कुटियन मा उजियारा होइहैं!__जुमई खां ‘आजाद’

majoor आज मजूर-दिवस आय। यहि मौके पै अवधी कवि जुमई खां ‘आजाद’ कै ई रचना हाजिर है, जेहिमा सोसक लोगन के खिलाफ बगावती सुर बुलंद कीन गा है। : संपादक 
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कुटियन मा उजियारा होइहैं!__जुमई खां आजाद

“दुखिया मजूर की मेहनत पर,
कब तलक मलाई उड़ति रहे।
इनकी खोपड़ी पै महलन मा,
कब तक सहनाई बजति रहे॥
ई तड़क-भड़क, बैभव-बिलास,
एनहीं कै गाढ़ि कमाई आ।
ई महल जौन देखत बाट्‌या,
एनहीं कै नींव जमाई आ॥
ई कब तक तोहरी मोटर पर,
कुकुरे कै पिलवा सफर करी।
औ कब तक ई दुखिया मजूर,
आधी रोटी पर गुजर करी॥
जब कबौ बगावत कै ज्वाला,
इनके भीतर से भभकि उठी।
तूफान उठी तब झोपड़िन से,
महलन कै इंटिया खसकि उठी॥
‘आजाद’ कहैं तब बुझि न सकी,
चिनगारिउ अंगारा होइहैं।
तब जरिहैं महल-किला-कोठी,
कुटियन मा उजियारा होइहैं॥”
__जुमई खां ‘आजाद’

कल भी अवधी का था, आज भी है और कल भी रहेगा!

यह खुशी की बात थी कि लखनऊ लिटरेरी फेस्टिवल-१३ के दौरान  अवधी का भी एक सत्र रखा गया था। तारीख – २३/३/१३। इस सत्र की रपट यहाँ बिना किसी काट-छाँट के दी जा रही है जिसे जागरुक पत्रकार और मित्र अटल तिवारी ने भेजी है। हम अटल जी के आभारी हैं। : संपादक
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 कल भी अवधी का था, आज भी है और कल भी रहेगा!
*अटल तिवारी

दो दिवसीय लखनऊ लिटरेरी फेस्टिवल के पहले दिन का अंतिम सत्र अवधी भाषा पर केन्द्रित था। विषय था-‘अवधी कल, आज और कल’। वक्ताओं में शामिल थे पद्मश्री बेकल उत्साही व लोक भाषा के जानकार योगेश प्रवीन। संचालन की जिम्मेदारी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से आए डाॅ. अमरेन्द्र त्रिपाठी पर थी। सत्र तय समय से काफी विलम्ब से शुरू हुआ। इसके बावजूद इसमें हिस्सा लेने के लिए लोग इंतजार करते रहे। यह अवधी के प्रति लोगों का लगाव कहिए या बेकल उत्साही के मुंह से निकला एक-एक शब्द सुनने की ललक। सोशल मीडिया के जरिए पिछले चार साल से अवधी का प्रसार करने में लगे डाॅ. अमरेन्द्र ने माइक संभाला। लोगों को विषय से रूबरू कराया। इसके साथ अवधी भाषा को लेकर बेकल उत्साही के सामने सवाल किया।

बेकल जी ने कहा कि ‘अवधी दुनिया की सबसे बड़ी भाषा है। अवधी की रचनाएं-पद्मावत, अमरावत व रामचरितमानस दुनिया की सबसे बड़ी रचनाएं हैं।’ अवधी को बढ़ाने की बात करते हुए उन्होंने कहा कि ‘हम जब राज्यसभा में थे तो अवधी समेत क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए सुझाव दिया था कि उत्तर प्रदेश को चार भागों में बांट दीजिए। उत्तराखण्ड, रुहेलखण्ड, बुन्देलखण्ड, पूर्वांचल। मेरी इस बात का लोगों ने गलत मतलब निकाल लिया। कहने लगे कि यह तो बंटवारा चाहता है। पाकिस्तानी है। पता नहीं और क्या-क्या कहा। अरे, भैया हम तो कहते हैं कि अवधी ऐसी जबान है कि इसके बिना हम जिन्दा नहीं रह सकते।’ अवधी से उन्हें कैसे लगाव हुआ? लिखने की शुरुआत कहां से की…इस पर बेकल जी ने कहा-‘अवधी से बचपन से ही लगाव था। पहले गीत लिखने शुरू किए। फिर रमई काका के साथ रेडियो पर काफी काम किया। लखीमपुर-खीरी जिले के निवासी बंशीधर शुक्ल के चरणों में पड़ा रहा। अवधी की इन विभूतियों से खूब सीखा। घर और गांव में हरवाह-चरवाह जो बोलते थे उनकी बातों को ध्यान से सुनते थे। उनको जेहन में उतारने की कोशिश करते थे। उनकी बातों में तहजीब दिखती थी। तहजीब का जिक्र आया है तो एक किस्सा सुन लीजिए। जाड़े का समय था। घर में काम करने वाले परसन काका ने कौरा यानी अलाव लगाया था। हम कौरा जलति देखेन तौ आलू भूनइ खातिर डारि दिहन। उइ मारिन। अम्मा घर पर नाइ रहइ। पड़ोस के गांव यानी अपने मइके में रहइ। हम र्वावति गएन। पूछिन का भवा। हम बताएन परसन मारिन हैं। उइ जूती निकारिन। दुइ मारिन। बोलीं, परसन कहति हउ। काका नाइ कहि पावति। यह घटना मैं इसलिए बता रहा हूं कि इस तरह अवधी हमें तहजीब सिखाती है। इंसान को इंसानियत सिखाती है।’

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(बाएं से) हिमांशु बाजपेयी, पद्मश्री बेकल उत्साही, योगेश प्रवीण और अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

पहले और अब की अवधी में बड़ा बदलाव दिखता है। इस पर बेकल उत्साही ने कहा-‘यह पद्मावत का समय नहीं है। इसमें लोग आते रहे। अपने हिसाब से बदलाव करते रहे। इसके बावजूद इस भाषा ने उन्नति की। इसका और विस्तार करने के लिए अवधी संस्थान बनना चाहिए। हम सालों से एक अवधी चैनल की बात कर रहे हैं। आप सभी लोग मांग उठाइए। सरकार को एक चैनल शुरू करना चाहिए। इससे दो फायदे होंगे। पहला भाषा का विकास होगा। दूसरा युवाओं को रोजगार मिलेगा। ऐसे में युवा पीढ़ी की भाषा के प्रति ललक बढ़ेगी। अरे, दिल्ली में मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से कहकर मैंने अवधी अकादमी कायम करा दी। दुख इस बात का होता है कि जहां की अवधी है वहां कुछ भी नहीं। इतना बड़ा प्रदेश है। एक अवधी संस्थान तक नहीं।’ बात पूरी होते देख संचालक ने अवधी के भविष्य को लेकर सवाल उछाला। इस पर बेकल उत्साही जी खानापूर्ति वाला जवाब देने के बजाय युवा संचालक के सामने ही सवाल उठा दिया। बोले-‘कल क्या होगा यह तो हम आप नौजवानों से पूछते हैं। वैसे तो हम गंवार हैं। यह बुद्धिजीवी (मंच पर बैठे योगेश प्रवीन व डाॅ. अमरेन्द्र त्रिपाठी) अवधी की बात करेंगे। इसी के साथ संचालक ने लोक भाषा के जानकार योगेश प्रवीन से अवधी के क्षेत्र व उसके इतिहास के बारे में पूछा।

योगेश प्रवीन ने कहा-‘नेपाल की तराई से गंगा के दहाने तक अवधी का बोलबाला है। पहले बारह आबाद जिलों तक अवधी का सिक्का रहा है। हां, यह बात जरूर है कि कुछ क्षेत्र बादि लहजा बदलति रहति है।’ उन्होंने मुल्ला दाउद के ‘चन्दायन’, मलिक मुहम्मद जायसी की ‘पद्मावत’ व तुलसीदास की ‘रामचरितमानस’ के जरिए अपनी बात का विस्तार किया। साथ ही कुछ कहावतों के जरिए माहौल को हल्का बनाने की कोशिश की। देवरानी-जेठानी के बीच काम को लेकर एक कहावत कही-‘एक आंगन में दुइ, उइ कहइ उइ, उइ कहइ उइ।’ इस पर मौजूद अवधी प्रेमी हंसने लगे। योगेश प्रवीन ने समृद्ध अवधी लोकगीतों की जानकारी दी। साथ ही बेगम अख्तर के गाए दादरा-‘चले जइहो बेदरदा मैं रोइ मरिहौं…’ की बात की। अवधी क्षेत्र…भाषा व उससे लोगों के लगाव की बात करते हुए योगेश प्रवीन ने कहा-‘आज भी आम आदमी की भाषा अवधी है। लोग अवधी आसानी से समझते हैं। अवधी का चलन बना रहे इसके लिए घर के बड़े लोग घरों में बच्चों से बातचीत में इसका इस्तेमाल करें। अगर बच्चों को अवधी से नहीं जोड़ा गया तो वे इससे दूर हो जाएंगे। यह अवधी के लिए अच्छा नहीं होगा। जाहिर है कि यह तहजीब के लिए भी सही नहीं होगा।’

डाॅ. अमरेन्द्र त्रिपाठी ने अवधी की बात करते हुए कहा कि अवधी करोड़ों किसानों की भाषा है, लेकिन दुखद यह कि हम इसका इतिहास तक नहीं रख रहे हैं। यह हमारे लिए कितनी शर्मिन्दा करने वाली बात है। संचालक ने भाषा के विस्तार को लेकर एक बार फिर पद्मश्री बेकल उत्साही से सवाल किया। बेकल जी ने कहा-‘अवधी क्षेत्र में जगह-जगह बैठकें होनी चाहिए। उसमें यह ध्यान न रखा जाए कि कितने लोग शामिल हो रहे हैं। जाहिर है पहले संख्या कम रहेगी। गोष्ठी, सेमिनार, कविता-कहानी पाठ के छोटे-छोटे आयोजन होने चाहिए। प्रतियोगिताएं होनी चाहिए। इससे नयी पौध का भाषा के प्रति प्रेम बढ़ेगा। वह इसे बोलने में संकोच नहीं करेगी।’ बेकल जी ने अपनी एक इंग्लैण्ड यात्रा का जिक्र करते हुए कहा-‘बीबीसी ने मेरा साक्षात्कार लेने के लिए कहा। मैंने साफ कह दिया कि हम तो अवधी में बोलते हैं। अवधी में साक्षात्कार लेना हो तो बात करिए अन्यथा नहीं। वह तैयार हो गए। पूरा साक्षात्कार मैंने अवधी में दिया।’ बेकल जी ने कहा कि ‘अवधी में दूसरों को अपनाने की भी क्षमता है। पता नहीं कितने फारसी और उर्दू के लफ्जों को आत्मसात किया है, जिससे इसका लालित्य बढ़ा है। जैसे मेहरारू शब्द अवधी में है। वैसे यह है फारसी का…लेकिन अवधी ने आत्मसात कर लिया।’ युवा पीढ़ी से उम्मीद जताते हुए उन्होंने कहा कि ‘मैं उम्रदराज हो गया हूं। अब आप लोगों पर अवधी को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है। हां, इतना जरूर कहूंगा कि अगर अवधी चली गई तो बड़ा तहजीबी नुकसान होगा।’ फेस्टिवल के पहले दिन का यह अंतिम सत्र था। समापन की ओर था। देर शाम हो चली थी…लेकिन अवधी प्रेमी व बेकल जी के प्रशंसक जमे बैठे थे। उन्होंने बेकल जी से कुछ सुनाने को कहा। बेकल जी सामने मेज पर रखी अपनी किताब ‘सरसों के जूड़े में टेसू के फूल’ पलटने लगे। फिर गुनगुनाया…‘नाचै ठुमुक ठुमुक पुरवाई।’ लोगों ने पूरे मनोयोग से सुना। तालियों से दाद दी। इसी बीच एक अवधी प्रेमी ने एतराज जताया कि अवधी के सत्र की अनदेखी की गयी। आयोजकों ने इसे मुख्य हाल में न रखकर एक कोने में रखा। समय का ध्यान नहीं रखा। यह भेदभाव नहीं होना चाहिए। इस पर आयोजकों की ओर से क्षमा याचना की औपचारिकता दिखी। वहीं संचालक ने वक्ताओं को धन्यवाद दिया। सजग पत्रकार और अवधी-प्रेमी हिमांशु बाजपेयी ने सत्र की शुरुआत की ही तरह  समापन की भी घोषणा की।
(फोटो: साभार, लखनऊ सोसाइटी)

कविता: हुवाँ अउर हियाँ

नीरज पाल कै ई कविता, कविता के जरिये यक बातचीत है। यहिमा गाँव से सहर मा आये के बाद गाँव केरी जिंदगी क ‘हुवाँ’ अउर सहर केरी जिंदगी क ‘हियाँ’ कहि के यक हल्का-फुल्का संबाद भर कीन गा है। हुवाँ काव काव हुअत रहा अउर हियाँ काव-काव हुवै लाग!
हमार कोसिस हुअत है कि केहू कै जौन ‘बानी’ भेजी जाय, हम भरसक वही हालत मा वहिका रखि दी। यहिसे भासा कै ‘ट्रेंड’ पता चलत है। यहिलिये कविता हमरे लगे जौनी हालत मा आयी, हम लगभग वही हालत मा हियाँ रखत अहन्‌। अपनी वारिस्‌ कौनौ रंदा-रुखानी नाही चलायेन। : संपादक
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कविता: हियाँ अउर हुवाँ 

हम गांवन के हरियर खलियान का दीख
और सहरन के जगमग समसान का दीख
गांवन मा लगा नीक नीक
सहरन मा लगा फीक फीक
हुवां कपरा पहिरैं अंग बचावें का
हियां फटहेव जचैं स्टाइल बनावें का
होयें कपडन मा जब तक दुई चार छेद नहीं
ऊ सहरन वाला भेष नहीं
गावन मा सम्मान अबहूँ है
छ्वाट बडेंन के संगै खात नहीं
हुवां हाय बाय ते बात नहीं
अम्मा बप्पा कहावत हैं
हियां मम्मी डैडी चिल्लावत हैं
जैसे घर मा न मुर्दा घर मा होंय
वो ऐसा सीन दिखावत हैं
हियां टीविन मा सीडी लगे पड़े
हुवां कोल्हू बैल चलावें का
हियां गर्मीं मा एसी लगावें का
हुवां पीपर के तारे वी स्वावत हैं
एसी का कहूं नाम नहीं ऐसी की तैसी मचावैं का
दादागिरी मा पाछे नहीं वी लम्बरदार कहावें का
हुवां मुअछन की रंगबाजी हवै
हियां रोवजये मूछ मुड़ावें का
भिक्खु नन्क्हू लाठी भांजै दीवारी मा चट्कावैं का
कित्ते पहलवानन का को सधी हुन लम्बरदार कहावें का
हुवाँ तित त्यौहार सब अपन लगें
हियाँ बज़ारन मा सब सजन लगें
हम गाँव का नीकैं कहब ई सहरन के गलियारन ते
हुवां दुःख सुख के भागीदार भलें हैं
हियां पिठछुरिया सब यारन ते!
__नीरज पाल

niraj
नीरज पाल
कानपुर-अवध / उत्तर प्रदेश कै रहवैया हुवैं। यहि साइत अंधेरी-महाराष्ट्र मा यक बिग्यापन एजेंसी मा कॊपीराइटर के पद पै काम करत अहैं। ‘अगड़म-बगड़म’ – ब्लाग पै इनकै साहित्तिक हलचल देखी जाय सकत है। इनसे मोबाइल नं.  091 67 624091 पै संपर्क साधा जाय सकत है।

‘तुम हे साजन!’__पढ़ीस

padhis कवि बलभद्र प्रसाद दीक्षित ‘पढ़ीस’ आधुनिक अवधी कवियन मा सबले जेठ कहा जइहैं। पढ़ीस जी कै जनम १८९८ ई. मा भा रहा। गाँव – अम्बरपुर। जिला – सीतापुर/अवध। खड़ी बोली हिन्दी , अंग्रेजी अउर उर्दू कै ग्यान हुवै के बादौ पढ़ीस जी कविताई अपनी मादरी जुबान मा यानी अवधी मा किहिन। १९३३ ई. मा पढ़ीस जी कै काव्य संग्रह ‘चकल्लस’ प्रकासित भा, जेहिकै भूमिका निराला जी लिखिन औ’ साफ तौर पै कहिन कि यू संग्रह हिन्दी के तमाम सफल काव्यन से बढ़िके है। पढ़ीस जी कै ग्रंथावली उ.प्र. हिन्दी संस्थान से आय चुकी है। पढ़ीस जी सन्‌ १९४२ मा दिवंगत भये। 

हियाँ पढ़ीस जी कै गीत प्रस्तुत कीन जात अहै, ‘तुम हे साजन!’ यहिमा निपट गाँव के माहौल मा नायिका कयिसे केहू से निरछल पियार कइ बैठति है अउ करति रहति है, देखा जाय सकत है। मुला नायक अपनी मासूका का भुलाइ बैठा है। यही कै टीस यहि गीत मा पिरोयी अहै। : संपादक
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 ‘तुम हे साजन!’__पढ़ीस

मँइ गुनहगार के आधार हौ तुम हे साजन!
निपटि गँवार के पियार हौ तुम हे साजन!

घास छीलति उयि चउमासन के ख्वादति खन,
तुम सगबगाइ क हमरी अलँग ताक्यउ साजन!

हायि हमहूँ तौ सिसियाइ के मुसक्याइ दिहेन,
बसि हँसाहुसी मोहब्बति मा बँधि गयन साजन!

आदि कइ-कइ कि सोचि सोचि क बिगरी बातै,
अपनिहे चूक करेजे मा है सालति साजन! 

तुम कहे रहेउ कि सुमिरेउ गाढ़े सकरे मा,
जापु तुमरै जपित है तुम कहाँ छिपेउ साजन! 

बइठि खरिहाने मा ताकिति है तउनें गल्ली,
जहाँ तुम लौटि के आवै क कहि गयौ साजन!

हन्नी उइ आई जुँधय्यउ अथयी छठिवाली,
टस ते मस तुम न भयउ कहाँ खपि गयौ साजन? 

कूचि कयि आगि करेजे मा हायि बिरहा की,
कैस कपूर की तिना ति उड़ि गयउ साजन!

याक झलकिउ जो कहूँ तुम दिखायि भरि देतिउ,
अपनी ओढ़नी मा तुमका फाँसि कै राखिति साजन!
__बलभद्र प्रसाद दीक्षित ‘पढ़ीस’

सबद-अरथ:  सगबगाइ – सकपकाब यानी संकोच करब / हन्नी – सप्तर्षि तारा मंडल कै समूह, हिरन / जुँधय्यउ – चंद्रमा / अथयी – डूबब, समाप्त हुअब या तिरोहित हुअब।

चला गजोधर भईस चराई!

हमका नयी पीढ़ी के जवानन कै लिखी कविता मिलत है तौ पहिली खुसी यू हुअत है कि नवजवानै अपनी लोकभासा मा लिखत अहैं। तब जबकि सब हिन्दी से हुअत-हुअत अंगरेजी की वारी लपलपात जात अहैं। यही लिहाज से यहि कविता ‘चला गजोधर भईस चराई!’ कै सबसे ज्यादा महत्व यहिके दस्ताबेजी हुवै मा अहै। रीवा जैसे दक्खिनी-अवधी के इलाका कै नवजवान अवधी मा रचनासील अहै। हमार आसीस जी से दरकारि अहै कि यहू से उग्गर-उग्गर कविता लिखैं। : संपादक
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कविता : ‘चला गजोधर भईस चराई!’ 

चला गजोधर भईस चराई,
जुग जमाना बदलिगा भाई!

लउँडे घूम रहे लगाये टाई,
पढ़े लिखे सब भईस चरावैं,
अनपढ़ कीन्हे खूब कमाई,
चला गजोधर भईस चराई !!

कलुआ भलुआ बाम्बे सूरत,
हमका तोहका का जरुरत!
खेत बेच के किहन पढ़ाई ,
चला गजोधर भईस चराई!

चालिस जगह दिहन इंटरब्यू ,
हमहू फसे उनके चक्रब्यू!
लगा पाच सौ फाम भराई ,
चला गजोधर भईस चराई!

बोल हाय बाय हमका भेजिस ,
जैसे घरे से कूकुर खेदिस!
कहिस आशीष हम फोन लगाउब ,
जल्दी अच्छी जॉब बताउब!
फोन नहीं किहिस का बताई ,
चला गजोधर भईस चराई!

बईठब बढ़िया चढ़े पेढ़ पर ,
भैसी चरिहीं हरे मेड़ पर!
कड़ी दुपहरी जब होई त ,
भैसी डबहा परि जई भाई ,,
चला गजोधर भईस चराई!

लइके चलब मटिआरे म ,
मजा करब झरिआरे म!
लल्लू झल्लू भईस बहोरिही ,
बल्लू भाई चना उखडिही!
हम करबय खुब चना भुजाई ,
चला गजोधर भईस चराई !
__आशीष तिवारी

ashish tiwari


आशीष तिवारी
, गाँव – अमाव / पोस्ट – अतरैला, १२-चाकघाट / रीवा-मध्य प्रदेश कै रहवैया हुवैं। ई दक्खिनी अवधी कै इलाका आय। इनसे आप 9200573071 पै संपर्क कै सकत हैं।

कविता : लछिमी-पूजन (कवि रमई काका)

वधी के आधुनिक कबियन मा सबसे पापुलर कवि रमई काका कै जनम रावतपुर, उन्नाव जिला(अवध) मा दुइ फरौरी सन्‌ १९२५ क भा रहा। काका जी कै पूरा नाव है चंद्रभूसन तिरबेदी। काका केरी कबिताई मा व्यंग्य कै छटा जनता के जबान पै चढ़ि के बोलति रही। आजौ कविता कै उहै असर बरकरार अहै। १९४० से काका जी आकासबानी मा काम करै लागे अउर तब से काका जी कै ख्याति बढ़तै गै। आकासबानी लखनऊ से काका जी कै प्रोग्राम ‘बहिरे बाबा’ बहुतै सराहा गवा। काका जी के कार्यक्रम कै प्रस्तुति बी.बी.सी. लंदन से ह्वै चुकी है। इनकै कबिता चौपाल मा, किसानन के खेतन मा, मेलन मा, चौराहन पै सहजै मिलि जात है। ‘भिनसार’, ‘बौछार’, ‘फुहार’, ‘गुलछर्रा’, ‘नेताजी’ जैसे कयिउ काब्य-संग्रह हजारन की संख्या मा छपे अउर बिके। दूर-दूर तक अपनी लोक-भासा कै जस फैलाय के माटी कै ई सपूत अठारह अपरैल सन्‌ १९८२ क ई दुनिया छोड़ दिहिस!

ई कविता ‘लछिमी-पूजन’ चंद्रशेखर जी के सौजन्य से मिली। यहि कविता मा लछिमी-पूजन के बहाने ‘पैसरमी किसान’ आपन ब्यथा कहत अहै। ऊ जगत की ब्यवस्था पै सवाल करत्‌ अहै कि हमरेन पैसरम से दुनिया जगामग्ग भै मुला हमहीं केतना अभाव झेलित है! आखिर काहे! : संपादक
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 कविता : लछिमी-पूजन (कवि रमई काका) 

लछिमी जी की अगवानी मा,
सबके घर जगमग-जोति जरी।
उतरे धरती पर नखत मनौ,
परकासु फइलिगा गली-गली।
चटके परकास सोनहरे के,
पाँउरा बिछे हैँ ठाँव-ठाँव।
औ लछिमी-लछिमी कै गोहारि,
जब मची सगत्तर गांव-गांव।
तब हमहुँ अंधेरी कुरिया मा,
चटकील सुभग परकासु भरा ।
औ बेकल अनमन हिरदय मा,
अभिलास आस बिसवास भरा।
फिरि सरधा ते जागरन कीन,
औ राह दीख यकटक नयनन।
हमरी कुरिया मा न आईँ,
का चली गईँ ऊँची महलन।
जी की फुलवारी के फुलवा,
अँसवा बनि नयनन ते निकरे।
पर लछिमी जी न दरस दिहिन,
निसफल पिरथी पर सब बिथरे।
लछिमी धनिकन की देवी हैँ,
जिनके उइ सदा सहारे हैँ।
दीनन के दीना नाथ देव,
लछिमी पति नाथ पियारे हैँ।
हमहीं धरती के मालिक हन,
हम पैसरमी तपसी किसान।
धन लछिमी सब कुछु खोय चुकेन,
मुलु हैं अपनेपन का गुमान।
जग का सुखु छइला छहरि-छहरि,
हमरिही दीनता की भुइँ पर।
जग के महलन कैं नीव परी,
हमरिही झोंपड़िन के ऊपर।
उइ धनिक आँय हम निरधनियाँ,
मुलु दीनन ते हैं धनिक बने।
माटी की किनकी-किनकी ते,
हीरा पन्ना मनि मानिक बने।
पथरन के छोटे टुकरन ते,
है परबत का यतना उँचान।
बदरन की नान्हीं बूंदन ते,
सागरु यतना होइगा महान।
हम करित जगत का अन्नु दानु,
ई ख्याल छोडि जो बइठि रही।
लछिमी पति आसनु छोड़ि चलैं,
फिरि लछिमी कै गति कौनि कही।
जौं हम न सही यह धूप ताप,
तौ मिले न सुखु छाहीं जग का।
औ हम न सुखाई रकतु अपन,
तौ मिटै हरापनु पग-पग का।
हम जौ न पसीना अपन बहाई,
जगु कइसे बिसरामु करै।
हम जौ न करी खाली कुरिया,
कइसे संसारु बखारु भरै।
चिकनई पसीना कै हमरे,
डेलिन-डेलिन मा लहकि रहि।
ख्यातन मा सिरजा हम कपास,
जहिके बाति है दहकि रहि।
सब जगतु उजेरिया मा कुलकै,
मुलु हम हन खड़े चिराग तरे।
हम सारे जग के परकासी,
ना पाइत है उजियारु अरे!
हम निरखित खड़े अँधेरे मा,
लछिमी जी तन आसा लगाय।
घुलि जाय अंधेरु उजेरा मा,
सारा जगु एकसाँ जगमगाय।
__ रमई काका
 
सौजन्य : चंद्रशेखर जी लखनऊ-अवध क्यार रहवैया हैं। (अवधी)साहित्य से खासी दिलचस्पी राखत हैं। इनसे आप http://www.facebook.com/s.chandrasekhar06  पै संपर्क कै सकत हैं।

दसहरा, ईद, तनाव, हमरी रुदौली और आसपास


तहसीन मुनव्वर साहिब
कै लिखा ई अवधी आलेख मूलरूप से उरदू डेली अखबार ‘द इंकिलाब’ [ THE INQUILAB ] मा छपा रहा, लिपि उर्दू रही। ई हियाँ नागरी लिपि मा हाजिर कीन जात अहै, लेखक की इजाजत से, साभार ‘द इंकिलाब’। यहि आलेख मा पिछले महीने फैजाबाद-अवध मा भये मजहबी तनाव पै लेखक कै आपबीती औ तबसिरा दुइनौ अहै। लेख अपने मूलरूप मा अहै, बस कहूँ-कहूँ अवधी ब्याकरन के हिसाब से तनिका-मनिका बदलाव कीन गा है। : संपादक 
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दसहरा, ईद, तनाव, हमरी रुदौली और आसपास

रुदौली मा दसहरे वाले दिन हम अपने बच्चन संग मगरिब की नमाज के बाद नवाब बाजार जात रहेन कि बड़े ईमामबाड़े के नुक्कड़ पर होटल मा हमरे अजीज मिल गये। हम उनसे पूछा का मियां रावण दग गवा? कहिन कहां दगा।

कोई भैलसर के पास वास वाले गांव मा मूर्ति खंडित कर दिहस रहे तो सब `पोशाले’ के हुआँ जाम लगाए हैं कि जब तक मुलजिम न पकड़े जइहैं तब तक न तो मूर्ति विसर्जन होइए न ही रावण दागा जाहिए। इ सुनके हमरे तो पांव के नीचे से जमीनें खिसक गई और हम बाजार न जाइ के उलटे पैर घर लौट पड़े।

हमका जब-जब मौका मिलत है हम अपने बच्चन का अपनी तहजीब के करीब लै जाइ की कोशिश करत हन। दसहरे की छुट्टी होए गई रहे और हम सोचा कि इह अच्छा मौका है काहे न दुइनौ त्यौहारन के जरिये आपसी मोहब्बत और भाईचारे कै दरसन कीन जाए। हम जब ट्रेन मा जात रहेन तो सताब्दी और राजधानी मा पढ़े के लिए दी जाए रही मैगजीन मा हिंदी में बकरीद पर लिखा हमार लेख पढ़त बच्चै बहुत खुशी महसूस कर रहे रहैं। हम ऊ लेख मा दसहरा, ईद और दीवाली समेत सभी त्यौहारन का देस मा एकता से जोड़कर देखे रहेन। हमरे कुछ हिंदू दोस्त फेसबुक पर लिखे भी रहे कि आप जो `अल्ला को प्यारी है कुर्बानी’ में बात कहिन हैं ऊ बहुत अच्छी है और हम सबका त्यौहारन का आपसी मोहब्बत बढ़ावै वाला समझेक चाही। अब आप समझ सकत हैं कि हम कौनी तरह की भावना कै पहाड़ लैके रुदौली मा ईद मनावै पहुंचे रहन।

पूरे कस्बे पर त्यौहारी मौसम छाया रहे। लाउड स्पीकर पर दिनभर माता की भेंट और उसी तरह के धार्मिक भजन आदि का जोर रहे। पांच वक्त की अजान की आवाज भी यही से जुड़ जात रहे। जब अपने आंगन में दोपहर में लेटत रहे तो कहीं दूर से राम चरित मानस की चौपायिन की आवाज इतनी अच्छी लगत रहे कि बताए नहीं सकत हैं।
जापे कृपा राम की होई,
तापे कृपा करे सब कोई।

कबौ-कबौ हमका ई सोर परेसान भी करत रहे मगर हम सोचत रहन कि रमजान मा तीन बजे से हमहूँ लोग सभी का जगाए रखत हन फिर इतना तो आपसी रवादारी मा बर्दास्त करहिन का पड़त है। रुदौली मा हमार टाटा फोटोन का इंटरनेट काम नहीं करत है यहिलिए वहां हम अनूप संघाई जो रामलीला और दुसरे हिंदू धार्मिक आयोजन से जुड़े रहत हैं, के पास जाइ के अपने दुइ-चार इंटरनेट के काम कर लेत हन। ऊ कसबाती मिलीजुली तहजीब का हिस्सा बने रहत हैं जबकि उनका ताल्लुक ऐसी सियासी पार्टी से बतावा जात है जेहिका हम लोग मुस्किल से वोट देत हन। हम उनसे कई बार कहा कि हमका रामलीला देखै जाय क है पर रुदौली मा अब के बिजली का सिलसिला अइसा रहा कि रात का दस बजे आवत रहे और चार बजे सबेरे चली जात रहे। फिर सबेरे नौ बजे आवत रहे और दोपहर दुइ बजे निकल जात रहे। वही मा हम लोगन का सोवै-जागै का वक्त आए जात रहे। रामलीला वैसे तो दुइ जगह हुइ रहे रहै मगर घर से दूर रही तो हम जाए नहीं सके पर हमका मालूम रहे कि हिंदू-मुस्लिम एकता कहीं न कहीं उनमा अपनी झलकी जरूर दिखाए रही होए।

हमरे घर जल्दी वापस आए-जाए से हमरी बेगम चौंक पड़ी। हम तीनों बाप-बेटेन का दस्तूर ई रहे कि हम लोग मगरिब इसा पढ़के रुदौली मा मालिक चचा के होटल से कबाब रोटी या ऐसा ही कुछ खाएके वापस आवत रहन। जब हम उनका बतावा हालात खराब होए रहे हैं तो मुंबई दंगन का डर उनके चेहरे पर दिखाई देगवा। हम इधर-उधर फोन किहेन और मालूम करै की कोशिश किहेन कि रुदौली मा हालात कैसे हैं तो हर कोई तनाव मा दिखाई दिया। पिछले कुछ सालन मा दुर्गा पूजा का लैके पूरब मा काफी जोर बढ़ा है। रुदौली के आसपास होए वाली दुर्गा पूजा के बाद विसर्जन के लिए मूर्तिन का लैके काफी दूर गोमती जावा जात है। ई लोग रुदौली से गुजरत हैं और अकसर उनका 25-30 किलोमीटर चलै का पड़त है। जुलूस बहुत लंबा होए जात है और देर रात तक विसर्जन पूरा होत है। अब हालत ई होए गई रहे कि वो सब पोसाला जो कि हमरे घर से कुछ ही दूर है पर जम गए रहैं। अब जब उन लोग जाम लगाए दिहिन तो तनाव बढ़ै लगा। नेशनल हाइवे पर भी हंगामे की खबर हमरे पास आई रहे। वहीं घर के करीब एक हमरे आरिफ चचा हैं। हम अकसर उनके पास जाइके सेरो-सायरी पर बहस किया करत हन। उनके खुमार बाराबनकवी साहब से अच्छे ताल्लुकात रहे तो सायरी की अच्छी समझ रखत हैं। जब हम उनके पास गए तो परेसान दिखाई दिए। कहिन फैजाबाद में गोली चल गई है। दुइ लोग मारे गए हैं। उनकी बेटी शायद वहीं रहत है। यहिलिए परेसान दिखे। उसके बाद आसपास से आग लगे की खबर आए लगीं। हम रुदौली मा बात किहेन तो सब यही कहन कि हमरी रुदौली मा कुछ गड़बड़ नहीं होए सकत है। हमरे बच्चे जो अब तक इस तरह की खबरन का टीवी-वीवी पर ही देखत-सुनत रहे जब खुद अपने करीब सुनिन तो घबराए लगे। अंदर से तो हम परेसान रहन कि काहे हम सबका लेकर दिल्ली से रुदौली आए गए। लेकिन प्रशासन की समय पर कार्रवाई के बाद कुछ लोग गिरफ्तार होए गए तो विसर्जन का मामला हल हुइ गवा। रात बेचैनी मा गुजरी और अगले दिन शाम का हमरे चचा के बड़े बेटे जो अब बाराबंकी रहे लगे हैं, अपने बच्चन संग आए गए तो हौसला मिल गवा। लेकिन उनसे ही सूचना मिली कि फैजाबाद भदरसा मा आगजनी की वारदात के दौरान एक आदमी चाकू लगे से मर गवा है। भदरसा हमरी ससुराल है मगर इतमिनान ई रहा कि हमरे ससुर आजकल ग्वालियर आए हैं। २५ की साम का एक बार फिर हम लोगन के फोन पर फैजाबाद और आसपास हालात के खराब हुवै की खबर आवै लगी। भदरसे से सटे छोटे-छोटे गांव से आग की खबरें आए लगीं और फैजाबाद मा भी वहि मस्जिद पर हमला कर दिया गवा जहां से एकता की मिसाल बने वाली राम बारात और दुर्गा प्रतिमा पर फूल बरसाए जात रहे। रिश्तेदारन से होई रही बातचीत मा पता लगत रहे कि जैसे साजिस के तहत कुछ लोग हालात बेकाबू करा चाहत हैं। खैर, ईद आवत-आवत हालात कुछ हद तक ठीक होए गए पर हम लोगन के जेहन से खौफ नहीं निकल पावा। हमरी बीवी तो एक रात बकरे के संग डर से जागी भी। दुइनौं का डर लगभग एक-सा ही रहा।

अखिलेस सरकार के आए के बाद ऐसा लगत है कि कुछ लोग या तो सरकार का बदनाम करे की खातिर या फिर उनहन की सह पर सूबे मा फिरकावाराना तनाव बनावा चाहत हैं। रुदौली और आसपास होइ वाली हिंसा के पीछे पुलिस और प्रशासन की नाकामी तो रहबै करी, जो अफसर हटाए गए उनमा साफ पता चल जात है कि एक खास नाम देखकर पुलिस मा जिम्मेदारी दी गई रहे। लोग तो यहां तक कहे लगे हैं कि अखिलेश सरकार के कुछ महीनन मा जिस तरह ऐसी-ऐसी जगह पर फिरकावाराना हिंसा हुई है जहां नब्बे मा हालात खराब होए के बावजूद कुछ नहीं हुआ रहे जो ई बताए रहा है कि वो मुसलमानन की जान और माल की हिफाजत करे में नाकाम होए रहे हैं। अब कहे वाले यहू कहे लगे हैं कि उनसे अच्छी तो बहन जी रहीं। कम से कम हम लोग सुकून से तो सोए लेत रहन। होए सकत है कि ई वक्त मुस्लिम वोटरन की मजबूरी अखिलेश यादव होंय पर को कह सकत है कि अगर ऊ हालात रोके मा यही तरह नाकाम रहे और हिंसा के बाद अफसरन का हटाना ही अपना फर्ज समझते रहे तो लोग उनसे मुंह न मोड़ लें। उनका याद रखेक होए कि मुलायम सिंह यादव देस कै प्रधानमंत्री बनना चाहत हैं मगर उनकी ई लापरवाही कहीं उनके पिता के यहि ख्वाब के पूरा होए मा रुकावट न बन जाए।

खुदा का सुकर है कि अब हालात काबू मा हैं। मगर अब हम लोगन का मोहर्रम की फिक्र सतावै लगी है। ऐसे मा पुलिस तो हर जगह मौजूद नहीं रह सकत है। राज्य सरकार का ई निश्चित करेक होए अगर किसी भी पुलिस थाने के तहत कुछ भी गलत हुइ गवा तो उनको बख्सा न जाहिए। साथ ही हिंदू-मुस्लिम सभन का मिलजुल के देश मा शांति कायम रखे के लिए जागरूक रहे की आवश्यकता है। अगर हम नहीं चाहें तो कोई मां ई हिम्मत न होए सकत है कि हमरे रहते हमरे पड़ोसी की तरफ टेढ़ी आंख से देख ले। हमका उम्मीद है कि मोहर्रम मा हम सबकी ओर से एकता और भाईचारा का ऐसा सबूत दिया जहिए जो हमरे हिंदुस्तानी होए की पहचान है। वैसे भी हमरे अवध मा तो आपसी भाईचारे का गिजरा कल हमे्सा आज से गले मिलकर आवै वाले कल की एकता का मजबूत बुनियाद रहबै किया और आगे अल्ला चाहे तो ऐसा ही होता रहिए।

(लेखक तहसीन मुनव्वर साहब मीडिया बिस्लेसक अउर साहित्यकार हैं। यै रुदौली-अवध से ताल्लुक रखत हैं। फिलहाल नई दिल्ली मा हैं। इनसे आप munawermedia@gmail.com पर संपर्क कै सकत हैं।)