अहै के मोरे तोहरे सेवाइ मइया_‘उन्मत्त’

manआधुनिक अवधी कविता के खास कवियन मा गिना जाय वाले आद्या प्रसाद ‘उन्मत्त’ कै जनम १३ जुलाई १९३५ ई. मा प्रतापगढ़ जिला के ‘मल्हूपुर’ गाँव मा भा रहा। यै अवधी अउर खड़ी बोली दुइनौ भासा मा लिखिन। ‘माटी अउर महतारी’ उन्मत्त जी की अवधी कबितन कै संग्रह है। अवधी गजलन और दोहन के माध्यम से काफी रचना किहिन। इनकै काब्य-तेवर ललकारू किसिम कै है: “तू आला अपसर बना आजु घरवै मूसै मा तेज अहा, / अंगरेज चला गे देसवा से तू अबौ बना अंगरेज अहा।”

आजु महतारी-दिवस है, यहि मौके पै उन्मत्त जी कै ई रचना हाजिर है:

अहै के मोरे तोहरे सेवाइ मइया!__आद्या प्रसाद ‘उन्मत्त’ 

चाहे जँघिया प लोटे बुकउना मले,
चाहे धुरिया लपेटे बेकैयाँ चले,
मुहा चूमू है गोदिया उठाइ मइया,
अहै के मोरे तोहरे सेवाइ मइया।

चाहे पहिला परगवा फनावत गिरे,
चाहे तोहरे अँगनवा मा धावत गिरे,
चलू अगवा अँगुरिया धराइ मइया,
अहै के मोरे तोहरे सेवाइ मइया।

फुसिलाइउ बजाइ घुनघुनवा तुहीं,
टिकटोरिउ है गूँगा बोलनवा तुहीं,
दुइनौ हथवा चुटुकिया बजाइ मइया,
अहै के मोरे तोहरे सेवाइ मइया।

भूख देखू तौ बावन करमवा किहू,
माई पूरा तू आपन धरमवा किहू,
मोरे डेकरे गइउ तू अघाइ मइया,
अहै के मोरे तोहरे सेवाइ मइया।

चाहे दुनिया कै आफत बिपति गरसै,
चाहे उपरा से कौनौ बलाइ बरसै,
तोहरे कोरवै म जाबै लुकाइ मइया,
अहै के मोरे तोहरे सेवाइ मइया।

__आद्या प्रसाद ‘उन्मत्त’

छपरा कस उठी!

ई निबंध, छपरा कस उठी, भारतेंदु जी कै लिखा आय। भारतेंदु जी अवधी कै, यहि दौर कै, अहम गद्य लेखक हुवैं। इनकै दुइ उपन्यास, ‘नई रोसनी’ औ ‘चंदावती’, आय चुका हैं। यै दिल्ली मा रहत हैं। इनसे आप ०९८६८०३१३८४ पै संपर्क कय सकत हैं।: संपादक
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भारतेन्दु मिश्र

भारतेन्दु मिश्र

 “छपरा कस उठी”__भारतेन्दु मिश्र

जुगु बदलि गवा है। अब कउनेउ ट्वाला मा जाति बिरादरी वाले याक साथ बइठै-क तयार नाई हैं। जी के तीर पैसा है वहेकि ठकुरई। उनका छपरा तौ जस पहिले उठति रहा है, वइसै अबहूँ उठी मुला गरीबन क्यार छपरा को छवाई? जो कउनिउ तना ते छाय ले तौ फिर ऊका उठावै वाले जन कहाँ ते अइहैं।

गरीबी हटावति हटावति कइयौ सरकारै हटि गयीं। गरीब दुखिया जहाँ खड़े रहैं हुआँ ते अउरु पीछे हटि आये, मुला गरीबी न अब लौं हटी है, न जल्दी हटै वाली है। अमीरी-गरीबी के पाटन मा आपसदारी धीरे-धीरे पिसी जाय रही है। तीका कोई इलाजु नाई है।

अब जब नोटन ते रिस्ता जुड़ि गा है तो बेइमानी-बदमासी औ मक्कारी करै मा जो साथु दे, जिहिकी बदौलति नोट मिलैं, वहै रिस्तेदार है, वहे से आपसदारी है। छपरा बिनु आपसदारी, न तौ छावा जाय सकी न उठावा जा सकी औ जौ आगि लागि जाय तौ बुझावौ न जाय सकी। हमरी लरिकईं मइहाँ सब याक दुसरे क्यार छपरा छवावै अउरु उठवावै जाति रहैं। अबहूँ छपरा उठवावै-क न्यउता आवति है मुला अब टाला-टाली कइकै सब अपन जिउ चोरावति हैं। जीके हाथेम लाठी है तीके सगरे काम हुई रहे हैं। कुछ जन तौ तिकड़म ते आपन काम निकारि रहे हैं, तेहूँ गाँव मा अइसन मनई जादा हैं जिनके काम कउनिउ तना नाई हुइ पाय रहे हैं। अइसे टेम मइहाँ उनका छपरा कस उठी?

अब न उइ सैकरन बाँसन वाली बाँसी रहि गई हैं, न छपरा खातिर बाँसै जुहाति हैं। फूस धीरे-धीरे फुर्रु हुइ गवा है। हाँ ऊँखन कै पाती औ झाँखर जरूर मिलि जाति हैं। बड़क्के किसान तौ पक्की हवेली बनवाय रहे हैं छोटकए कच्ची देवालन पर लेसाई लौ नाई कइ पाइ रहे हैं। मजूरी-धतूरी ते जो संझा तके लोनु रोटी जुरि जाय तौ जानौ बड़ी भागि है। कंगाली के साथै मँहगाई मुर्गा बनाये है। लकड़ी कटि-कटि राती-राता सहरन मा जाय रही है। फारेस्ट वाले खाय-पीकै सोय रहे हैं। हमका तुमका तौ थुनिहा औ चियारी तक नाई मिलै वाली है, बाता मइहाँ पगही बाँधे छपरा कै दिन रुकी, अरे रुकी कि ठाढ़ै न होई।

अइसी-वइसी बइठै ते, बीड़ी फूकै ते या सुर्ती मलै ते कुछु काम बनै वाला नाई है। लरिकई-म जब छपरा उठवावै जाइति रहै तौ बड़ा जोसु रहै, गाँव केरी ऊँची-नीची सब जाति क्यार आदमी आवति रहै। “अउरु लगा दे…हैंसा, जोर लगा दे..हैंसा। पुरबह वार खँइचौ रे, दखिनह वार थ्वारा रेलि देव” – ई तना के जुमला यादि आवति हैं। तब मालुम होति रहै गाँव ट्वाला सब कुछु अपनै देसु है।

तब जहाँ चहौ तहाँ चट्ट-पट्ट छपरा धरि दीन जाति रहै। अब न तौ रमजानी अपने ट्वाला ते अइहैं, न सुच्चा सिंह रामपालै केरि उम्मेद है। अइसे बुरे वखत मइहाँ कहाँ मूड़ु दइ मारी।

छपरा, जीमा कइयौ सिकहर लटके होति रहैं, कहूँ-कहूँ छोटकई चिरइया आपन *घरघुच्चु बनउती रहैं, जिनके ऊपर कबहूँ लउकी कबहूँ कदुआ केरि फसलि मिलति रही, जीपर बिलैया टहलती रहैं, जीके तरे जिंदगी-मउत, दीन-दुनिया केरि सब बतकही होति रहै, जीके तरे घरी भरि बइठि कै राहगीरौ जुड़ाति औ सँहताति रहै, जहाँ दुपहरिया मा कबौ किस्सा-कहानी, कबौ सुरबग्घी, औ कबहूँ कोटपीस ख्याला जाति रहै – अब उइ दिन कहाँ? अब जब प्यारु, दुलारु, मोहब्बति औ भइयाचारु नाई रहिगा तौ छपरा छावा जाय चहै न छावा जाय। उठवावा जाय चहै न उठवावा जाय, हमरी बलाय ते।

*घोसला
(‘कस परजवटि बिसारी’ किताब से)

एक साल अउर बीता__उन्मत्त / @१४ ढेरक्के सुभकामना!

Happy-New-Year-Wishes-2014-HD-Wallpapers-for-Laptops-Desktopsआप सबका २०१४ मुबारक! दुइ हजार तेरह जाय-जाय क अहै, औ दुइ हजार चौदह आवै-आवै क! अगिला भिनसार दुइ हजार चौदह कै पहिल भिनसार होये। सबके ताईं ई नौका साल बहुत छाजै, सबकै अरमान पुरायँ, हर मेर कै तरक्की सबका मिलै, जेकर गाड़ी जहाँ रुकी अहै औ जहमति मा फँसी अहै ऊ छुक-छुक कैके चलि परै, सबके बीचे सुमति ब्यापै औ कुमति बिनसै, अउर हाँ, सब अवधियन के गले से अवधी कै मिठास दिग-दिगन्त तक फैलै!

कुछ ब्यस्तता के चलते दुइ हजार तेरह मा यहि पोर्ट्ल पर जेतना काम हुवै क रहा, नाय होइ पावा। हम जीबिका के चक्कर मा यहिरी-वहिरी आवै-जाय मा रहि गयेन मुदा चौदह मा हम दिल्लिन मा रहब, अस्थिर होइके रहब तौ जादा काम कै सकब, चौदह मा ई पोर्टल अवधी ताईं पढ़ै बरे बढ़िया-बढ़िया चीजन क दै सके, हमैं अस भरोसा अहै!

यक साल अउर बीतिगा, जैसे कयिउ साल बीते, बीते साल कै हम लेख-जोखा देखी औ नये साल मा नीमन करै कै संकलप ली, यही नौके साल के ताईं सबसे जबर पैगाम होइ सकत है! आज यहि मौके पै अपने पसंदीदा कवि आद्या प्रसाद ‘उन्मत्त’ कै कविता ‘एक साल अउर बीता’ आपके साथ बांटा चाहित है, यहि दिलचस्प कबिता कै मजा लीन जाय! : संपादक
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”एक साल अउर बीता”__उन्मत्त

कुछ बीतिगा लड़कपन की मौज म, मस्ती मा
कुछ बीतिगा डगर मा सुनसान म, बस्ती मा
कुछ बीतिगा खोवइ मा कुछ बीतिगा पावइ मा
कुछ बीतिगा रोवइ मा कुछ बीतिगा गावइ मा।

का चूक भइ न कबहूँ सोचइ क भा सुभीता,
एक साल अउर बीता।

कबहूँ जनान दुनिया अबहीं उछिन्न होई
कबहूँ जनान सगरौ अब ताक धिन्न होई
कबहूँ बजी पिपिहिरी कबहूँ बजा नगाड़ा
गइ जरि कभौं उखाड़ी झंडा ग कभौं गाड़ा।

कबहूँ त बिना बातइ के लागिगा पलीता।
एक साल अउर बीता।

परसौं अहै दसहरा नरसौं अहै देवारी
सब आइ के चला गे तिउहार बारी-बारी
पनरा अगस्त आवा फिर आइ दुइ अक्तूबर
हफ्ता भरे कै झंझट फैलाइ गा नवंबर।

नापै के बरे जिनगी हर साल नवा फीता।
एक साल अउर बीता।

महजिद से ताल ठोंकेन मन्दिर से ताल ठोंकेन
केतनौ गयेन छोड़ावा फिर फिर से ताल ठोंकेन
बनि के धरमधुरी सब केतना रकत बहाएन
खूनइ क किहेन उल्टी खूनइ म खुब नहाएन।

दुइनौ छलाँग मारेन केउ बाघ केहू चीता।
एक साल अउर बीता।

दर्रान तलइयन के दिन फिर से किहे फेरा
घाटन प खिली सुतुही पानी म कुईं-बेरा
फिर हरसिंगार फूला फिर डार-डार गमकी
पछियाँव तनी ढुरका सगरी सेंवार गमकी।

गदराय गईं उखिया पियराइ गा पपीता।
एक साल अउर बीता।

हमरेउ अँजोर लौटइ तोहरेउ अँजोर लौटइ
इंसान की जिनगी मा फिर फिर से भोर लौटइ
धरती क भाग जागइ दुख औ दरिद्द भागइ
संसार के अँगना मा फिर जोत परब लागइ।

रावन क कै उछिन्नी लौटइ सुमति क सीता।
एक साल अउर बीता।

कवि: आद्या प्रसाद ‘उन्मत्त’

कवि श्री युक्तिभद्र दीक्षित ‘पुतान’ की क्रांतिकारी प्रगतिशील चेतना को नमन!

 

 पुतान जी

पुतान जी

बहुत अफसोस कै बाति है कि अवधी कै कवि युक्तिभद्र दीक्षित पुतान अब हमरे बीच नहीं हैं। औरौ अफसोस कै बाति है कि उनके बारे मा मीडिया वगैरह से कौनौ जानकारिव नाही दीन गै। लेकिन उत्साही युवा शैलेन्द्र शुक्ल तमाम खामियन का खतम करत औ हमार जानकारी बढावत ई ‘सरधांजलि’ आलेख भेजिन हैं। हम आभारी हन। : संपादक
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कवि श्री युक्तिभद्र दीक्षित ‘पुतान’ की क्रांतिकारी प्रगतिशील चेतना को नमन! 
__शैलेन्द्र कुमार शुक्ल

युक्तिभद्र दीक्षित “पुतान” आधुनिक अवधी काव्य परम्परा के विशिष्ट हस्ताक्षर हैँ,जिनका पिछले दिनोँ 24 जुलाई को निधन हो गया । ये अवधी की नयी लीक के प्रवर्तक महान क्राँतिकारी कवि बलभद्र प्रसाद दीक्षित पढ़ीस के पुत्र थे । क्रांति और कविता इन्हेँ विरासत मेँ मिली थी । ये सच्चे अर्थोँ मेँ पढ़ीस की परम्परा के उत्तराधिकारी थे ।इन्होँने अपने जीवन मेँ बड़े संघर्ष झेले ,लेकिन समझौते का रास्ता नहीँ अपनाया ,आखिर पुत्र ही ऐसे स्वाभिमानी व्यक्तित्व के थे।पुतान जी आकाशवाणी इलाहाबाद मेँ नौकरी करते थे । वहाँ ये किसानोँ के लिये कार्यक्रम मेँ मतई भइया / मतई काका के नाम से प्रसिद्ध हुये । पुतान जी ने पचीसोँ रेडियो नाटक और नौटंकी अवधी और भोजपुरी मेँ लिखीँ तथा उनमें भूमिका निभाई । वह लोक गीतोँ के बड़े अच्छे पारखी थे .वह बड़े अच्छे लोकगीत रचते और बहुत ही अच्छी लय मेँ गाते थे । मैँ पिछले साल जब इलाहाबाद उनसे जा कर मिला ,तब मैँ पढ़ीस जी के बारे मेँ उनसे जानने-समझनेँ को उत्सुक था ,लेकिन पुतान जी से मिलकर मुझे एक नये अध्याय के बारे मेँ पता चला । पुतान जी ने अपने कुछ गीत और कविताएँ बड़ी संजीदगी से सुनाई। वह आधुनिक अवधी साहित्य से हिँदी वालोँ की उदासीनता से दुखी थे , और अवधी के आधुनिक विद्वानोँ की संकुचित मानसिकता से उन्हेँ बड़ा कष्ट था । जो पूर्णतः जायज था।

उन्होँने अवधी और भोजपुरी दोनोँ मेँ श्रेष्ठतम कविताएँ रचीँ हैँ। उनकी कई काव्य पुस्तकोँ का प्रकाशन बहुत पहले परिमल प्रकाशन से हुआ था जिनका अब कहीँ अता पता नहीँ मिलता । उन्होँने स्वतंत्रता आंदोलन के समय कई महत्वपूर्ण रचनाएँ दी। उनकी कुछ कविताऔँ के उदाहरण डा.मधुप ने अपनी पुस्तक “अवधी साहित्य का इतिहास” मेँ दिया है।

वह प्रगतिवादी चेतना के कवि थे । वह प्राचीन रूढ़िवादी और पूंजीवादी समाज को मिटाकर एक अभिनव समाज की स्थापना करना चहते थे जिसमेँ न कोई शोषक हो न कोई शोषित । शासन व्यवस्था से असंतुष्ट कवि किसानों को क्रांति के लिये ललकारते हुये कहता है-

“रे छोड़ भला अब तो खटिया
दे फूँकि फूस की यह टटिया ।”

देश की खोखली आजादी पर प्रहार करती पुतान जी ये पंक्तियाँ देखिये-

“सब कहेँ मुलुक आजाद भवा
भारत का मिलिगै आजादी ।
मुलु तोरी मुरझुल्ली ठठरी पर
लदि गै और गरू लादी
आजाद भये हैँ संखपती
उइ तोरि करेजी काढ़ि सकैं।
आजाद भये सोँठी साहू
त्वांदन के मेटुका बाढ़ि सकैँ।”

उनके एक और क्रांतिकारी गीत की याद ताजा कीजिये -

“चेतु रे माली फुलबगिया के
बड़ी जुगुति ते साफु कीन तुयि
झंखरझार कटीले ।
दै दै रकतु प्रान रोपे रे
सुँदर बिरिछ छबीले ।
रहि ना जायं गुलाब के धोखे
काँटा झरबेरिया के।।”

हम अपनी माटी के बने अपने लोक कवि श्री युक्तिभद्र दीक्षित पुतान को याद करते हुये श्रद्धांजलि ज्ञापित करते हैँ ! उनकी क्रांतिकारी प्रगतिशील चेतना को नमन !!!

-शैलेन्द्र कुमार शुक्ल

कुटियन मा उजियारा होइहैं!__जुमई खां ‘आजाद’

majoor आज मजूर-दिवस आय। यहि मौके पै अवधी कवि जुमई खां ‘आजाद’ कै ई रचना हाजिर है, जेहिमा सोसक लोगन के खिलाफ बगावती सुर बुलंद कीन गा है। : संपादक 
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कुटियन मा उजियारा होइहैं!__जुमई खां आजाद

“दुखिया मजूर की मेहनत पर,
कब तलक मलाई उड़ति रहे।
इनकी खोपड़ी पै महलन मा,
कब तक सहनाई बजति रहे॥
ई तड़क-भड़क, बैभव-बिलास,
एनहीं कै गाढ़ि कमाई आ।
ई महल जौन देखत बाट्‌या,
एनहीं कै नींव जमाई आ॥
ई कब तक तोहरी मोटर पर,
कुकुरे कै पिलवा सफर करी।
औ कब तक ई दुखिया मजूर,
आधी रोटी पर गुजर करी॥
जब कबौ बगावत कै ज्वाला,
इनके भीतर से भभकि उठी।
तूफान उठी तब झोपड़िन से,
महलन कै इंटिया खसकि उठी॥
‘आजाद’ कहैं तब बुझि न सकी,
चिनगारिउ अंगारा होइहैं।
तब जरिहैं महल-किला-कोठी,
कुटियन मा उजियारा होइहैं॥”
__जुमई खां ‘आजाद’

कल भी अवधी का था, आज भी है और कल भी रहेगा!

यह खुशी की बात थी कि लखनऊ लिटरेरी फेस्टिवल-१३ के दौरान  अवधी का भी एक सत्र रखा गया था। तारीख – २३/३/१३। इस सत्र की रपट यहाँ बिना किसी काट-छाँट के दी जा रही है जिसे जागरुक पत्रकार और मित्र अटल तिवारी ने भेजी है। हम अटल जी के आभारी हैं। : संपादक
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 कल भी अवधी का था, आज भी है और कल भी रहेगा!
*अटल तिवारी

दो दिवसीय लखनऊ लिटरेरी फेस्टिवल के पहले दिन का अंतिम सत्र अवधी भाषा पर केन्द्रित था। विषय था-‘अवधी कल, आज और कल’। वक्ताओं में शामिल थे पद्मश्री बेकल उत्साही व लोक भाषा के जानकार योगेश प्रवीन। संचालन की जिम्मेदारी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से आए डाॅ. अमरेन्द्र त्रिपाठी पर थी। सत्र तय समय से काफी विलम्ब से शुरू हुआ। इसके बावजूद इसमें हिस्सा लेने के लिए लोग इंतजार करते रहे। यह अवधी के प्रति लोगों का लगाव कहिए या बेकल उत्साही के मुंह से निकला एक-एक शब्द सुनने की ललक। सोशल मीडिया के जरिए पिछले चार साल से अवधी का प्रसार करने में लगे डाॅ. अमरेन्द्र ने माइक संभाला। लोगों को विषय से रूबरू कराया। इसके साथ अवधी भाषा को लेकर बेकल उत्साही के सामने सवाल किया।

बेकल जी ने कहा कि ‘अवधी दुनिया की सबसे बड़ी भाषा है। अवधी की रचनाएं-पद्मावत, अमरावत व रामचरितमानस दुनिया की सबसे बड़ी रचनाएं हैं।’ अवधी को बढ़ाने की बात करते हुए उन्होंने कहा कि ‘हम जब राज्यसभा में थे तो अवधी समेत क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए सुझाव दिया था कि उत्तर प्रदेश को चार भागों में बांट दीजिए। उत्तराखण्ड, रुहेलखण्ड, बुन्देलखण्ड, पूर्वांचल। मेरी इस बात का लोगों ने गलत मतलब निकाल लिया। कहने लगे कि यह तो बंटवारा चाहता है। पाकिस्तानी है। पता नहीं और क्या-क्या कहा। अरे, भैया हम तो कहते हैं कि अवधी ऐसी जबान है कि इसके बिना हम जिन्दा नहीं रह सकते।’ अवधी से उन्हें कैसे लगाव हुआ? लिखने की शुरुआत कहां से की…इस पर बेकल जी ने कहा-‘अवधी से बचपन से ही लगाव था। पहले गीत लिखने शुरू किए। फिर रमई काका के साथ रेडियो पर काफी काम किया। लखीमपुर-खीरी जिले के निवासी बंशीधर शुक्ल के चरणों में पड़ा रहा। अवधी की इन विभूतियों से खूब सीखा। घर और गांव में हरवाह-चरवाह जो बोलते थे उनकी बातों को ध्यान से सुनते थे। उनको जेहन में उतारने की कोशिश करते थे। उनकी बातों में तहजीब दिखती थी। तहजीब का जिक्र आया है तो एक किस्सा सुन लीजिए। जाड़े का समय था। घर में काम करने वाले परसन काका ने कौरा यानी अलाव लगाया था। हम कौरा जलति देखेन तौ आलू भूनइ खातिर डारि दिहन। उइ मारिन। अम्मा घर पर नाइ रहइ। पड़ोस के गांव यानी अपने मइके में रहइ। हम र्वावति गएन। पूछिन का भवा। हम बताएन परसन मारिन हैं। उइ जूती निकारिन। दुइ मारिन। बोलीं, परसन कहति हउ। काका नाइ कहि पावति। यह घटना मैं इसलिए बता रहा हूं कि इस तरह अवधी हमें तहजीब सिखाती है। इंसान को इंसानियत सिखाती है।’

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(बाएं से) हिमांशु बाजपेयी, पद्मश्री बेकल उत्साही, योगेश प्रवीण और अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

पहले और अब की अवधी में बड़ा बदलाव दिखता है। इस पर बेकल उत्साही ने कहा-‘यह पद्मावत का समय नहीं है। इसमें लोग आते रहे। अपने हिसाब से बदलाव करते रहे। इसके बावजूद इस भाषा ने उन्नति की। इसका और विस्तार करने के लिए अवधी संस्थान बनना चाहिए। हम सालों से एक अवधी चैनल की बात कर रहे हैं। आप सभी लोग मांग उठाइए। सरकार को एक चैनल शुरू करना चाहिए। इससे दो फायदे होंगे। पहला भाषा का विकास होगा। दूसरा युवाओं को रोजगार मिलेगा। ऐसे में युवा पीढ़ी की भाषा के प्रति ललक बढ़ेगी। अरे, दिल्ली में मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से कहकर मैंने अवधी अकादमी कायम करा दी। दुख इस बात का होता है कि जहां की अवधी है वहां कुछ भी नहीं। इतना बड़ा प्रदेश है। एक अवधी संस्थान तक नहीं।’ बात पूरी होते देख संचालक ने अवधी के भविष्य को लेकर सवाल उछाला। इस पर बेकल उत्साही जी खानापूर्ति वाला जवाब देने के बजाय युवा संचालक के सामने ही सवाल उठा दिया। बोले-‘कल क्या होगा यह तो हम आप नौजवानों से पूछते हैं। वैसे तो हम गंवार हैं। यह बुद्धिजीवी (मंच पर बैठे योगेश प्रवीन व डाॅ. अमरेन्द्र त्रिपाठी) अवधी की बात करेंगे। इसी के साथ संचालक ने लोक भाषा के जानकार योगेश प्रवीन से अवधी के क्षेत्र व उसके इतिहास के बारे में पूछा।

योगेश प्रवीन ने कहा-‘नेपाल की तराई से गंगा के दहाने तक अवधी का बोलबाला है। पहले बारह आबाद जिलों तक अवधी का सिक्का रहा है। हां, यह बात जरूर है कि कुछ क्षेत्र बादि लहजा बदलति रहति है।’ उन्होंने मुल्ला दाउद के ‘चन्दायन’, मलिक मुहम्मद जायसी की ‘पद्मावत’ व तुलसीदास की ‘रामचरितमानस’ के जरिए अपनी बात का विस्तार किया। साथ ही कुछ कहावतों के जरिए माहौल को हल्का बनाने की कोशिश की। देवरानी-जेठानी के बीच काम को लेकर एक कहावत कही-‘एक आंगन में दुइ, उइ कहइ उइ, उइ कहइ उइ।’ इस पर मौजूद अवधी प्रेमी हंसने लगे। योगेश प्रवीन ने समृद्ध अवधी लोकगीतों की जानकारी दी। साथ ही बेगम अख्तर के गाए दादरा-‘चले जइहो बेदरदा मैं रोइ मरिहौं…’ की बात की। अवधी क्षेत्र…भाषा व उससे लोगों के लगाव की बात करते हुए योगेश प्रवीन ने कहा-‘आज भी आम आदमी की भाषा अवधी है। लोग अवधी आसानी से समझते हैं। अवधी का चलन बना रहे इसके लिए घर के बड़े लोग घरों में बच्चों से बातचीत में इसका इस्तेमाल करें। अगर बच्चों को अवधी से नहीं जोड़ा गया तो वे इससे दूर हो जाएंगे। यह अवधी के लिए अच्छा नहीं होगा। जाहिर है कि यह तहजीब के लिए भी सही नहीं होगा।’

डाॅ. अमरेन्द्र त्रिपाठी ने अवधी की बात करते हुए कहा कि अवधी करोड़ों किसानों की भाषा है, लेकिन दुखद यह कि हम इसका इतिहास तक नहीं रख रहे हैं। यह हमारे लिए कितनी शर्मिन्दा करने वाली बात है। संचालक ने भाषा के विस्तार को लेकर एक बार फिर पद्मश्री बेकल उत्साही से सवाल किया। बेकल जी ने कहा-‘अवधी क्षेत्र में जगह-जगह बैठकें होनी चाहिए। उसमें यह ध्यान न रखा जाए कि कितने लोग शामिल हो रहे हैं। जाहिर है पहले संख्या कम रहेगी। गोष्ठी, सेमिनार, कविता-कहानी पाठ के छोटे-छोटे आयोजन होने चाहिए। प्रतियोगिताएं होनी चाहिए। इससे नयी पौध का भाषा के प्रति प्रेम बढ़ेगा। वह इसे बोलने में संकोच नहीं करेगी।’ बेकल जी ने अपनी एक इंग्लैण्ड यात्रा का जिक्र करते हुए कहा-‘बीबीसी ने मेरा साक्षात्कार लेने के लिए कहा। मैंने साफ कह दिया कि हम तो अवधी में बोलते हैं। अवधी में साक्षात्कार लेना हो तो बात करिए अन्यथा नहीं। वह तैयार हो गए। पूरा साक्षात्कार मैंने अवधी में दिया।’ बेकल जी ने कहा कि ‘अवधी में दूसरों को अपनाने की भी क्षमता है। पता नहीं कितने फारसी और उर्दू के लफ्जों को आत्मसात किया है, जिससे इसका लालित्य बढ़ा है। जैसे मेहरारू शब्द अवधी में है। वैसे यह है फारसी का…लेकिन अवधी ने आत्मसात कर लिया।’ युवा पीढ़ी से उम्मीद जताते हुए उन्होंने कहा कि ‘मैं उम्रदराज हो गया हूं। अब आप लोगों पर अवधी को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है। हां, इतना जरूर कहूंगा कि अगर अवधी चली गई तो बड़ा तहजीबी नुकसान होगा।’ फेस्टिवल के पहले दिन का यह अंतिम सत्र था। समापन की ओर था। देर शाम हो चली थी…लेकिन अवधी प्रेमी व बेकल जी के प्रशंसक जमे बैठे थे। उन्होंने बेकल जी से कुछ सुनाने को कहा। बेकल जी सामने मेज पर रखी अपनी किताब ‘सरसों के जूड़े में टेसू के फूल’ पलटने लगे। फिर गुनगुनाया…‘नाचै ठुमुक ठुमुक पुरवाई।’ लोगों ने पूरे मनोयोग से सुना। तालियों से दाद दी। इसी बीच एक अवधी प्रेमी ने एतराज जताया कि अवधी के सत्र की अनदेखी की गयी। आयोजकों ने इसे मुख्य हाल में न रखकर एक कोने में रखा। समय का ध्यान नहीं रखा। यह भेदभाव नहीं होना चाहिए। इस पर आयोजकों की ओर से क्षमा याचना की औपचारिकता दिखी। वहीं संचालक ने वक्ताओं को धन्यवाद दिया। सजग पत्रकार और अवधी-प्रेमी हिमांशु बाजपेयी ने सत्र की शुरुआत की ही तरह  समापन की भी घोषणा की।
(फोटो: साभार, लखनऊ सोसाइटी)

कविता: हुवाँ अउर हियाँ

नीरज पाल कै ई कविता, कविता के जरिये यक बातचीत है। यहिमा गाँव से सहर मा आये के बाद गाँव केरी जिंदगी क ‘हुवाँ’ अउर सहर केरी जिंदगी क ‘हियाँ’ कहि के यक हल्का-फुल्का संबाद भर कीन गा है। हुवाँ काव काव हुअत रहा अउर हियाँ काव-काव हुवै लाग!
हमार कोसिस हुअत है कि केहू कै जौन ‘बानी’ भेजी जाय, हम भरसक वही हालत मा वहिका रखि दी। यहिसे भासा कै ‘ट्रेंड’ पता चलत है। यहिलिये कविता हमरे लगे जौनी हालत मा आयी, हम लगभग वही हालत मा हियाँ रखत अहन्‌। अपनी वारिस्‌ कौनौ रंदा-रुखानी नाही चलायेन। : संपादक
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कविता: हियाँ अउर हुवाँ 

हम गांवन के हरियर खलियान का दीख
और सहरन के जगमग समसान का दीख
गांवन मा लगा नीक नीक
सहरन मा लगा फीक फीक
हुवां कपरा पहिरैं अंग बचावें का
हियां फटहेव जचैं स्टाइल बनावें का
होयें कपडन मा जब तक दुई चार छेद नहीं
ऊ सहरन वाला भेष नहीं
गावन मा सम्मान अबहूँ है
छ्वाट बडेंन के संगै खात नहीं
हुवां हाय बाय ते बात नहीं
अम्मा बप्पा कहावत हैं
हियां मम्मी डैडी चिल्लावत हैं
जैसे घर मा न मुर्दा घर मा होंय
वो ऐसा सीन दिखावत हैं
हियां टीविन मा सीडी लगे पड़े
हुवां कोल्हू बैल चलावें का
हियां गर्मीं मा एसी लगावें का
हुवां पीपर के तारे वी स्वावत हैं
एसी का कहूं नाम नहीं ऐसी की तैसी मचावैं का
दादागिरी मा पाछे नहीं वी लम्बरदार कहावें का
हुवां मुअछन की रंगबाजी हवै
हियां रोवजये मूछ मुड़ावें का
भिक्खु नन्क्हू लाठी भांजै दीवारी मा चट्कावैं का
कित्ते पहलवानन का को सधी हुन लम्बरदार कहावें का
हुवाँ तित त्यौहार सब अपन लगें
हियाँ बज़ारन मा सब सजन लगें
हम गाँव का नीकैं कहब ई सहरन के गलियारन ते
हुवां दुःख सुख के भागीदार भलें हैं
हियां पिठछुरिया सब यारन ते!
__नीरज पाल

niraj
नीरज पाल
कानपुर-अवध / उत्तर प्रदेश कै रहवैया हुवैं। यहि साइत अंधेरी-महाराष्ट्र मा यक बिग्यापन एजेंसी मा कॊपीराइटर के पद पै काम करत अहैं। ‘अगड़म-बगड़म’ – ब्लाग पै इनकै साहित्तिक हलचल देखी जाय सकत है। इनसे मोबाइल नं.  091 67 624091 पै संपर्क साधा जाय सकत है।