बजरंग तिवारी ‘बजरू’ केरि अवधी गजल

हंस पत्रिका के जुलाई वाले अंक मा बजरंग बिहारी ‘बजरू’ केर ई अवधी गजल पढ़तै-खन जिउ निहाल होइगा। ‘हंस’ हिन्दी कय जानी-मानी पत्रिका आय, वहिमन लोकभासा के ताईं अस पहल भै, ई बहुत खुसी कै बाति है।  यहि गजल क हियाँ, पाठक लोगन ख़ातिर, हाजिर करत हम ‘हंस’ औ बजरंग भैया केर बहुत आभारी हन्‌। आगेउ अस परयास जारी रहय। निहायत गाँव कै सबदन से आधुनिक चेतना क समाउब, समझौ गाँव-गुलौरी मा नयी आगि-आँच डारब! चुनौती बड़ी मुल निभायी गय है करीने से। 
साभार; हंस-जुलाई’१५

साभार; हंस-जुलाई’१५

बाबा निमिया कै पेड़ जिनि काटेउ

village_india_scene_paintings_nature_hut_street_agriculture_farmers_एक दिन फिर जाता है और सारी स्थितियाँ बदल जाती हैं। विवाह के परोजन में, विदाई के पहले वाली रात तक कितनी चहल-पहल रहती है! जिस दिन कन्या की विदाई होती है, उस दिन का सूरज ही कुछ मायूसी लिए उगता है। कुछ पहर ही बीतते हैं, हालात ‘यू-टर्न’ ले लेते हैं। स्त्रियों के जिन कंठों ने उल्लास में ‘गारियाँ’ गायीं, वे अब बेबस हो कर विरह के दुख को सबद दे रहे होते हैं। विदाई का ऐन वक्त! बुक्का फार कर रोता परिवेश! मानव का सुख-दुख कितना परिवेशी है, जड़-चेतन सब अपनी भाषा में कूकते हैं। गाँवों में लोग ही नहीं, गोरू-बछरू भी इस विदाई के दुख को महसूस करते हैं। वे कान उटेर-उटेर कर पूरे परिवेश को अपने ढ़ंग से समझने की कोशिश करते हैं। वे निराशा के साथ देखते हैं कि इन इंसानी कायदों में उनका कोई दखल नहीं है। विदाई के बाद उनकी आँखें अँसुवाई रहती हैं। कई दिनों तक। एक गाय का सत्याग्रह मुझे याद है जिसने कई दिनों तक पानी की बाल्टी की ओर देखा तक नहीं। वह उन हाथों की प्रतीक्षा में थी जो मेहदी लगा के ससुराल चले गये, जिन्होंने पानी की बाल्टी भर-भर इनकी प्यास बुझाई थी। प्रकृति इतनी कृतघ्न कहाँ हो सकती है!

विदा होती लड़की भी परिवेश के महत्व को खूब जानती है। उसे घर के इन पशुओं का ही नहीं, पेड़ों-पौधों की भी भूमिका का पता है। वह अपने घर के नीम के पेड़ और उस पर आने वाली, कूजने वाली चिड़ियों में जीवन का फैलाव देखती है। उसे अपने विदा होने पर पूरे परिवार की चिन्ता है। खास कर माँ की। बेटियों के बिना घर कितना वीरान होता है, यह वह जानती है। इस वीरानेपन में माँ कितनी अकेली पड़ जाएगी, इसको लेकर वह चिंतित है। विदाई के समय वह अपने पिता से इस नीम के पेड़ को न काटने का अनुरोध करती हुई बड़ी करुणा के साथ कहती है –

बाबा निबिया कै पेड़ जिनि काटेउ,
निबिया चिरैया बसेर, बलैया लेहु बीरन की।
बिटियन जिनि दुख देहु मोरे बाबा,
बिटिया चिरैया की नाँय, बलैया लेहु बीरन की।
बाबा सगरी चिरैया उड़ि जइहैं,
रहि जइहैं निबिया अकेलि, बलैया लेहु बीरन की।
बाबा सगरी बिटियवै जइहैं ससुरे,
रहि जइहैं अम्मा अकेलि, बलैया लेहु बीरन की।

विदा होते हुए अपने कठिन दुख में उसे चिड़ियों की याद आ रही है। चिड़ियों की याद क्यों? ससुराल की चौहद्दी में खुद को सीमित होते देख उसे आकाश में उन्मुक्त उड़ान करने में समर्थ चिड़ियों की याद स्वाभाविक है। उड़ान कहीं की भी हो, बसेरा तो नीम पर ही है। बसेरे से अलग होने में उड़ान भरने का हौसला भी खत्म। इस बात को माँ ही सबसे ज्यादा समझ सकती है क्योंकि पितृसत्ता के क़ायदों से उसने भी कभी अपना आँगन छोड़ा है! अब एक एक करके सारी बेटियों के जाने के बाद यह का नीम का पेड़ और उस पर बसेरा लिये चिड़ियाँ ही उन बेटियों की अनुपस्थिति को भरेंगी। दिल को दिलासा दिलाना होगा कि अब इन चिड़ियों के कूजने, चहचहाने और उड़ने में बेटियों की आरजूएँ भी जाहिर हो रहीं!

लेकिन निरुपायता तो देखिये, आँगन के इस पेड़ के भविष्य पर भी माँ का कोई अधिकार नहीं है। अतः बेटी विदा होते वक्त अपने बप्पा से अनुरोध कर रही है कि बड़ी मेहरबानी करके इसे मत काटियेगा। फिर भी कहीं उसे संशय है। तो क्या किया जाय! पिता का सबसे प्यारा कौन है? कोई बेटी नहीं, बेटा है। तो उसी को आगे करके बात की जाय। बेटी कहती है कि हे पिता जी मैं बीरन(भाई) की बलैया लेती हूँ(यानी, मंगलकामना करती हुई उसके रोग-दोख सबको अपने ऊपर लेती हूँ), लेकिन इस पेड़ को मत काटना। उसे यकीन है कि बेटे के ज़िक्र के बाद इस बात को पिता जी गंभीरता से लेंगे और नीम का पेड़ बचा रहेगा। ‘बिटियन जिनि दुख देहु मोरे बाबा’ – में कितना कातर स्वर है! अब तक जो हुआ, सो हुआ, अब आगे जो बिटियाँ बची हैं और आख़िर उन्हें भी तो चिड़ियों की तरह चली ही जाना है, तो उन्हें इन बचे हुए दिनों में भला क्यों दुख देना।

इस गीत पर थोड़ा रुक कर सोचने पर मन करुणा से भर जाता है। इसमें एक ओर पितृसत्ता के सामने लाचार-सी स्त्रियों की व्यथा है तो दूसरी ओर दुख-दर्द की प्राकृतिक साझेदारी। क्या अब भी यह प्राकृतिक साझेदारी है हमारे बीच? पेड़ों-पक्षियों के साथ आज हमारे रिश्ते कैसे हो गये हैं। हम कितना कट चुके हैं उनसे जो हमारे गाढ़े के साथी रहे और जिन्होंने सदियों से अपनी प्राकृतिक बाहों में हमें संभाले रखा। लोक-रसिक विद्यानिवास मिश्र की इस गीत के प्रसंग में यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है कि ‘पेड़ों के साथ उन आदमियों का जो रिश्ता है वह रिश्ता आज हमने तोड़ दिया। पेड़ अब बाज़ार के अंग बन गये हैं। उनकी जो निर्मम कटाई हुई है वह उस प्रज्ञा के विरुद्ध है जो लोगों के अंदर मौजूद है।’ आज शहर हर तरफ़ अपना अपने हाथ-पाँव पसारता जा रहा है, शहरी प्रवृत्तियों का बोलबाला दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। अब ज़रूरत है कि इस स्वभाव और प्रभाव से अलग हट कर गाँवो में, ग्राम-भाषा में और गाँव के परिवेश में जाकर हम फिर से अपने जीवन पर सोचें। यकीनन हमारा हृदय अधिक विशाल होगा और मस्तिष्क अधिक प्रखर।
~अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

अहै के मोरे तोहरे सेवाइ मइया_‘उन्मत्त’

manआधुनिक अवधी कविता के खास कवियन मा गिना जाय वाले आद्या प्रसाद ‘उन्मत्त’ कै जनम १३ जुलाई १९३५ ई. मा प्रतापगढ़ जिला के ‘मल्हूपुर’ गाँव मा भा रहा। यै अवधी अउर खड़ी बोली दुइनौ भासा मा लिखिन। ‘माटी अउर महतारी’ उन्मत्त जी की अवधी कबितन कै संग्रह है। अवधी गजलन और दोहन के माध्यम से काफी रचना किहिन। इनकै काब्य-तेवर ललकारू किसिम कै है: “तू आला अपसर बना आजु घरवै मूसै मा तेज अहा, / अंगरेज चला गे देसवा से तू अबौ बना अंगरेज अहा।”

आजु महतारी-दिवस है, यहि मौके पै उन्मत्त जी कै ई रचना हाजिर है:

अहै के मोरे तोहरे सेवाइ मइया!__आद्या प्रसाद ‘उन्मत्त’ 

चाहे जँघिया प लोटे बुकउना मले,
चाहे धुरिया लपेटे बेकैयाँ चले,
मुहा चूमू है गोदिया उठाइ मइया,
अहै के मोरे तोहरे सेवाइ मइया।

चाहे पहिला परगवा फनावत गिरे,
चाहे तोहरे अँगनवा मा धावत गिरे,
चलू अगवा अँगुरिया धराइ मइया,
अहै के मोरे तोहरे सेवाइ मइया।

फुसिलाइउ बजाइ घुनघुनवा तुहीं,
टिकटोरिउ है गूँगा बोलनवा तुहीं,
दुइनौ हथवा चुटुकिया बजाइ मइया,
अहै के मोरे तोहरे सेवाइ मइया।

भूख देखू तौ बावन करमवा किहू,
माई पूरा तू आपन धरमवा किहू,
मोरे डेकरे गइउ तू अघाइ मइया,
अहै के मोरे तोहरे सेवाइ मइया।

चाहे दुनिया कै आफत बिपति गरसै,
चाहे उपरा से कौनौ बलाइ बरसै,
तोहरे कोरवै म जाबै लुकाइ मइया,
अहै के मोरे तोहरे सेवाइ मइया।

__आद्या प्रसाद ‘उन्मत्त’

छपरा कस उठी!

ई निबंध, छपरा कस उठी, भारतेंदु जी कै लिखा आय। भारतेंदु जी अवधी कै, यहि दौर कै, अहम गद्य लेखक हुवैं। इनकै दुइ उपन्यास, ‘नई रोसनी’ औ ‘चंदावती’, आय चुका हैं। यै दिल्ली मा रहत हैं। इनसे आप ०९८६८०३१३८४ पै संपर्क कय सकत हैं।: संपादक
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भारतेन्दु मिश्र

भारतेन्दु मिश्र

 “छपरा कस उठी”__भारतेन्दु मिश्र

जुगु बदलि गवा है। अब कउनेउ ट्वाला मा जाति बिरादरी वाले याक साथ बइठै-क तयार नाई हैं। जी के तीर पैसा है वहेकि ठकुरई। उनका छपरा तौ जस पहिले उठति रहा है, वइसै अबहूँ उठी मुला गरीबन क्यार छपरा को छवाई? जो कउनिउ तना ते छाय ले तौ फिर ऊका उठावै वाले जन कहाँ ते अइहैं।

गरीबी हटावति हटावति कइयौ सरकारै हटि गयीं। गरीब दुखिया जहाँ खड़े रहैं हुआँ ते अउरु पीछे हटि आये, मुला गरीबी न अब लौं हटी है, न जल्दी हटै वाली है। अमीरी-गरीबी के पाटन मा आपसदारी धीरे-धीरे पिसी जाय रही है। तीका कोई इलाजु नाई है।

अब जब नोटन ते रिस्ता जुड़ि गा है तो बेइमानी-बदमासी औ मक्कारी करै मा जो साथु दे, जिहिकी बदौलति नोट मिलैं, वहै रिस्तेदार है, वहे से आपसदारी है। छपरा बिनु आपसदारी, न तौ छावा जाय सकी न उठावा जा सकी औ जौ आगि लागि जाय तौ बुझावौ न जाय सकी। हमरी लरिकईं मइहाँ सब याक दुसरे क्यार छपरा छवावै अउरु उठवावै जाति रहैं। अबहूँ छपरा उठवावै-क न्यउता आवति है मुला अब टाला-टाली कइकै सब अपन जिउ चोरावति हैं। जीके हाथेम लाठी है तीके सगरे काम हुई रहे हैं। कुछ जन तौ तिकड़म ते आपन काम निकारि रहे हैं, तेहूँ गाँव मा अइसन मनई जादा हैं जिनके काम कउनिउ तना नाई हुइ पाय रहे हैं। अइसे टेम मइहाँ उनका छपरा कस उठी?

अब न उइ सैकरन बाँसन वाली बाँसी रहि गई हैं, न छपरा खातिर बाँसै जुहाति हैं। फूस धीरे-धीरे फुर्रु हुइ गवा है। हाँ ऊँखन कै पाती औ झाँखर जरूर मिलि जाति हैं। बड़क्के किसान तौ पक्की हवेली बनवाय रहे हैं छोटकए कच्ची देवालन पर लेसाई लौ नाई कइ पाइ रहे हैं। मजूरी-धतूरी ते जो संझा तके लोनु रोटी जुरि जाय तौ जानौ बड़ी भागि है। कंगाली के साथै मँहगाई मुर्गा बनाये है। लकड़ी कटि-कटि राती-राता सहरन मा जाय रही है। फारेस्ट वाले खाय-पीकै सोय रहे हैं। हमका तुमका तौ थुनिहा औ चियारी तक नाई मिलै वाली है, बाता मइहाँ पगही बाँधे छपरा कै दिन रुकी, अरे रुकी कि ठाढ़ै न होई।

अइसी-वइसी बइठै ते, बीड़ी फूकै ते या सुर्ती मलै ते कुछु काम बनै वाला नाई है। लरिकई-म जब छपरा उठवावै जाइति रहै तौ बड़ा जोसु रहै, गाँव केरी ऊँची-नीची सब जाति क्यार आदमी आवति रहै। “अउरु लगा दे…हैंसा, जोर लगा दे..हैंसा। पुरबह वार खँइचौ रे, दखिनह वार थ्वारा रेलि देव” – ई तना के जुमला यादि आवति हैं। तब मालुम होति रहै गाँव ट्वाला सब कुछु अपनै देसु है।

तब जहाँ चहौ तहाँ चट्ट-पट्ट छपरा धरि दीन जाति रहै। अब न तौ रमजानी अपने ट्वाला ते अइहैं, न सुच्चा सिंह रामपालै केरि उम्मेद है। अइसे बुरे वखत मइहाँ कहाँ मूड़ु दइ मारी।

छपरा, जीमा कइयौ सिकहर लटके होति रहैं, कहूँ-कहूँ छोटकई चिरइया आपन *घरघुच्चु बनउती रहैं, जिनके ऊपर कबहूँ लउकी कबहूँ कदुआ केरि फसलि मिलति रही, जीपर बिलैया टहलती रहैं, जीके तरे जिंदगी-मउत, दीन-दुनिया केरि सब बतकही होति रहै, जीके तरे घरी भरि बइठि कै राहगीरौ जुड़ाति औ सँहताति रहै, जहाँ दुपहरिया मा कबौ किस्सा-कहानी, कबौ सुरबग्घी, औ कबहूँ कोटपीस ख्याला जाति रहै – अब उइ दिन कहाँ? अब जब प्यारु, दुलारु, मोहब्बति औ भइयाचारु नाई रहिगा तौ छपरा छावा जाय चहै न छावा जाय। उठवावा जाय चहै न उठवावा जाय, हमरी बलाय ते।

*घोसला
(‘कस परजवटि बिसारी’ किताब से)

एक साल अउर बीता__उन्मत्त / @१४ ढेरक्के सुभकामना!

Happy-New-Year-Wishes-2014-HD-Wallpapers-for-Laptops-Desktopsआप सबका २०१४ मुबारक! दुइ हजार तेरह जाय-जाय क अहै, औ दुइ हजार चौदह आवै-आवै क! अगिला भिनसार दुइ हजार चौदह कै पहिल भिनसार होये। सबके ताईं ई नौका साल बहुत छाजै, सबकै अरमान पुरायँ, हर मेर कै तरक्की सबका मिलै, जेकर गाड़ी जहाँ रुकी अहै औ जहमति मा फँसी अहै ऊ छुक-छुक कैके चलि परै, सबके बीचे सुमति ब्यापै औ कुमति बिनसै, अउर हाँ, सब अवधियन के गले से अवधी कै मिठास दिग-दिगन्त तक फैलै!

कुछ ब्यस्तता के चलते दुइ हजार तेरह मा यहि पोर्ट्ल पर जेतना काम हुवै क रहा, नाय होइ पावा। हम जीबिका के चक्कर मा यहिरी-वहिरी आवै-जाय मा रहि गयेन मुदा चौदह मा हम दिल्लिन मा रहब, अस्थिर होइके रहब तौ जादा काम कै सकब, चौदह मा ई पोर्टल अवधी ताईं पढ़ै बरे बढ़िया-बढ़िया चीजन क दै सके, हमैं अस भरोसा अहै!

यक साल अउर बीतिगा, जैसे कयिउ साल बीते, बीते साल कै हम लेख-जोखा देखी औ नये साल मा नीमन करै कै संकलप ली, यही नौके साल के ताईं सबसे जबर पैगाम होइ सकत है! आज यहि मौके पै अपने पसंदीदा कवि आद्या प्रसाद ‘उन्मत्त’ कै कविता ‘एक साल अउर बीता’ आपके साथ बांटा चाहित है, यहि दिलचस्प कबिता कै मजा लीन जाय! : संपादक
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”एक साल अउर बीता”__उन्मत्त

कुछ बीतिगा लड़कपन की मौज म, मस्ती मा
कुछ बीतिगा डगर मा सुनसान म, बस्ती मा
कुछ बीतिगा खोवइ मा कुछ बीतिगा पावइ मा
कुछ बीतिगा रोवइ मा कुछ बीतिगा गावइ मा।

का चूक भइ न कबहूँ सोचइ क भा सुभीता,
एक साल अउर बीता।

कबहूँ जनान दुनिया अबहीं उछिन्न होई
कबहूँ जनान सगरौ अब ताक धिन्न होई
कबहूँ बजी पिपिहिरी कबहूँ बजा नगाड़ा
गइ जरि कभौं उखाड़ी झंडा ग कभौं गाड़ा।

कबहूँ त बिना बातइ के लागिगा पलीता।
एक साल अउर बीता।

परसौं अहै दसहरा नरसौं अहै देवारी
सब आइ के चला गे तिउहार बारी-बारी
पनरा अगस्त आवा फिर आइ दुइ अक्तूबर
हफ्ता भरे कै झंझट फैलाइ गा नवंबर।

नापै के बरे जिनगी हर साल नवा फीता।
एक साल अउर बीता।

महजिद से ताल ठोंकेन मन्दिर से ताल ठोंकेन
केतनौ गयेन छोड़ावा फिर फिर से ताल ठोंकेन
बनि के धरमधुरी सब केतना रकत बहाएन
खूनइ क किहेन उल्टी खूनइ म खुब नहाएन।

दुइनौ छलाँग मारेन केउ बाघ केहू चीता।
एक साल अउर बीता।

दर्रान तलइयन के दिन फिर से किहे फेरा
घाटन प खिली सुतुही पानी म कुईं-बेरा
फिर हरसिंगार फूला फिर डार-डार गमकी
पछियाँव तनी ढुरका सगरी सेंवार गमकी।

गदराय गईं उखिया पियराइ गा पपीता।
एक साल अउर बीता।

हमरेउ अँजोर लौटइ तोहरेउ अँजोर लौटइ
इंसान की जिनगी मा फिर फिर से भोर लौटइ
धरती क भाग जागइ दुख औ दरिद्द भागइ
संसार के अँगना मा फिर जोत परब लागइ।

रावन क कै उछिन्नी लौटइ सुमति क सीता।
एक साल अउर बीता।

कवि: आद्या प्रसाद ‘उन्मत्त’

कवि श्री युक्तिभद्र दीक्षित ‘पुतान’ की क्रांतिकारी प्रगतिशील चेतना को नमन!

 

 पुतान जी

पुतान जी

बहुत अफसोस कै बाति है कि अवधी कै कवि युक्तिभद्र दीक्षित पुतान अब हमरे बीच नहीं हैं। औरौ अफसोस कै बाति है कि उनके बारे मा मीडिया वगैरह से कौनौ जानकारिव नाही दीन गै। लेकिन उत्साही युवा शैलेन्द्र शुक्ल तमाम खामियन का खतम करत औ हमार जानकारी बढावत ई ‘सरधांजलि’ आलेख भेजिन हैं। हम आभारी हन। : संपादक
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कवि श्री युक्तिभद्र दीक्षित ‘पुतान’ की क्रांतिकारी प्रगतिशील चेतना को नमन! 
__शैलेन्द्र कुमार शुक्ल

युक्तिभद्र दीक्षित “पुतान” आधुनिक अवधी काव्य परम्परा के विशिष्ट हस्ताक्षर हैँ,जिनका पिछले दिनोँ 24 जुलाई को निधन हो गया । ये अवधी की नयी लीक के प्रवर्तक महान क्राँतिकारी कवि बलभद्र प्रसाद दीक्षित पढ़ीस के पुत्र थे । क्रांति और कविता इन्हेँ विरासत मेँ मिली थी । ये सच्चे अर्थोँ मेँ पढ़ीस की परम्परा के उत्तराधिकारी थे ।इन्होँने अपने जीवन मेँ बड़े संघर्ष झेले ,लेकिन समझौते का रास्ता नहीँ अपनाया ,आखिर पुत्र ही ऐसे स्वाभिमानी व्यक्तित्व के थे।पुतान जी आकाशवाणी इलाहाबाद मेँ नौकरी करते थे । वहाँ ये किसानोँ के लिये कार्यक्रम मेँ मतई भइया / मतई काका के नाम से प्रसिद्ध हुये । पुतान जी ने पचीसोँ रेडियो नाटक और नौटंकी अवधी और भोजपुरी मेँ लिखीँ तथा उनमें भूमिका निभाई । वह लोक गीतोँ के बड़े अच्छे पारखी थे .वह बड़े अच्छे लोकगीत रचते और बहुत ही अच्छी लय मेँ गाते थे । मैँ पिछले साल जब इलाहाबाद उनसे जा कर मिला ,तब मैँ पढ़ीस जी के बारे मेँ उनसे जानने-समझनेँ को उत्सुक था ,लेकिन पुतान जी से मिलकर मुझे एक नये अध्याय के बारे मेँ पता चला । पुतान जी ने अपने कुछ गीत और कविताएँ बड़ी संजीदगी से सुनाई। वह आधुनिक अवधी साहित्य से हिँदी वालोँ की उदासीनता से दुखी थे , और अवधी के आधुनिक विद्वानोँ की संकुचित मानसिकता से उन्हेँ बड़ा कष्ट था । जो पूर्णतः जायज था।

उन्होँने अवधी और भोजपुरी दोनोँ मेँ श्रेष्ठतम कविताएँ रचीँ हैँ। उनकी कई काव्य पुस्तकोँ का प्रकाशन बहुत पहले परिमल प्रकाशन से हुआ था जिनका अब कहीँ अता पता नहीँ मिलता । उन्होँने स्वतंत्रता आंदोलन के समय कई महत्वपूर्ण रचनाएँ दी। उनकी कुछ कविताऔँ के उदाहरण डा.मधुप ने अपनी पुस्तक “अवधी साहित्य का इतिहास” मेँ दिया है।

वह प्रगतिवादी चेतना के कवि थे । वह प्राचीन रूढ़िवादी और पूंजीवादी समाज को मिटाकर एक अभिनव समाज की स्थापना करना चहते थे जिसमेँ न कोई शोषक हो न कोई शोषित । शासन व्यवस्था से असंतुष्ट कवि किसानों को क्रांति के लिये ललकारते हुये कहता है-

“रे छोड़ भला अब तो खटिया
दे फूँकि फूस की यह टटिया ।”

देश की खोखली आजादी पर प्रहार करती पुतान जी ये पंक्तियाँ देखिये-

“सब कहेँ मुलुक आजाद भवा
भारत का मिलिगै आजादी ।
मुलु तोरी मुरझुल्ली ठठरी पर
लदि गै और गरू लादी
आजाद भये हैँ संखपती
उइ तोरि करेजी काढ़ि सकैं।
आजाद भये सोँठी साहू
त्वांदन के मेटुका बाढ़ि सकैँ।”

उनके एक और क्रांतिकारी गीत की याद ताजा कीजिये –

“चेतु रे माली फुलबगिया के
बड़ी जुगुति ते साफु कीन तुयि
झंखरझार कटीले ।
दै दै रकतु प्रान रोपे रे
सुँदर बिरिछ छबीले ।
रहि ना जायं गुलाब के धोखे
काँटा झरबेरिया के।।”

हम अपनी माटी के बने अपने लोक कवि श्री युक्तिभद्र दीक्षित पुतान को याद करते हुये श्रद्धांजलि ज्ञापित करते हैँ ! उनकी क्रांतिकारी प्रगतिशील चेतना को नमन !!!

-शैलेन्द्र कुमार शुक्ल

कुटियन मा उजियारा होइहैं!__जुमई खां ‘आजाद’

majoor आज मजूर-दिवस आय। यहि मौके पै अवधी कवि जुमई खां ‘आजाद’ कै ई रचना हाजिर है, जेहिमा सोसक लोगन के खिलाफ बगावती सुर बुलंद कीन गा है। : संपादक 
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कुटियन मा उजियारा होइहैं!__जुमई खां आजाद

“दुखिया मजूर की मेहनत पर,
कब तलक मलाई उड़ति रहे।
इनकी खोपड़ी पै महलन मा,
कब तक सहनाई बजति रहे॥
ई तड़क-भड़क, बैभव-बिलास,
एनहीं कै गाढ़ि कमाई आ।
ई महल जौन देखत बाट्‌या,
एनहीं कै नींव जमाई आ॥
ई कब तक तोहरी मोटर पर,
कुकुरे कै पिलवा सफर करी।
औ कब तक ई दुखिया मजूर,
आधी रोटी पर गुजर करी॥
जब कबौ बगावत कै ज्वाला,
इनके भीतर से भभकि उठी।
तूफान उठी तब झोपड़िन से,
महलन कै इंटिया खसकि उठी॥
‘आजाद’ कहैं तब बुझि न सकी,
चिनगारिउ अंगारा होइहैं।
तब जरिहैं महल-किला-कोठी,
कुटियन मा उजियारा होइहैं॥”
__जुमई खां ‘आजाद’