यादगारी: ‘पहिलका डर’_राघव देवेश

जेठ-असाढ़ कय महीना, गरमी पुराजोर रही। दुपहरिया कय खाना लावय क भुलाय गा रहेन। पेट कोर्रा गिनत रहा। गरमसत एतना रहा कि पूछव न, लसलसी गरमी दिमाग झंड किहे रही। उमसत खूब रहा, बादर घेरे रहा, लागय कि बरसे जरूर। खाना नाहीं खाये रहेन यही के मारा छठयें घंटा मा चहरदेवारी फांदि के इसकूल से चंपत होइ लिहेन। घरे आयेन, अम्मा मिलतय पूछिन –- ‘का रे, इसकूल से काहे एतनी जल्दी भागि आयव?’ हम कहेन –- ‘मास्टर नाहीं आवा रहे, काव करतेन, सोचेन कि घरे चलिके गाय-गोरू कय चारावारा निपटाय ली। अम्मा कहिन –- ‘ठीक बाय लेकिन पहिले खाना खाय लियव अउर बोरिया बिछाइके घर कय काम पूर कै लियव। हँ..अउर खेलय तौ जायव न, नाहिँत काटिके पिठासा धइ दियब।’

कुछ देर बाद पिता जी बजारी से भुट्टा लइ के आये। गुड़िया बहिनी भूजब सुरू किहिन अव सबही मिलि के चबायन। सँझलउख हुअत रहा, बदरियान मौसम मा मुरैलौ बोलत रहे। गौधिरिया देखि के गुड़िया बहिनी लालटेन कय सीसा साफ करब सुरू किहिन। माटिक तेल भरे के बादि मा लालटेन बारि के डुढ़ुई पै धरिन, तीन दाँय संझा-माई क ध्यायिन। दुइ घरी भय नाहीं कि टुपुर-टुपुर बुंदियाय लाग। पता लाग कि लालटेन के किनारे दुइ चार पाँखी लहरियाय लागीँ। यनहीं के लभक्के मा यह दुइ बिहतुइयौ पहुँचि गयीं। नल के चौकी पै पानी छहराय के ह्वईं लालटेन धय दीन गय। ताकि पँखियै वही वारी पानी मा मरयँ-खपयँ। यनहीं के डर से खाई-पिया जल्दी होइ गय। मुल पानी बुँदियाइ के रहिगा। लाइट तनिका भै लुप्प असे भय कि मुन्ना के खेते कय टरांसफारम धाँय से उड़ि गा। लियव भईया, अब तौ बिजलियौ न आये। खाई-पिया होइगय तब सबही आपन-आपन कथरी-गुदरी लइके पक्का(छत) पै पहुँचि गा। पानी बुँदियाय के कारन पक्का ठंढान रहा, नाहीं वइसे तौ जेठ-असाढ़ कय घाम सहिके गरम तावा अस जरा करत हय। सबही पहुँड़ब सुरू किहिस। कुछ देर तौ हम धुरुब तारा औ सप्तरिसी हेरत-हेरत बितायन। यही के बिच्चे कब औंघाय गयन, पतै न लागि।

अबहीं सोये आधव घंटा न भा रहा कि सुकुल के पुरवा की वारी से धाँय-धाँय कय अवाज सुनाय परय लागि। हम अहदंक के मारा उठि-बैठि परेन। माई हमार हाँथ पकरि लिहिन। काहे से कि हम नींद मा कौने वारी ढर्रियाय जाई, पता नाहीं। केहू कहय कि हथगोला दगा तौ केहू कहय कि गोली चली। यक दुसरे के वारी से खेखारा-खेखारी हुवय लाग। अलगू, मास्टर अव सुकुल –- यै सबही सोचतय रहे कि चलि के तनी आरव लीन जाय। सबही आपन लाठी-डंडा सहेजत रहे कि अतनेन मा पुरुब टोला मा हलचल मची कि चड्ढा-बनियाइन गिरोह वाले लाव-लसकर के साथे निकरि परा अहयँ; यही वारि आवत जनाय परत अहयँ। सभय चौकन्ना होइगा अव अपने-अपने छते पै हाथे मा अद्धा लइके खड़ा होइगा। वहि सइती चोरी-चकारी कय अतना अहदंक रहा कि मनई अपनी हिफाजत के ताईं अपने छते के कोने पै रोड़ा-अद्धा कुरियाये रहत रहा। ताकी कौनौ समय जरूरति परय तौ इस्तेमाल कीन जाय। अस जनान कि चड्ढा-बनियाइन गिरोह वाले दुसरी वारी मुँड़ियाय गये। तब तनिका सबके जिउ मा जिउ आवा।

लगभग आधा घंटा के बाद फिन नरक मचा। हलचल भै कि मुँहनोचवै उतरत अहयँ। हउँफा उड़ा रहा कि यहिसाइत मुँहनोचवा अउर मुँड़कटवा उधिरान बाटे जौन कि टीबी के अंटीना से सिगनल लइके अकास से उतरत थीं; यनके खउफ से आरी-पौस्त कय मनई आपन अंटीना परमानेंटली उतारि के धै दिहे रहा…मुँहनोचवा कय बाति सुनतै हमार माई कहिन अंटिनवा तौ दिनै मा उतारि दीन गा रहा, तौ कयिसे!/? तब तक अलगू चिल्लाने कि सुकुल भैया कय लरिकवा आपन लगाय लिहे रहा महाभारत देखै के ताईं। गोहराई-गोहरावा भय। वै सरऊ जल्दी से आपन नट-बुल्ट ढील करिन। तौ सबकै जिउ थोरक्‌ ठन्टुट भा। अतनेन मा मोखड़ी वाली बगिया मा कुछ टारच लपलपाय लागीं। केहू कहिस कि मनई आम बीनत होये, तब तक सुगदेव चिल्लाय परे –- ई तौ सारै चोर बत्ती लिहे बाटे। ई बत्ती गाँव मा केहू के लगे थोरय अहय! यह दाईं फिर सबकै धुकधुकी बढ़ी। हमार तौ भूसी खसक गय रही। जिउ यक सौ पचास के उपरै धुकधुकात रहा। अब मन कहय कि अलगू औ सुगदेव जइसे मनइन का केहू चुप कराय दियै। पर करय के? गाँव भय जब जागि गा तब मनई, केहू लाठी केहू डंडा अऊर गाँव मा दुन जने के लगे बंदूक रही, वहू लाइसेंसी, वहिका लइके तनी आरव लियै बहिरियाने। आगे बंदूक वाले, पाछे डंडा-गोजी वाले। करत-करावत चारि बजिगा। डर के मारे नींद उड़नछू होइगै। घर कय मनई कामकाज मा बाझि गये। हम पाँच बजे भिनसारे डेरात-डेरात सोइ गयेन।

deveshदुसरे दिन दस बजे आँखि मुलमुलावत उठेन। उठेन तौ देखेन सबही बड़ा अफसोसात रहा। भगतिन बैठी रहीं; उनका बस इहै कहत सुनेन कि ‘बेचारे बड़ा नीक मनई रहे, अपना मरे मुला घरे वालेन का बचाय लिहिन।’ सोवय के पहिले अलगू दिमाग खराब किहे रहे अऊर अब भगतिनौ खराब खबर सुनाइन। हम उठतय अपनी बहिनी से पूछेन, तब पता लाग कि सुकुल के पुरवा मा जौन पुजारी कै बाप रहे वै राति मा चोरन का गाँव मा हलत देखि लिहे रहे अउर देखतै गोहरावय लागे –- ‘का हो! के हुवौ! कहाँ जात बाटेव!’ पता नहीं कयिसे वै ताड़ लिहे रहे कि वै सब चड्ढ़ा-बनियाइन गिरोह वाले रहे। औ ठाँवैं जोर-जोर से चिल्लाय लागे कि सबही जागि जाव हो, यह देखौ सारय… …। तब तक वहिमा से यक मिला उनपै हथगोला मारि दिहिस अउर चट्टय उनकय आँती-पोती बहिरियाय गय। खैर… अब काव कीनय जाय सकत हय! मजमा देखिके अलगुवौ मुँहे मा दतुइन कूँचत पहुँचि गये अउर यक नयी खबर सुनाइन कि काल्हि तौ भईया गजब होइगा रहा। पिता जी पूछिन –- काव हो? अलगू कहिन –- अरे भईया कुमारे ताले पै मछरी कय निगरानी करय आवा रहे। सुकुल भईया चोर समझि के बंदूक से निसाना साधि लिहे रहे लेकिन हियात रही कुमारे कय कि सुकुल भईया का सुबहा लागि गय कि कहूँ तलवा पै कुमरवा न हुवै! काहे से कि ऊ रोज तीन से चारि के बीच मा मछरी क दाना डारय आवत हय। हाँ भईया, तौ कुमारे मरत-मरत बचे।

सबका पुजारी के बाप कय बड़ा अफसोस रहा। बाता-कहानी के बाद सबही अपने थाने-पवाने होइ लिहिस। ई हमार पहिलका डर रहा जेहमन हनुमान चालिसव पढ़े से काम न चला। हम भूते क सम्हारि लिहेन पर मुँहनोचवा से हमार जान हलक मा अटकि गय। दुइ दिन तौ बरबस रारि ठानि लिहेन औ इसकूल न गयेन।

राघव देवेश अवधी कय युवा कवि-लेखक हुवयँ। पढ़ाई; जल्दियै ग्रेजुएसन पूर भवा, एम्मे कy तैयारी मा अहयँ। इनसे आप  9910618062 पै संपर्क कय सकत हयँ। 

अवधी गीत : वा है जिंदगी.

11951257_892598724141326_3811047311510933059_nई अवधी गीत सुशील सिद्धार्थ भैया रचिन हयँ। ओनसे अनुरोध किहे रहेन कि वय आपन रचा कुछ भेजयँ। तौ ई अवधी गीत भेजिन। ई गीत जिंदगी का हय, कवन जिंदगी सारथक जिंदगी कही जाय, यहिपै अहय। ई गीत यक तरह से जागरन गीत के नायिँव देखा जाय सकत हय। ्सुशील सिद्धार्थ परिचय कै मोहताज नाय हयँ। हिन्दी व्यंग बिधा मा ओनकै लेखनी यहिरी धमाल मचाये अहय। अब ई गीत गुनगुनावा जाय, लेकिन जागरन गीत वाली उरजा के साथे, तनिका लंफाय के। : संपादक
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अवधी गीत : वा है जिंदगी

चाहे सब नखत बुतायं,सोम ब्योम मा समायं
मुलु न तुम कह्यो कि राति है
जी की लगन ना बुताय जौनु दे गगन लचाय
वहिकी भोर जगमगाति है

रोसनी लिखै तौ वा है जिंदगी
दे जियबु सिखै तौ वा है जिंदगी
बिनु थके चलै तौ वा है जिंदगी
झूठु का खलै तौ वा है जिंदगी।।

चलि परै तौ राह मा पहाड़ बन कि बाघु होय
मुलु कहूं तनिकु रुकै न बीच मा
पाखु जौ अंधेरु होय आंखि मा उजेरु होय
काफिला फंसै न काल कीच मा
आंधी सिरु झुकाइ देइ राह खुद बनाइ देइ
सागरनु कि का बिसाति है
जी की लगन ना बुताय जौनु दे गगन लचाय
वहिकी भोर जगमगाति है

घामु मा तचै तौ वा है जिंदगी
मुलु घटा रचै तौ वा है जिंदगी
सांचु पर डटै तौ वा है जिंदगी
इंचु ना हटै तौ वा है जिंदगी।।

प्रीति कै गुलाल बनि प्रतीति पै निहाल होय
धार लौटि देति सब गुमान की
ग्यान कै मिसाल होय त्याग कै मसाल होय
जइसे राधारानी जइसे जानकी
आखरन म वा समाय जोति बीच झिलमिलाय
कालु उइते हारि जाति है
जी की लगन ना बुताय जौनु दे गगन लचाय
वहिकी भोर जगमगाति है

फूलु जस झरै तौ वा है जिंदगी
दुखु सकल हरै तौ वा है जिंदगी
यादि मा बसै तौ वा है जिंदगी
पीर मा हंसै तौ वा है जिंदगी॥

भूमि जल गगन पवन अगिनि क कर्जु दे उतारि
जो मिला हियां हियैं लुटाय दे
जिंदगिक जियाय जाय जगु समूच पाय जाय
अइस अपने आपु का गंवाइ दे
राह छांह छूटि जाय ई तना जो जसु कमाय
दुनिया देखि कै सिहाति है
जी की लगन ना बुताय जौनु दे गगन लचाय
वहिकी भोर जगमगाति है

धार मा धंसै तौ वा है जिंदगी
पांवु ना फंसै तौ वा है जिंदगी
आंबु जस फरै तौ वा है जिंदगी
प्रीति रसु भरै तौ वा है जिंदगी।।

__सुशील सिद्धार्थ
संपर्क: 08588015394

बजरंग बिहारी ‘बजरू’ केर गजल (१) : गजल मामूली है लेकिन लिहेबा सच्चाई.

bajrang b tपहिल मार्च सन १९७२ क अवध के गोन्डा जिला मा बजरंग बिहारी ‘बजरू’ क्यार जनम भा रहा। देहाती जिंदगी अउर भासा से यनकै सुरुआती जीवन अस सना कि ऊ पूरी उमिर भर कय अटूट हिस्सा होइगा। जइसे सबकै पढ़ाई-लिखाई कय भासा खड़ी बोली-हिन्दी होइ जात हय, अइसनै यनहूँ के साथे भा। मुला जउन बहुतन के साथे हुअत हय ऊ यनके साथे नाय भा! काव? यहय कि बादि मा खड़ी बोली-हिन्दी कय बिख्यात लेखक हुवय के बादौ अपनी मातरीभासा से जुड़ाव नाहीं टूट। मुदा ई जुड़ाव जाहिर कयिसे हुवय? यहिकी ताईं ‘बजरू’, यहि अवधी नाव से यइ अवधी गजलन का लिखै क सुरू किहिन। अउर आजु ई देखि के जिउ बार-बार हरसित ्हुअत हय कि यहि साइत अवधी कबिताई मा जौन आधुनिक चेतना कय कमी इन अवधी गजलन से पुरात हय, वहिके खातिर पूरा अवधी साहित्त यनपै नाज करत हय औ करत रहे। अब अवधी गजलन से रूबरू हुवा जाय। : संपादक
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[१]

हेरित है इतिहास जौन दिन झूठ बदलि कै फुर होइगा
झूर आँख अंसुवात जौन दिन झूठ बदलि कै फुर होइगा।
हंडा चढ़ा सिकार मिले बिनु राजाजी बेफिकिर रहे
बोटी जब पहुंची थरिया मा झूठ बदलि कै फुर होइगा।
बिन दहेज सादी कै चर्चा पंडित जी आदर्स बने
कोठी गाड़ी परुआ1 पाइन झूठ बदलि कै फुर होइगा।
“खाली हाथ चले जाना है” साहूजी उनसे बोले
बस्ती खाली करुआइन जब झूठ बदलि कै फुर होइगा।
‘बजरू’ का देखिन महंथ जी जोरदार परबचन भवा
संका सब कपूर बनि उड़िगै झूठ बदलि कै फुर होइगा।

[२]

चढ़ेन मुंडेर मुल2 नटवर3 न मिला काव करी
भयी अबेर मुल नटवर न मिला काव करी।
रुपैया तीस धरी जेब, रिचार्ज या रासन
पहिलकै ठीक मुल नटवर न मिला काव करी।
जरूरी जौन है हमरे लिए हमसे न कहौ
होत है देर मुल नटवर न मिला काव करी।
माल बेखोट है लेटेस्ट सेट ई एंड्राइड   
नयी नवेल मुल नटवर न मिला काव करी।
रहा वादा कि चटनी चाटि कै हम खबर करब
बिसरिगा स्वाद मुल नटवर न मिला काव करी।

[३]

गजल मामूली है लेकिन लिहेबा सच्चाई
बिथा4 किसान कै खोली कि लाई गहराई।
इस्क से उपजै इसारा चढ़ै मानी कै परत
बिना जाने कसस बोली दरद से मुस्काई।
तसव्वुर दुनिया रचै औ’ तसव्वुफ अर्थ भरै
न यहके तीर हम डोली न यहका लुकुवाई5
धरम अध्यात्म से न काम बने जानित है
ककहरा राजनीति कै, पढ़ी औ’ समझाई।
समय बदले समाज बोध का बदल डारे
बिलाये वक्ती गजल ई कहैम न सरमाई।
चुए ओरौनी जौन बरसे सब देखाए परे
‘बजरू’ कै सच न छुपे दबै कहाँ असनाई।

[४]

चले लखनऊ पहुंचे दिल्ली,
चतुर चौगड़ा6 बनिगा गिल्ली7
हाटडाग सरदी भय खायिन,
झांझर8 भये सुरू मा सिल्ली9
समझि बूझि कै करो दोस्ती,
नेक सलाह उड़ावै खिल्ली।
बब्बर सेर कार मा बैठा ,
संकट देखि दुबकि भा बिल्ली।
‘बजरू’ बचि कै रह्यो सहर मा,
दरकि जाय न पातर झिल्ली।

  1. परुआ= यूँ ही, मुफ्त में
  2. मुल= लेकिन
  3. नटवर= नेटवर्क
  4. बिथा= व्यथा, पीड़ा
  5. लुकुआई= छिपाना
  6. चौगड़ा= खरगोश
  7. गिल्ली= गिलहरी
  8. झांझर= जीर्ण-शीर्ण, कमज़ोर
  9. सिल्ली= शिला, चट्टान

सम्पर्क: 
फ्लैट नं.- 204, दूसरी मंजिल,
मकान नं. T-134/1,
गाँव- बेगमपुर,
डाकखाना- मालवीय नगर,
नई दिल्ली-110 017
फोन- 09868 261895

डॉ. प्रदीप शुक्ल कय कबिता.

प्रदीप शुक्ल केरी कबिताई से आज आप लोगन क रूबरू कराउब। प्रदीप शुक्ल कय अउरिउ कबितन क पढ़ेन, औ पढ़े के बादि ई समझ मा आवा कि सामाजिक-राजनीतिक सोसन मा पिसत मनई क हिगारब(यानी सामने लाउब) इन कबितन कय मूल संबेदना आय। हजार जखम खाये मनई के साथे जवन आवाज निकरत हय ऊ तनिका आँकर हुयिन जाति हय, औ ऊ चुभाऊ ब्यंग कय सकलि लइ लियत हय। इनकी कबितन मा भासा एतनी सरल अउर समझय मा आसानि अहय कि अलग से कौनौ मेहनत नाहीं करय क परत। यहीताईं पढ़यके साथे-साथे कबिता से जुड़ाव बना रहत हय। हियाँ हम आपनि पसंद कय चारि कबितन क रखत अहन। कबितन क चुनत के हमार ई कोसिस रही कि अलग-अलग मिजाज केरी कबितन क रखी। : संपादक
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देसप्रेमु का पाठु फलाने 

समझाईति है तुमका, ना
एतना उत्पातु करौ
देसप्रेमु का पाठु फलाने
फिर ते यादि करौ

ऊपर ते सब जय जय ब्वालैं
अन्दर खूनु पियैं
अईसन मा ई भारत माता
कब तक भला जियैं
ई च्वारन का मारौ पहिले
ताल ठोंकि सम्भरौ

‘टुकड़ा टुकड़ा करिबे यहिके’
जो ब्वालै यहु नारा
नटई ते तुम पकरौ वहिका
दई देव देसु निकारा
लेकिन बात सुनौ अउरिनु की
थ्वारा धीरु धरौ

बेमतलब ना रागु अलापौ
देसप्रेमु का भइय्या
रामदीन द्याखौ भूखा है
भूखी वहिकी गईय्या
रुपिया चढ़ा जाय फ़ुनगी
पहिले वहिका पकरौ

एतना बड़ा देसु, दुई नारन
ते यहु टूटि न जाई
का चाहति हौ, देस भक्ति
हम माथे पर लिखवाई?
खुलि जाई जो यह जबान
ना पईहौ अपन घरौ

समझाईति है तुमका ना
एतना उत्पातु करौ
देसप्रेमु का पाठु फलाने
फिर ते यादि करौ.
(19.02.2016)


घर घर यहै कहानी 

सड़क किनारे बनी दुकानें
ख्यात मरैं बिनु पानी
चले जाव गाँवन मा भईय्या
घर घर यहै कहानी

उलरे उलरे
फिरैं मुसद्दी
अंट शंट गोहरावैं
आधा बिगहा खेतु बेंचि कै
दारू ते मुंहु ध्वावैं
लरिका करै मजूरी घर मा
कढ़िलि रहीं जगरानी
चले जाव गाँवन मा भईय्या
घर घर यहै कहानी

जी जमीन का
बप्पा गोड़िनि,
दादा औ परदादा
जहिमा पानी कम, पुरिखन का
मिला पसीना जादा
बंजर होईगै धरती वहि पर
जाय न कुतिया कानी
चले जाव गाँवन मा भईय्या
घर घर यहै कहानी

सिटी बनी स्मार्ट
हुआँ पर 
करिहैं चौकीदारी
नंबर वन के काश्तकार जो
अब तक रहैं मुरारी
कालोनी के पीछे डरिहैं
आपनि छप्पर छानी
चले जाव गाँवन मा भईय्या
घर घर यहै कहानी.
(29.01.2016)


चुप हैं राम दुलारे

झाँखर बारे
तपता तापैं
मजमा लाग दुआरे
बहस होय रही संविधान पर
चुप हैं राम दुलारे

सोचि रहे हैं
संविधान मा
भला लिखा का होई
यहु काहे नहिं लिखा
देस मा भूखा कोउ न सोई
लिखौ होई तौ
छुपा लिहिन
होईहैं उई मिलिकै सारे

पईसा, दारू
जो बाँटी
फिरि वहु पाई परधानी
पाँचि साल मा वहिके घर मा
लछमी भरिहैं पानी
संविधान मा
यहौ लिखा का
भईया राम पियारे

संविधान के
‘ हम ‘ पर काफी
जोर दिहिनि हैं कक्का
देसु मगर चेलवन की बातन
ते है हक्का बक्का
भरी दुपहरी
हमका लागति
अईहैं बदरा कारे

बहस होय रही संविधान पर
चुप हैं राम दुलारे.
(28.11.2015)


नई बहुरिया दावत ठाने है

काकी बइठे जिरजिराँय कोउ
बात न माने है
नए साल मा नई बहुरिया
दावत ठाने है

काकी खटिया पर
बरोठ मा
खाँसे जाती हैं
बीच बीच मा काका के
ऊपर चिल्लाती हैं
काका द्याखैं टुकुर टुकुर
बैठे सिरहाने हैं
नए साल मा नई बहुरिया
दावत ठाने है

‘ पानी – पानी ‘ के
ऊपर बस
नाचि रहे सारे
बहुत देर ते पानी माँगति
काका बेचारे
अधखाई थाली खटिया
रक्खी पैताने है
नए साल मा नई बहुरिया
दावत ठाने है

बड़की भौजी
डारे घूँघट
नाचि रहीं जमके
नई बहुरिया पैंट पहिन
पूरे आँगन थिरके
खाँसि खखारति ससुरौ का
वह ना पहिचाने है
नए साल मा नई बहुरिया
दावत ठाने है
(31-12-2014)

10178123_793805877304865_5314846030965715777_nडॉ. प्रदीप शुक्ल
जन्म – 29 जून, 1967 को लखनऊ जिले के छोटे से गांव भौकापुर के एक गरीब किसान परिवार में.
शिक्षा – प्रारम्भिक शिक्षा गांव में ही, बी.एससी. कान्यकुब्ज कॉलेज, लखनऊ. एम बी बी एस, एम डी – बालरोग ( स्वर्ण पदक ) – किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज, लखनऊ
वर्तमान में लखनऊ में “ केवल बच्चों के लिए एक हॉस्पिटल “ जहां पर चौबीस घंटे बीमार बच्चों की देखभाल के लिए उपलब्ध, उसी से कुछ समय चुरा कर कविता लिखने का प्रयास.
प्रकाशित रचनाएँ –
1. संयुक्त काव्य संग्रह –
1. नवगीत का लोकधर्मी सौन्दर्यबोध
2. वीथिका
3. पारिजात
4. अनुभूति के इन्द्रधनुष ( सभी गीत, नवगीत, बालगीत )
2. विभिन्न पत्र, पत्रिकाओं, वेब पत्रिकाओं में गीत, नवगीत, बालगीत, कुण्डलिया, कह–मुकरी आदि विधाओं में रचनाएं प्रकाशित.
सम्पर्क:
गंगा चिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल
N. H. – 1, सेक्टर – डी, LDA कॉलोनी, कानपुर रोड, लखनऊ – 226012
मोबाइल – 09415029713
E – Mail – drpradeepkshukla@gmail.com

अवधी साहित्य के शिखर साहित्यकार चंद्रभूषण त्रिवेदी ‘रमई काका’

ई आलेख बिख्यात अवधी साहित्यकार रमई काका के ऊपर लिखा गा हय जौन हमैं नवंबर-१५ मा दोस्त हिमांशु बाजपेयी के जरिये मिला रहा। यानी, काका केरी जन्म-शताब्दी-वर्ष मा। यहिका चित्रलेखा जी लिखिन हँय। हम उन कय आभारी हन। : संपादक
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*चित्रलेखा वर्मा

हिन्दी साहित्य जगत में साहित्यिक प्रतिभा के धनी, अवधी के लोक-नायक, यशस्वी चंद्रभूषण त्रिवेदी का विख्यात नाम ‘रमई काका’ है। आधुनिक अवधी काव्य की परिधि अत्यंत विस्तृत है और रमई काका अवध क्षेत्र के सर्वप्रिय जनकवि हैं।  

ramai

रमई काका

आपका जन्म २ फरवरी १९१५ में जनपद उन्नाव के रावतपुर नामक गाँव में हुआ था। आपके पिता पं. वृंदावन त्रिवेदी फौज में नौकरी करते थे तथा प्रथम विश्व युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। उस समय वे केवल एक वर्ष के थे। काका की आत्मकथा से पता चलता है कि पिता की मृत्यु के बाद माँ गंगा देवी को सरकार से कुल तीन सौ रूपए मिलते थे जिनसे वे अपने परिवार को चलाती थीं। इस तरह उनका बचपन संकटों और कष्टों में बीता। पर आपका लालन-पालन इस तरह से हुआ कि ग्राम संस्कृति काका के जीवन का पर्याय बन गयी क्योंकि आपकी प्राथमिक शिक्षा ग्रामीण वातावरण में हुई थी। हाई स्कूल की परीक्षा अटल बिहारी स्कूल से उत्तीर्ण की। इसके पश्चात आपने नियोजन विभाग में निरीक्षक का पद सम्हाला। निरीक्षक पद  का प्रशिक्षण लेने के लिए वे मसौधा-फैजाबाद में कुछ समय रहे। अपने प्रशिक्षण काल में भी आपने अपनी प्रतिभा से प्रशिक्षकों को प्रभावित किया। यहाँ उन्होंने कई कविताएँ लिखीं तथा कई एकांकियों का मंचन भी किया।

‘गड़बड़ स्कूल’ एकांकी ने यहाँ के लोगों का बहुत मनोरंजन किया। यहाँ के बाद उनकी नियुक्ति उन्नाव के बोधापुर केंद्र में हो गयी। यहाँ इन्होंने बहुत मेहनत की। फलतः इनके केंद्र को संपूर्ण लखनऊ कमिश्नरी में प्रथम स्थान मिला। उन्हें गवर्नर की ‘सर हेनरी हेग शील्ड’ प्रदान की गयी। इस केंद्र पर काम करते हुए काका ने एक बैलगाड़ी बनायी जिसमें बालवियरिंग का प्रयोग हुआ था तथा ढलान से उतरते समय उसमें ब्रेक का भी प्रयोग किया जा सकता था।

यद्यपि आपने शास्त्रीय एवं सुगम संगीत का विधिवत प्रशिक्षण नहीं लिया था परंतु अपनी प्रतिभा के ही बल पर शास्त्रीय और सुगम संगीत का ज्ञान प्राप्त किया। २७ वर्ष की उम्र में १९४१ में काका लखनऊ आकाशवाणी में नियुक्त हुए और स्थानीय रूप से लखनऊ में बस गये। काका आकाशवाणी में ६२ वर्ष की आयु तक रहे और १९७७ में सेवानिवृत्त हुए। इसके दो वर्ष बाद दो-दो वर्षों के लिए उनका सेवाकाल बढ़ाया भी गया। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे निष्क्रिय नहीं हुए और आकाशवाणी, दूरदर्शन, समाचार पत्र, पत्रिकाओं और कवि सम्मेलनों से जुड़े रहे। आकाशवाणी पर आपने अनेक भूमिकाएँ भी निभायीं। सन्तू दादा, चतुरी चाचा, बहिरे बाबा आदि उनकी भूमिकाएँ थीं। रमई काका के अतिरिक्त उनको बहिरे बाबा के नाम से भी ख्याति मिली। बहिरे बाबा धारावाहिक ने तो प्रसारण का कीर्तिमान स्थापित कर दिया था। यह धारावाहिक २५ से भी अधिक वर्षों तक आकाशवाणी से प्रसारित हुआ।

यद्यपि काका स्थायी रूप लखनऊ में रहे पर उनका संपर्क गाँव से जीवन भर बना रहा। शहर में रहते हुए आपने अपने ग्रामीण मन को बचाए रखा। रमई काका का काव्य अवध के गाँव से बहुत गहराई से जुड़ा होने के कारण आकाशवाणी (पंचायत घर), दूरदर्शन और एच.एम.वी. के रिकार्डर के माध्यम से उनकी कविताएँ अवध अंचल में रच-बस गयीं। ‘मौलवी’ रमई काका की पहली उपलब्ध कविता है। यह कविता उन्होंने ‘पडरी’ के मिडिल स्कूल में पढ़ते हुए लिखी थी। इस कविता पर काका के अपने गुरु पं. गौरीशंकर जी से आशीर्वाद मिला था कि काका एक कवि के रूप में विख्यात होंगे।

रमई काका हास्य-व्यंग्य कवि के रूप में काफी विख्यात रहे। उनकी प्रकाशित तीन कविताओं में ‘फुहार’,‘गुलछर्रा’ तथा ‘हास्य के छींटे’ हास्य-व्यंग्य रचनाओं ही संकलन हैं। ‘बौछार’ उनकी प्रथम और ‘भिनसार’ उनकी दूसरी कृति है। इन दोनों पुस्तकों में अधिकतर व्यंग्य रचनाएँ हैं। इनके बारे में संक्षिप्त जानकारी इसप्रकार है, बौछार १९४४ ई. में छपी। बौछार ग्रामजीवन, प्रकृति-चित्रण, छायावादी काव्य, राष्ट्रप्रेम, सामाजिक भावना और जनवाद से प्रेरित ३० कविताओं का संकलन है। भिनसार में ४२ कविताएँ हैं। इसकी कविताएँ वर्षा की बूँदों से तन-मन को भिगोती हुई हास्य-व्यंग्य की मिठास से भरी हैं। ‘नेता जी’ सुभाषचंद्र बोस पर लिखा गया है। यह आल्ह छंद में लिखा गया है। परंपरागत शैली में लिखा वीर रस का यह अनूठा काव्य है।

‘हरसति तरवारि’ तथा ‘माटी के बोल’ शीर्षक पुस्तकों में अधिकांश गीत रचनाएँ हैं, ये लोकधुनों पर आधारित हैं। हास्य के छींटे, गुलछर्रा, तीर के समान प्रहार करती हुई उत्कृष्ट व्यंग्य उकेरती हुई पाठकों का मनोरंजन करती हैं। ये खड़ी बोली की कविताओं के संकलन हैं। सभी काका के जीवन के उत्तरार्ध में लिखी गयी थीं। शेष सभी संकलनों की भाषा अवधी है।

इनकी पुस्तकें हजारों-लाखों की संख्या में छपीं और बिकीं।

काका की तीन नाट्य-कृतियाँ भी प्रकाशित हुई थीं। ‘रतौंधी’ पुस्तक में आठ तथा ‘बहिरे बोधन बाबा’ शीर्षक पुस्तक में ७ एकांकियाँ-नाटक संकलित हैं। काका की खड़ी बोली की चार एकांकियों का एक संकलन जुगनू नाम से प्रकाशित हुआ था। ‘कलुवा बैल’ एक अवधी उपन्यास भी आपने लिखा पर यह प्रकाशित नहीं हो सका। ‘स्वतंत्र भारत सुमन’ पत्रिका में यह धारावाहिक के रूप में छपा था।

काका की कई गंभीर रचनाओं-लेखों के संकलित रूप का प्रकाशन आज तक नहीं हो पाया, यद्यपि इस संकलन की अधिकांश कविताएँ ‘भिनसार’ और ‘बौछार’ में प्रकाशित हो चुकी थीं। किन्तु अनेक महत्वपूर्ण रचनाएँ अभी भी अप्रकाशित हैं। इन रचनाओं में ‘भोर की किरन’, ‘सुखी कब होहिहै गाँव हमार’, ‘गाँव है हमका बहुत पियार’, ‘छाती का पीपर’ आदि अनेक लोकप्रिय कविताएँ हैं। काका के नाठकों का एक बहुत बड़ा भाग आज भी अप्रकाशित है। ‘हंस किसका है’ शीर्षक एक बालोपयोगी एकांकियों का संकलन है। यह अगर प्रकाशित हो तो बालकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है।

वृद्धावस्था में ब्रांकाइटिस रोग से वे पीड़ित थे। अन्त में १९८२ की फरवरी में इतने बीमार हो गये कि फिर सम्हल ही नहीं पाए और अंत में १८ अप्रैल १९८२ की प्रातःकाल को उनका निधन हो गया। उनका गाँव से मोह तो था ही पर वे बहुत सुसंस्कृत नागरिक थे। साधारण रहन सहन वाले चंद्रभूषण त्रिवेदी तुलसी, गांधी और आर्यसमाज के विचारों से प्रभावित थे। उनका गाँव आर्यसमाज का गढ़ था तथा पं. प्रयागदत्त, जो वेदों के प्रकाण्ड पंडित थे, उस गाँव में रहते थे।

वे असाधारण मेधा वाले रचनाकार तो थे ही साथ में उनको लेखक, नाटककार, अभिनेता और संगीतज्ञ के रूप में भी कम सम्मान नहीं मिला। रमई काका के विपुल साहित्य की अनुपलब्धता के कारण उनके साहित्य को पढ़ने का उत्सुक एक बड़ा पाठक समुदाय अधिकांशतः अपने को हताश-निराश और निरुपाय अनुभव करता है। रमई काका के समग्र साहित्य का मूल्यांकन भी होना शेष है। रमई काका का साहित्य सर्वजन को सुलभ हो सके, इसका भी कुछ प्रयास होना चाहिए।

अवधी कविता के शिखर साहित्यकार रमई काका केवल किसानों के कवि नहीं, स्वयं भी कविता के किसान थे जिन्होंने कागज रूपी धरती पर अक्षर बीज बो कर मुस्कान और हास्य की जो फसल तैयार की है वह आज तक पाठकों को हँसाती और गुनगुनाती है।

चित्रलेखा वर्मा

चित्रलेखा वर्मा

इस शताब्दी वर्ष में हास्य के अमर कवि रमई काका के चरणों में अपना शत शत नमन निवेदित करते हुए ईश्वर से यही प्रार्थना करती हूँ कि काका की अमर कृतियों की प्रेरणा से सभी पाठकों व रचनाकारों में हँसाने की क्षमता प्राप्त हो।

(नवंबर-२०१५)

अवधी साहित्य की समस्या और आचार्य कवि श्याम सुंदर मिश्र ‘मधुप’

इंटरनेट पै मधुप जी के अवधी अवदान क ध्यान मा रखिके लिखा ई पहिल आलेख आय। यहिते पहिले बस आप  उनके साथ भवा यक इंटब्यू जरूर देखि सकत हँय। यहि आलेख क बड़े लव से युवा अवधी अध्येता सैलेन्दर सुकुल लिखिन हैं। हम उनकय बहुत आभारी हन्‌। : संपादक
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*शैलेन्द्र कुमार शुक्ल

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मधुप जी के साथ शैलेन्द्र शुक्ल

अवधी कविता अपने आप में ही आचार्यत्व की एक खरी कसौटी है। जिस भाषा में जायसी, तुलसी और रहीम जैसे आचार्य कवि हुये हों उस भाषा की कविताई के साथ खिलवाड़ नहीं हो सकती। भाषा का अपना एक चरित्र होता है, इस प्रकार हर भाषा अपने स्वभाव का इतिहास और भूगोल अपनी संस्कृति में रचती है। मध्य काल की प्रारम्भिक अवस्था से ही अवधी का विराट वैभव काशी से कान्यकुब्ज तक दिखाई पड़ता है जब की इसका केंद्र अवध ही था । पं॰दामोदर शर्मा के ग्रंथ ‘उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण’ से लेकर जगनिक के आल्ह-खंड तक इसे देखा जा सकता है।इसी भाषा में सूफी कविता की एक स्ंवृद्ध परंपरा मिलती है, जिसकी तुलना विश्व के किसी भी पुराने साहित्यिक और सांस्कृतिक आंदोलनों से की जा सकती है। ऐसा विराट आंदोलन और व्यापक पहल शायद फिर कभी दिखाई नहीं पड़ी। इस काव्यपरंपरा के लगभग सारे कवि मुसलमान थे। इन मुसलमान कवियों ने अवधी की जो साझा संस्कृति रची वह अवधी और हिन्दी में ही नहीं विश्व साहित्य में भी एक महत्वपूर्ण मिसाल के तौर पर पेश की जा सकती है। यह काव्यधारा एक संक्रमण की संस्कृति है, जहां भाषा एंटी-वाइरेस का काम करती है। मानवीय मूल्यों का कलात्मक संरक्षण भाषा के साहित्यिक होने का बड़ा प्रमाण है। एक प्रश्न यहाँ जायज है इन सूफी कवियों ने अवधी भाषा को ही क्यों चुना ?जबकि अवधी के साथ-साथ समय का अनुगमन ब्रज-भाषा भी कर रही थी औरब्रजभाषा का स्वाभाविक चरित्र प्रेम के लिए ज्यादा निकट था, प्रेमगाथाओं के अनुकूल भी ! इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि ब्रजभाषा प्रबंध के लिए तैयार न थी और दूसरा यह कि इन सूफी कवियों को केवल प्रेम ही स्थापित करने का लक्ष्य न था । वह जीवन के विविध पक्षों की विराटता लिखना चाहते थे। कुछ सूफी कवि इसी तरह के प्रेमाख्यानक अन्य लोक भाषाओं में भी लिख रहे थे, लेकिन जो ऊंचाई अवधी के प्रेमाख्यानों की है वह अन्यों की नहीं। यह अवधी भाषा के सामर्थ्य का एक जोरदार पहलू है।

डॉ॰ श्याम सुंदर मिश्र ‘मधुप’(1922-2014)अवधी साहित्य के पहले इतिहासकर हैं। वह अवधी के प्रगतिशील कवि और आचार्यत्व के गुणों से परिचित एक प्रबुद्ध आलोचक भी। उनका लोचनात्मक व्यक्तित्व लोक की समाजशास्त्रीय पद्धति के आलोक में दिखाई पड़ता है । उन्होंने अपनी मातृभाषा अवधी में बड़ा काम किया । और यह कम महत्वपूर्ण नहीं कि जब स्थापित खड़ीबोली हिंदी को लेकर एक दूसरे की पीठ सहलाने वाले लोग विद्वता का ढोंग बड़े बड़े के नाम पर सिर्फ हिंदी का ढिढोरा पिटा जा रहा हो, संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषाओं में हिंदी को शामिल किए जाने का दबाव बढ़ रहा हो, यह सब जिन लोगों द्वारा किया जा रहा हो उन्हें यह मालूम ही न हो कि हिंदी आखिर है क्या ! इनकी नजर में क्या हिंदी के पहले कवि हरिऔध हैं ! बहरहाल हिंदी के विदूषकों ने यहीं माहौल बना रखा है । हिंदी के महत्वपूर्ण आलोचक डॉ॰ मैनेजर पाण्डेय की यह उक्ति कितनी प्रासंगिक है ‘आजकल भूमंडलीकरण की जो आँधी चल रही है हर बुद्धिजीवी स्थानीय होने से पहले राष्ट्रीय बन जाना चाहता है और राष्ट्रीय होने से पहले अंतरराष्ट्रीय’। इससे हिंदी का कोई हित होने वाला नहीं है यह बात तो तय है । डॉ॰ मधुप ऐसे ही कठिन समय में उस हिंदी के लिए काम करते रहे जो हिंदी जायसी, तुलसी और रहीम की हिंदी थी । जिस हिंदी पर हिंदी साहित्य के इतिहासकारों ने मध्यकाल से ही ताला लगा दिया था । और यह भी विचारणीय तथ्य है कि भक्तिकाल में अवधी हिंदी का स्वर्णयुग रच रही थी,संत और भक्त कवियों की वाणी इसी भाषा का वैभव बनी । इस युग में यह भाषा अपने स्वभाव को और भी स्वाभाविक बना चुकी थी । इसका यह भी बड़ा प्रमाण है कि इस भाषा ने राजदरबारों में जाने से परहेज किया । इस तरह रीतिकाल भर यह भाषा चुप्पी साधे रही यानी ‘रहिमन चुप ह्वै बैठिए देखि दिनन को फेर’ लेकिन यह चुप्पी एक लंबी लड़ाई की तैयारी कर रही थी, जिसकी वही स्वाभाविक धमक और उतनी ही तेज धार आधुनिक युग में दिखाई पड़ती है । डॉ॰ ‘मधुप’ अपने ग्रंथ ‘अवधी साहित्य के इतिहास’ में अवधी की आधुनिक कविता का प्रस्थान बिंदु काशी के बाबू भारतेन्दु हरिश्चंद्र को मानते हैं ।भारतेन्दु के बारे में अपनी बात रखते हुये वह कहते हैं “अपनी काव्यभाषा को ब्रज-भाषा रखते हुये भी उन्होंने अपनी सामयिक रचनाओं के लिए जनभाषा अवधी की सादगी का सहारा लिया”। यहाँ मधुप जी अवधी को जन भाषा इस लिए भी कह रहे हैं क्योंकि अवधी लंबे समय तक हिंदी भाषी प्रान्तों की संपर्क भाषा रही है । इस तथ्य की ओर सुनीति कुमार चटर्जी ने ‘उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण’ की भूमिका लिखते हुये इशारा किया था जिसे डॉ॰ रामविलास शर्मा ने काफी उधेड़बुन के बाद स्पष्ट रूप में व्याख्यायित किया है ।

डॉ॰ मधुप का इतिहास ग्रंथ अवधी की पुरानी परंपरा को परखते हुये अवधी की आधुनिक साहित्य परंपरा की एक महत्वपूर्ण खोज है । डॉ॰ मधुप शहरों की साहित्यिक चकाचौंध और विमर्शों के झंडाबरदारों से बचते हुये हिंदी की उस स्वाभाविक परंपरा को साधने का काम किया जिसे विद्वता के अभिमानी दिहाती बोली कह कर छुट्टी ले लेते हैं ।वह पक्के दिहाती थे और दिहाती होना उनकी स्वाभाविक विद्वता का सबसे मजबूत पहलू । उन्होंने अंत तक अपने गाँव मैनासी-सरैयां (सीतापुर) को नहीं छोड़ा । वह आर॰एम॰पी डिग्री कॉलेज, सीतापुरमें अध्यापन कार्य करते हुये खुद को देहाती हिंदी के लिए समर्पित कर दिया । उन्होंने अवधी में बड़ा काम किया । वह मूलतःअवधी कवि थे और कविताई का आचार्यत्व उनमे था । उनके काव्यग्रंथ ‘गाउँ का सुरपुर देउ बनाइ’,‘जगि रहे गांधी केर सपन’,‘खेतवन का देखि-देखि जीउ हुलसइ मोर’ तथा ‘घास के घरौंदे’ अवधी साहित्य की निधि हैं । इन किताबों की कवितायें आज भी बूढ़े किसानों के मुह सीतापुर के आस-पास के गांवों में सुनने को मिल जाएंगी । इसके अतिरिक्त उन्होंने अवधी की उस विरासत को सहेजा, जो बिखरीपड़ी थी उसे संपादित किया । इस तरह के ग्रन्थों में ‘वंशीधर शुक्ल ग्रंथावली’,‘अवधी की राष्ट्रीय कवितायें’, आदि प्रमुख है । उन्होंने अवधी की साहित्य परंपरा को आगे बढ़ाते हुये कई महत्वपूर्ण शोध-ग्रंथ और आलोचना पुस्तकें दीं जिनमें ‘परंपरा के परिपेक्ष्य में आधुनिक अवधी काव्य’,‘आधुनिक अवधी काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ’,‘अवधी काव्यधारा’,‘अवधी कविता की नई लीक के प्रवर्तक: बलभद्र प्रसाद दीक्षित ‘पढ़ीस’’, तथा ‘अवधी के आधुनिक कवि’ प्रमुख हैं । इसके अतिरिक्त जिसके आधार पर उन्हें अवधी का रामचन्द्र शुक्ल कहा जाता है वह है ‘अवधी साहित्य का इतिहास’ । इस इतिहास ग्रंथ में उन्होंने जो बहुत ही जटिल और मुश्किल काम को अंजाम दिया वह है आधुनिक अवधी साहित्य की खोज । अवधी के आधुनिक साहित्यकारों का साहित्य जो सहज उपलब्ध नहीं मिलता,क्योंकि यह राजकमल, वाणी, और ज्ञानपीठ से नहीं छपा।इधर हाल ही में जगदीश पीयूष द्वारा संपादित अवधी ग्रंथावली वाणी प्रकाशन से छप चुकी है लेकिन इसमे भी आधुनिक कवियों की सिर्फ एक–एक कविता संग्रहीतहै। यह साहित्य बहुत कुछ आज भी अप्रकाशित ही है और जो भी छपा है वह स्थानीय छोटे-छोटे प्रकाशनों से। इनमें से अधिकांश प्रकाशन अब बंद भी हो गए हैं । और जो चालू हालत में हैं उनके पास पुरानी पुस्तकें उपलब्ध नहीं है और नई छापने की हिम्मत अब उनमें नहीं, क्योंकि बाजार में इनकी मांग नहीं है। अवधी के तमाम साहित्यकार जो इस बदहाली में मर गए, या अपने अंतिम पड़ाव पर जीवित हैं, उनके घर वाले या वे स्वयं किसी अपरिचित को साहित्य देने में संकोच करते हैं,कि कहीं वह इसे अपने नाम से न छपवा ले । कई लोलुपों ने यह किया भी। अवधी की इसी आधुनिक पीढ़ी में मधुप जी भी थे जो जाते-जाते यह महत्वपूर्ण काम कर गए जिसे उनके अलावा कोई मुश्किल से ही कर पता। मधुप जी के पास एक दुर्लभ पुस्तकालय था। इस बात का प्रमाण उनका यह ग्रंथ है।

मधुप जी ने इस किताब में साहित्य के इतिहास लेखन की दृष्टि हिंदी साहित्य के इतिहास से ग्रहण की। और यह ही इस किताब की सबसे बड़ी कमजोरी है। उन्होंने अवधी की आधुनिक काव्यधारा में छायावाद और रहस्यवाद जो दिखाया है वह बेमतलब की चीज है। अवधी की नई लीक के प्रवर्तक बलभद्र दीक्षित ‘पढ़ीस’ अपने प्रारम्भिक अवस्था से ही पूर्णतः प्रगतिशील थे। उनकी कावताओं में प्रगतिशीलता के वह गुण विद्यमान हैं जिन्हे हिंदी कविता की मूल (या बेमूल) धारा में खोजना आज भी मुश्किल है। रही बात रमई काका की जो छायावाद के बाद की उपज हैं। सिर्फ इन दो कवियों के यहाँ मधुप जी ने छायावाद और रहस्यवाद देख लिया और इन दोनों के बीच की कड़ी वंशीधर शुक्ल को सीधे छोड़ दिया क्योंकि यह कवि स्वतन्त्रता आंदोलन के समय क्रांति का अलाव जलाए बैठा था । अब जब अवधी में छायावाद या रहस्यवाद नहीं था तो नहीं था,उसे जबरन ठेल कर पता नहीं क्या प्रमाणित करना चाहते थे । बहरहाल इसके आगे उन्होंने अवधी की प्रगतित्रई की जो स्थापना की और उसकी जो ऐतिहासिक पड़ताल की वह अपने आप में बहुत ही महत्वपूर्ण है । इन कवियों के साथ मधुप जी ने साहित्य की ऐतिहासिक ऊर्जा दिखाई । मधुप जी ने अवधी की प्रगतिशील परंपरा की एक लंबी कतार दिखाई । कवियों के बारे में भी लिखा और कविता के उदाहरण भी दिये । अवधी में हो रहे गजल और नवगीत लेखन को भी रेखांकित किया। इसके अतिरिक्त इस ग्रंथ में उन्होंने अवधी की पुरानी परमम्परा जो दोहा-चौपाई-बरवै की थी वह आधुनिक अवधी में कब तक चलती रही और उसमे क्या-क्या लिखा जाता रहा ,यह सब दिखाया है जो अपने आप में एक इतिहास दृष्टि का मानक है ।

इस प्रकार हम देखते हैं मधुप जी ने लगभग 300 आधुनिक अवधी कवियों का हवाला देते हुये उनकी कविताओं के जिस प्रकार उदाहरण दिये हैं वह अपने आप में एक बहुत ही जटिल और निहायत मुश्किल काम था क्योंकि यह अवधी साहित्य के इतिहास का पहला ग्रंथ है । साहित्य के इतिहास का पहला ग्रंथ लिखना कितना मुश्किल होता है यह बताने अवश्यकता नहीं । मधुप जी नें यह बड़ा काम किया है । जिसके लिए साहित्य प्रेमी उनके सदा ऋणी रहेंगे।

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शैलेन्द्र कुमार शुक्ल
शोधार्थी: म.गां.अं.हिं.वि.वि.,वर्धा (महाराष्ट्र)
मो.07057467780
ई-मेल: shailendrashuklahcu@gmail.com 

काका लोक-करुणा के भी बड़े कवि हैं!

हिमांशु बाजपेयी 

2015 अवधी भाषा के महत्वपूर्ण कवि-नाटककार चन्द्रभूषण त्रिवेदी उर्फ रमई काका का जन्मशताब्दी वर्ष है. पढ़ीस और वंशीधर शुक्ल के साथ रमई काका अवधी की उस अमर ‘त्रयी’ का हिस्सा हैं जिसकी रचनात्मकता ने तुलसी और जायसी की अवधी को एक नई साहित्यिक समृद्धि प्रदान की. यूं अवधी की इस कद्दावर तिकड़ी के तीनों सदस्य बहुत लोकप्रिय रहे लेकिन सुनहरे दौर में आकाशवाणी लखनऊ के साथ सफल नाटककार और प्रस्तोता के बतौर लंबे जुड़ाव और अपने अद्वितीय हास्य-व्यंग्यबोध के चलते रमई काका की लोकप्रियता सचमुच अद्भुत और असाधारण रही है. रेडियो नाटकों का उनका हस्ताक्षर चरित्र ‘बहिरे बाबा’ तो इस कदर मशहूर रहा कि आज भी उत्तर भारत के पुराने लोगों में रमई काका का नाम  भले ही सब न जानें लेकिन बहिरे बाबा सबको अब तक याद हैं.

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अपनी अफसानवी मकबूलियत को रमई काका ने अपने रचनाकर्मी सरोकारों और दायित्वबोध पर कभी हावी नहीं होने दिया. उनके नाटक और कविताएं अपने समय से मुठभेड़ का सशक्त माध्यम बनीं. उनकी भाषा में गजब की सादगी और अपनेपन की सौंधी-सी खुशबू बसी हुई थी. अपने लोगों से अपनी भाषा में अपनी बात कहते हुए उन्होंने अपने समय के ज्वलंत सवालों को संबोधित किया. हालांकि उन्होंने खड़ी बोली में भी लिखा लेकिन उनकी पहचान हमेशा अवधी से जुड़ी रही. हास्य-व्यंग्य के अपने जाने पहचाने रंग में तो वे बेजोड़ रहे ही, उन्होंने दिल में उतर जानेवाली संजीदा कविताएं भी लिखीं. उस दौर में जब खड़ी बोली के कई बड़े साहित्यकार लोकभाषाओं को भाषा नहीं फकत बोली कहकर खड़ीबोली को उन पर तरजीह दे रहे थे और दूसरों से भी उसी में लिखने का आग्रह कर रहे थे उस वक्त रमई काका अवधी में उत्कृष्ट लेखन करते हुए, अपने समय के जरूरी सवालों को उठाते हुए और अत्यधिक लोकप्रिय होते हुए ये सिद्ध कर रहे थे कि अवधी भाषा-साहित्य केवल रामचरितमानस और पद्मावत तक सीमित किसी गुजरी हुई दास्तान का नाम नहीं है, बल्कि ये एक ज़िन्दा कारवान-ए-सुखन का नाम है जो अभी कई मंज़िलें तय करेगा.

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के रावतपुर गांव में 2 फरवरी 1915 जन्मे रमई काका कविता तो किशोरावस्था में ही लिखने लगे थे लेकिन उनकी प्रतिभा को सही मकाम 1941 में मिला जब उन्होंने आकाशवाणी के कर्मचारी के बतौर लखनऊ को अपना निवास-स्थान बनाया. नौकरी के लिए गांव छोड़ने के बाद वे जिंदगीभर लखनऊ में ही रहे लेकिन इसके बावजूद उनकी कविताओं में गांव और कृषि प्रधान संस्कृति की मौजूदगी हमेशा बनी रही. गांव का उनका प्रकृति चित्रण अनूठा है लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि वे गांव को किसी आउटसाइडर यानी शहरवाले की नजर से नहीं बल्कि एक इनसाइडर के बतौर देखते और बयान करते हैं. दुखिया गिरिस्ती, धरती हमरि, सुखी जब हुइहैं गांव हमार, धरती तुमका टेरि रही है आदि अनेक उत्कृष्ट कविताएं रमई काका ने गांव के जीवन पर लिखी हैं. डाॅ. रामविलास शर्मा ने रमई काका के बारे में लिखा है- ‘उनकी गंभीर रचनाओं में एक विद्रोही किसान का उदात्त स्वर है, जो समाज में अपने महत्वपूर्ण स्थान को पहचानता रहा है और अधिकार पाने के लिए कटिबद्ध हो गया है.’

लोकभाषाओं को पिछड़ेपन की निशानी आैर खुद को प्रगतिशील माननेवालों काे यह जानना बहुत जरूरी है कि रमई काका की अवधी में लिखी गईं ग्राम्य जीवन पर आधारित कविताओं में चौंकानेवाली प्रगतिशीलता और विद्रोह का स्वर मिलता है. इसकी बानगी के तौर पर ‘अनोखा परदा’ और ‘छाती का पीपर’ आदि कविताएं देखी जा सकती हैं. अपने समय के सामाजिक यथार्थ को भी वे पुख्तगी से बयान करते हैं. सामाजिक विसंगतियों और कुरीतियों जैसे परदा प्रथा, जाति प्रथा, बेमेल विवाह, सामंतवाद, सूदखोरी को निशाने पर रखते हुए भी उन्होंने बहुत कुछ लिखा है. यहां इस बात को रेखांकित करना जरूरी हो जाता है कि उनकी कविताओं में हास्य-व्यंग्य की इतनी ज्यादा चर्चा हुई कि उनकी कविता के कई जरूरी और गंभीर पक्ष ठीक से पहचाने नहीं  गए. वैसे भी हास्य-व्यंग्य को, यदि वह ग्रामभाषा का हो तो और भी, गंभीरता से ग्रहण करने की कोशिश प्रायः नहीं होती. रमई काका के लोक-हास्य की खूब तारीफ हुई तो उनकी कविता में निबद्ध लोक-करुणा की अनदेखी भी हुई. निर्विवाद रूप से काका लोक-करुणा के भी बड़े कवि हैं. इस संदर्भ में अवधी के विद्वान डॉ. अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी कहते हैं- ‘रमई काका की कविताओं में व्याप्त लोक-करुणा एक तरफ ग्रामीणों-किसानों-मजदूरों-स्त्रियों का दुख-दर्द कहती है वहीं दूसरी तरफ वह बरतानिया हुकूमत में पराधीनता की व्यथा को भी मार्मिकता के साथ दर्ज करती है. उसमें परबसता की पीड़ा है, ‘सब बुद्धि बिबेकु नसावै परबसता धीरे-धीरे’ तो ‘परबसता’ से मुक्ति के भिनसार (सुबह) की प्रतीक्षा भी, ‘धीर धरु भिनसार होई!’’

संजीदा मिजाज की बेशुमार बेहतरीन कविताएं लिखने के बावजूद काका की पहचान उनकी हास्य व्यंग्य शैली ही है. लिखा भी उन्होंने इसी में सबसे ज्यादा. उनकी हास्य-व्यंग्य कविताओं का एक लोकप्रिय विषय गांव की नजर से शहर को देखने का भी रहा है. इनमें उनकी कविताएं ‘हम कहा बड़ा ध्वाखा हुई गा’ सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुईं हैं. कविता की दुनिया में शुरुआती ख्याति उन्हें ‘ध्वाखा’ कविता से ही मिली. इसमें गांव से पहली बार लखनऊ गए एक आदमी के साथ जो कुछ घटित हुआ उसका मजाकिया अंदाज में बयान है. इसके अलावा हास्य व्यंग्य शैली में लिखीं उनकी ई छीछालेदर द्याखौ तौ, नैनीताल, कचेहरी,अंधकार के राजा, नाजुक बरखा, बुढ़ऊ का बियाहु आदि कविताएं भी बहुत मशहूर हुईं.

अपनी इन्हीं कविताओं के माध्यम से रमई काका कई दशकों तक कवि सम्मेलनों में धूम मचाते रहे. उन्होंने अपनी लम्बी साहित्यिक यात्रा के दौरान विपुल साहित्य रचा है, जिसका बहुत सारा हिस्सा अभी भी अप्रकाशित है. उनकी कविताओं का पहला संकलन ‘बौछार’ 1944 में छपा जो बहुत लोकप्रिय रहा. इसके बाद भिनसार, नेताजी, फुहार, गुलछर्रा, हरपाती तरवारि, हास्य के छींटे और माटी के बोल आदि काव्य संकलन आए.
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हिमांशु बाजपेयी

कविता के अलावा नाटकों और एकांकियों में भी रमई काका अवधी के सबसे बड़े नाम हैं. नाटकों की भी उनकी तीन पुस्तकें रतौंधी, बहिरे बोधन बाबा और मि. जुगनू छपी. आकाशवाणी लखनऊ के लिए उन्होंने पचास से ज्यादा लोकप्रिय नाटक लिखे और उनमें अभिनय भी किया. इनमें ‘बहिरे बोधन बाबा’ सबसे मशहूर है. ये आकाशवाणी के इतिहास का सबसे लंबा और लोकप्रिय धारावाहिक नाटक है जो 1957 से 1982 तक लगातार चला. कुल 121 कड़ियोंवाला यही नाटक रमई काका का दूसरा नाम बन चुका है. नाटक की विषयवस्तु ग्राम्य जीवन पर आधारित होती थी एवं ग्रामीण जीवन की समस्याओं एवं मुद्दों को उठाती थी. बहिरे बोधन बाबा के अलावा रमई काका के लिखे मगन मिस्तरी परिवार, जगराना बुआ, चपल चंदू, नटखट नंदू, छोटई लुटई, अफीमी चाचा, खिचड़ी, हरफनमौला, खोखे पंडित, जंतर मंतर, मटरू मामा एवं गदरभ राग आदि रेडियो नाटक भी बहुत लोकप्रिय रहे. गौरतलब है कि रमई काका का लिखा हर नाटक हास्य व्यंग्य शैली का होने के बावजूद किसी न किसी गंभीर सामाजिक समस्या पर केंद्रित होता था. जनसाधारण में रमई काका की लोकप्रियता को देखते हुए आकाशवाणी ने उनसे उस समय की लगभग सभी सामाजिक समस्याओं पर नाटक लिखवाए जिन्होंने अपना व्यापक असर भी दिखाया. कवि और नाटककार के रूप में लोकप्रियता का शिखर पानेवाले रमई काका ने अवधी लेख एवं निबंध भी काफी लिखे जो समय-समय पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे.

काका 1977 में आकाशवाणी से रिटायर हो गए लेकिन रेडियो से उनका जुड़ाव बना रहा. 18 अप्रैल 1982 को लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली. आकाशवाणी लखनऊ की लोकप्रियता में काका की बड़ी भूमिका रही. 1965 में आकाशवाणी को लिखे गए एक पत्र में मशहूर साहित्यकार अमृतलाल नागर ने लिखा- ‘एक मैं ही नहीं, मेरे मत से आपके केंद्र के असंख्य श्रोता भी एक ही उमंग में सम्मिलित होकर एक स्वर से कहेंगे कि काका रेडियो के अनमोल रत्न हैं.’ 2013 में आकाशवाणी लखनऊ के 75 साल पूरे होने के मौके पर संस्थान ने रमई काका की सेवाओं को याद करते हुए ‘जन-मन के रमई काका’ नाम से एक श्रंखला का प्रसारण किया जो काफी लोकप्रिय रहा.

जन्मशती के मौके पर निहायत जरूरी है कि रमई काका के तमाम प्रकाशित-अप्रकाशित साहित्य को इकट्ठा करके एक समग्र ग्रंथावली के रूप में छापा जाए. क्योंकि उनका बहुत सारा काम अभी तक अप्रकाशित है और ज्यादातर प्रकाशित पुस्तकें भी लंबे वक्त से नए संस्करण न छपने के कारण लगभग अनुपलब्ध हो गईं हैं. इसके साथ ही ज्यादा जरूरी ये है कि उनके साहित्यिक संस्कारों एवं सरोकारों से प्रेरणा प्राप्त की जाए. जैसा कि एक जगह वे कहते हैं-

हिरदय की कोमल पंखुरिन मा, जो भंवरा असि न गूंजि सकै
उसरील वांठ हरियर न करै, डभकत नयना ना पोंछि  सकै
जेहिका सुनतै खन बन्धन की, बेड़ी झन झन न झनझनायं
उन पांवन मां पौरूखु न भरै, जो अपने पथ पर डगमगायं
अंधियारू न दुरवै सबिता बनि, अइसी कविता ते कौनु लाभ!

साभार: तहलका