खुसरो..!

चेहरा चेहरा ढूंढिन खुसरो,
खूब पहेली बूझिन खुसरो.!

गोर कलइया, हरियर चुरिया,
आखिर केहिका देखिन खुसरो.!

कठिन डगर है पनघट केरी,
जाने केतना भंछिन खुसरो.!

राजपाट सब पानिक् बुज्जा,
छे राजन से सीखिन खुसरो..!

इस्के-मजाजी से उबियाने,
इस्के-हकीकी साधिन खुसरो.!

__अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

गजल : विधायक होइगा

 ई बहुत खुसी केरि बाति है कि अवधी भासा मा बिधिवत गजलन क्यार संग्रह द्याखै क मिलत अहै। यहि खुसी कै योजना बनावै वाले कवि सिरी अशोक ‘अग्यानी’ जी बधाई कै पात्र हैं। अग्यानी जी अवधी-साधक की हैसियत से सक्रिय अहैं। रामपुर-खेड़ा, मजरे-इचौली( पो-कुर्री सुदौली/रायबरेली-अवध) गाँव कै रहै वाले अग्यानी जी खुनखुनिया, माहे-परासू, धिरवा, जैसी लोकगाधन क हमरे बीच लाइन हैं। इनकै बप्पा अहीं – सिरी नन्हकऊ यादव। अम्मा हुवैं – सिरीमती शान्ती देवी। ‘वीर पवाड़े अवध भूमि के’ नाव से आकासबानी के ताईं धारावाहिक कै तेरह एपीसोडौ लिखिन हैं। यहि साइत राजकीय हुसैनाबाद इण्टर कालेज, चौक, लखनऊ मा प्रवक्ता पद पै सक्रिय अहैं। ई गजल अग्यानी जी के गजल-संग्रह ‘चिरइया कहाँ रहैं’ से लीन गै है:

गजल : विधायक होइगा

जन गण मन अधिनायक होइगा।
गुण्डा    रहै,    विधायक   होइगा।  

पढ़े – लिखे    करमन   का   र्‌वावैं,
बिना  पढ़ा   सब  लायक  होइगा।  

जीवन  भर  अपराध  किहिस जो,
राम   नाम  गुण  गायक  होइगा।  

कुरसी  केरि  हनक  मिलतै  खन,
कूकुर    सेरु    एकाएक    होइगा।

गवा  गाँव  ते  जीति  के,  लेकिन 
सहरन   का   परिचायक होइगा। 

वादा    कइके    गा    जनता   ते,
च्वारन  क्यार सहायक होइगा।

जेहि   पर   रहै   भरोसा  सबका,
‘अग्यानी’   दुखदायक   होइगा। 

__ कवि अशोक ‘अग्यानी’ 

कविता : मंहगाई (कवि वंशीधर शुक्ल)

कवि वंशीधर शुक्ल  कै नाव परिचय कै मोहताज नही है। उनकै ई  कविता ‘मंहगाई’ भाई पद्म सिंह टाइप कैके अंतर्जाल पै रखिन। उनसे हम कहेन कि यहि कविता का यहि वेबसाइट पै डारि दीन जाय, वै तैयार भये, पहिले कविता हाजिर है फिर ‘भेजवैया’ के तहत उनहिन के सब्दन मा उनके बारेम जानकारी दीन गै है। : संपादक 

कविता : मंहगाई

हमका चूसि रही मंहगाई।
रुपया रोजु मजूरी पाई, प्रानी पाँच जियाई, 
पाँच सेर का खरचु ठौर पर, सेर भरे माँ खाई। 
सरकारी कंट्रोलित गल्ला हम ना ढूँढे पाई, 
छा दुपहरी खराबु करी तब कहूँ किलो भर पाई।
हमका चूसि रही मंहगाई। 

जिनकी करी नउकरी उनते नाजउ मोल न पाई, 
खीसइ बावति फिरी गाँव माँ हारि बजारइ जाई।
लोनु तेलु कपड़न की दुरगति दारि न देखइ पाई 
लरिका घूमइं बांधि लंगोटा जाडु रहा डिड़ियाई।
हमका चूसि रही मंहगाई। 

खेती वाले गल्ला धरि धरि रहे मुनाफा खाई, 
हमरे लरिका भूखे तरसइं उइ देखइं अठिलाई। 
खेती छीने फारम वाले ट्रेक्टर रहे चलाई, 
गन्ना गोहूँ बेंचि बेंचि के बैंकइ रहे भराई। 
हमका चूसि रही मंहगाई। 

सबते ज़्यादा अफसर डाहइं औ डाहइं लिडराई,
पार्टी बंदा अउरउ डाहइं जेलि देइं पहुंचाई। 
बड़ी हउस ते ओटइ दइ दइ राजि पलटि मिलि जाई 
अब खपड़ी पर बइठि कांग्रेस हड्डी रही चबाई। 
हमका चूसि रही मंहगाई। 

ओट देइ के समय पारटी लालच देंय बिछाई 
बादि ओट के अइसा काटइं, जस लौकी चउराई। 
खेती वालन का सरकारउ कर्जु देइ अधिकाई 
हमइं कहूँ ते मिलइ न कर्जा हाय हाय हउहाई। 
हमका चूसि रही मंहगाई।

बढ़िया भुईं माँ जंगल रोपइं ताल झील अपनाई 
गाँव की परती दिहिसि हुकूमत दस फीसदी छोड़ाई। 
देखि न परइ भुम्मि अलबेली खेती करइ न पाई 
ऊसर बंजर जोता चाही चट्ट लेइं छिनवाई। 
हमका चूसि रही मंहगाई।

जो कछु हमरी सुनइ हुकूमत तौ हम बिनय सुनाई 
सबकी खेती नीकि हमइं जंगलइ देत जुतवाई। 
चउगिरदा सब राहइं रूँधी, भागि कहाँ का जाई 
कइसे प्राण बचइं बिन खाए खाना कहाँ ते लाई। 
हमका चूसि रही मंहगाई। 

सुनित रहइ जिमिदार न रहिहइं तब जमीन मिलि जाई 
अब उनके दादा बनि बइठे सभापती दुखदाई। 
खुद सब जोतइं धरती बेंचइं महल रहे उठवाई 
हम भुइंहीन सदा से, खेती हमइ न कोउ दइ पाई। 
हमका चूसि रही मंहगाई। 

हमते कहइं की की भुइं पर कब्जा लेहु जमाई 
फिरी थोरे दिन माँ पटवारी अधिवासी लिखि जाई। 
जिनकी भुइं नीके कस छोड़िहइं कबजा जउ करि पाई 
उनके लरिका हमका कोसिहइं हम बेइमान कहाई। 
हमका चूसि रही मंहगाई।

हम होई बीमार डरन माँ अस्पताल ना जाई 
हुंवउ लगि रही संतति निग्रह इंद्री लेइ कटाई। 
सुवरी कसि छाबरि अफसर की बंसु बढ़इ अधिकाई 
हमरे तीनि जनेन का देखे उनकी फटइं बेवाई। 
हमका चूसि रही मंहगाई। 

नफाखोर मेढुका अस फूलइं हमरा सबु डकराई 
थानेदार जवानी देखे पिस्टल देंइ धराई। 
जो जेत्ता मेहनती वहे के घर वत्ती कंगलाई 
जो जेत्ता बेइमान वत्तिहे तोंदन पर चिकनाई। 
हमका चूसि रही मंहगाई।

पार्टीबिंदी न्याय नीति अउ राजनीति ठगहाई 
कोऊ नहीं सुनइ कोऊ की मउत रही डिड़ियाई।
हे ईसुर यहु सिस्टम बदलउ देउ सयान बनाई 
चाटि जाउ सरकारु आजु की या चाटउ लिडराई। 
हमका चूसि रही मंहगाई। 

__  कवि वंशीधर शुक्ल

सबद-अरथ: नाउज=अनाज, दारि=दाल,डिडियाइ =चीखना, गोहूँ=गेहूं, डाहइं=तंग करना, चउराई=चौलाई, चट्ट=तुरंत, चउगिरदा=चारों ओर, रुँधी=बंद, कोसिहइं=कोसेंगे, छाबरि=झुण्ड, डकराइ=डकार जाना, हजम कर जाना, कंगलाई=कंगाली

भेजवैया : ्नाम – पद्म सिंह “मूल रूप से तहसील कुंडा प्रतापगढ़ के छोटे से गाँव काशीपुर (डेरवा के पास) से, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक, बिजनेस और फिर UPPCL मा नौकरी। एहि के अलावा संगीत, थियेटर,लेखन और स्वयंसेवक संस्थानन मा सक्रिय रहे हमेशा। वर्तमान मा ब्लागिंग और इन्टरनेट पय अपने लेखन क धार देय और सीखय के प्रक्रिया म छोटा सा प्रयास अहय हमार ब्लॉग http://padmsingh.wordpress.com/ , http://padmsingh.blogspot.com/  ::  शुभकामनाओं सहित / पद्म सिंह 9716973262” 

 

अकेलै बढ़ौ हो!

कविवर रवींद्र नाथ टैगोर कै ‘एकला चलो रे’ मनै-मन बहुत सालन से गुनगुनात रहेन। मन का आसा से भरै वाला ई गीत हमैं सुकून दियत है, अइसे बहुतन क दियत होई। आज यहिका मनोज जी के पोस्ट पै जाइके अर्थ से तान भिड़ाइ के सुनेन, किसोर कुमार साहिब की आवाज मा। मन मा आवा कि लाओ यहिकै अवधी अनुवाद करी। जौन बनि परा किहेन। अब पढ़ैया लोगै बतावैं कि केतना बनि पावा है! 

अकेलै बढ़ौ हो!

केउ न सुनै जउ पुकार,
अकेलै बढ़ौ हो!

केउ कहै-सुनै न कुछू,
मुँह फिराइ लेइ।
अस अभागि जागि जाइ,
भय दिखाइ देइ।
अपने मुँहे अपन बाति,
मन मा गहौ हो!
..अकेलै बढ़ौ हो! 

डगर-डगर काँट भरी,
केऊ नहीं पास।
अस अभागि जागि जाइ,
दूर जाँय खास।
राह-राह, काँट-काँट,
रउँदि चलौ हो!
..अकेलै बढ़ौ हो! 

जउ अँजोर केउ न करै,
स्याह राति होइ।
अस अभागि जागि जाइ,
बवंडर झँकोइ।
हिये पीर-अगन कइ,
अँजोर करौ हो!
..अकेलै बढ़ौ हो!

[मूल(बांग्ला) - रवींद्र नाथ टैगोर, ‘एकला चलो रे’ / अनुवाद(अवधी) - अमरेंद्र]

कविता : अछूत की होरी (कवि वंशीधर शुक्ल)

बिख्यात अवधी कवि वंशीधर शुक्ल कै जनम सन १९०४ मा भा रहा। गाँव : मन्योरा। जिला : खीरी-लखीमपुर/अवध। सुकुल जी के पिता जी कै नाव सिरी ्छेदीलाल शुक्ल रहा। छेदीलाल जी अपने समय क्यार अल्हैत रहे औ दूर-दूर ले आल्हा गावै जात रहे। कवि रहे। छेदीलाल जी कै १९१६ ई. मा असामयिक देहावसान होइ गा। बप्पा के यहि तिना काल कौलित होइ जाये से वंशीधर जी कै पढ़ायिउ-लिखाई भँवर मा पड़ि गै। इस्कूली पढ़ाई अठईं तक किहिन मुला स्वाध्याय के बलबूते संस्कृत-उर्दू-हिन्दी-अंग्रेजी कै ग्यान अर्जित किहिन। कविता करै कै सुरुआत बहुत पहिलेन से सुरू कै दिहे रहे। यहिसे कीरति आस-पड़ोस मा फैलति गै। गाँधी जी के आंदोलन मा सामिल भये। कयिउ बार जेल गये। समाजबादी रुझान कै मनई रहे। गरीबन के ब्यथा औ किसानन के व्यथा से इनकै काव्य भरा पड़ा है। ‘उठो सोने वालों सबेरा हुआ है..’ यनही कै लिखा आय। ‘उठ जाग मुसाफिर भोर भई..’ यनहीं लिखिन। वंशीधर जी लखीमपुर खीरी से बिधानसभा सदस्यौ रहे: १९५९-१९६२ मा। हुजूर केरी रचनावली ‘उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान-लखनऊ’ से आय चुकी है। अपरैल-१९८० मा आजादी केर सिपाही औ अवधी साहित्त कै अनन्य उपासक वंशीधर शुक्ल जी ७६ साल की उमिर मा ई दुनिया छोड़ि दिहिन।

हाजिर है वंशीधर जी कै कविता, ‘अछूत की होरी’।

कविता : अछूत की होरी 

हमैं यह होरिउ झुरसावइ। 
खेत बनिज ना गोरू गैया ना घर दूध न पूत।
मड़ई परी गाँव के बाहर, सब जन कहैं अछूत॥
द्वार कोई झँकइउ ना आवइ।
..हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
ठिठुरत मरति जाड़ु सब काटित, हम औ दुखिया जोइ।
चारि टका तब मिलै मजूरी, जब जिउ डारी खोइ॥ 
दुःख कोई ना बँटवावइ।
..हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
नई फसिल कट रही खेत मा चिरइउ करैं कुलेल।
हमैं वहे मेहनत के दाना नहीं लोनु न तेल॥
खेलु हमका कैसे भावइ।
..हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
गाँव नगर सब होरी खेलैं, रंग अबीर उड़ाय।
हमरी आँतैं जरैं भूख ते, तलफै अँधरी माय॥
बात कोई पूँछइ न आवइ।
..हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
सुनेन राति मा जरि गइ होरी, जरि के गई बुझाय।
हमरे जिउ की बुझी न होरी जरि जरि जारति जाय॥
नैन जल कब लैं जुड़वावइ।
..हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
हाड़ मास जरि खूनौ झुरसा, धुनी जरै धुँधुवाय।
जरे चाम की ई खलइत का तृष्णा रही चलाय॥
आस पर दम आवइ जावइ।
..हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
यह होरी औ पर्ब देवारी, हमैं कछू न सोहाइ।
आप जरे पर लोनु लगावै, आवै यह जरि जाइ॥
कौनु सुखु हमका पहुँचावइ।
..हमैं यह होरिउ झुरसावइ। 
हमरी सगी बिलैया, कुतिया रोजुइ घर मथि जाय।
साथी सगे चिरैया कौवा, जागि जगावैं आय॥
मौत सुधि लेइउ न आवइ।
..हमैं यह होरिउ झुरसावइ।

___कवि वंशीधर शुक्ल, रचनाकाल : १९३६ ई.

सादर/अमरेन्द्र

कविता : पुरानि चुनरी (कवि रमई काका)

अवधी के आधुनिक कबियन मा सबसे पापुलर कवि रमई काका कै जनम रावतपुर, उन्नाव जिला(अवध) मा दुइ फरौरी सन्‌ १९२५ क भा रहा। काका जी कै पूरा नाव है चंद्रभूसन तिरबेदी। काका केरी कबिताई मा व्यंग्य कै छटा जनता के जबान पै चढ़ि के बोलति रही। आजौ कविता कै उहै असर बरकरार अहै। १९४० से काका जी आकासबानी मा काम करै लागे अउर तब से काका जी कै ख्याति बढ़तै गै। आकासबानी लखनऊ से काका जी कै प्रोग्राम ‘बहिरे बाबा’ बहुतै सराहा गवा। काका जी के कार्यक्रम कै प्रस्तुति बी.बी.सी. लंदन से ह्वै चुकी है। इनकै कबिता चौपाल मा, किसानन के खेतन मा, मेलन मा, चौराहन पै सहजै मिलि जात है। ‘भिनसार’, ‘बौछार’, ‘फुहार’, ‘गुलछर्रा’, ‘नेताजी’ जैसे कयिउ काब्य-संग्रह हजारन की संख्या मा छपे अउर बिके। दूर-दूर तक अपनी लोक-भासा कै जस फैलाय के माटी कै ई सपूत अठारह अपरैल सन्‌ १९८२ क ई दुनिया छोड़ दिहिस!

प्रस्तुत है रमई काका कै कविता, ‘पुरानि चुनरी’! 

कविता : पुरानि चुनरी

      यह चुनरी बड़ी पुरानी।

बूटा-बूटा मा यहिके,
झलकत अम्मा का दुलारु।
लाली मा घुला मिला है,
बप्पा का चटका पियारु।
यह यादि धरावति छोटे,
भैय्या कै तितुली बोली।
सिकुरन मा लुकी छिपी है,
सब बचपन की हमजोली।

      है मइके केरि निसानी,
      यह चुनरी बड़ी पुरानी।

दरसात माँग मा सेंदुर,
है यहिमा उइ सुभ दिन का।
जब बँधा रहै खूँटे मा,
पटुकवा पियरका उनका।
है अजहूँ देति गवाही,
गठि बंधन प्रेम परन कै।
यह धरी सँजोई पोथी,
पति सेवा नेम धरम कै।

      पावन सोहाग मा सानी,
      यह चुनरी बड़ी पुरानी।

इक दिवस भोर कै लोही,
यहिका अपने रँग रँगिगै।
सुरजन कै किरन सोनहरी,
कोंछे मा आसिस भरिगै।
सब भेंटेनि दुइ-दुइ अँसुआ,
जिनते धागा हैं सीझे।
अपने अँसुवन के पानी,
आँचर के टिपका भीजे।

      है आवति यादि भुलानी,
      यह चुनरी बड़ी पुरानी।

यहि की जूड़ी छाँहीं मा,
है प्रेम बेलि अँगुस्यानी।
सजि-सजि सुघरीले फूलन,
बहु छहरि-छहरि फलियानी।
आँचर मा पोंछि सुखावा,
केतने दुख सुख का पानी।
ई घरी उसिलतै उसिलैं,
पहिले की सबै कहानी।

      जस कलियन पखै लुकानी,
      यह चुनरी बड़ी पुरानी। 

__कवि रमई काका  

सादर/अमरेन्द्र 

अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस और बांग्लादेशियों का मातृभाषा-प्रेम

भारत बिबिधता से भरा देस हवै। यहिकी बिबिधता यहिकी बड़नकई है। भासिक बिबिधता के हिसाब से अस देस बिरलै मिलिहैं। मुला दुख हुअत है ई देखिके कि जौनी भासा का आज करोड़न लोग बोलत अहैं , वनकी दसा बहुत नीक नाई है। अवधी , छत्तीसगढ़ी, ब्रजी , भोजपुरी , मगही जइसी कयिउ भासा महत्व नाई पाय सकी हैं। यहि हालात मा अबहीं हालै मा गुजरे ‘अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस’(२१-फरौरी) कै महत्व भारत मा अउरउ बढ़ि गा है। यही क ध्यान मा रखिके आनंद पांडेय साहिब कै लिखा ई लेख आप सबसे सेयर करत अही। साभार, विस्फोट-साइट से। लेख खड़ी बोली-हिन्दी मा है। : संपादक 

लेख : अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस और  बांग्लादेशियों का मातृभाषा-प्रेम 

पूंजीवाद का अंतर्राष्ट्रीय वर्चस्व भाषाई भी है. आज भूमंडलीकरण के नाम पर दुनिया को अमेरिका-यूरो केंद्रित बनाने के प्रयास में दुनिया भर में मातृभाषाओं का वध किया जा रहा है. कई छोटी-बड़ी मातृभाषाएं बेमौत मर रही हैं. कइयों का अस्तित्व संकट में है. ऐसे में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा २१ फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाना कई दृष्टियों से विडम्बना का सूचक भी है और महत्वपूर्ण भी.

उल्लेख्नीय है कि बंगलादेश के भाषाई आन्दोलन के शहीदों  की याद में संयुक्त राष्ट्र संघ ने नवम्बर १९९९ में २१ फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा  दिवस के रूम में मनाने की घोषणा की. तब से यह दिन दुनिया भर में मातृभाषा दिवस के रूप में मनाया जाता है लेकिन इस दिन को लेकर जैसा उत्साह और उत्सवधर्मिता तथा जागरूकता एवं आम जनता की भागीदारी बांग्लादेश में दिखाई देती है वैसी अन्यत्र दुर्लभ है. भारत में तो इस दिवस को शायद लोग जानते भी नहीं है. भारतीय जनता के लिए यह दिवस वैसे ही लगभग अनजाना है जैसे अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस (२ अक्टूबर). हो सकता है कि बौद्धिक और शासक वर्ग इन ‘दिवसों’ से परिचित हो लेकिन आम जनता को बिल्कुल इनसे कोई सरोकार नहीं दिखाई देता. उत्सवधर्मिता और उत्साह तो दूर की बातें हैं. ऐसा भी नहीं है कि भारतीय मातृभाषाओं के सामने कोई खतरा मौजूद नहीं है इसलिए भारतवासी इन ‘दिवसों’ की औपचारिकता को अपने लिए निरर्थक मानते हों. और आयोजनों और उत्सवों से दूर रहते हों.

लेकिन, बांग्लादेश में २१ फरवरी का दिन राष्ट्रीय उत्सव की तरह से मनाया जाता है. संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा २१ फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में घोषित करने की पृष्ठभूमि में बांग्लादेश है और इसके पीछे बांग्लादेश का १९५२ का मातृभाषा आन्दोलन है. पाकिस्तान की राजभाषा उर्दू हो ऐसा, पूरा पश्चिमी पाकिस्तान और कायदे आजम मानते थे. लेकिन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) की जनता के लिए उर्दू अजनबी भाषा थी. अपनी भाषा और संस्कृति में रचे-बसे गर्वीले बंगालियों ने इस बात को स्वीकार नहीं किया. संयुक्त पाकिस्तान में बंगाली आबादी का अनुपात अधिक था.

इसलिए बंगाली चाहते थे कि बंगला को भी उर्दू के साथ-साथ राजभाषा बनाया जाय. लेकिन उर्दू उनके ऊपर थोप दी गयी. २१ फरवरी, १९४८ को मोहम्मद अली जिन्नाह ने उर्दू को पश्चिमी और पूर्वी दोनों पाकिस्तानों के लिए एकमात्र राजभाषा घोषित कर दिया. प्रतिरोध स्वरूप पूर्वी पाकिस्तान में बांग्ला को लेकर आन्दोलन तेज हो गया. २१ फरवरी, १९५२ को ढाका विश्विद्यालय के छात्रों ने प्रांतीय (पूरा पूर्वी पाकिस्तान) हड़ताल का आह्वान किया.  इसे रोकने के लिए सरकार ने धारा १४४ के तहत कर्फ़्यू लगा दिया. लेकिन, छात्रों का मनोबल नहीं टूटा. उनके शांति पूर्ण प्रदर्शन पर पाकिस्तानी सरकार ने गोलियाँ चलवाईं जिससे कई छात्र मारे गए. इनमें से चार छात्रों (अब्दुस सलाम, रफीकुद्दीन अहमद, अब्दुल बरकत और अब्दुल जब्बर) का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है. इस दिन को ‘अमर इकुस’ (अमर इक्कीस) के नाम से जाना जाता है और प्रतिवर्ष लोग शहीद मीनार पर लाखों की संख्या में पहुँच कर भाषा आन्दोलन के नायकों और शहीदों को श्रद्धाजंलि देते हैं. प्रतिरोध स्वरुप काले और सफ़ेद कपड़े पहनते हैं. बांग्ला भाषा की वर्णमाला के अक्षरों को दुकानों और बाजारों से लेकर घरों और संस्थाओं में सजाया जाता है. यह दिन बांग्लादेश में राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाता है. यह ऐसा दिन है जब बंगाली समाज अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के लिए अपनी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करता है. भारतीय बंगाली भी इसे गौरव से याद करते हैं.

१२.०१ मिनट पर शहीद मीनार पर राष्ट्रपति जिल्लुर रहमान ने श्रद्धांजलि दी. उसके बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद से लेकर साधारण जनता तक ने पूरे दिन उत्साह से अपनी भावना प्रकट की. समय का चुनाव ही इस दिन के उत्साह को जाहिर कर देता है. रात के १२ बजे सारा देश इसमें शामिल हो जाता है. राष्ट्राध्यक्ष इस समय सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल होते हैं. उनके साथ ही पूरा शासक वर्ग और समाज. भारत में कोई राष्ट्रीय पर्व रात में मनाया जाता हो ऐसा नहीं देखा गया.

बांग्लादेश से हम भारतीय क्या सीख सकते हैं? अपनी मातृभाषा और संस्कृति को लेकर जितना सम्मान का भाव उनमें दिखाई देता है उतना भारतीयों में नहीं. बांग्लादेश भारत की तरह भाषाई विविधता वाला देश नहीं. इसलिए इसे भारत की तरह कई भाषाई समूहों के बीच तालमेल बनाए के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता और अंग्रेजी को बीच में घुसने का मौका नहीं मिलता है. लेकिन सांस्कृतिक उपनिवेशवाद से अपने को बचाए रखने में उसने भारत से अधिक दृढ़ता का परिचय दिया है. यह सायास दृढ़ता यहाँ की सड़कों पर उतरते ही पता चल जाती है. भारतीय समाज क्या मातृभाषा दिवस को एक अवसर के रूप में लेते हुए अपनी भाषाई विविधता और मातृभाषाओं के विकास के लिए आगे आयेगा और औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति का रास्ता चुनेगा?

 आनंद पांडेय, जिला अंबेडकर नगर, अवध कै रहवैया हुवैं। जे.एन.यू  से उच्च सिच्छा औ पी.एच.डी हासिल किहिन। इस्टूडेंट पालिटिक्स से जुड़ा रहे। सामाजिक औ साहित्तिक मुद्दन पै आपन राय हौके-मौके रखा करत हैं। इनसे आप  anandpandeyjnu@yahoo.co.in  पै संपर्क कै सकत हैं।