती अत: सदाचार की प्रतिष्ठा संत कवियों ने ही की। अवधी में इस प्रकार का कार्य अभी भी किया जा सकता है।

अवधी की बोलियों में एकरूपता कैसे बनाई जा सकती है, आपकी दृष्टि में बिरवा की क्या भूमिका हो सकती है?

मेरा कहना है कि जो जिस अंचल का है उसी रूप में उसका लेखन हो। यदि मैं सीखकर लिखूं तो सीतापुर की बोली में भी लिखूंगा पर जो वहां का निवासी कवि है वह अधिक श्रेष्ठ लिखेगा, अत: मेरी दृष्टि में इन्हें एकरूपता देने की अवश्यक्ता नहीं है। वंशीधर जी ने  अवधी में गद्य लिखा है वह मिले तोउसे ‘बिरवा’ में प्रकाशित करना चाहिए। भाषा सपाट नहीं होती रचनाकार की दृष्टि सपाट होती है। अत: कहीं की बोली को स्टैण्डर्ड मानने के बाद वहां की संस्कृति भी सटैण्डर्ड हो जाएगी। इसलिए किसी भी क्षेत्र को स्टैण्डर्ड मत बनाइए। संक्रमण क्षेत्रों की भाषा को भी मानिए। उसका मानवीकरण (Highly Local) हो। तब कोष बने। अवधी के गद्य  में अनन्त शक्ति है, वह शक्ति हिन्दी खड़ी बोली में भी नहीं है। उसमें विभक्तियां हैं। ‘बिरवा’ यदि मानक कोष का स्वरूप तय करना चाहे तो उसके लिए मैं टीम को प्रशिक्षण दे सकता हूं। 

बजरंग बिहारी ‘बजरू’ केर गजल (२) : उठाए बीज कै गठरी सवाल बोइत है!

कवि बजरू के्र गजलन की पहिली कड़ी के बाद ई दूसरि कड़ी आय। पहिली कड़ी  ‘हियाँ’ देखयँ। अब सीधे गजलन से रूबरू हुवा जाय। : संपादक
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[१] 

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कवि बजरू

का बेसाह्यो कस रहा मेला
राह सूनी निकरि गा रेला
बरफ पिघली पोर तक पानी
मजाखैंहस संगसंग झेला।
के उठाए साल भर खर्चा
जेबि टोवैं पास ना धेला।
गे नगरची मुकुटधारी
मंच खाली पूर  भा खेला
बहुत सोयौ राति भरबजरू
अब लपक्यो भोर की बेला।

[२]

जियै कै ढंग सीखब बोलिगे काका
भोरहरे तीर जमुना डोलिगे काका।
आँखि  अंगार  कूटैं  धान  काकी,
पुरनका घाव फिर से छोलिगे काका।
झरैया  हल्ल  होइगे  मंत्र  फूंकत
जहर अस गांव भीतर घोलिगे काका।
निहारैं   खेत   बीदुर  काढ़ि  घुरहू,
हंकारिन पसु पगहवा खोलिगे काका।
बिराजैं   ऊँच   सिंघासन   श्री   श्री
नफा नकसान आपन तोलिगे काका।
भतीजा हौ तौ पहुंचौ घाटबजरू
महातम कमलदल कै झोरिगे काका।

[३]

उठाए बीज कै गठरी सवाल बोइत है
दबाए फूल कै मोटरी बवाल पोइत है।
इन्हैं मार्यौ उन्हैं काट्यौ तबौं प्यास बुझी
रकत डरि कै कहां छिपिगा नसै नसि टोइत है।
जुआठा कांधे पर धारे जबां पर कीर्तिकथा
सभे जानै कि हम जागी असल मा सोइत है
कहूं खोदी कहूं तोपी सिवान चालि उठा
महाजन देखि कै सोची मजूरी खोइत है।
घटाटोप अन्हेंरिया उजाड़ रेह भरी
अहेरी भक्त दरोरैं यही से रोइत है।

[४]

देसदाना भवा दूभर राष्ट्रभूसी अस उड़ी
कागजी फूलन कै अबकी साल किस्मत भै खड़ी।
मिली चटनी बिना रोटी पेट खाली मुंह भरा
घुप अमावस लाइ रोपिन तब जलावैं फुलझड़ी।
नरदहा दावा करै खुसबू कै हम वारिस हियां 
खोइ हिम्मत सिर हिलावैं अकिल पर चादर पड़ी।
कोट काला बिन मसाला भये लाला हुमुकि गे।
बीर अभिमन्यू कराहै धूर्तता अब नग जड़ी।
मिलैं ‘बजरू’ तौ बतावैं रास्ता के रूंधि गा 
मृगसिरा मिरगी औ’ साखामृग कै अनदेखी कड़ी।  
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सम्पर्क: 
फ्लैट नं.- 204, दूसरी मंजिल,
मकान नं. T-134/1,
गाँव- बेगमपुर,
डाकखाना- मालवीय नगर,
नई दिल्ली-110 017
फोन- 09868 261895

काका पय आलेख [१] : आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी

रमई काका अवधी कय सन्नाम कवि हुवयँ। अवधी अनुरागी के नाय जानत उन कय नाव! मुला इहौ सही है कि उन केरी कविताई पर जेतनी बात हुवय क चाही, ओतनी नाहीं होइ पायी हय। यहय सोचिके ‘काका पय आलेख’ कय सिलसिला चालू कीन जात अहय। बहुत लोगन से आग्रह किहेन हयँ कि वइ लिखयँ। कोसिस रहे हर महीना मा दुइ आलेख काका पय यहि बेबसाइट पय रखा जायँ। यहि योजना कय सुरुआती कड़ी ई आय,  प्रख्यात आलोचक विस्वनाथ त्रिपाठी केर आलेख ‘जनता द्वारा मूल्यांकित कवि हैं रमई काका!’ : संपादक
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जनता द्वारा मूल्यांकित कवि हैं रमई काका! : विश्वनाथ त्रिपाठी
                                                                                                                                  

यह ’४८-’४९ की बात है, भारत आजाद हो गया था। मैं बलरामपुर में पढ़ता था। बलरामपुर रियासत थी, अवध की मशहूर तालुकेदारी थी वहाँ, समझिये कि लखनऊ और गोरखपुर के बीच की सबसे बड़ी जगह वही थी। वहीं मैं डी.ए.वी. स्कूल से हाई स्कूल कर रहा था। वहाँ एक बहुत अच्छा स्कूल था, एल.सी. कहलाता था, लॊयल कॊलिजिएट, महाराजा का बनवाया हुआ था और बहुत अच्छा था। उसमें बहुत अच्छे अध्यापक होते थे। संस्कृत के पं. रामप्रगट मणि थे। उर्दू में थे इशरत साहेब जिनको हम गुरू जी कहते थे। वहाँ मुशायरे बहुत अच्छे होते थे, बहुत अच्छे कवि सम्मेलन होते थे। एक बार कवि सम्मेलन हुआ वहाँ, उसी में रमई काका आये हुए थे।

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 रमई काका के साथ एक कवि थे, ‘सरोज’ नाम में था उनके। नये कवि थे, मशहूर थे। लेकिन रमई काका ज्यादा मशहूर थे। तब रमई काका की उमर रही होगी ३५-४० के बीच में। अच्छे दिखते थे, पतले थे। काली शेरवानी पहने थे। पान खाए हुए थे। उन्होंने काव्य-पाठ किया। उन्होंने जो कविताएँ पढ़ीं, तो उसकी पंक्तियाँ सभी को याद हो गईं। अवधी में थी, बैसवाड़ी में। इतना प्रभाव पड़ा उनके काव्य-पाठ का, कि हम लोगों ने एक बार उनका काव्य-पाठ सुना और कविताएँ याद हो गयीं। कवि सम्मेलन समाप्त होने के बाद भी हम लोग उन कविताओं को पढ़ते घूमते।

जो कविता उनकी सुनी थी, उसका शीर्षक था — ध्वाखा होइगा। अभी याद है, इसकी पंक्तियाँ इस तरह हैं:
हम गयन याक दिन लखनउवै , कक्कू संजोगु अइस परिगा
पहिलेहे पहिल हम सहरु दीख , सो कहूँ–कहूँ ध्वाखा होइगा!
जब गएँ नुमाइस द्याखै हम , जंह कक्कू भारी रहै भीर
दुई तोला चारि रुपइया कै , हम बेसहा सोने कै जंजीर
लखि भईं घरैतिन गलगल बहु , मुल चारि दिनन मा रंग बदला
उन कहा कि पीतरि लै आयौ , हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा!
इसमें फिर तमाम स्थितियाँ आती हैं, हम कहाँ-कहाँ गये फिर वहाँ क्या हुआ। एक जो गाँव का ग्रामीण है वह शहर जाता है तो उसे अपरिचित दुनिया मिलती है। उस अपरिचित दुनिया में वह अपने को ढाल नहीं पाता। वहाँ का आचार-विचार-व्यवहार सब अपरिचित होता है। वह भी उस दुनिया में आश्चर्य में रहता है और दूसरे भी उसे लेकर आश्चर्य में पड़ते हैं। इसमें एक जगह है, दुकान में जैसे औरत की मूर्ति बनाकर कपड़े पहना देते हैं तो वह ग्रामीण उसे सचमुच की औरत समझ बैठता है, लोगों के बताने पर समझ में आता है कि ‘ध्वाखा होइगा।’ फिर एक जगह सचमुच की औरत को वह माटी की मूर्ति समझ कर हाथ रख बैठता है, स्थिति इस तरह बन जाती है, ‘उइ झझकि भकुरि खउख्वाय उठीं , हम कहा फिरिव ध्वाखा होइगा!’ बहुत अच्छी कविता है।

रमई काका की कविताएँ देशभक्ति की भावना से भरी हुई हैं। उनकी हर तरह की कविताओं में, चाहे वह हास्य कविताएँ हों, व्यंग्य की कविताएँ हों, शृंगार की कविताएँ हों; सबमें देशभक्ति का भाव रचा-बसा है। एक तो देशभक्ति का भाव दूसरे वे कविताएँ आदमी को बनाने की, संवारने की, कर्तव्य पथ पर लगाने की प्रेरणा देती थीं। एक तरफ तो कविताओं में देशभक्ति का पाठ था दूसरी तरफ वे कविताएँ एक आचार-संहिता भी इससे प्रस्तुत करती थीं; चाहे हास्य से, चाहे व्यंग्य से, चाहे करुणा से, चाहे उत्साह देकर। ये कविताएँ जीवनवादी कविताएँ भी हैं। चूँकि ये कविताएँ अवधी में थीं इसलिए बड़ी आत्मीय थीं। बड़ा फर्क पड़ जाता है, कविता कोई अपनी बोली में हो, कविता कोई राष्ट्रभाषा में हो और कविता कोई विदेशी भाषा में हो। आस्वाद में भी बड़ा अंतर पड़ जाता है।

भारत वर्ष नया नया आजाद हुआ था। उस समय बड़ा उत्साह-आह्लाद था। आशा-आकांक्षा भी थी। हालांकि विभाजन की त्रासदी झेल रहा था देश, और वह भी कविता में व्यक्त होता था। ये जो कविताएँ अवधी में हैं, भोजपुरी में हैं या दूसरी बोलियों में हैं, हम लोग समझते हैं कि इनमें ज्यादातर हास्य या व्यंग्य की ही कविताएँ होती हैं। इन कविताओं के सौंदर्य-पक्ष की कई बातों की हम उपेक्षा कर देते हैं। जैसे ‘बौछार’ की यह कविता अवधी में है, ‘विधाता कै रचना’:
जगत कै रचना सुघरि निहारि
कोयलिया बन-बन करति पुकारि
झरे हैं झर-झर दुख के पात
लहकि गे रूखन के सब गात
डरैयन नये पात दरसानि
पलैयन नये प्वाप अंगुस्यानि
पतौवन गुच्छा परे लखाय
परी है गुच्छन कली देखाय
कली का देखि हँसी है कली
गगरिया अमरित की निरमली
प्रकृति की इतनी सुन्दर कविताएँ निराला को छोड़ दीजिये तो शायद ही खड़ी बोली के किसी कवि के यहाँ मिलें। निराला की भाषा और इस भाषा में कितना अंतर है। एकदम सीधे असर! ‘जगत कै रचना सुघरि निहारि / कोयलिया बन-बन करति पुकारि’ : अब इसका आप विश्लेषण करें तो कोयल जो बोल रही है वह जगत की सुन्दर रचना को निहार करके बोल रही है। यह निहारना क्रिया अद्भुत क्रिया है। इसका उपयुक्त प्रयोग खड़ी बोली में निराला ने किया है। ‘सरोज स्मृति’ में जब सरोज के भाई ने उसे पीटा, दोनों बच्चे थे खेल रहे थे, तो पीट कर मनाने लगे सरोज को — ‘चुमकारा फिर उसने निहार’। बेचारी छोटी बहन है, रो रही है, ये सारी बातें उस निहारने में आ गयीं। ‘निहार’ का अप्रतिम कालजयी उपयोग तुलसीदास ने किया है। जनक के दूत जब दशरथ के यहाँ पहुँचे संदेश ले कर कि दोनों भाई सकुशल हैं, तो दशरथ दूतों से कहते हैं:
भैया, कुसल कहौ दोउ बारे।
तुम नीके निज नैन निहारे॥
‘निहारना’ देखना नहीं है। मन लगा कर देखने को निहारना कहते हैं। कोयलिया बन-बन पुकार रही है। यह तो सीधे लोकगीतों से आया है। हमारे यहाँ अवधी के कवि हैं, बेकल उत्साही, बलरामपुर के हैं, हमारे साथ पढ़ते थे। उनकी पहली कविता जो बहुत मशहूर हुई थी, ‘सखि बन-बन बेला फुलानि’। बन-बन का मतलब सर्वत्र।

ये हमारे जो कवि हैं, अन्य को दोष क्या दूँ मैंने भी नहीं किया यह काम, जिनके अंदर सौंदर्य है उनका विश्लेषण हम लोग नहीं करते। बाकी कविताओं का तो करते हैं। होता यह है कि फिर ये हमारे कवि उपेक्षित रह जाते हैं। जो इनके योग्य है, वह इन्हें मिलता नहीं है। दुर्भाग्य कुछ ऐसा है कि जिन लोगों ने अवधी भाषा को, इसके सौंदर्य को ऊपर उठाने का जिम्मा ले रखा है जोकि अच्छा काम है लेकिन मैं इस अवसर पर जरूर कहना चाहता हूँ कि उन लोगों की गतिविधियों को देख करके ऐसा नहीं लगता कि ये लोग सचमुच किसी उच्च आदर्श से, देशप्रेम से या अवधी के प्रेम से काम कर रहे हैं। कभी-कभी तो यह शक होने लगता है कि वे अपने छोटे-छोटे किसी स्वार्थ से लगे हुए हैं। ऐसे में भी ये कवि उपेक्षित रह जाते हैं। ऐसे ही कवियों में रमई काका भी हैं। वरना जरूरत तो यह है कि बहुत व्यापक दृष्टि से इन कवियों का पुनर्मूल्यांकन क्या कहें, मूल्यांकन ही नहीं हुआ है, यह किया जाय। लेकिन जनता ने इनका मूल्यांकन किया है। अभी भी जहाँ रमई काका की कविताएँ पढ़ी जाती हैं, लोग सुनते हैं, उन पर इनका असर होता है।

(प्रस्तुति: अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी। यह लेख विश्वनाथ त्रिपाठी जी द्वारा ‘बोला’ गया, जिसे बाद में लिपिबद्ध किया गया।)

यादगारी: ‘पहिलका डर’_राघव देवेश

जेठ-असाढ़ कय महीना, गरमी पुराजोर रही। दुपहरिया कय खाना लावय क भुलाय गा रहेन। पेट कोर्रा गिनत रहा। गरमसत एतना रहा कि पूछव न, लसलसी गरमी दिमाग झंड किहे रही। उमसत खूब रहा, बादर घेरे रहा, लागय कि बरसे जरूर। खाना नाहीं खाये रहेन यही के मारा छठयें घंटा मा चहरदेवारी फांदि के इसकूल से चंपत होइ लिहेन। घरे आयेन, अम्मा मिलतय पूछिन –- ‘का रे, इसकूल से काहे एतनी जल्दी भागि आयव?’ हम कहेन –- ‘मास्टर नाहीं आवा रहे, काव करतेन, सोचेन कि घरे चलिके गाय-गोरू कय चारावारा निपटाय ली। अम्मा कहिन –- ‘ठीक बाय लेकिन पहिले खाना खाय लियव अउर बोरिया बिछाइके घर कय काम पूर कै लियव। हँ..अउर खेलय तौ जायव न, नाहिँत काटिके पिठासा धइ दियब।’

कुछ देर बाद पिता जी बजारी से भुट्टा लइ के आये। गुड़िया बहिनी भूजब सुरू किहिन अव सबही मिलि के चबायन। सँझलउख हुअत रहा, बदरियान मौसम मा मुरैलौ बोलत रहे। गौधिरिया देखि के गुड़िया बहिनी लालटेन कय सीसा साफ करब सुरू किहिन। माटिक तेल भरे के बादि मा लालटेन बारि के डुढ़ुई पै धरिन, तीन दाँय संझा-माई क ध्यायिन। दुइ घरी भय नाहीं कि टुपुर-टुपुर बुंदियाय लाग। पता लाग कि लालटेन के किनारे दुइ चार पाँखी लहरियाय लागीँ। यनहीं के लभक्के मा यह दुइ बिहतुइयौ पहुँचि गयीं। नल के चौकी पै पानी छहराय के ह्वईं लालटेन धय दीन गय। ताकि पँखियै वही वारी पानी मा मरयँ-खपयँ। यनहीं के डर से खाई-पिया जल्दी होइ गय। मुल पानी बुँदियाइ के रहिगा। लाइट तनिका भै लुप्प असे भय कि मुन्ना के खेते कय टरांसफारम धाँय से उड़ि गा। लियव भईया, अब तौ बिजलियौ न आये। खाई-पिया होइगय तब सबही आपन-आपन कथरी-गुदरी लइके पक्का(छत) पै पहुँचि गा। पानी बुँदियाय के कारन पक्का ठंढान रहा, नाहीं वइसे तौ जेठ-असाढ़ कय घाम सहिके गरम तावा अस जरा करत हय। सबही पहुँड़ब सुरू किहिस। कुछ देर तौ हम धुरुब तारा औ सप्तरिसी हेरत-हेरत बितायन। यही के बिच्चे कब औंघाय गयन, पतै न लागि।

अबहीं सोये आधव घंटा न भा रहा कि सुकुल के पुरवा की वारी से धाँय-धाँय कय अवाज सुनाय परय लागि। हम अहदंक के मारा उठि-बैठि परेन। माई हमार हाँथ पकरि लिहिन। काहे से कि हम नींद मा कौने वारी ढर्रियाय जाई, पता नाहीं। केहू कहय कि हथगोला दगा तौ केहू कहय कि गोली चली। यक दुसरे के वारी से खेखारा-खेखारी हुवय लाग। अलगू, मास्टर अव सुकुल –- यै सबही सोचतय रहे कि चलि के तनी आरव लीन जाय। सबही आपन लाठी-डंडा सहेजत रहे कि अतनेन मा पुरुब टोला मा हलचल मची कि चड्ढा-बनियाइन गिरोह वाले लाव-लसकर के साथे निकरि परा अहयँ; यही वारि आवत जनाय परत अहयँ। सभय चौकन्ना होइगा अव अपने-अपने छते पै हाथे मा अद्धा लइके खड़ा होइगा। वहि सइती चोरी-चकारी कय अतना अहदंक रहा कि मनई अपनी हिफाजत के ताईं अपने छते के कोने पै रोड़ा-अद्धा कुरियाये रहत रहा। ताकी कौनौ समय जरूरति परय तौ इस्तेमाल कीन जाय। अस जनान कि चड्ढा-बनियाइन गिरोह वाले दुसरी वारी मुँड़ियाय गये। तब तनिका सबके जिउ मा जिउ आवा।

लगभग आधा घंटा के बाद फिन नरक मचा। हलचल भै कि मुँहनोचवै उतरत अहयँ। हउँफा उड़ा रहा कि यहिसाइत मुँहनोचवा अउर मुँड़कटवा उधिरान बाटे जौन कि टीबी के अंटीना से सिगनल लइके अकास से उतरत थीं; यनके खउफ से आरी-पौस्त कय मनई आपन अंटीना परमानेंटली उतारि के धै दिहे रहा…मुँहनोचवा कय बाति सुनतै हमार माई कहिन अंटिनवा तौ दिनै मा उतारि दीन गा रहा, तौ कयिसे!/? तब तक अलगू चिल्लाने कि सुकुल भैया कय लरिकवा आपन लगाय लिहे रहा महाभारत देखै के ताईं। गोहराई-गोहरावा भय। वै सरऊ जल्दी से आपन नट-बुल्ट ढील करिन। तौ सबकै जिउ थोरक्‌ ठन्टुट भा। अतनेन मा मोखड़ी वाली बगिया मा कुछ टारच लपलपाय लागीं। केहू कहिस कि मनई आम बीनत होये, तब तक सुगदेव चिल्लाय परे –- ई तौ सारै चोर बत्ती लिहे बाटे। ई बत्ती गाँव मा केहू के लगे थोरय अहय! यह दाईं फिर सबकै धुकधुकी बढ़ी। हमार तौ भूसी खसक गय रही। जिउ यक सौ पचास के उपरै धुकधुकात रहा। अब मन कहय कि अलगू औ सुगदेव जइसे मनइन का केहू चुप कराय दियै। पर करय के? गाँव भय जब जागि गा तब मनई, केहू लाठी केहू डंडा अऊर गाँव मा दुन जने के लगे बंदूक रही, वहू लाइसेंसी, वहिका लइके तनी आरव लियै बहिरियाने। आगे बंदूक वाले, पाछे डंडा-गोजी वाले। करत-करावत चारि बजिगा। डर के मारे नींद उड़नछू होइगै। घर कय मनई कामकाज मा बाझि गये। हम पाँच बजे भिनसारे डेरात-डेरात सोइ गयेन।

deveshदुसरे दिन दस बजे आँखि मुलमुलावत उठेन। उठेन तौ देखेन सबही बड़ा अफसोसात रहा। भगतिन बैठी रहीं; उनका बस इहै कहत सुनेन कि ‘बेचारे बड़ा नीक मनई रहे, अपना मरे मुला घरे वालेन का बचाय लिहिन।’ सोवय के पहिले अलगू दिमाग खराब किहे रहे अऊर अब भगतिनौ खराब खबर सुनाइन। हम उठतय अपनी बहिनी से पूछेन, तब पता लाग कि सुकुल के पुरवा मा जौन पुजारी कै बाप रहे वै राति मा चोरन का गाँव मा हलत देखि लिहे रहे अउर देखतै गोहरावय लागे –- ‘का हो! के हुवौ! कहाँ जात बाटेव!’ पता नहीं कयिसे वै ताड़ लिहे रहे कि वै सब चड्ढ़ा-बनियाइन गिरोह वाले रहे। औ ठाँवैं जोर-जोर से चिल्लाय लागे कि सबही जागि जाव हो, यह देखौ सारय… …। तब तक वहिमा से यक मिला उनपै हथगोला मारि दिहिस अउर चट्टय उनकय आँती-पोती बहिरियाय गय। खैर… अब काव कीनय जाय सकत हय! मजमा देखिके अलगुवौ मुँहे मा दतुइन कूँचत पहुँचि गये अउर यक नयी खबर सुनाइन कि काल्हि तौ भईया गजब होइगा रहा। पिता जी पूछिन –- काव हो? अलगू कहिन –- अरे भईया कुमारे ताले पै मछरी कय निगरानी करय आवा रहे। सुकुल भईया चोर समझि के बंदूक से निसाना साधि लिहे रहे लेकिन हियात रही कुमारे कय कि सुकुल भईया का सुबहा लागि गय कि कहूँ तलवा पै कुमरवा न हुवै! काहे से कि ऊ रोज तीन से चारि के बीच मा मछरी क दाना डारय आवत हय। हाँ भईया, तौ कुमारे मरत-मरत बचे।

सबका पुजारी के बाप कय बड़ा अफसोस रहा। बाता-कहानी के बाद सबही अपने थाने-पवाने होइ लिहिस। ई हमार पहिलका डर रहा जेहमन हनुमान चालिसव पढ़े से काम न चला। हम भूते क सम्हारि लिहेन पर मुँहनोचवा से हमार जान हलक मा अटकि गय। दुइ दिन तौ बरबस रारि ठानि लिहेन औ इसकूल न गयेन।

राघव देवेश अवधी कय युवा कवि-लेखक हुवयँ। पढ़ाई; जल्दियै ग्रेजुएसन पूर भवा, एम्मे कy तैयारी मा अहयँ। इनसे आप  9910618062 पै संपर्क कय सकत हयँ। 

अवधी गीत : वा है जिंदगी.

11951257_892598724141326_3811047311510933059_nई अवधी गीत सुशील सिद्धार्थ भैया रचिन हयँ। ओनसे अनुरोध किहे रहेन कि वय आपन रचा कुछ भेजयँ। तौ ई अवधी गीत भेजिन। ई गीत जिंदगी का हय, कवन जिंदगी सारथक जिंदगी कही जाय, यहिपै अहय। ई गीत यक तरह से जागरन गीत के नायिँव देखा जाय सकत हय। ्सुशील सिद्धार्थ परिचय कै मोहताज नाय हयँ। हिन्दी व्यंग बिधा मा ओनकै लेखनी यहिरी धमाल मचाये अहय। अब ई गीत गुनगुनावा जाय, लेकिन जागरन गीत वाली उरजा के साथे, तनिका लंफाय के। : संपादक
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अवधी गीत : वा है जिंदगी

चाहे सब नखत बुतायं,सोम ब्योम मा समायं
मुलु न तुम कह्यो कि राति है
जी की लगन ना बुताय जौनु दे गगन लचाय
वहिकी भोर जगमगाति है

रोसनी लिखै तौ वा है जिंदगी
दे जियबु सिखै तौ वा है जिंदगी
बिनु थके चलै तौ वा है जिंदगी
झूठु का खलै तौ वा है जिंदगी।।

चलि परै तौ राह मा पहाड़ बन कि बाघु होय
मुलु कहूं तनिकु रुकै न बीच मा
पाखु जौ अंधेरु होय आंखि मा उजेरु होय
काफिला फंसै न काल कीच मा
आंधी सिरु झुकाइ देइ राह खुद बनाइ देइ
सागरनु कि का बिसाति है
जी की लगन ना बुताय जौनु दे गगन लचाय
वहिकी भोर जगमगाति है

घामु मा तचै तौ वा है जिंदगी
मुलु घटा रचै तौ वा है जिंदगी
सांचु पर डटै तौ वा है जिंदगी
इंचु ना हटै तौ वा है जिंदगी।।

प्रीति कै गुलाल बनि प्रतीति पै निहाल होय
धार लौटि देति सब गुमान की
ग्यान कै मिसाल होय त्याग कै मसाल होय
जइसे राधारानी जइसे जानकी
आखरन म वा समाय जोति बीच झिलमिलाय
कालु उइते हारि जाति है
जी की लगन ना बुताय जौनु दे गगन लचाय
वहिकी भोर जगमगाति है

फूलु जस झरै तौ वा है जिंदगी
दुखु सकल हरै तौ वा है जिंदगी
यादि मा बसै तौ वा है जिंदगी
पीर मा हंसै तौ वा है जिंदगी॥

भूमि जल गगन पवन अगिनि क कर्जु दे उतारि
जो मिला हियां हियैं लुटाय दे
जिंदगिक जियाय जाय जगु समूच पाय जाय
अइस अपने आपु का गंवाइ दे
राह छांह छूटि जाय ई तना जो जसु कमाय
दुनिया देखि कै सिहाति है
जी की लगन ना बुताय जौनु दे गगन लचाय
वहिकी भोर जगमगाति है

धार मा धंसै तौ वा है जिंदगी
पांवु ना फंसै तौ वा है जिंदगी
आंबु जस फरै तौ वा है जिंदगी
प्रीति रसु भरै तौ वा है जिंदगी।।

__सुशील सिद्धार्थ
संपर्क: 08588015394

बजरंग बिहारी ‘बजरू’ केर गजल (१) : गजल मामूली है लेकिन लिहेबा सच्चाई.

bajrang b tपहिल मार्च सन १९७२ क अवध के गोन्डा जिला मा बजरंग बिहारी ‘बजरू’ क्यार जनम भा रहा। देहाती जिंदगी अउर भासा से यनकै सुरुआती जीवन अस सना कि ऊ पूरी उमिर भर कय अटूट हिस्सा होइगा। जइसे सबकै पढ़ाई-लिखाई कय भासा खड़ी बोली-हिन्दी होइ जात हय, अइसनै यनहूँ के साथे भा। मुला जउन बहुतन के साथे हुअत हय ऊ यनके साथे नाय भा! काव? यहय कि बादि मा खड़ी बोली-हिन्दी कय बिख्यात लेखक हुवय के बादौ अपनी मातरीभासा से जुड़ाव नाहीं टूट। मुदा ई जुड़ाव जाहिर कयिसे हुवय? यहिकी ताईं ‘बजरू’, यहि अवधी नाव से यइ अवधी गजलन का लिखै क सुरू किहिन। अउर आजु ई देखि के जिउ बार-बार हरसित ्हुअत हय कि यहि साइत अवधी कबिताई मा जौन आधुनिक चेतना कय कमी इन अवधी गजलन से पुरात हय, वहिके खातिर पूरा अवधी साहित्त यनपै नाज करत हय औ करत रहे। अब अवधी गजलन से रूबरू हुवा जाय। : संपादक
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[१]

हेरित है इतिहास जौन दिन झूठ बदलि कै फुर होइगा
झूर आँख अंसुवात जौन दिन झूठ बदलि कै फुर होइगा।
हंडा चढ़ा सिकार मिले बिनु राजाजी बेफिकिर रहे
बोटी जब पहुंची थरिया मा झूठ बदलि कै फुर होइगा।
बिन दहेज सादी कै चर्चा पंडित जी आदर्स बने
कोठी गाड़ी परुआ1 पाइन झूठ बदलि कै फुर होइगा।
“खाली हाथ चले जाना है” साहूजी उनसे बोले
बस्ती खाली करुआइन जब झूठ बदलि कै फुर होइगा।
‘बजरू’ का देखिन महंथ जी जोरदार परबचन भवा
संका सब कपूर बनि उड़िगै झूठ बदलि कै फुर होइगा।

[२]

चढ़ेन मुंडेर मुल2 नटवर3 न मिला काव करी
भयी अबेर मुल नटवर न मिला काव करी।
रुपैया तीस धरी जेब, रिचार्ज या रासन
पहिलकै ठीक मुल नटवर न मिला काव करी।
जरूरी जौन है हमरे लिए हमसे न कहौ
होत है देर मुल नटवर न मिला काव करी।
माल बेखोट है लेटेस्ट सेट ई एंड्राइड   
नयी नवेल मुल नटवर न मिला काव करी।
रहा वादा कि चटनी चाटि कै हम खबर करब
बिसरिगा स्वाद मुल नटवर न मिला काव करी।

[३]

गजल मामूली है लेकिन लिहेबा सच्चाई
बिथा4 किसान कै खोली कि लाई गहराई।
इस्क से उपजै इसारा चढ़ै मानी कै परत
बिना जाने कसस बोली दरद से मुस्काई।
तसव्वुर दुनिया रचै औ’ तसव्वुफ अर्थ भरै
न यहके तीर हम डोली न यहका लुकुवाई5
धरम अध्यात्म से न काम बने जानित है
ककहरा राजनीति कै, पढ़ी औ’ समझाई।
समय बदले समाज बोध का बदल डारे
बिलाये वक्ती गजल ई कहैम न सरमाई।
चुए ओरौनी जौन बरसे सब देखाए परे
‘बजरू’ कै सच न छुपे दबै कहाँ असनाई।

[४]

चले लखनऊ पहुंचे दिल्ली,
चतुर चौगड़ा6 बनिगा गिल्ली7
हाटडाग सरदी भय खायिन,
झांझर8 भये सुरू मा सिल्ली9
समझि बूझि कै करो दोस्ती,
नेक सलाह उड़ावै खिल्ली।
बब्बर सेर कार मा बैठा ,
संकट देखि दुबकि भा बिल्ली।
‘बजरू’ बचि कै रह्यो सहर मा,
दरकि जाय न पातर झिल्ली।

  1. परुआ= यूँ ही, मुफ्त में
  2. मुल= लेकिन
  3. नटवर= नेटवर्क
  4. बिथा= व्यथा, पीड़ा
  5. लुकुआई= छिपाना
  6. चौगड़ा= खरगोश
  7. गिल्ली= गिलहरी
  8. झांझर= जीर्ण-शीर्ण, कमज़ोर
  9. सिल्ली= शिला, चट्टान

सम्पर्क: 
फ्लैट नं.- 204, दूसरी मंजिल,
मकान नं. T-134/1,
गाँव- बेगमपुर,
डाकखाना- मालवीय नगर,
नई दिल्ली-110 017
फोन- 09868 261895